घटिया दवाओं पर सरकार का सख्त रुख, अब एनएसक्यू पाए जाने पर तुरंत निलंबित होगा निर्माण लाइसेंस
नई दिल्ली, 4 नवंबर (आईएएनएस)। देश में दवाओं की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने ड्रग्स रूल्स, 1945 में संशोधन का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत अगर कोई दवा तय किए गए महत्वपूर्ण गुणवत्ता मानकों पर मानक गुणवत्ता वाली नहीं यानी एनएसक्यू पाई जाती है, तो उसके निर्माण लाइसेंस को तुरंत निलंबित किया जा सकेगा।
इन प्रस्तावित संशोधनों का मकसद घटिया दवाओं का पता चलते ही नियामक अधिकारियों को तुरंत हस्तक्षेप करने, उनके निर्माण और वितरण को रोकने और मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का है। मंत्रालय ने संशोधनों के मसौदे को सार्वजनिक परामर्श के लिए अधिसूचित कर दिया है। हितधारक और आम जनता भारत के राजपत्र में मसौदा नियमों के उपलब्ध होने की तारीख से 30 दिनों के भीतर आपत्तियां और सुझाव भेज सकते हैं।
मौजूदा नियमों के तहत किसी निर्माण लाइसेंस को निलंबित या रद्द करने से पहले एक तय नियामक प्रक्रिया अपनानी पड़ती है, जिसमें कारण बताओ नोटिस जारी करना भी शामिल है। इस प्रक्रिया में समय लग सकता है, जिससे दवा को एनएसक्यू घोषित करने और उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के बीच अंतराल आ जाता है। इस दौरान वह दवा बाजार में बनी रह सकती है, जिससे जनस्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा हो सकता है और ऐसी दवाओं को वापस मंगाना भी मुश्किल हो जाता है।
इस समस्या को दूर करने के लिए मंत्रालय ने नया प्रावधान प्रस्तावित किया है। इसके अनुसार, अगर सरकारी विश्लेषक की रिपोर्ट में कोई दवा एसे, डिसोल्यूशन, संबंधित पदार्थों, अशुद्धियों या स्टेरिलिटी के मानकों पर एनएसक्यू पाई जाती है, तो केंद्रीय लाइसेंसिंग अनुमोदन प्राधिकरण या राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरण उस दवा के निर्माण लाइसेंस को तुरंत निलंबित कर सकेंगे। ये मानक दवाओं की गुणवत्ता तय करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।
प्रस्तावित संशोधन में निलंबन हटाने से पहले सुधारात्मक उपाय करना अनिवार्य किया गया है। निलंबन तब तक जारी रहेगा जब तक निर्माता गुणवत्ता में कमी के कारणों का पता लगाने के लिए प्रभावी रूट कॉज एनालिसिस नहीं कर लेता और संबंधित लाइसेंसिंग अथॉरिटी की संतुष्टि के अनुसार उचित सुधारात्मक और निवारक कार्रवाई यानी सीएपीए लागू नहीं कर देता। निलंबन तभी हटाया जा सकेगा जब आवश्यक उपाय लागू कर दिए जाएं और लाइसेंसिंग अथॉरिटी द्वारा उनका उचित सत्यापन कर लिया जाए।
नियामक समन्वय को मजबूत करने के लिए सरकारी विश्लेषक की टेस्ट रिपोर्ट से जुड़े फॉर्म 13 में भी संशोधन प्रस्तावित किया गया है। इस व्यवस्था के तहत सरकारी विश्लेषक की रिपोर्ट ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया, संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की लाइसेंसिंग अथॉरिटी और संबंधित दवा के निर्माता और मार्केटर को भेजी जाएगी। इससे गुणवत्ता में कमी की जानकारी समय पर सभी तक पहुंचेगी और नियामक कार्रवाई में बेहतर समन्वय हो सकेगा।
ये प्रस्तावित संशोधन 20 दिसंबर 2024 को हुई ड्रग्स कंसल्टेटिव कमिटी की 65वीं बैठक और 24 अप्रैल 2025 को हुई ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड की 92वीं बैठक की सिफारिशों पर आधारित हैं। इससे दवाओं की बिक्री के बाद की नियामक निगरानी मजबूत होने, घटिया दवाओं के खिलाफ समय पर कार्रवाई होने और देश में उपलब्ध दवाओं की गुणवत्ता पर जनता का भरोसा और मजबूत होने की उम्मीद है।
--आईएएनएस
एससीएच
