ट्रम्प ने मिडटर्म चुनाव में हार से पल्ला झाड़ा:पहले खुद को चेहरा बता रहे थे, चुनाव प्रचार में 47 बार अपने नाम पर वोट मांगा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की करारी हार से पल्ला झाड़ लिया है। चुनाव प्रचार के दौरान वे बार-बार खुद को चुनाव का चेहरा बता रहे थे और वोटर्स से उन्हें उम्मीदवार मानकर वोट देने की अपील कर रहे थे। उन्होंने 47 बार खुद के नाम पर लोगों से वोट देने के लिए कहा। लेकिन नतीजे आने के बाद ट्रम्प ने कहा कि वे खुद चुनाव में उम्मीदवार नहीं थे, इसलिए रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक बड़ी संख्या में वोट डालने नहीं पहुंचे। इस चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट, दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर लिया है। यह ट्रम्प के लिए बड़ा झटका है। अब डेमोक्रेट्स के पास उनके कार्यकाल के बचे हुए दो साल में उनके फैसलों और योजनाओं को रोकने की ताकत होगी। ट्रम्प बोले- मैं बैलेट पर नहीं था, इसलिए हार हुई चुनाव नतीजे आने के बाद ट्रम्प ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा, “मैं चुनाव में उम्मीदवार नहीं था। इसी वजह से हम ज्यादा लोगों को वोट डालने के लिए नहीं ला सके।” ट्रम्प का यह बयान उनके चुनाव प्रचार से बिल्कुल उलट है। उस दौरान वे खुद को चुनाव का सबसे बड़ा चेहरा बता रहे थे। उन्होंने उम्मीदवारों के चयन से लेकर चुनावी मुद्दों, रणनीति और प्रचार के संदेश तक में दखल दिया था। उन्होंने बार-बार वोटर्स से कहा था कि वे उनके कामकाज को ध्यान में रखकर वोट दें। यानी जीत की उम्मीद थी तो ट्रम्प खुद चुनाव का चेहरा थे, लेकिन हार मिली तो उन्होंने खुद को चुनाव से अलग बता दिया। महंगाई और ईरान युद्ध से नाराज थे वोटर्स रिपब्लिकन पार्टी की हार के पीछे महंगाई और ईरान युद्ध को बड़ी वजह माना जा रहा है। ट्रम्प ने सत्ता में आने से पहले महंगाई कम करने और अमेरिका को नए युद्धों से दूर रखने का वादा किया था। लेकिन उनके कार्यकाल में ईरान के साथ युद्ध शुरू हो गया। इससे तेल की कीमतें बढ़ीं और अमेरिका में पेट्रोल महंगा हो गया। कई वोटर्स को लगा कि ट्रम्प ने उनसे किए वादे पूरे नहीं किए। वे महंगाई से राहत और सुरक्षित सीमा चाहते थे, लेकिन उन्हें महंगी चीजों और नई जंग का सामना करना पड़ा। दूसरे देशों से आने वाले सामान पर ट्रम्प के लगाए टैक्स ने भी लोगों की जेब पर बोझ बढ़ाया। प्रवासियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई से भी लोग नाराज थे। सरकार ने ऐसे लोगों को भी गिरफ्तार किया जो कई सालों से अमेरिका में रह रहे थे। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी ईरान जंग को चुनाव में हार की वजह बताया। ट्रम्प के पसंदीदा उम्मीदवार भी चुनाव हार गए ट्रम्प ने अपनी पसंद के नेताओं को रिपब्लिकन पार्टी का उम्मीदवार बनवाने में भी पूरी ताकत लगाई थी। लेकिन उनके पसंदीदा उम्मीदवार भी चुनाव नहीं जीत पाए। टेक्सास में केन पैक्सटन और साउथ कैरोलाइना में डार्लिन ग्राहम को ट्रम्प ने खुद समर्थन दिया था। इसके बावजूद दोनों हार गए। