बेंगलुरु भर में पेइंग गेस्ट (पीजी) आवासों को व्यावसायिक एलपीजी सिलेंडरों की कमी के कारण नियमित भोजन तैयार करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इस स्थिति ने कई पीजी मालिकों को अपने मेनू में बदलाव करने और निवासियों के लिए कुछ खाद्य सेवाओं को कम करने के लिए मजबूर कर दिया है। पीजी ओनर्स वेलफेयर एसोसिएशन-बैंगलोर ने अस्थायी दिशानिर्देश जारी कर पीजी संचालकों से खाना पकाने के लिए गैस का सावधानीपूर्वक उपयोग करने को कहा है ताकि हजारों निवासियों के लिए खाद्य सेवाएं बिना किसी बड़ी बाधा के जारी रह सकें। एसोसिएशन के अनुसार, शहर के कई पीजी रसोईघरों को व्यावसायिक गैस सिलेंडर प्राप्त करने में पहले से ही कठिनाई हो रही है, जो दैनिक भोजन तैयार करने के लिए आवश्यक हैं।
डोसा और पूरी पर अस्थायी रोक लगा दी गई
गैस की खपत कम करने के लिए, पीजी मालिकों को ऐसे व्यंजन बनाने से बचने की सलाह दी गई है जिनमें अधिक समय लगता है या जिन्हें डीप फ्राई करना पड़ता है। इसका मतलब है कि डोसा, पूरी, चपाती, इडली और बोंडा जैसे लोकप्रिय व्यंजन फिलहाल नहीं परोसे जा सकेंगे। इसके बजाय, रसोईघरों को बिसीबेलेबाथ, चित्रान्ना और पुलियोगारे जैसे साधारण चावल आधारित व्यंजन बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिनमें कम गैस लगती है और जिन्हें आसानी से पकाया जा सकता है। पीजी प्रबंधकों ने सलाद, फ्रूट सलाद और अन्य ऐसे खाद्य पदार्थ भी शामिल करना शुरू कर दिया है जिनमें कम या बिल्कुल भी पकाने की आवश्यकता नहीं होती है।
वर्किंग डे में भोजन की आवृत्ति कम की गई
एसोसिएशन द्वारा सुझाया गया एक अन्य उपाय सप्ताह के दौरान परोसे जाने वाले भोजन की संख्या कम करना है। पीजी को सोमवार से शुक्रवार तक प्रतिदिन दो बार भोजन उपलब्ध कराने के लिए कहा गया है, जबकि निवासियों को अपना लंच पैक करके लाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। हालांकि, सप्ताहांत में, जब निवासी आमतौर पर अपने आवास में अधिक समय बिताते हैं, तो प्रतिदिन तीन बार भोजन उपलब्ध कराया जा सकता है। इन उपायों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गैस की कमी जारी रहने पर भी भोजन सेवाएं पूरी तरह से बंद न हों।
खाना पकाने के वैकल्पिक तरीकों पर विचार किया जा रहा है
पेट्रोलियम मालिक एलपीजी पर पूरी तरह निर्भर हुए बिना खाना पकाने के अन्य तरीकों की भी खोज कर रहे हैं। कई लोगों ने खाना बनाने के लिए इंडक्शन स्टोव, इलेक्ट्रिक कुकर और राइस कुकर का उपयोग करना शुरू कर दिया है।
छोटे पेट्रोलियमों को 20 लीटर के इलेक्ट्रिक राइस कुकर का उपयोग करने की सलाह दी गई है, जो कम गैस का उपयोग करते हुए कई निवासियों के लिए खाना बना सकते हैं। एक और विचार जिस पर चर्चा हो रही है, वह है साझा खाना पकाने की व्यवस्था, जिसमें एक पेट्रोलियम की रसोई आस-पास के पेट्रोलियमों के लिए खाना तैयार करती है और भोजन वितरित करती है।
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पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक बयान वैश्विक राजनीति में नया विवाद खड़ा कर रहा है। दरअसल ट्रंप ने एक जनसभा में खड़े होकर जोरदार अंदाज में ऐलान कर दिया कि अमेरिका इस युद्ध को जीत चुका है। लेकिन सवाल यह है कि जब ईरान खुलकर कह रहा है कि वह झुकने को तैयार नहीं है और उसने युद्ध समाप्त करने के लिए कड़ी शर्तें रख दी हैं, तब आखिर ट्रंप किस जीत का ऐलान कर रहे हैं?
