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West Asia टेंशन से Stock Market में कोहराम, Sensex 1100 अंक लुढ़का, निवेशकों में हड़कंप

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक बाजारों के साथ-साथ भारत के शेयर बाजार पर भी साफ दिखाई देने लगा है। शुक्रवार को कारोबार के दौरान निवेशकों की सतर्कता के बीच भारतीय बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई है। मौजूद जानकारी के अनुसार ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव और खाड़ी क्षेत्र में अस्थिर हालात ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।

शुक्रवार को कारोबार समाप्त होने तक बंबई शेयर बाजार का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स करीब 1,097 अंक गिरकर 78,918 के स्तर पर बंद हुआ है। वहीं राष्ट्रीय शेयर बाजार का निफ्टी सूचकांक भी करीब 315 अंक टूटकर नीचे आ गया है। बाजार में यह गिरावट ऐसे समय आई है जब एक दिन पहले ही तेज गिरावट के बाद बाजार में थोड़ी सुधार की स्थिति देखी गई थी।

गौरतलब है कि वैश्विक बाजारों में भी कमजोरी का माहौल बना हुआ है। मौजूद जानकारी के अनुसार अमेरिका के प्रमुख शेयर सूचकांकों में भी गिरावट दर्ज की गई है। अमेरिकी बाजार में औद्योगिक सूचकांक लगभग 785 अंक गिरा, जबकि अन्य प्रमुख सूचकांकों में भी गिरावट देखने को मिली है। इसी का असर एशियाई बाजारों पर भी पड़ा है और क्षेत्रीय शेयर बाजारों में भी कमजोरी का रुख दिखाई दिया है।

बता दें कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है। इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 85 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई है, जबकि अमेरिकी कच्चे तेल की कीमत भी 81 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंचने की खबर है।

मौजूद जानकारी के अनुसार होरमुज़ जलडमरूमध्य के आसपास समुद्री परिवहन प्रभावित होने की खबरों ने भी बाजार की चिंता बढ़ा दी है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के तेल और गैस आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा संभालता है, इसलिए वहां किसी भी तरह की बाधा का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

इसी बीच भारतीय रुपया भी दबाव में नजर आया है। बताया जा रहा है कि रुपये को स्थिर रखने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक को इस सप्ताह लगभग 12 अरब डॉलर तक बाजार में हस्तक्षेप करना पड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया का तनाव लंबा खिंचता है तो भारतीय मुद्रा और बाजार दोनों पर दबाव बना रह सकता है।

बाजार में विभिन्न क्षेत्रों के प्रदर्शन की बात करें तो रियल एस्टेट क्षेत्र सबसे कमजोर रहा है और इसमें लगभग दो प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है। वहीं कई प्रमुख कंपनियों के शेयरों में भी गिरावट देखने को मिली है, जिनमें इंडिगो, आईसीआईसीआई बैंक और लार्सन एंड टुब्रो जैसे बड़े नाम शामिल बताए जा रहे हैं।

हालांकि बाजार की कमजोरी के बीच कुछ क्षेत्रों में तेजी भी देखने को मिली है। मौजूद जानकारी के अनुसार रक्षा क्षेत्र की कंपनियों के शेयरों में निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी है और इनमें लगभग नौ प्रतिशत तक की तेजी दर्ज की गई है। इसके अलावा कुछ सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और निजी कंपनियों के शेयर भी चर्चा में रहे हैं।

गौरतलब है कि बाजार में अस्थिरता का स्तर भी बढ़ गया है। राष्ट्रीय शेयर बाजार का अस्थिरता सूचकांक दिन के कारोबार में आठ प्रतिशत से अधिक बढ़ गया है, जो निवेशकों की बढ़ती चिंता को दर्शाता है।

उधर सरकार भी हालात पर नजर बनाए हुए है। जानकारी के मुताबिक केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जहाजरानी मंत्रालय और संबंधित कंपनियों के साथ बैठक कर पश्चिम एशिया में तनाव के कारण फंसे माल को निकालने के उपायों पर चर्चा की।

