Dhurandhar 2 ने रिलीज से पहले तोड़ा 'पुष्पा 2' का रिकॉर्ड, इतने रुपये में बिका भारत का सबसे महंगा टिकट?
Dhurandhar 2 Breaks Pushpa 2 Record: बॉलीवुड के वर्सेटाइल एक्टर रणवीर सिंह (Ranveer Singh) अपनी अपकमिंग फिल्म को लेकर चर्चा में हैं. उनकी 'धुरंधर- द रिवेंज' (Dhurandhar: The Revenge) फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है. फिल्म का रिलीज होने से पहले ही चारों-ओर बज बना हुआ है. साथ ही एक के बाद एक रिकॉर्ड तोड़ रही है. अभी हाल ही में ही धुरंधर-2 के डायरेक्टर आदित्य धार ने ट्रेलर लॉन्च किया था, जिसे लोग बहुत पसंद कर रहे हैं. फिल्म की एडवांस बुकिंग भी शुरू कर दी है और इसने टिकट प्राइस के मामले में अल्लू अर्जुन की 'पुष्पा-2' का रिकॉर्ड तोड़ दिया है. चलिए जानते हैं कि धुरंधर-2 का टिकट कितने में बिका है-
धुरंधर-2 का टिकट प्राइस 31,00 रुपये
धुरंधर-2 के एडवांस प्रीव्यू शो का टिकट 31,00 रुपये में बिक रहा है. बॉलीवुड हंगामा की एक रिपोर्ट के मुबाबिक, बोरिवली के स्काई सिटी मॉल में स्थित आईनॉक्स मेगाप्लेक्स के INSIGNIA क्लास में टिकट के प्राइज आसमान छू रहे हैं. यहां पर 10:15 pm और 11:15 pm के शोज में रिक्लाइनर सीट्स 2900 रुपये में हैं, जबकि प्राइम रिक्लाइनर सीट का प्राइस 31,000 रुपये है. बता दें कि ये टिकट प्राइज बिना टैक्स के है. ऐसे में भारत में इस फिल्म का ये सबसे मंहगा टिकट है.
पुष्पा-2 का तोड़ा रिकॉर्ड
'धुरंधर: द रिवेंज' (Dhurandhar: The Revenge) ने प्रीव्यू शो की एडवांस बुकिंग के मामले में 'पुष्पा-2' का रिकॉर्ड तोड़ दिया है. पुष्पा-2 का मुंबई के Maison PVR में एक प्रीमियम टिकट प्राइज 3,000 रुपये था तो वहीं धुरंधर-2 का प्राइज इससे 100 रुपये ज्यादा में मिल रहा है. ऐसे में अब धुरंधर-2 के नाम सबसे महंगा टिकट बेचने का रिकॉर्ड बन गया है. इसी के साथ 18 मार्च को पेड़ प्रीव्यू शो के लिए जबरदस्त बुकिंग चल रही है. रिपोर्ट के मुताबिक फिल्म ने अब तक 4 लाख से ज्यादा टिकट बेच दिए हैं. फिल्म 19 मार्च को दुनियाभर के सिनेमाघरों में रिलीज होगी.
रणवीर का देखने को मिलेगा नया अवतार
अगर धुरंधर के सीक्वल की कहानी की बात करें, तो इसमें धुरंधर के पहले को आगे बढ़ाया गया है. ट्रेलर देखने से पता चलता है कि इस बार कहानी का मैन किरदार हमजा का होगा. फिल्म में दिखाया जाएगा कि किस तरह हमजा (रणवीर सिंह) पहले जसकीरत सिंह रंगी होता है और फिर अपनी पहचान बदलकर मुस्लिम बनता है, ताकि वह पाकिस्तान में स्पाई बनकर अपने मिशन को अंजाम दे सके. इस रोल में रणवीर सिंह का काफी खतरनाक और दमदार अवतार देखने को मिलने वाला है.
फिल्म में यह भी दिखाया जाएगा कि हमजा किस तरह ट्रेनिंग हासिल करता है और धीरे-धीरे एक स्पाई बन जाता है. पहले पार्ट में दिखाया गया था कि रहमान डकैत (अक्षय खन्ना) की मौत हो जाती है, जिसके बाद पाकिस्तान के लियारी इलाके में सत्ता को लेकर संघर्ष शुरू हो जाता है.
अब पार्ट में कहानी वहीं से आगे बढ़ेगी, जहां हमजा इस इलाके का बादशाह बनने की कोशिश करेगा और वहां फैले आतंकी नेटवर्क को खत्म करने के मिशन पर निकलेगा. हालांकि फिल्म में और भी कई बड़े ट्विस्ट और एक्शन देखने को मिलेंगे, जिसका फिल्म रिलीज होने के बाद होगा.
