अमेरिका और इजराइल के ईरान के साथ चल रहे इस भयंकर युद्ध ने दुनिया को हिलाकर रख दिया है। लेकिन ऐसे समय में जब मिडिल ईस्ट के देशों में जहाज नहीं पहुंच पा रहे हैं। उड़ाने रद्द हो रही है और फ़ूड सिक्योरिटी का एक बड़ा संकट सामने खड़ा हो चुका है। उस वक्त भारत ने एक बार फिर अपनी दोस्ती का हाथ बढ़ाया। मदद मांगते ही भारत ने जहाज भेजा। सैकड़ों टन मदद पहुंचाई और इस कदम से ईरान भी हैरान हो गया। मार्च 2026 में यह युद्ध 28 फरवरी 2026 को शुरू हुआ था। जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले किए। इसे अमेरिका ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी नाम दिया। यह कोई साधारण संघर्ष नहीं है। यह एक ऐसा युद्ध है जो मिडिल ईस्ट को बदल सकता है। उसके नक्शे को बदल सकता है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे ईरान की न्यूक्लियर महत्वाकांक्षाओं को रोकने का तरीका बताया है। शुरुआत में ही इजराइल और अमेरिका ने ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई को मार गिराया जो ईरान की राजनीति का सबसे बड़ा झटका था। खामेनेई के जाने के बाद ईरान ने जवाबी हमले शुरू कर दिए जिसमें इजराइल और अमेरिकी ठिकानों और यहां तक कि खाड़ी देशों पर मिसाइल और ड्रोन हमले शामिल हैं। 9 मार्च 2026 तक यह युद्ध अपने 10वें दिन में पहुंच चुका है और अमेरिका और इजराइल ने ईरान के तेल डिपो मिसाइल साइट्स आईआरजीसी यानी कि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड स्कोप्स के हेड क्वार्टर्स और न्यूक्लियर साइट्स पर दनादन हमले किए हैं। ईरान ने बदले में इजराइल पर मिसाइल बरसाए जिनमें क्लस्टर म्यूनिशियंस भी शामिल हैं और इस बीच अमेरिकी सैनिकों की मौत भी हो चुकी है। कम से कम सात अमेरिकी सैनिक मारे गए हैं। इस युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। ब्रैंड क्रूड $ प्रति बैरल से ऊपर पहुंच चुका है।
इतना ही नहीं कुछ रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि 20% की बढ़ोतरी भी हुई है। स्टेट ऑफ ऑर्बुज जो दुनिया के 20% तेल का रास्ता है लगभग पूरी तरह से बंद हो चुका है। जहाजों की आवाजाही 30% से ज्यादा कम हो चुकी है। ईरान ने एनर्जी वॉर की धमकी दे दी है और अमेरिका ने बिना शर्त सरेंडर की मांग की है ईरान से। इतना ही नहीं इजराइल ने ईरान के सुप्रीम लीडर मुजतबा खामनेई यानी जो अली खामनेई के बेटे हैं उनको भी निशाना बनाने की धमकी दे दी है और यह युद्ध अब लेबनान इराक सीरिया तक फैल चुका है जहां हिजबुल्लाह और अन्य ग्रुप्स शामिल हो सकते हैं। अब इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर पड़ रहा है। स्टॉक मार्केट्स गिर रहे हैं।
भारत के लिए तो भारत के लिए भी चिंता का विषय है। बहुत बड़ा चिंता का विषय है क्योंकि भारत का 55 से 60% तेल इंपोर्ट गल्फ से ही आता है। इराक, सऊदी अरब, यूएई, कुवैत से आता है। लेकिन इस युद्ध में भारत की भूमिका एक एक दोस्त की तरह है जो संकट में मदद करता है और मदद कर भी रहा है। एक तरफ ईरान की मदद, दूसरी ओर मिडिल ईस्ट के देशों की मदद। अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर। मिडिल ईस्ट में फूड सिक्योरिटी का संकट है। जहां पूरी दुनिया को तेल की समस्या दिख रही है, वहीं मिडिल ईस्ट के देशों पर फूड सिक्योरिटी का बादल मंडरा रहा है। यूएई हो या सऊदी अरब इन सभी देशों में 90% से ज्यादा खाने-पीने का सामान बाहर से इंपोर्ट होता है। यानी बाहर से उनके यहां सामान जाता है।
वह कुछ उगाते नहीं है। रेगिस्तान होने की वजह से पानी की कमी है और कृषि सीमित है। सामान्य समय में यह देश यूरोप, एशिया और अमेरिका से फल, सब्जियां, अनाज इंपोर्ट करते हैं। लेकिन इस युद्ध ने सब कुछ बदल दिया। स्टेट ऑफ हॉर्मोज बंद होने से जहाज नहीं जा पा रहे। ऐसा कहा जा रहा है। उड़ाने प्रभावित हैं। कई पैसेंजर फ्लाइट रद्द हो चुकी है और कारगो भी अब बहुत कम लोग जानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय पैसेंजर विमानों के कारगो होल्ड की बड़ी मात्रा में ताजा फल जाता है।
