अयातुल्ला अली खामेनेई के एक्स हैंडल से एक पोस्ट हुआ है। खुर्रम शहर का वक्त आ गया। ये मिसाइल ईरानियों की पहचान ये दुश्मन को खत्म करने के लिए ये ईरानियों के युवाओं ने तैयार की है। वो भी खामनी के एक सैंडल से और पोस्ट करके इसने जो कैप्शन में लिखा है वो ये कि ये मिसाइल ईरानियों की पहचान है। ये ईरान के दुश्मनों को खत्म करने के लिए है और इसे ईरानियों ने बनाया है। यहां के यूथ ने तैयार किया और लेबनान में जहां 102 लोगों की मौत हो गई है। लोग पलायन कर रहे हैं।
खोर्रमशहर क्या है
खोर्रमशहर-4 को खैबर मिसाइल भी कहते हैं। यह मीडियम रेंज बैलिस्टिक मिसाइल (MRBM) है जो सड़क पर चलने वाली लॉन्चर से दागी जाती है। इसकी लंबाई 13 से 13.5 मीटर, व्यास 1.5 से 1.8 मीटर और वजन 15000 से 20000 किलो है। इसमें 1800 किलो तक पेलोड ले जाने की क्षमता है। मिसाइल में 1 टन से ज्यादा हाई एक्सप्लोसिव वारहेड लगाया जा सकता है। यह लिक्विड फ्यूल से चलती है और 2000 से 3000 किलोमीटर तक मार कर सकती है। ईरान का दावा है कि यह 2000 किलोमीटर दूर भी 30 मीटर के दायरे में सटीक निशाना लगाती है।
खामेनेई की मौत के बाद लेबनान से सक्रिय हिजबुल्ला ने उत्तरी इजराइल की ओर रॉकेट दागे। इसके जवाब में इजराइल ने दक्षिणी लेबनान, बेरूत और पूर्वी बेका घाटी में संगठन के ठिकानों पर नए हवाई हमले किए। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही हिजबुल्ला अब पहले जितना शक्तिशाली नहीं रहा, फिर भी उसके कदम लेबनान को गंभीर संकट में डाल सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, हिजबुल्ला फिलहाल अमेरिका और इजराइल के खिलाफ ईरान के युद्ध में प्रभावी सैन्य सहयोगी बनने की स्थिति में नहीं है, लेकिन उसकी गतिविधियां लेबनान को अस्थिर कर सकती हैं। इसके साथ ही यह आशंका भी जताई जा रही है कि हिजबुल्ला की प्रतिक्रिया को बहाना बनाकर इजराइल या सीरिया लेबनान में जमीनी अभियान शुरू कर सकते हैं। हिजबुल्ला की स्थापना 1985 में 1979 की ईरानी क्रांति से प्रेरित होकर की गई थी। लेबनान में हमास कमांडर के भी मारे जाने की खबर है। हमास कमांडर अताउल्लाह अली ढेर हुआ है। इजराइल की लेवी ने ढेर कर दिया इसको। हमास कमांडर ट्रिपोली इलाके में मार गिराया गया। ट्रिपोली इलाके में इसको मारा गया। बड़ी जानकारी सामने आ रही है लेबन। ईरान से रंग के बीच इजराइल ने लेबनान के खिलाफ भी हमला बोल दिया है। जहां इजराइली नेवी ने त्रिपोली इलाके में हमला करके हमास कमांडर वसीम अतालाह अली को मार गिराया जो लेबनान में हमास ऑपरेटिव्स को ट्रेनिंग देता था। बताया जा रहा है कि हमले के वक्त अतालाह अपने परिवार के साथ घर पर मौजूद था।
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श्रीलंका की संसद में गुरुवार को एक ऐसा सवाल उठा जिसने हिंद महासागर में उभरे खतरनाक सैन्य टकराव की परतें खोल कर रख दीं। विपक्षी नेताओं ने सरकार से पूछा कि क्या अमेरिकी हमले का शिकार बना ईरानी युद्धपोत काफी समय से श्रीलंका के जल क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति मांग रहा था? एसजेबी के सांसद मुजीबुर रहमान ने संसद में दावा किया कि ईरानी जहाज को गाले बंदरगाह से लगभग चालीस समुद्री मील दूर ग्यारह घंटे तक इंतजार करना पड़ा। उनका कहना था कि संघर्ष की स्थिति के कारण जहाज के लिए ईरान लौटना कठिन था और उसने श्रीलंका से शरण की मांग की थी।
रहमान ने यह भी सवाल उठाया कि क्या श्रीलंका सरकार ने अमेरिका और भारत के दबाव में जहाज को बंदरगाह में प्रवेश की अनुमति देने में देरी की? उन्होंने कहा कि जिस जहाज पर बाद में अमेरिकी पनडुब्बी ने हमला किया, वह कई घंटे तक श्रीलंका के जल क्षेत्र में प्रवेश की गुहार लगाता रहा। यह आरोप श्रीलंका के भीतर एक बड़े राजनीतिक और कूटनीतिक विवाद को जन्म दे चुका है, क्योंकि इस पूरे घटनाक्रम ने यह संकेत दिया है कि छोटा-सा द्वीपीय देश अब वैश्विक शक्ति राजनीति के भंवर में फंस गया है।
विपक्ष के नेता सजित प्रेमदासा ने भी संसद में कहा कि कोलंबो के पास एक और ईरानी जहाज की मौजूदगी ने स्थिति को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। वहीं श्रीलंका सरकार के प्रवक्ता नलिंदा जयतिस्स ने जवाब देते हुए कहा कि सरकार के पास कई ऐसी जानकारियां हैं जो अभी सार्वजनिक नहीं की जा सकतीं और हालात सामान्य होने के बाद संसद में विस्तृत रिपोर्ट रखी जाएगी। उन्होंने कहा कि सरकार स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है।