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
दक्षिणी अफगानिस्तान के अस्पतालों पर कुपोषण का बढ़ता दबाव, गंभीर हालत में भर्ती हो रहे बच्चों की संख्या बढ़ी
काबुल, 4 नवंबर (आईएएनएस)। अफगानिस्तान में गंभीर कुपोषण का संकट लगातार गहराता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों के समन्वय कार्यालय (ओचा) ने बुधवार को कहा कि दक्षिणी अफगानिस्तान के अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में मरीजों की संख्या बढ़ने से वार्डों में भीड़ बढ़ रही है। गंभीर कुपोषण से पीड़ित लोगों को बड़ी संख्या में अस्पताल में भर्ती कराया जा रहा है।
अफगानिस्तान स्थित समाचार एजेंसी खामा प्रेस के मुताबिक, ओचा ने कहा कि दक्षिणी अफगानिस्तान के लोग कई तरह की समस्याओं का सामना कर रहे हैं। वहीं, मानवीय सहायता संगठनों को भी संसाधनों में लगातार कटौती का सामना करना पड़ रहा है। यह बयान ऐसे समय आया है, जब देश में खाद्य सुरक्षा की स्थिति बिगड़ने को लेकर चिंता बढ़ रही है।
इससे पहले अक्टूबर में खाद्य एवं कृषि संगठन और विश्व खाद्य कार्यक्रम ने आशंका जताई थी कि इस सर्दी में अफगानिस्तान की करीब 40 प्रतिशत आबादी गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर सकती है। दोनों एजेंसियों ने 2027 में तीव्र कुपोषण के मामलों में भी भारी बढ़ोतरी की आशंका जताई है।
संयुक्त राष्ट्र की दोनों एजेंसियों ने अक्टूबर में जारी एकीकृत खाद्य सुरक्षा चरण वर्गीकरण (आईपीसी) के ताजा विश्लेषण का हवाला देते हुए बताया था कि नवंबर से अप्रैल के बीच करीब 1.92 करोड़ लोग, यानी देश की 38 प्रतिशत आबादी, गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना करेगी। पिछले वर्ष इसी अवधि के लिए यह आंकड़ा 1.74 करोड़ रहने का अनुमान था।
रिपोर्ट के अनुसार, करीब 50 लाख लोगों के भुखमरी के आपातकालीन स्तर (आईपीसी फेज-4) तक पहुंचने की आशंका है। यह अप्रैल-सितंबर 2026 के लिए अनुमानित संख्या से दोगुना है। बदख्शां, बदगीस, दायकुंडी, घोर, समांगन, सर-ए-पोल और ग्रामीण गजनी में हालात सबसे खराब रहने की आशंका जताई गई है।
दोनों एजेंसियों ने कहा कि 2026 की तुलना में कुपोषण के मामलों में करीब 10 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है और इनकी संख्या 40 लाख तक पहुंच सकती है। इनमें लगभग एक चौथाई मामले गंभीर और जानलेवा कुपोषण के होंगे। रोकथाम और उपचार सेवाओं की कमी के कारण महिलाएं और बच्चे सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं।
इस संकट के पीछे कई कारण बताए गए हैं। इनमें इस साल ईरान और पाकिस्तान से 12 लाख से अधिक अफगान नागरिकों की जबरन वापसी, सीमा बंद होने और होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से जरूरी वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि तथा मानवीय सहायता के लिए धन की भारी कमी शामिल है।
एजेंसियों ने यह भी कहा कि 2026 में अनुकूल बारिश के कारण फसल उत्पादन में सुधार हुआ है, लेकिन लगातार बेरोजगारी के चलते वे परिवार पौष्टिक भोजन खरीदने में सक्षम नहीं हैं, जो खुद खाद्यान्न का उत्पादन नहीं करते।
इससे पहले अगस्त में संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) ने बताया था कि अफगानिस्तान में 37 लाख बच्चे तीव्र कुपोषण से पीड़ित हैं। इनमें करीब 10 लाख बच्चे गंभीर तीव्र कुपोषण की जानलेवा स्थिति में हैं। यूनिसेफ के मुताबिक, दक्षिणी अफगानिस्तान के कई अस्पतालों में उपलब्ध प्रत्येक बिस्तर पर तीन से चार गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों को रखा जा रहा था।
--आईएएनएस
डीएससी
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