US Congress चुनाव नतीजों से ट्रंप पर बढ़ेगा दबाव, ईरान वॉक और भारत पर क्या पड़ेगा असर?
3 नवंबर को अमेरिकी नागरिक 'हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स' और 'सीनेट' पर नियंत्रण के लिए मध्यावधि चुनाव में मतदान करेंगे। ये चुनाव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के राजनीतिक करियर की एक अहम परीक्षा साबित हो सकते हैं, और इनके नतीजे उन मुद्दों को प्रभावित कर सकते हैं जो भारत के लिए मायने रखते हैं। राष्ट्रपति की अप्रूवल रेटिंग, उनके पदभार संभालने के समय के 47% से गिरकर औसतन लगभग 37% पर आ गई है। कुछ पोल में तो यह आंकड़ा अब तक के सबसे निचले स्तर 33% से 34% तक पहुंच गया है, जिसका कारण अर्थव्यवस्था, ईंधन की कीमतों और ईरान युद्ध को लेकर बढ़ता हुआ गुस्सा है। अनुमानों के अनुसार, रिपब्लिकन पार्टी 'हाउस' (प्रतिनिधि सभा) में अपनी सत्ता खो सकती है, जहां अभी उनके पास बहुत ही मामूली बहुमत है। वहीं, डेमोक्रेट्स ने सीनेट में भी अपनी दावेदारी मजबूत कर ली है, और उनके उम्मीदवार टेक्सास जैसे रिपब्लिकन गढ़ों में भी उलटफेर करने की स्थिति में हैं।
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नई कांग्रेस क्या बदल सकती है और क्या नहीं
अमेरिकी थिंक टैंक 'काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस' के जेम्स लिंडसे का कहना है कि मध्यावधि चुनाव (मिडटर्म) शायद ही कभी अमेरिकी रणनीति की मूल दिशा को बदलते हैं। 2006 में, इराक युद्ध को लेकर मतदाताओं के भारी असंतोष का फायदा उठाते हुए डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिकन्स से हाउस और सीनेट, दोनों पर अपना नियंत्रण वापस ले लिया था। उस समय भारी दबाव के बावजूद, राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने युद्ध में अमेरिकी भागीदारी पर पुनर्विचार करने से इनकार कर दिया, और 2007 में उन्होंने इराक में 20,000 से अधिक अतिरिक्त सैनिक भेजने का आदेश दिया। लिंडसे का तर्क है कि जब राष्ट्रपति को अपने कदमों के लिए विधायी सहमति की आवश्यकता होती है, तो कांग्रेस पर नियंत्रण रखने वाली पार्टी के पास दबाव बनाने की ताकत होती है। ईरान युद्ध या वैश्विक टैरिफ के मामलों में ट्रम्प को ऐसी किसी सहमति की जरूरत नहीं पड़ी, जिससे यह सीमित हो जाता है कि विदेश नीति में कितना बदलाव आएगा। फिर भी, हाउस पर डेमोक्रेटिक पार्टी का नियंत्रण (जिसकी उम्मीद है) और सीनेट पर नियंत्रण (जिसकी संभावना थोड़ी कम है) - ये दोनों बातें दुनिया में अमेरिका के बर्ताव को इस तरह प्रभावित कर सकती हैं, जिसका असर भारत और अन्य देशों पर भी पड़ेगा।
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ईरान युद्ध
यह युद्ध अमेरिकी मतदाताओं के बीच बेहद अलोकप्रिय हो गया है, क्योंकि इसके कारण ऊर्जा की कीमतें काफी बढ़ गई हैं। इसे रोकना डेमोक्रेट्स के विधायी एजेंडे में एक प्राथमिकता है। इसका मुख्य उपाय खर्च संबंधी विधेयकों पर नियंत्रण हो सकता है, जिन्हें हाउस (सदन) से पारित होना जरूरी है। डेमोक्रेटिक सांसदों ने युद्ध के लिए नया फंड देने पर रोक लगाने के प्रस्ताव पेश किए हैं, लेकिन इन्हें सीनेट से भी पास होना होगा, और संभावना है कि ट्रम्प इन पर वीटो लगा देंगे। पार्टी नए फंड को मंजूरी देने से भी इनकार कर सकती है, हालांकि पेंटागन के पास पहले से मौजूद फंड की वजह से शायद अमेरिकी अभियानों पर तुरंत कोई असर न पड़े। फिर भी, डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाला हाउस (प्रतिनिधि सभा) ट्रम्प और उनकी टीम के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है। वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक 