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bank Loan tips: कम सैलरी में भी मिल सकता बड़ा लोन? जानिए बैंक किन बातों को देखकर तय करते आपकी लिमिट

bank loan criteria: कई लोगों को लगता है कि अगर सैलरी कम है तो बैंक से बड़ा लोन मिलना लगभग नामुमकिन है। लेकिन हकीकत इतनी सीधी नहीं होती। बैंक सिर्फ आपकी सैलरी देखकर फैसला नहीं करते, बल्कि आपकी पूरी वित्तीय स्थिति को ध्यान में रखते हैं।

जब भी कोई व्यक्ति लोन के लिए आवेदन करता है, तो सबसे पहले बैंक यह देखता है कि वह हर महीने ईएमआई आराम से चुका पाएगा या नहीं। आम तौर पर बैंक चाहते हैं कि किसी व्यक्ति की कुल ईएमआई उसकी मासिक आय के लगभग 40 से 50 प्रतिशत के भीतर ही रहे। उदाहरण के लिए अगर किसी की सैलरी 60000 रुपये है, तो बैंक के लिए 25 से 30 हजार रुपये से ज्यादा की ईएमआई थोड़ा जोखिम भरी मानी जाती है।

लेकिन यह सिर्फ शुरुआत होती है। असल फैसला इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी बाकी वित्तीय स्थिति कैसी है।

मौजूदा लोन बदल सकते हैं पूरा हिसाब
एक ही सैलरी वाले दो लोगों को बैंक अलग-अलग लोन ऑफर दे सकता है। मान लीजिए दो लोग हर महीने 55000 रुपये कमाते हैं। पहले व्यक्ति पर कोई मौजूदा लोन नहीं है और वह हर महीने अपने क्रेडिट कार्ड का बिल पूरा चुका देता है।

दूसरे व्यक्ति की स्थिति अलग है। वह पहले से ही किसी पर्सनल लोन और कंज्यूमर लोन की ईएमआई के रूप में हर महीने 15000 से 20000 रुपये चुका रहा है। ऐसे में बैंक के नजरिए से पहला व्यक्ति ज्यादा सुरक्षित उधारकर्ता है क्योंकि उसके पास नई ईएमआई उठाने की ज्यादा गुंजाइश है। यही कारण है कि कई लोग बड़ा लोन लेने से पहले छोटे कर्ज चुकाने की कोशिश करते हैं।

क्रेडिट स्कोर का भी बड़ा रोल
लोन की मंजूरी में क्रेडिट हिस्ट्री भी बेहद अहम होती है। आम तौर पर 750 से ऊपर का सिबिल स्कोर बैंक को यह संकेत देता है कि उधार लेने वाला व्यक्ति समय पर भुगतान करने वाला है।

अगर किसी का क्रेडिट रिकॉर्ड साफ है और उसने पहले कभी ईएमआई या क्रेडिट कार्ड भुगतान में देरी नहीं की, तो बैंक उसके लिए ज्यादा लोन मंजूर करने या बेहतर ब्याज दर देने में ज्यादा सहज महसूस करते हैं। इसके उलट अगर भुगतान में चूक का रिकॉर्ड है तो अच्छी सैलरी होने के बावजूद लोन लिमिट कम हो सकती है।

लंबी अवधि से बढ़ सकता लोन
लोन की अवधि भी लोन राशि तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अगर लोन 20 या 25 साल के लिए लिया जाए तो EMI कम हो जाती है, जिससे बैंक ज्यादा लोन देने में सहज हो जाते हैं। होम लोन में यह तरीका अक्सर अपनाया जाता है। हालांकि लंबी अवधि का मतलब यह भी है कि कुल मिलाकर ज्यादा ब्याज देना पड़ेगा, लेकिन कई लोग कम EMI की वजह से इसे पसंद करते हैं।

को-एप्लिकेंट से भी बढ़ सकती है पात्रता
लोन की पात्रता बढ़ाने का एक आसान तरीका संयुक्त आवेदन भी है। अगर पति-पत्नी या परिवार का कोई सदस्य को-एप्लिकेंट बनता है तो बैंक दोनों की कुल आय को देखता है। इससे लोन की मंजूरी की संभावना और राशि दोनों बढ़ जाती हैं। हालांकि संयुक्त लोन में जिम्मेदारी भी साझा होती है। अगर EMI नहीं चुकाई जाती तो बैंक दोनों उधारकर्ताओं से वसूली कर सकता है।

आखिरकार बैंक का असली सवाल सिर्फ एक होता है-क्या उधार लेने वाला व्यक्ति लंबे समय तक ईएमआई आराम से चुका पाएगा। इसलिए सैलरी के अलावा क्रेडिट रिकॉर्ड, मौजूदा कर्ज, लोन की अवधि और कुल वित्तीय स्थिति मिलकर तय करती है कि आपको कितना लोन मिलेगा।