कुल मिलाकर विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पश्चिम एशिया का संघर्ष कम नहीं होता, तब तक वैश्विक बाजारों में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है और इसका असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखाई देता रहेगा।

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Middle East Crisis का Global Economy पर असर, Qatar की चेतावनी- कभी भी रुक सकती है Energy Supply

पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के साथ दुनिया के ऊर्जा बाजार को लेकर भी चिंता गहराने लगी है। इसी बीच क़तर के ऊर्जा मंत्री साद अल-काबी ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान, अमेरिका और इज़राइल से जुड़ा यह संघर्ष लंबे समय तक जारी रहा तो खाड़ी देशों से ऊर्जा निर्यात रुक सकता है और कच्चे तेल की कीमतें तेज़ी से बढ़कर लगभग 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।

मौजूद जानकारी के अनुसार साद अल-काबी ने एक अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में कहा कि अगर मौजूदा हालात ऐसे ही बने रहे तो खाड़ी क्षेत्र के ऊर्जा निर्यातक कुछ ही दिनों में उत्पादन रोकने के लिए मजबूर हो सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर संघर्ष लंबे समय तक चलता है तो इसका असर केवल ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

बता दें कि क़तर दुनिया में तरलीकृत प्राकृतिक गैस के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक माना जाता है। हाल ही में क़तर ने अपने रास लफ़ान गैस संयंत्र पर ड्रोन हमले के बाद “अपरिहार्य परिस्थितियों” की घोषणा की है। गौरतलब है कि यह संयंत्र देश के गैस निर्यात का प्रमुख केंद्र है और दुनिया की कुल तरलीकृत प्राकृतिक गैस आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा क़तर से ही आता है।

ऊर्जा मंत्री ने कहा कि अगर अभी संघर्ष रुक भी जाए तो भी सामान्य आपूर्ति व्यवस्था बहाल होने में कई सप्ताह या महीनों का समय लग सकता है। मौजूद जानकारी के अनुसार हमले के बाद नुकसान का आकलन और आपूर्ति व्यवस्था को दोबारा व्यवस्थित करने में समय लगेगा।

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अगर हालात जल्द नहीं सुधरे तो खाड़ी क्षेत्र के अन्य ऊर्जा निर्यातक देशों को भी जल्द ही इसी तरह की घोषणा करनी पड़ सकती है। साद अल-काबी के मुताबिक अगर यह संघर्ष कुछ सप्ताह और जारी रहा तो दुनिया की आर्थिक वृद्धि दर पर भी असर पड़ सकता है।

गौरतलब है कि उनके बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली है। मौजूद जानकारी के अनुसार ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत शुक्रवार को लगभग 2.5 प्रतिशत बढ़कर करीब 87.6 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। वहीं प्राकृतिक गैस की कीमतें भी बढ़कर लगभग 40 डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल इकाई तक जा सकती हैं।

बताया जा रहा है कि होरमुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही भी काफी प्रभावित हुई है। यह समुद्री मार्ग बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से का तेल और गैस इसी रास्ते से होकर गुजरता है। हालिया तनाव के दौरान कई जहाजों पर हमले की घटनाएं सामने आई हैं और बीमा प्रीमियम में भी तेज़ बढ़ोतरी देखी जा रही है।

इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिकी नौसेना जहाजों को सुरक्षा देते हुए इस समुद्री मार्ग से गुजरने में मदद करेगी। हालांकि क़तर के ऊर्जा मंत्री का मानना है कि जब तक संघर्ष पूरी तरह नहीं रुकता तब तक यह मार्ग सुरक्षित नहीं माना जा सकता।

साद अल-काबी ने स्पष्ट कहा कि मौजूदा हालात में जहाजों को इस रास्ते से ले जाना बेहद खतरनाक हो सकता है। उनके अनुसार क़तर तभी दोबारा गैस उत्पादन और निर्यात को पूरी तरह सामान्य करेगा जब क्षेत्र में संघर्ष पूरी तरह समाप्त हो जाएगा और हालात स्थिर हो जाएंगे।

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