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Saudi -UAE की चेतावनी, पेट्रो डॉलर की उड़ी धज्जियां

आज दुनिया की अर्थव्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां एक संभावित युद्ध सिर्फ मिसाइलों, टैंकों की लड़ाई नहीं होगा बल्कि डॉलर, तेल और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की भी परीक्षा बन सकता है। सवाल उठ रहा है कि अगर ईरान के साथ तनाव बढ़ गया और युद्ध और तेज हो गया तो क्या इसका आर्थिक झटका सीधे अमेरिका को लग सकता है?  दरअसल हाल के दिनों में एक ऐसी बड़ी खबर सामने आई है जिसने अमेरिका के होश उड़ा दिए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक खाड़ी के चार प्रमुख देश सऊदी अरब, क़तर, यूएई और कुवैत अब अमेरिका में अपने भारी निवेश की समीक्षा करने पर विचार कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि अगर मध्य पूर्व में युद्ध या लंबे समय तक तनाव की स्थिति बनती है तो यह देश अमेरिका में लगाए गए अपने निवेश को कम करने या आंशिक रूप से वापस लेने पर विचार कर सकते हैं।

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पहली नजर में यह बात शायद बहुत बड़ी ना लगे लेकिन अगर हम इसकी गहराई में जाएं तो यह खबर दुनिया की आर्थिक व्यवस्था से सीधे जुड़ी हुई है। खाड़ी देशों के पास दुनिया के सबसे बड़े सोवरन वेल्थ फंड्स हैं। इनमें प्रमुख है पब्लिक इन्वेस्टमेंट फंड। अबू धाबी इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी और क़तर इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी इन फंड्स के जरिए अरब देशों ने अमेरिका की अर्थव्यवस्था में ट्रिलियनों डॉलर का निवेश किया हुआ है। यह निवेश केवल शेयर बाजार में ही नहीं बल्कि अमेरिकी इंफ्रास्ट्रक्चर, टेक कंपनियों, रियलस्टेट और सबसे महत्वपूर्ण अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स में भी किया है। अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स वह साधन है जिनके जरिए अमेरिका दुनिया से उधार लेता है। दुनिया भर के निवेशक, सरकारें और फंड्स इन्हें खरीदते हैं और बदले में अमेरिका को पैसा मिलता है। 

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लेकिन अगर बड़े निवेशक अचानक इन बॉन्ड्स को बेचने लगे या नई खरीद कम कर दें तो इसका असर सीधे अमेरिकी उधारी पर पड़ सकता है। यहां एक और महत्वपूर्ण अवधारणा सामने आती है। पेट्रो डॉलर सिस्टम 1970 के दशक से दुनिया में एक व्यवस्था बनी हुई है जिसमें तेल का वैश्विक व्यापार मुख्य रूप से डॉलर में होता है। यानी जब कोई देश तेल खरीदता है तो वह भुगतान डॉलर में करता है। इसके बाद तेल निर्यातक देश उस डॉलर को वापस अमेरिकी संपत्तियों में निवेश कर देते हैं। जैसे कि अमेरिकी बॉन्ड स्टॉक्स और रियलस्टेट्स। इस पूरी प्रक्रिया में दो बड़े फायदे अमेरिका को मिलते हैं। 

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पहला डॉलर की वैश्विक मांग लगातार बनी रहती है। दूसरा अमेरिका को दुनिया से सस्ती उधारी मिलती रहती है। लेकिन अगर तेल निर्यातक देश किसी कारण से डॉलर आधारित निवेश को कम करने लगे तो इस पूरी व्यवस्था पर दबाव आ सकता है। पिछले कुछ वर्षों में एक और शब्द बहुत तेजी से चर्चा में आया। डीडोलराइजेशन इसका मतलब है कई देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ देश अपने व्यापार को स्थानीय मुद्राओं में करना चाहते हैं तो कुछ नए वित्तीय ढांचे बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

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T20 World Cup: Suryakumar की कप्तानी में इतिहास रचेगा भारत? तीसरी बार Trophy जीतने पर टिकी निगाहें

आईसीसी पुरुष टी20 विश्व कप 2026 के फाइनल में भारत और न्यूजीलैंड रविवार को अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में आमने-सामने होंगे। कई हफ्तों तक चले रोमांचक क्रिकेट और कई दिलचस्प मुकाबलों के बाद, टूर्नामेंट अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है, जहां ट्रॉफी जीतने के लिए केवल एक ही टीम बची है। दोनों टीमों ने टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन किया है और रास्ते में कुछ झटकों का सामना करते हुए जीत हासिल की है। फाइनल मुकाबला बेहद रोमांचक होने की उम्मीद है।
 

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दुनिया के सबसे बड़े स्टेडियमों में से एक नरेन्द्र मोदी स्टेडियम में भारत को 19 नवंबर 2023 को बड़ा झटका लगा था जब वह ऑस्ट्रेलिया से वनडे विश्व कप का फाइनल हार गया था। तब भारत ने भावुक नम आंखों वाले रोहित शर्मा को ड्रेसिंग रूम की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए देखा था। केवल भारतीय टीम ही नहीं बल्कि स्टेडियम में मौजूद 93000 दर्शक भी सन्न रह गए थे। भारत ने हालांकि 2024 में रोहित शर्मा की कप्तानी में टी20 विश्व कप जीतकर इसकी काफी हद तक भरपाई कर दी थी। अब खेल के सबसे छोटे प्रारूप की भारतीय टीम सूर्यकुमार की कप्तानी में खिताब का बचाव करने और इस प्रतिष्ठित ट्रॉफी को तीन बार जीतने वाली पहली टीम बनने की कोशिश करेगी। एक कुशल बल्लेबाज और चतुर कप्तान सूर्यकुमार न केवल कप्तान के रूप में अपनी खुद की विरासत बनाने के लिए उत्सुक होंगे, बल्कि वह 19 नवंबर 2023 की पीड़ा को भी खत्म करना चाहेंगे। 