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना था कि दूसरे उम्मीदवार चुनाव जीतने के लिए बेहतर थे। ट्रम्प ने अपनी पार्टी को ज्यादा सीटें दिलाने के लिए कई राज्यों में चुनाव क्षेत्रों की सीमाएं भी बदलवाने की कोशिश की थी। लेकिन उनका यह दांव उलटा पड़ गया। डेमोक्रेट्स ने उन इलाकों में भी अच्छा प्रदर्शन किया, जहां रिपब्लिकन पार्टी मजबूत मानी जाती है। फ्लोरिडा में कैथी कैस्टर अपनी सीट बचाने में कामयाब रहीं। उनके चुनाव क्षेत्र में 2024 के मुकाबले डेमोक्रेट्स को करीब 16 प्रतिशत अंक ज्यादा वोट मिले। डेमोक्रेट्स के पास अब ट्रम्प के फैसले रोकने की ताकत दोनों सदनों में बहुमत गंवाने के बाद ट्रम्प के लिए अपने एजेंडे को लागू करना आसान नहीं होगा। डेमोक्रेट्स उनके प्रस्तावों को रोक सकते हैं और सरकार के फैसलों पर सवाल उठा सकते हैं। राष्ट्रपति के तौर पर ट्रम्प के पास अभी दो साल का समय है, लेकिन अब उन्हें संसद में विपक्ष का सामना करना पड़ेगा। ट्रम्प ने कहा है कि वे डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली कांग्रेस के साथ मिलकर काम करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि वे अगले दो साल सिर्फ हर प्रस्ताव पर वीटो लगाते हुए नहीं बिताना चाहते। हालांकि, इससे पहले वे कह चुके थे कि डेमोक्रेट्स के बहुमत में आने पर वे 'मिस्टर वीटो' बन जाएंगे। ट्रम्प के समर्थक बोले- उनकी राजनीति अभी खत्म नहीं हुई ट्रम्प के समर्थकों का कहना है कि चुनावी हार को उनकी राजनीति का अंत नहीं मानना चाहिए। क्लब फॉर ग्रोथ के अध्यक्ष डेविड मैकिंटोश ने कहा कि ट्रम्प के विरोधी पहले भी कई बार उनके राजनीतिक अंत की बात कह चुके हैं, लेकिन हर बार गलत साबित हुए। अमेरिका के इतिहास में भी कई बार सत्ताधारी पार्टी को मिडटर्म चुनाव में बड़ी हार का सामना करना पड़ा, लेकिन बाद में उसने वापसी की। 1974 में वॉटरगेट कांड के बाद रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा नुकसान हुआ था, लेकिन छह साल बाद रोनाल्ड रीगन राष्ट्रपति बन गए। इसी तरह 1994 में बिल क्लिंटन और 2010 में बराक ओबामा की पार्टी को मिडटर्म चुनाव में हार मिली थी, लेकिन दोनों नेता दो साल बाद राष्ट्रपति चुनाव जीत गए थे। डेमोक्रेट्स के सामने भी जीत को बनाए रखने की चुनौती डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत के बाद अब उसके भीतर भी इस बात पर बहस होगी कि इस सफलता की असली वजह क्या रही। पार्टी को ट्रम्प के विरोध का फायदा मिला। लेकिन कुछ नेताओं का मानना है कि वामपंथी विचारों वाले वोटर्स के समर्थन ने जीत दिलाई, जबकि दूसरे नेताओं के मुताबिक, रिपब्लिकन पार्टी से नाराज वोटर्स का साथ मिलना ज्यादा अहम रहा। पूर्व डेमोक्रेटिक नेता रहम इमैनुएल ने कहा कि अब पार्टी को तय करना होगा कि वह इस जीत को सिर्फ चुनावी सफलता मानती है या इसे अमेरिकी राजनीति में बड़े बदलाव का मौका बनाती है। उनके मुताबिक, 2027 में पार्टी जो फैसले लेगी, उनसे तय होगा कि यह जीत कितनी दूर तक असर डालेगी। ----------------------
अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में 5 भारतवंशी जीते:सभी डेमोक्रेटिक पार्टी के मेंबर; ट्रम्प ने विवेक रामास्वामी का प्रचार किया, फिर भी हार गए
अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में 5 भारतवंशी नेताओं ने हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के चुनाव जीत हासिल की है। जबकि एक उम्मीदवार अमीष शाह आगे चल रहे हैं। ये सभी डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्य हैं। इनमें रो खन्ना, अमी बेरा, प्रमिला जयपाल, सुहास सुब्रमण्यम और पिया दांडिया जैसे नाम शामिल हैं। इससे पहले 2024 के चुनाव में 6 भारतवंशी इस सदन के लिए चुने गए थे। इस बार सीनेट के लिए किसी भारतीय मूल के उम्मीदवार ने चुनाव नहीं लड़ा था। वहीं, गवर्नर पद के लिए भारतीय मूल के विवेक रामास्वामी ने ओहायो से दावेदारी पेश की थी, लेकिन वे डेमोक्रेटिक उम्मीदवार एमी एक्टन से हार गए। डेमोक्रेटिक पार्टी से 5 भारतवंशी संसद सदस्य बने 1. एमी बेरा, डेमोक्रेट पार्टी- 8वीं बार जीते कैलिफोर्निया के तीसरे संसदीय क्षेत्र से एमी बेरा लगातार आठवीं बार सांसद चुने गए हैं। उन्होंने रिपब्लिकन उम्मीदवार रॉब टकर को 23 हजार से ज्यादा वोटों से हराया है। बेरा पेशे से डॉक्टर हैं। वह 2013 में पहली बार हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के सदस्य बने थे। 