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अमेरिका और इज़राइल के साथ चल रहे युद्ध में ईरान को कम लागत वाले ड्रोनों से अभूतपूर्व लाभ मिला है। ईरान के शाहेद-136 ड्रोन से प्रेरित होकर स्वदेशी ड्रोन बनाए जा रहे हैं, जिनकी कीमत प्रति यूनिट 20,000 डॉलर से 50,000 डॉलर के बीच है। दरअसल, अमेरिका का कम लागत वाला मानवरहित लड़ाकू हमला प्रणाली (LUCAS) ड्रोन भी शाहेद के समान ही डिज़ाइन पर आधारित है। भारत भी स्वदेशी लंबी दूरी के मारक ड्रोनों से अपनी मारक क्षमता बढ़ा रहा है। वर्तमान युद्ध में अपनी क्षमता साबित करने से पहले, ईरान के शाहेद-136 ड्रोन ने रूस-यूक्रेन संघर्ष में अपनी छाप छोड़ी, जिसके चलते कीव को उन्हें रोकने के लिए लाखों डॉलर खर्च करने पड़े। एक प्रभावी वायुसेना के बिना भी ईरान का देशों के भीतरी इलाकों तक मार करने की क्षमता उसके ड्रोनों और मिसाइलों की ताकत को दर्शाती है। अमेरिका के कम लागत वाले लूकास ड्रोन ईरान के शाहेद-136 से काफी मिलते-जुलते हैं। यूक्रेन-रूस युद्ध से पहले, नागोर्नो-काराबाख को लेकर आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच हुए संघर्ष ने यह दिखाया कि ड्रोन और लोइटरिंग मुनिशन्स (लोइटरिंग मुनिशन्स) किस प्रकार सैन्य शक्ति संतुलन को बदल सकते हैं। अज़रबैजान ने युद्ध जीता और उसकी जीत का श्रेय ड्रोनों के व्यापक उपयोग को दिया जाता है।
इसका नया पहलू कम लागत वाले ड्रोन हैं जो दुश्मन को आर्थिक और भौतिक रूप से कमजोर बना देते हैं। उदाहरण के लिए, शाहेद-136 आत्मघाती ड्रोन की कीमत 20,000 डॉलर से 50,000 डॉलर के बीच है। लेकिन अमेरिका और इज़राइल इन्हें रोकने के लिए लाखों डॉलर खर्च कर रहे हैं। प्रत्येक पैट्रियट मिसाइल की कीमत 40 लाख डॉलर है, जबकि कुछ इंटरसेप्टर की कीमत 120 लाख डॉलर तक हो सकती है। भारत के पास पहले से ही कई स्वदेशी ड्रोन हैं जो परिचालन में हैं या उसकी सशस्त्र सेनाओं में शामिल किए जा चुके हैं। मध्यम ऊंचाई लंबी सहनशक्ति (MALE) और उच्च ऊंचाई लंबी सहनशक्ति (HALE) जैसे प्रमुख उन्नत ड्रोन परीक्षण या विकास के चरण में हैं, वहीं भारतीय निजी कंपनियों और DRDO द्वारा निर्मित छोटे सामरिक, निगरानी, झुंड और लड़ाकू ड्रोन वितरित किए जा चुके हैं, शामिल किए जा चुके हैं और अभ्यास और वास्तविक परिदृश्यों सहित विभिन्न परिचालन कार्यों में उपयोग किए जा रहे हैं।
भारत के शेषनाग और प्रोजेक्ट काल स्ट्राइक ड्रोन क्या हैं?
सटीक हमलों के लिए कई स्वदेशी हमलावर ड्रोन, मुख्य रूप से लोइटरिंग मुनिशन्स (LOITER MUNIS) शामिल किए हैं। ऐसा ही एक स्वदेशी ड्रोन सोलर इंडस्ट्रीज का नागास्त्र-1 है, जिसे 2024 से शामिल किया जा रहा है और इसके बैचों की डिलीवरी हो चुकी है। ये एकतरफा सिस्टम न्यूनतम संपार्श्विक क्षति के साथ पैदल सेना स्तर के सटीक हमले करने में सक्षम हैं। बेंगलुरु स्थित अल्फा डिजाइन (ADTL) द्वारा इजरायल की एलबिट सिस्टम्स के सहयोग से विकसित स्काईस्ट्राइकर 'आत्मघाती ड्रोन' ने भी जम्मू और कश्मीर के अग्रिम क्षेत्रों में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपना परिचालन प्रारंभ किया। हालांकि, भारत में अब कम लागत वाले शाहेद-प्रकार के ड्रोन विकसित किए जा रहे हैं। प्रोजेक्ट केएएल, कथित तौर पर अपने शुरुआती चरण में है, और इसे 1,000 किमी तक की मारक क्षमता और तीन से पांच घंटे की सहनशक्ति वाले गहरे क्षेत्र में घुसपैठ करने वाले स्ट्राइक ड्रोन के रूप में डिज़ाइन किया गया है। यह दुश्मन के क्षेत्र में उड़ान भर सकता है, लक्ष्यों की पहचान कर सकता है, अपना मार्ग बदल सकता है और उच्च-विस्फोटक पेलोड गिरा सकता है।
ऑपरेशन सिदूर के दौरान ड्रोन का इस्तेमाल
दूसरी ओर, पौराणिक बहु-सिर वाले सर्प राजा के नाम पर नामित शेषनाग-150, एक लंबी दूरी का झुंड हमला करने वाला ड्रोन है, जिसमें स्वायत्त प्रणालियाँ हैं जो गहरे हमले और सघन हमले करने में सक्षम हैं। गौरतलब है कि भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिदूर के दौरान पाकिस्तान के भीतर आतंकी मुख्यालयों को निशाना बनाने के लिए ड्रोन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। पहलगाम आतंकी हमले के प्रतिशोध में चलाए गए इस ऑपरेशन में, जिसमें 26 लोग मारे गए थे, भारत ने ऑपरेशन के पहले दिन नौ में से सात आतंकी ठिकानों को नष्ट कर दिया। बाद में, ड्रोन का इस्तेमाल पाकिस्तानी सेना के खिलाफ भी किया गया, जिसने अपने समर्थित आतंकवादियों के बचाव में जोरदार प्रतिक्रिया दी। उन्होंने बताया कि सेना के हमलों में हताहतों की संख्या बहुत अधिक थी और इससे सीमा पर दुश्मन के बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा।
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