पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के मुद्दे पर सियासत तेज हो गई है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर तीखा हमला बोलते हुए उन्हें चेतावनी दी है कि वह अपनी सीमा से बाहर न जाएं। इसके जवाब में निर्वाचन आयोग ने कहा है कि राज्य में किसी भी पात्र मतदाता का नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया जाएगा और आयोग का लक्ष्य स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव कराना है।
कोलकाता के एस्प्लानेड स्थित मेट्रो चैनल पर धरने के दौरान ममता बनर्जी ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर कटाक्ष करते हुए कहा कि साहस होना अच्छी बात है, लेकिन दुस्साहस के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव तैयारियों की समीक्षा के लिए हुई बैठक में राज्य के अधिकारियों को धमकाया गया। ममता बनर्जी ने कहा कि उन्हें जानकारी मिली है कि बैठक में अधिकारियों को यह कहा गया कि अभी ही नहीं बल्कि मई के बाद भी उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि पहले अपनी कुर्सी बचाइए, फिर बंगाल के अधिकारियों और लोगों को धमकाइए।
मुख्यमंत्री ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर व्यंग्य करते हुए यह भी कहा कि वह खुद को किसी काल्पनिक नायक की तरह समझ रहे हैं और ऐसे लोग लोकतंत्र को कमजोर करते हैं। कालीघाट मंदिर की उनकी यात्रा का जिक्र करते हुए ममता ने कहा कि मंदिर जाते समय कोई लगभग फिसल गया था, शायद यह संकेत है कि देवी मां भी वैध मतदाताओं के नाम हटाए जाने से खुश नहीं हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मतदाता सूची से बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटाए गए हैं और इसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोगों को प्रभावित किया गया है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम मतदाताओं को विशेष रूप से निशाना बनाया गया है।
ममता बनर्जी ने यह भी सवाल उठाया कि यदि मतदाता सूची में कथित तर्कगत त्रुटियां हैं तो वह केवल पश्चिम बंगाल में ही क्यों सामने आ रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि तकनीकी साधनों के प्रयोग से उपनामों में गलतियां पैदा की गई हैं। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि एक योजना के तहत पहले वास्तविक मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं और बाद में मतदान मशीनों में गड़बड़ी करने की कोशिश की जा सकती है। उन्होंने दावा किया कि मतगणना के दिन भी ऐसी रणनीति अपनाई जा सकती है जिससे जनता को गलत संदेश दिया जाए।
धरना स्थल पर उनके साथ मौजूद तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भी कहा कि लगभग साठ लाख लोगों के मतदान अधिकार बहाल होने तक आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि कोलकाता में हजारों होटलों के बावजूद मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने वही होटल क्यों चुना जहां अक्सर भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता ठहरते हैं।
उधर, इन आरोपों के बीच आज कोलकाता में संवाददाता सम्मेलन में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा कि पश्चिम बंगाल के लोग हमेशा शांतिपूर्ण और सहभागी लोकतंत्र में विश्वास करते रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि आयोग का उद्देश्य राज्य में स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव कराना है और हर पात्र मतदाता को मतदान का अवसर मिलेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया जाएगा। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण पूरे देश में संविधान के प्रावधानों के अनुसार किया जा रहा है। ज्ञानेश कुमार ने बताया कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध और सही बनाना है ताकि केवल योग्य मतदाताओं के नाम सूची में बने रहें और अयोग्य नाम हटाए जा सकें।
उन्होंने कहा कि पुनरीक्षण के दौरान लगभग चार से पांच प्रतिशत मतदाता ऐसे पाए गए जो वर्ष 2002 की सूची से अपना मिलान नहीं कर पाए। इसके अलावा सात से आठ प्रतिशत मतदाताओं के विवरण में गलत मिलान पाया गया, जो या तो जानबूझकर किया गया प्रयास था या अनजाने में हुई त्रुटि का परिणाम था। उन्होंने बताया कि कई मामलों की जांच अभी निर्वाचन अधिकारियों के स्तर पर जारी है और विचाराधीन मामलों पर उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुसार कार्रवाई की जा रही है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने कहा कि चुनाव के दौरान हिंसा या मतदाताओं को डराने की किसी भी कोशिश के प्रति आयोग की शून्य सहनशीलता की नीति रहेगी। उन्होंने यह भी बताया कि राज्य में लगभग अस्सी हजार मतदान केंद्र बनाए जाएंगे और मतदान प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए सभी केंद्रों पर शत प्रतिशत वेब प्रसारण की व्यवस्था की जाएगी।
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एआईएमआईएम प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने मंगलवार को लोकसभा में व्यवस्था का प्रश्न उठाते हुए भाजपा सांसद जगदंबिका पाल द्वारा कार्यवाही की अध्यक्षता करने की वैधता पर सवाल उठाया। ओवैसी ने संविधान के अनुच्छेद 95 और 96 का हवाला देते हुए तर्क दिया कि अध्यक्ष द्वारा नियुक्त पाल अविश्वास प्रस्ताव पर बहस की अध्यक्षता नहीं कर सकते। उन्होंने सदन का रुख स्पष्ट करने की मांग की और कहा कि नियम 10 संवैधानिक प्रावधानों को रद्द नहीं कर सकता। उन्होंने सरकार पर संवैधानिक गड़बड़ी पैदा करने का आरोप लगाया।
ओवैसी ने कहा कि महोदय, आप (भाजपा सांसद जगदंबिका पाल) अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे हैं। आपको अध्यक्ष ने नियुक्त किया है। मेरा मानना है कि आप वहां बैठकर कार्यवाही नहीं कर सकते। सदन का रुख स्पष्ट होना चाहिए। नियम 10 संविधान के अनुच्छेद 95 और 96 को रद्द नहीं कर सकता। इस सरकार ने संवैधानिक गड़बड़ी पैदा कर दी है। ओवैसी ने आरोप लगाया कि सरकार प्रक्रियात्मक नियमों का इस्तेमाल करके अनिवार्य संवैधानिक आवश्यकताओं को दरकिनार कर रही है। संविधान के अनुच्छेद 95 और 96 अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के कर्तव्यों से संबंधित हैं, जिनमें यह भी शामिल है कि इन पदों के रिक्त होने पर या उन्हें हटाने के प्रस्ताव पर विचाराधीन होने पर कौन अध्यक्षता करेगा।
लोकसभा के नियम 10 के तहत अध्यक्ष को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की अनुपस्थिति में अध्यक्षता करने के लिए 'अध्यक्षों के पैनल' को मनोनीत करने का अधिकार है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने मंगलवार को लोकसभा में अध्यक्ष को हटाने के प्रस्ताव का जवाब देते हुए विपक्ष पर "अशांत" होने और जनता की इच्छा के विरुद्ध जाने का आरोप लगाया, क्योंकि उनका आरोप है कि वे अध्यक्ष की शक्ति को अपने लिए हथियाना चाहते हैं। मतघोषणा के बीच विपक्षी सांसदों पर कटाक्ष करते हुए मंत्री रिजिजू ने राहुल गांधी के पूर्व बयान का हवाला देते हुए कहा कि अगर कोई सदन में खुद को अध्यक्ष से ऊपर समझता है तो उनके पास इसका कोई इलाज नहीं है।
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