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'जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की वजह वाजिब थी', 2000 Gen Z से बतचीत में बोले-आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने युवाओं के आंदोलनों और खासकर Gen-Z की भागीदारी को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है.  उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने का अधिकार सभी को है, लेकिन किसी भी आंदोलन का तरीका मर्यादित और सकारात्मक होना चाहिए. उन्होंने कहा जंतर-मंतर पर जो प्रदर्शन हुआ उसकी वजह वाजिब थी, लेकिन मर्यादाओं को तोड़ना ठीक नहीं. 

भागवत ने स्पष्ट किया कि केवल किसी मुद्दे को लेकर प्रदर्शन करने से युवाओं को देशविरोधी नहीं कहा जा सकता.  उन्होंने कहा कि जो युवा आवाज उठा रहे हैं, वे भी इसी देश के नागरिक हैं और आने वाली पीढ़ी का हिस्सा हैं. ऐसे में उनके विचारों और चिंताओं को समझना जरूरी है.

Gen-Z को बताया ईमानदार और देशभक्त पीढ़ी

एक बातचीत के दौरान Gen-Z के आंदोलनों पर पूछे गए सवाल के जवाब में मोहन भागवत ने कहा कि युवा पीढ़ी को लेकर नकारात्मक धारणा बनाना सही नहीं है. उन्होंने कहा कि उनके अनुभव के अनुसार Gen-Z और Gen Alpha जैसी नई पीढ़ियां कई मामलों में पहले की पीढ़ियों से अधिक ईमानदार हैं.

उन्होंने कहा कि युवाओं में देश के प्रति भावना और जिम्मेदारी की भावना भी मजबूत है. जरूरत इस बात की है कि पुरानी और नई पीढ़ी के बीच संवाद बना रहे. उन्होंने कहा कि जैसे युवाओं को बुजुर्गों की बात समझनी चाहिए, वैसे ही बड़ी पीढ़ी को भी युवाओं के विचारों और सवालों को समझना चाहिए.

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नाम था '15 अगस्त', पोस्टर में दिखा तिरंगा, फिर भी इस फिल्मा का देशभक्ति और आजादी से दूर-दूर तक नहीं है नाता

Independence Day 2026: हर साल स्वतंत्रता दिवस के आसपास सिनेमाघरों में देशभक्ति से जुड़ी फिल्मों की धूम देखने को मिलती है. बॉलीवुड ने समय-समय पर ऐसी कई यादगार फिल्में दी हैं, जिन्होंने देशप्रेम की भावना को बड़े पर्दे पर शानदार अंदाज में पेश किया. 'बॉर्डर', 'लगान', 'द लीजेंड ऑफ भगत सिंह', 'उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक', 'शेरशाह' और 'रंग दे बसंती' जैसी फिल्मों ने दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई है.

लेकिन बॉलीवुड के इतिहास में एक ऐसी फिल्म भी बनी, जिसका नाम सुनते ही हर किसी को लगा कि ये देशभक्ति पर आधारित होगी. फिल्म का नाम था '15 अगस्त'. इतना ही नहीं, इसका पोस्टर भी तिरंगे के रंग यानी केसरिया, सफेद और हरे रंग की थीम पर तैयार किया गया था. लेकिन जब दर्शक फिल्म देखने पहुंचे तो उन्हें देशभक्ति नहीं, बल्कि मर्डर, साजिश, भ्रष्टाचार और सस्पेंस से भरी कहानी देखने को मिली. यही वजह रही कि फिल्म दर्शकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी और बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप साबित हुई. 

नाम ने पैदा की देशभक्ति वाली फिल्म की उम्मीद

'15 अगस्त' नाम सुनते ही आम तौर पर लोगों के मन में आजादी, स्वतंत्रता संग्राम या देशप्रेम से जुड़ी कहानी की छवि बनती है. फिल्म के पोस्टर ने भी यही संकेत दिया था. तिरंगे के रंगों से सजे पोस्टर को देखकर दर्शकों को लगा कि ये फिल्म स्वतंत्रता दिवस या देशभक्ति पर आधारित होगी. लेकिन रिलीज के बाद लोगों को पता चला कि फिल्म का भारत की आजादी या देशभक्ति से कोई सीधा संबंध नहीं है. इसकी कहानी पूरी तरह अपराध, हत्या, साजिश और बदले के इर्द-गिर्द घूमती है. यही बात उस समय दर्शकों के लिए सबसे बड़ा सरप्राइज भी बनी और कई लोगों के लिए निराशा का कारण भी.