दरअसल यह पूरा विवाद उस समय भड़का जब बुधवार सुबह श्रीलंका के दक्षिणी तट के पास अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरान के युद्धपोत डेना पर टारपीडो दाग कर उसे समुद्र में डुबो दिया। यह जहाज भारत में आयोजित नौसैनिक अभ्यास में भाग लेने के बाद अपने देश लौट रहा था। गाले से लगभग चालीस समुद्री मील दूर यह हमला हुआ और कुछ ही समय में जहाज समुद्र की गहराइयों में समा गया।
अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने खुलकर स्वीकार किया कि यह हमला अमेरिकी सेना ने ही किया है। यह बयान इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि दूसरे विश्व युद्ध के बाद पहली बार हिंद महासागर के इन जल क्षेत्रों में अमेरिका ने किसी दुश्मन जहाज को निशाना बनाया है। इस एक हमले ने पूरे इलाके में सैन्य और कूटनीतिक हलचल पैदा कर दी है। इस पूरे घटनाक्रम में एक और चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार ईरानी युद्धपोत डेना को निशाना बनाने वाली टारपीडो अमेरिकी नौसेना की हमला करने वाली पनडुब्बी यूएसएस शार्लोट से दागी गई थी। यह लॉस एंजिलिस वर्ग की पनडुब्बी है जिसे समुद्र में दुश्मन जहाजों को नष्ट करने के लिए तैयार किया गया है। बताया गया कि इस पनडुब्बी ने डेना पर दो एमके-48 टारपीडो दागे। पहला टारपीडो अपने लक्ष्य से चूक गया लेकिन दूसरा सीधे जहाज से टकराया और कुछ ही क्षणों में ईरानी युद्धपोत समुद्र की गहराइयों में समा गया। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भी इस हमले की पुष्टि करते हुए कहा कि ईरानी जहाज को यह भ्रम था कि वह अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में सुरक्षित है, लेकिन अमेरिका ने उसे वहीं निशाना बना दिया। यह खुलासा इस बात का संकेत है कि क्षेत्र में अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव अब खुले समुद्री टकराव के स्तर तक पहुंच चुका है।
बताया जा रहा है कि श्रीलंका को सुबह पांच बजकर आठ मिनट पर संकट संदेश मिला था। जब निगरानी विमान घटनास्थल पर पहुंचे तब तक जहाज पूरी तरह डूब चुका था और समुद्र की सतह पर केवल तेल की परत तैर रही थी। जहाज पर लगभग 180 नौसैनिक सवार थे। इसके बाद बचाव अभियान तेज किया गया और कई देशों ने इसमें भाग लिया।
भारत ने भी तुरंत सक्रियता दिखाते हुए खोज और बचाव अभियान में अपने संसाधन लगा दिए। भारतीय नौसेना ने लंबी दूरी का समुद्री गश्ती विमान भेजा और जीवन रक्षक नौकाओं से लैस एक अन्य विमान को भी तैयार रखा। इसके अलावा तारंगिनी नामक जहाज को बचाव अभियान में लगाया गया और कोच्चि से इक्शक नामक जहाज को भी रवाना किया गया ताकि लापता नौसैनिकों की तलाश जारी रखी जा सके।
घटना के बाद एक और नाटकीय मोड़ तब आया जब ईरान का दूसरा युद्धपोत बुशेहर कई घंटों तक श्रीलंका के जल क्षेत्र के बाहर खड़ा रहा। यह जहाज श्रीलंका के विशेष आर्थिक क्षेत्र में पहुंच चुका था और बंदरगाह में प्रवेश की अनुमति का इंतजार कर रहा था। आखिरकार श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुर कुमार दिसानायके ने घोषणा की कि जहाज के 208 कर्मियों को कोलंबो बंदरगाह पर उतारा जाएगा और जहाज को त्रिंकोमाली बंदरगाह ले जाया जाएगा।
यह पूरा घटनाक्रम केवल एक सैन्य घटना नहीं बल्कि हिंद महासागर में बदलते शक्ति संतुलन का संकेत है। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव की लपटें अब इस क्षेत्र तक पहुंच चुकी हैं। यदि अमेरिका और ईरान के बीच टकराव समुद्र में इसी तरह बढ़ता रहा तो यह इलाका वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
हिंद महासागर दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री धमनियों में से एक है। यहां से गुजरने वाले समुद्री मार्गों से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और माल ढुलाई होती है। ऐसे में किसी भी सैन्य टकराव का असर केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक हो सकता है।
अमेरिका द्वारा किया गया यह हमला एक स्पष्ट संदेश भी माना जा रहा है कि हिंद महासागर में उसकी सैन्य मौजूदगी अब भी निर्णायक है। दूसरी ओर ईरान के लिए यह घटना एक गंभीर चुनौती बनकर सामने आई है। श्रीलंका के लिए यह स्थिति और भी कठिन है क्योंकि उसे अपने तट के पास खड़े महाशक्तियों के इस टकराव के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है।
बहरहाल, समुद्र की सतह भले ही शांत दिखाई दे, लेकिन इसके नीचे चल रही शक्ति की राजनीति की लहरें अब तेजी से उफान लेने लगी हैं। यदि समय रहते कूटनीतिक रास्ता नहीं निकाला गया तो हिंद महासागर आने वाले समय में वैश्विक टकराव का नया मंच बन सकता है।
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