2. रो खन्ना, डेमोक्रेटिक पार्टी- छठी बार जीते कैलिफोर्निया के 17वें संसदीय क्षेत्र से रो खन्ना ने लगातार छठी बार चुनाव जीता है। उन्होंने रिपब्लिकन उम्मीदवार रितेश टंडन को 42 हजार से ज्यादा वोटों से हराया है। टंडन इससे पहले 2020 और 2022 में भी रो खन्ना के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं। 3. प्रमिला जयपाल, डेमोक्रेटिक पार्टी- 1.52 लाख से वोटों से जीतीं वॉशिंगटन के 7वें संसदीय क्षेत्र से डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रमिला जयपाल ने लगातार छठी बार जीत दर्ज की है। उन्होंने रिपब्लिकन उम्मीदवार नीरव शेठ को 1.52 लाख से ज्यादा वोटों से हराया है। प्रमिला 2017 से इस सीट पर सांसद हैं। वह हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में पहुंचने वाली पहली भारतीय मूल की महिला हैं। उनका जन्म चेन्नई में हुआ था। 4. सुहास सुब्रमण्यम, डेमोक्रेटिक पार्टी- दूसरी बार सांसद बने वर्जीनिया के 10वें संसदीय क्षेत्र से सुहास सुब्रमण्यम दूसरी बार सांसद चुने गए हैं। उन्हें 61.5% से ज्यादा वोट मिले हैं, जबकि रिपब्लिकन उम्मीदवार डेव बेकविथ को 36.4% वोट मिले हैं। सुहास का जन्म टेक्सास के ह्यूस्टन में भारतीय माता-पिता के घर हुआ था। वह पेशे से वकील हैं। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में उन्होंने व्हाइट हाउस में टेक्नोलॉजी पॉलिसी एडवाइजर के तौर पर काम किया था। जीत के बाद सुहास ने कहा, “अपनी आवाज उठाइए। मैंने चुनाव लड़ा और जीता। आप भी ऐसा कर सकते हैं।” 5. पिया दांडिया, डेमोक्रेटिक पार्टी- पहली बार संसद पहुंचीं वहीं, फ्लोरिडा के 22वें संसदीय क्षेत्र से पिया दांडिया पहली बार हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के लिए चुनी गई हैं। उन्होंने रिपब्लिकन उम्मीदवार केसी अस्कर को हराया है। पिया को 51.9% और अस्कर को 48.1% वोट मिले हैं। 39 साल की पिया का जन्म और पालन-पोषण फ्लोरिडा के पाम बीच काउंटी में हुआ है। उनके माता-पिता भारत से अमेरिका गए थे। पिया पहले टीचर थीं। ट्रम्प और जेडी वेंस ने प्रचार किया, फिर भी हार गए रामास्वामी भारतीय मूल के रिपब्लिकन नेता विवेक रामास्वामी ओहायो के गवर्नर का चुनाव हार गए हैं। डेमोक्रेटिक उम्मीदवार एमी एक्टन ने उन्हें 2 लाख से ज्यादा वोटों से हराया है। रामास्वामी के समर्थन में ट्रम्प ने प्रचार किया था। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी उनके लिए वोट मांगने पहुंचे थे। इसके बावजूद रामास्वामी चुनाव नहीं जीत सके हैं। रामास्वामी ने 2024 में राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने के लिए रिपब्लिकन पार्टी से अपनी उम्मीदवारी पेश की थी। बाद में उन्होंने नाम वापस ले लिया था और ट्रम्प का समर्थन किया था। राज्यों के चुनावों में भी भारतवंशियों का दबदबा कई भारतवंशी उम्मीदवार हारे: न्यूयॉर्क में रिपब्लिकन उम्मीदवार सरिता कोमतिरड्डी अटॉर्नी जनरल का चुनाव हार गई हैं। नॉर्थ कैरोलाइना में महेश गनोरकर, ओहायो में निर्दलीय संदीप दीक्षित और मिशिगन में निर्दलीय अनिल कुमार को भी हार का सामना करना पड़ा है।
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 