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कहां खो जाते हैं पुराने सैटेलाइट? जानिए 'ग्रेवयार्ड ऑर्बिट' और अंतरिक्ष के अनोखे 'कब्रिस्तान' का रहस्य
नई दिल्ली, 13 मार्च (आईएएनएस)। अंतरिक्ष में हजारों सैटेलाइट काम कर रहे हैं, लेकिन हर मशीन की तरह ये भी हमेशा नहीं चलते। मौसम की निगरानी, ग्रीनहाउस गैस मापन या दूर के तारों का अध्ययन करने वाले सैटेलाइट आखिरकार पुराने हो जाते हैं, खराब हो जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है पुराने सैटेलाइट के साथ क्या होता है? क्या वे अंतरिक्ष में ही घूमते रहते हैं या उनका कोई अंत होता है?
ज्यादातर मामलों में दो मुख्य तरीके अपनाए जाते हैं, जो सैटेलाइट की ऊंचाई पर निर्भर करते हैं। पहला तरीका कम ऊंचाई वाली कक्षाओं यानी लो अर्थ ऑर्बिट के लिए है। इसमें इंजीनियर सैटेलाइट में बचे हुए थोड़े ईंधन का इस्तेमाल करके उसकी गति धीमी कर देते हैं। इससे सैटेलाइट अपनी कक्षा से नीचे आ जाता है और पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर जाता है। बहुत तेज गति से गिरते हुए हवा के घर्षण से इतनी गर्मी पैदा होती है कि सैटेलाइट पूरी तरह जलकर राख हो जाता है। छोटे सैटेलाइट के लिए यह आसान और सुरक्षित तरीका ह, कोई मलबा जमीन पर नहीं पहुंचता। लेकिन बड़े सैटेलाइट, अंतरिक्ष स्टेशन या अन्य बड़े यान पूरी तरह नहीं जल पाते। ऐसे में नियंत्रित तरीके से उन्हें गिराया जाता है ताकि मलबा सुरक्षित जगह पर गिरे।
इसके लिए प्रशांत महासागर में एक खास इलाका चुना जाता है, जिसे स्पेसक्राफ्ट कब्रिस्तान या अंतरिक्ष यान का कब्रिस्तान कहते हैं। यह जगह पॉइंट निमो के आसपास है, जो पृथ्वी पर सबसे दूरस्थ समुद्री क्षेत्र है। यहां से जमीन की दूरी लगभग 2,600 किलोमीटर से ज्यादा है। न्यूजीलैंड से हजारों किलोमीटर दूर होने के कारण जहाज बहुत कम आते हैं, इसलिए कोई खतरा नहीं। मिर स्पेस स्टेशन, कई साल्यूट स्टेशन और अन्य बड़े यान इसी जगह पर गिराए गए हैं।
वहीं, दूसरा तरीका ऊंची कक्षाओं जैसे जियोस्टेशनरी ऑर्बिट के लिए है। यहां सैटेलाइट को पृथ्वी की ओर वापस लाने के लिए बहुत ज्यादा ईंधन चाहिए। इसलिए इंजीनियर उन्हें और दूर, ग्रेवयार्ड ऑर्बिट या कब्रिस्तान वाली कक्षा में भेज देते हैं। यह कक्षा सामान्य जियोस्टेशनरी ऑर्बिट से 200-300 किलोमीटर या इससे ज्यादा ऊपर होती है, लगभग 36 हजार किलोमीटर से अधिक ऊंचाई पर होती है। यहां सैटेलाइट सुरक्षित रहते हैं, सक्रिय सैटेलाइट से टकराव का खतरा कम होता है। ये सैटेलाइट हजारों साल तक वहीं घूमते रह सकते हैं।
सवाल यह भी है कि आखिरकार पुराने सैटेलाइट हटाना जरूरी क्यों है? अमेरिकी स्पेस एजेंसी के अनुसार, आज पृथ्वी की कक्षा में कई सक्रिय सैटेलाइट हैं, साथ ही लाखों टुकड़े कबाड़ या स्पेस डेब्री हैं। ये टुकड़े काम कर रहे सैटेलाइट या अंतरिक्ष यानों से टकरा सकते हैं। एक टक्कर से और ज्यादा टुकड़े बनते हैं, जो और टक्कर पैदा करते हैं यह चेन रिएक्शन केसलर सिंड्रोम या केसलर इफेक्ट कहलाता है। अगर यह शुरू हुआ तो कुछ कक्षाएं इस्तेमाल के लायक नहीं रहेंगी, संचार, जीपीएस, मौसम पूर्वानुमान सब प्रभावित होंगे।
--आईएएनएस
एमटी/एएस
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