सूर्यकुमार और उनके साथी ठीक 364 दिन पहले नौ मार्च, 2025 को भारत की आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी में न्यूजीलैंड की लगभग इसी टीम के खिलाफ मिली जीत से प्रेरणा लेने की कोशिश करेंगे। भले ही वह टूर्नामेंट 50 ओवर का था। सूर्यकुमार उस टीम का हिस्सा नहीं थे, लेकिन दुबई में मिली उस एकतरफा जीत से उन्हें हौसला मिल सकता है। फाइनल जीतने के लिए साहस के अलावा किस्मत का साथ भी जरूरी होता है। खेल एकदम ‘परफेक्ट’ होना जरूरी नहीं है, लेकिन सही समय पर सही चीजें होनी चाहिए। मौजूदा टूर्नामेंट के सेमीफाइनल में भारत की जीत तब लगभग तय हो गई थी जब हैरी ब्रूक ने संजू सैमसन का कैच छोड़ दिया था। भारत रविवार को न्यूजीलैंड की ऐसी किसी भी गलती का पूरा फायदा उठाने की कोशिश करेगा। भारत को अब तक इस टूर्नामेंट में किस्मत का साथ मिला है। अगर वह खिताब जीत जाता है तो उन्हें सराहना मिलेगी लेकिन अगर वह हार जाते हैं तो फिर बहुत बड़ा बवाल मच सकता है। सूर्यकुमार ने पिछले दो वर्षों में टीम का बहुत अच्छी तरह से नेतृत्व किया है, भले ही एक बल्लेबाज के रूप में वह उम्मीदों पर पूरी तरह खरा नहीं उतर पाए। 

रविवार का दिन उनके करियर के लिए निर्णायक क्षण होगा। अगर उनकी टीम खुशगवार मौसम में अच्छा प्रदर्शन करती है तो उनकी सारी नाकामियां पल भर में भुला दी जाएंगी। लेकिन भारत के लिए न्यूजीलैंड की चुनौती आसान नहीं होगी क्योंकि किसी भी दिन फिन एलन, लॉकी फर्ग्यूसन या मैट हेनरी जैसे खिलाड़ी अपनी क्षमता से कहीं बेहतर प्रदर्शन करना जानते हैं। मिचेल सैंटनर या ग्लेन फिलिप्स जैसे खिलाड़ी जानते हैं कि एक मजबूत टीम के खिलाफ किस तरह से चुनौती का सामना करना होता है। न्यूजीलैंड के लिए सबसे बड़ा खतरा ‘अहमदाबाद का सरदार’ होगा। इस सरदार का नाम जसप्रीत बुमराह है। फाइनल में बुमराह के चार ओवर एक बार फिर दोनों टीमों के बीच निर्णायक साबित हो सकते हैं। इंग्लैंड को सेमीफाइनल में इसका कड़वा अनुभव हुआ था। भारत के महानतम तेज गेंदबाज को ज्यादातर विपक्षी टीम की पारी के आखिर में इस्तेमाल किया जाता रहा है, लेकिन रविवार को यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वह सेमीफाइनल में 33 गेंदों में 100 रन बनाने वाले एलन के खिलाफ गेंदबाजी की शुरुआत करेंगे या नहीं। 
 

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अर्शदीप सिंह या हार्दिक पंड्या की नई गेंद की लेंथ शायद बल्लेबाजी के लिए अधिक अनुकूल साबित हो सकती है और ऐसे में बुमराह को शुरू में गेंदबाजी के लिए बुलाना सही फैसला होगा क्योंकि वह दोनों तरफ स्विंग करा सकते हैं। लेकिन जैसा कि फिलिप्स ने शुक्रवार को कहा था, ‘‘जसप्रीत बुमराह भी इंसान हैं। उनका भी हमारी तरह कभी-कभी खराब दिन हो सकता है।’’ अभिषेक शर्मा अभी तक अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए हैं और उनको अंतिम एकादश में बनाए रखने पर सवाल उठ रहे हैं। उनकी तकनीकी खामियां उजागर हो गई हैं और अगर वह फाइनल खेलते हैं तो ऑफ-स्पिनर कोल मैककॉन्ची को शुरू में ही गेंदबाजी के लिए बुलाया जा सकता है। अगर उन्हें टीम से बाहर किया जाता है, तो मध्य क्रम बहुत लंबा हो जाएगा और रिंकू सिंह भी अच्छी फॉर्म में नहीं हैं। भारत के लिए एक और बड़ी चिंता वरुण चक्रवर्ती का लगातार असफल रहना है। वह अब पहले की तरह बल्लेबाजों को परेशान नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें न्यूजीलैंड के दाएं हाथ के बल्लेबाजों के सामने संघर्ष करना पड़ सकता है। अभी तक टूर्नामेंट में केवल एक मैच खेलने वाले कुलदीप यादव उनकी जगह पर अच्छे विकल्प हो सकते हैं। 

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