क्या थी फिल्म की कहानी?

साल 1993 में रिलीज हुई '15 अगस्त' एक थ्रिलर-ड्रामा फिल्म थी. फिल्म की कहानी विक्रम नाम के एक आम आदमी के इर्द-गिर्द घूमती है. एक दिन वो अपनी आंखों के सामने एक पुलिस अधिकारी की हत्या होते देख लेता है. इस घटना के बाद उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है. हत्या का चश्मदीद गवाह बनने के बाद विक्रम डर जाता है और न्याय की उम्मीद लेकर नजदीकी पुलिस स्टेशन पहुंचता है ताकि अपराधियों के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सके.

लेकिन कहानी यहीं से अनएक्सपेक्टेड मोड़ लेती है. जिस पुलिस से उसे इंसाफ की उम्मीद होती है, वही पुलिस उसकी बात सुनने के बजाय उसे ही शक के दायरे में ले आती है. हालात ऐसे बनते हैं कि अपराधी खुलेआम घूमते रहते हैं और निर्दोष व्यक्ति खुद मुश्किलों में फंस जाता है. इसके बाद फिल्म में लगातार ऐसे मोड़ आते हैं, जो दर्शकों को अंत तक बांधे रखने की कोशिश करते हैं.

मर्डर, साजिश और बदले की कहानी

फिल्म आगे बढ़ने के साथ कई रहस्य सामने आते हैं. हत्या के पीछे छिपी साजिश, राजनीतिक दबाव और सत्ता के खेल को कहानी में शामिल किया गया है. फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह सच बोलने वाला इंसान खुद कानून के जाल में फंस जाता है, जबकि असली अपराधी अपनी ताकत और पहुंच का इस्तेमाल कर बच निकलने की कोशिश करते हैं. कहानी में बदले की भावना, राजनीतिक षड्यंत्र और भ्रष्ट व्यवस्था को भी अहम हिस्सा बनाया गया है. यही कारण है कि ये फिल्म पूरी तरह एक क्राइम थ्रिलर बनकर सामने आई, न कि देशभक्ति पर आधारित किसी कहानी के रूप में.

रौनित रॉय ने निभाई थी मुख्य भूमिका

फिल्म में मुख्य किरदार एक्टर रौनित रॉय ने निभाया था. उस दौर में वो अपने करियर के शुरुआती चरण में थे और अलग-अलग तरह की भूमिकाएं निभाने की कोशिश कर रहे थे. रौनित रॉय ने विक्रम के किरदार में एक ऐसे आम इंसान की भूमिका निभाई, जो अचानक अपराध और भ्रष्ट व्यवस्था के जाल में फंस जाता है. फिल्म में प्रेम चोपड़ा भी अहम भूमिका में नजर आए. उन्होंने एक दमदार मंत्री का किरदार निभाया, जिसके आसपास कहानी के कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम घूमते हैं. दोनों कलाकारों ने अपने-अपने किरदारों को पूरी गंभीरता से निभाया, लेकिन मजबूत अभिनय भी फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर सफलता नहीं दिला सका.

आखिर क्यों नहीं चली फिल्म?

रिपोर्ट्स और उस समय की चर्चाओं के मुताबिक, फिल्म का सबसे बड़ा कमजोर पक्ष उसका नाम माना गया. दर्शक सिनेमाघरों में देशभक्ति की कहानी देखने की उम्मीद लेकर पहुंचे थे, लेकिन उन्हें पूरी तरह अलग टॉपिक पर बनी फिल्म देखने को मिली. इस वजह से कई दर्शकों ने खुद को ठगा हुआ महसूस किया. फिल्म का टॉपिक भले ही अलग था लेकिन उसके प्रचार और शीर्षक ने लोगों के मन में दूसरी तरह की उम्मीदें पैदा कर दी थीं. यही वजह रही कि फिल्म को शुरुआती दिनों से ही दर्शकों का एक्सपेक्टेड सपोर्ट नहीं मिला.

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