(प्रियंका कुमारी)

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Gold-Silver Prices: यूएस-ईरान युद्ध के बावजूद गिर रहे सोने-चांदी के दाम, क्यों कमजोर पड़ा 'सेफ हेवन' का सहारा

Gold-Silver Prices:अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बावजूद सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट ने निवेशकों को चौंका दिया है। आमतौर पर युद्ध या वैश्विक संकट के समय इन कीमती धातुओं में तेज उछाल देखने को मिलता है, लेकिन इस बार तस्वीर उलटी नजर आ रही।

करीब 10 दिन पहले जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर सैन्य हमले शुरू किए थे, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना करीब 5416 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा था। लेकिन जैसे-जैसे संघर्ष बढ़ा, सोना मजबूत होने की बजाय कमजोर पड़ता गया। 9 मार्च को दोपहर करीब 1:30 बजे सोना 5103 डॉलर प्रति औंस के आसपास पहुंच गया, यानी करीब 5.7% की गिरावट।

भारत में भी यही ट्रेंड देखने को मिला। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर 28 फरवरी को सोना करीब 1.67 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास था, जो अब घटकर लगभग 1.60 लाख रुपये पर आ गया। यानी घरेलू बाजार में भी करीब 4.2% की गिरावट दर्ज की गई है।

चांदी हफ्ते भर में 9 फीसदी गिरी
चांदी में गिरावट और भी तेज रही। एमसीएक्स पर 28 फरवरी को चांदी करीब 2.89 लाख रुपये प्रति किलो थी, जो 9 मार्च तक गिरकर लगभग 2.63 लाख रुपये प्रति किलो पर आ गई। यानी सिर्फ एक हफ्ते में करीब 9% की गिरावट।

मजबूत डॉलर बना सबसे बड़ा कारण
विशेषज्ञों के मुताबिक इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह अमेरिकी डॉलर की मजबूती है। पश्चिम एशिया में जब भी तनाव बढ़ता है और कच्चे तेल की कीमतें ऊपर जाती हैं, तब डॉलर की मांग भी बढ़ जाती है क्योंकि तेल का ज्यादातर व्यापार डॉलर में ही होता है। डॉलर मजबूत होने से सोने की कीमतों पर दबाव आता है।

मुनाफावसूली भी दबाव बना रही
एक्सपर्ट्स का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में सोने-चांदी में तेज रैली आ चुकी थी। ऐसे में युद्ध की खबर के बाद कई निवेशकों ने मुनाफा वसूलना शुरू कर दिया। कोटक म्यूचुअल फंड के फंड मैनेजर सतीश डोंडापाटी के अनुसार, जब कीमतें तेजी से बढ़ती हैं तो निवेशक अक्सर लाभ बुक कर लेते हैं, जिससे बाजार में अस्थायी गिरावट आती है।

निवेशकों के पास बढ़े विकल्प
पहले ज्यादातर निवेशक संकट के समय सिर्फ सोने को सुरक्षित निवेश मानते थे। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। निवेशक अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड, डॉलर आधारित एसेट्स और ऊर्जा सेक्टर में भी पैसा लगा रहे। इससे सुरक्षित निवेश की मांग कई हिस्सों में बंट गई है।

शेयर बाजार की गिरावट का भी असर
जब शेयर बाजार में तेज गिरावट आती है तो कुछ निवेशक नकदी जुटाने के लिए सोना भी बेच देते हैं। हाल ही में सेंसेक्स और निफ्टी में करीब 1.7% की गिरावट देखने को मिली, जिससे भी सोने की कीमतों पर दबाव पड़ा।

ऊंची ब्याज दरें भी रोक रहीं तेजी
ऊंची वैश्विक ब्याज दरों की वजह से भी सोने की तेजी सीमित हो रही है। जब अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ती है तो निवेशक बिना जोखिम वाले ब्याज देने वाले एसेट्स को ज्यादा पसंद करते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट 2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध से अलग है। उस समय डॉलर और बॉन्ड यील्ड इतने मजबूत नहीं थे। अब बाजार ज्यादा विविध और तरल है, इसलिए निवेशक कई अलग-अलग एसेट्स में पैसा लगा रहे हैं।

कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि फिलहाल बाजार को लगता है कि यह संघर्ष सीमित दायरे में रह सकता है और लंबा वैश्विक युद्ध नहीं बनेगा। इसी वजह से सोने में घबराहट वाली खरीदारी नहीं दिख रही।
(प्रियंका कुमारी)

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