हम आपको बता दें कि केन्टकी के हेब्रोन में आयोजित एक सभा में बोलते हुए ट्रंप ने मध्य पूर्व में अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किये गये हमलों का जिक्र किया। भाषण के दौरान उन्होंने महज कुछ ही सेकंड में कई बार कहा कि अमेरिका युद्ध जीत चुका है। उनका दावा था कि युद्ध की शुरुआत के पहले ही घंटे में सब कुछ लगभग समाप्त हो गया था।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि जीत का यह दावा करते हुए खुद ट्रंप ने उसी भाषण में यह भी कहा कि जीत का ऐलान करते समय सावधान रहना चाहिए। यानी पहले उन्होंने युद्ध समाप्त होने और अमेरिका की जीत की बात कही और तुरंत बाद अपने ही बयान से पीछे हटते नजर आये। यही विरोधाभास अब पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है।
सोशल मीडिया पर भी लोगों ने इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। कई लोगों ने सवाल उठाया कि जब मध्य पूर्व में अमेरिकी ठिकानों पर हमले अब भी जारी हैं, तब यह जीत कैसी। कुछ प्रतिक्रियाओं में यह भी कहा गया कि अगर अमेरिका सचमुच जीत गया है तो फिर अमेरिकी सैनिक अब तक घर क्यों नहीं लौटे?
दरअसल जमीन पर हालात बिल्कुल अलग कहानी बता रहे हैं। पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व में जारी यह संघर्ष अब अपने तेरहवें दिन में प्रवेश कर चुका है। अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान पर संयुक्त हमले किये थे, जिसके बाद से लगातार हमले और जवाबी हमले हो रहे हैं। अब तक इस संघर्ष में लगभग बारह सौ लोगों की जान जा चुकी है।
इस बीच, ईरान ने युद्ध समाप्त करने के लिए तीन स्पष्ट शर्तें सामने रख दी हैं। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने रूस और पाकिस्तान से बातचीत के बाद यह संदेश दिया है कि अगर वास्तव में शांति चाहिए तो सबसे पहले ईरान के वैध अधिकारों को मान्यता देनी होगी। दूसरी शर्त यह रखी गयी कि युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई की जाये। तीसरी और सबसे अहम शर्त यह है कि भविष्य में ईरान के खिलाफ किसी भी आक्रमण को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ठोस गारंटी दी जाये।
इन शर्तों से साफ संकेत मिलता है कि ईरान पीछे हटने के मूड़ में नहीं है। बल्कि वह इस संघर्ष को अपने अधिकारों की लड़ाई के रूप में पेश कर रहा है। अगर कोई देश अपनी शर्तों के साथ बातचीत की मेज पर खड़ा है, तो इसे उसकी हार कैसे कहा जा सकता है?
यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है। जब ईरान युद्ध समाप्त करने के लिए कठोर शर्तें रख रहा है, जब संघर्ष जारी है, जब अमेरिकी सैनिक अब भी पश्चिम एशिया में तैनात हैं, तब ट्रंप किस आधार पर जीत का दावा कर रहे हैं?
युद्ध के मैदान में जीत का मतलब होता है विरोधी का झुक जाना या संघर्ष का समाप्त हो जाना। लेकिन यहां तो दोनों में से कोई भी स्थिति नजर नहीं आती। उलटे हालात यह दिखा रहे हैं कि संघर्ष और फैल सकता है।
देखा जाये तो इस युद्ध का असर केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं है। ईरान के तेल टैंकरों पर हमले और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से दुनिया भर में कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसके कारण वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है। यानी यह संघर्ष केवल दो या तीन देशों का मामला नहीं रह गया बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ रहा है।
ट्रंप के बयान के बाद एक और सवाल उठ रहा है कि क्या यह राजनीतिक संदेश देने की कोशिश है? अक्सर चुनावी माहौल या घरेलू दबाव के समय नेता युद्ध को जीत के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं, भले ही जमीन पर स्थिति अलग हो। सवाल उठता है कि अगर वास्तव में युद्ध समाप्त हो चुका है तो फिर मध्य पूर्व में अमेरिकी दूतावासों से कर्मचारियों को निकालने की तैयारी क्यों चल रही है? अगर जीत मिल चुकी है तो फिर क्षेत्र में तनाव लगातार क्यों बढ़ रहा है?
यही विरोधाभास ट्रंप के दावे को कमजोर करता है। एक तरफ जीत का ऐलान, दूसरी तरफ जारी संघर्ष। एक तरफ विजय की घोषणा, दूसरी तरफ ईरान की कड़ी शर्तें। पश्चिम एशिया का यह युद्ध अब केवल सैन्य संघर्ष नहीं बल्कि राजनीतिक बयानबाजी की जंग भी बन चुका है। ट्रंप का विजय दावा और ईरान की शर्तें इस टकराव को और तीखा बना रही हैं। हालांकि सच यही है कि जब तक गोलियां चल रही हैं, जब तक सैनिक मोर्चे पर खड़े हैं और जब तक बातचीत की मेज पर शर्तों की लड़ाई जारी है, तब तक किसी भी पक्ष की जीत का ऐलान केवल शब्दों का शोर लगता है, हकीकत नहीं। और यही वह सवाल है जो आज पूरी दुनिया पूछ रही है। जब ईरान हार नहीं मान रहा, तब ट्रंप आखिर जीत कैसे गये?
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