ट्रेन में ही मनाया करवा चौथ, बेंगलुरु से बिहार जा रहे कपल का वीडियो वायरल, पति ने यूं पिलाया पत्नी को पानी!
बेंगलुरु से बिहार जा रहे एक कपल ने ट्रेन के सफर के दौरान ही करवा चौथ मनाया. वायरल वीडियो में पति ट्रेन के डिब्बे के बीच खड़े होकर अपनी पत्नी को पानी पिलाकर व्रत खुलवाता नजर आ रहा है. इस खूबसूरत पल को यात्रियों ने कैमरे में कैद कर लिया. आप भी देखें..
यूपी में वोटर लिस्ट से नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 के इस्तेमाल पर सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगी जांच रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश में वोटर लिस्ट को लेकर चल रही प्रक्रिया के बीच एक नया विवाद सामने आया है। मामला मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-7 से जुड़ा है। आरोप है कि कुछ जगहों पर बड़ी संख्या में फॉर्म-7 जमा किए गए और उनमें ऐसी गड़बड़ियां थीं, जिनकी ठीक से जांच होना जरूरी है। इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने चुनाव आयोग को शिकायतों की जांच करने और जरूरी कदम उठाने का निर्देश दिया है।
दरअसल, चुनाव आयोग की ओर से देश के अलग-अलग हिस्सों में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR कराया जा रहा है। इसका मकसद वोटर लिस्ट को सही करना और उसमें मौजूद गलतियों को दूर करना है। इस प्रक्रिया में नए मतदाताओं के नाम जोड़ने, गलत जानकारी सुधारने और पात्रता नहीं रखने वाले लोगों के नाम हटाने का काम किया जाता है। इसी प्रक्रिया में फॉर्म-7 का इस्तेमाल किसी मतदाता का नाम हटाने का दावा या आपत्ति दर्ज कराने के लिए होता है।
बड़ी संख्या में फॉर्म जमा किए गए
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि उत्तर प्रदेश में कुछ स्थानों पर फॉर्म-7 का इस्तेमाल सामान्य तरीके से नहीं हुआ। आरोप लगाया गया कि बड़ी संख्या में फॉर्म जमा किए गए और उनमें कई ऐसी बातें सामने आईं, जिन पर संदेह होता है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि एक विधानसभा क्षेत्र में कथित तौर पर 32 फॉर्म जमा किए गए थे। खास बात यह थी कि इन सभी फॉर्म में एक ही समुदाय के लोगों के नाम शामिल थे।
BLO के हस्ताक्षर दिखाई दे रहे थे
याचिकाकर्ताओं ने कुछ फॉर्म की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि रिकॉर्ड में मौजूद दो फॉर्म पर बूथ लेवल अधिकारियों यानी BLO के हस्ताक्षर दिखाई दे रहे थे। इस वजह से यह सवाल उठा कि आखिर इन फॉर्म को किसने भरा और किस आधार पर जमा किया गया। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि चुनाव आयोग के जवाब और उपलब्ध दस्तावेजों में कुछ ऐसी बातें हैं, जिनका आपस में मेल नहीं बैठता। इसलिए पूरे मामले की गंभीरता से जांच होनी चाहिए।
शिकायत की जांच की जा सकती है
दूसरी तरफ चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डीएस नायडू ने अदालत को बताया कि आयोग ने इस तरह की शिकायतों की जांच कराई है। अधिकारियों ने फॉर्म की जांच और दोबारा मिलान किया। आयोग के अनुसार, कुछ शिकायतें गलत पाई गईं और जिन फॉर्म को गलत पाया गया, उन पर कार्रवाई नहीं की गई। आयोग का कहना था कि अगर किसी के पास किसी खास गड़बड़ी का सबूत है, तो वह शिकायत दे सकता है। उस शिकायत की जांच की जा सकती है।
अलग से जांच होनी चाहिए
हालांकि याचिकाकर्ताओं ने आयोग के इस जवाब पर संतुष्टि नहीं जताई। उनका कहना था कि केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि शिकायतें गलत पाई गईं। जिन मामलों में दस्तावेजों के भीतर ही अंतर दिखाई दे रहा है, उनकी अलग से जांच होनी चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि कर्नाटक और तेलंगाना में इसी तरह की शिकायतों के बाद कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि उत्तर प्रदेश में प्रभावी कार्रवाई नहीं होने के कारण ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा मिला।
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि जिन गड़बड़ियों का जिक्र अदालत के सामने किया गया है, उनकी जानकारी चुनाव आयोग के वकील को एक लिखित नोट के माध्यम से दी जाए। याचिकाकर्ताओं को उन मामलों का विवरण देना होगा, जिनका अभी तक समाधान नहीं हुआ है।
इसके बाद चुनाव आयोग को दिए गए नोट में शामिल तथ्यों की जांच करनी होगी। आयोग को यह देखना होगा कि फॉर्म जमा करने की प्रक्रिया में वास्तव में कोई गड़बड़ी हुई है या नहीं। अगर जांच में कोई गलती सामने आती है, तो उसे सुधारने के लिए जरूरी कदम भी उठाने होंगे। इसके बाद चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।
गलत जानकारी या फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल
इस मामले में अदालत का निर्देश इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मतदाता सूची में नाम होना हर योग्य नागरिक के मतदान के अधिकार से जुड़ा है। अगर किसी का नाम गलत तरीके से हट जाता है, तो वह चुनाव में अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। वहीं, किसी व्यक्ति का नाम हटाने के लिए गलत जानकारी या फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल भी गंभीर मामला है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने अब मुख्य सवाल यही है कि उत्तर प्रदेश में फॉर्म-7 जमा करने की प्रक्रिया के दौरान जिन गड़बड़ियों की शिकायत की गई है, वे वास्तव में हुई हैं या नहीं। चुनाव आयोग की जांच और उसकी रिपोर्ट से इस बारे में स्थिति साफ हो सकेगी।
अदालत के इस कदम से साफ है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी है। किसी भी नागरिक का नाम बिना उचित आधार के नहीं हटना चाहिए और शिकायत मिलने पर उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। आखिरकार वोटर लिस्ट का सही होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है।
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