'सेंटर फॉर इंटरनेशनल पॉलिसी' के एग्जीक्यूटिव वाइस-प्रेसिडेंट और वरमोंट के सीनेटर बर्नी सैंडर्स के पूर्व विदेश नीति सलाहकार, मैट डस कहते हैं, "यह एक ऐसा युद्ध है जो डेमोक्रेट्स के बीच बिल्कुल भी लोकप्रिय नहीं है। सच कहें तो, आम अमेरिकी लोगों के बीच भी यह बहुत अलोकप्रिय है। इसलिए, मुझे उम्मीद है कि इस युद्ध को लेकर सुनवाई (hearings) होंगी। मुझे लगता है कि रक्षा सचिव पीट हेगसेथ पर खास ध्यान दिया जाएगा, और संभव है कि उनके खिलाफ महाभियोग (impeachment) की प्रक्रिया भी शुरू करने की कोशिश की जाए। ये तो बस कुछ उदाहरण हैं कि डेमोक्रेट्स क्या-क्या कर सकते हैं।
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पाकिस्तान और जांच करने की शक्ति
ट्रम्प प्रशासन के पाकिस्तान के साथ बेहतर होते रिश्तों को लेकर नई दिल्ली में चिंता जताई गई है। इसी तरह, इस्लामाबाद के उन व्यवसायों के साथ लेन-देन पर भी सवाल उठे हैं, जिनका संबंध ट्रम्प के परिवार और उनके सहयोगियों से है। आलोचकों का कहना है कि ऐसे समय में जब ट्रम्प खुद अमेरिकी क्रिप्टो नीति की देखरेख कर रहे हैं, उनके परिवार का क्रिप्टो कारोबार में विस्तार करना 'हितों के टकराव' (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) का मामला है। साल 2025 में पाकिस्तान सरकार की एक संस्था ने 'वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल' के साथ एक 'लेटर ऑफ इंटेंट' (इरादा पत्र) पर हस्ताक्षर किए। यह एक क्रिप्टो फर्म है जिसे ट्रम्प परिवार का समर्थन प्राप्त है। इसके अलावा, न्यूयॉर्क में पाकिस्तान के स्वामित्व वाले रूजवेल्ट होटल के पुनर्विकास के लिए, उन्होंने ट्रम्प के विशेष दूत की मदद से 'जनरल सर्विसेज एडमिनिस्ट्रेशन' (GSA) के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर बातचीत की। GSA अमेरिकी सरकार की वह एजेंसी है जो संघीय संपत्तियों का प्रबंधन करती है।
Explainer: रेत छानो, सोना पाओ! भारत की इस नदी में आखिर कहां से आते हैं सोने के कण?
Jharkhand Subarnarekha River: झारखंड अपनी खनिज संपदा के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. यहां कोयला, लौह अयस्क और कई दूसरे खनिजों के बड़े भंडार हैं. लेकिन इसी राज्य में एक ऐसी नदी भी बहती है, जिसकी रेत से सोने के बारीक कण मिलते हैं. इस नदी का नाम है स्वर्णरेखा, जिसे सुवर्णरेखा भी कहा जाता है. इसके किनारे रहने वाले कई ग्रामीण पीढ़ियों से रेत और मिट्टी से सोने के कण निकालकर अपनी आजीविका चलाते आ रहे हैं. यह काम जितना दिलचस्प है, उतना ही कठिन भी. दिनभर नदी में मेहनत करने के बाद कई बार इतनी कम कमाई होती है कि परिवार का खर्च चलाना भी मुश्किल हो जाता है. आइए जानते हैं कि आखिर स्वर्णरेखा नदी में सोना कहां से आता है और ग्रामीण इसे निकालने के लिए कौन-सा तरीका अपनाते हैं.
स्वर्णरेखा नदी कहां से निकलती है और कहां तक जाती है?
- झारखंड की खास पहचान: स्वर्णरेखा नदी झारखंड की प्रमुख नदियों में से एक है. इसका नाम संस्कृत के 'स्वर्ण' यानी सोना और 'रेखा' शब्द से जुड़ा है. इसका अर्थ सोने की लकीर होता है.
- कहां से होता है उद्गम: स्वर्णरेखा नदी का उद्गम रांची के पास नगड़ी क्षेत्र से माना जाता है. यहां से निकलकर यह नदी झारखंड के अलग-अलग इलाकों से गुजरती है.
- कितनी लंबी है नदी: स्वर्णरेखा नदी की लंबाई करीब 395 किलोमीटर बताई जाती है. यह झारखंड के अलावा पश्चिम बंगाल और ओडिशा के कुछ हिस्सों से होकर बहती है.
- कहां मिलती है समुद्र में: लंबा सफर तय करने के बाद यह नदी बंगाल की खाड़ी में जाकर मिल जाती है.
- ग्रामीणों के लिए क्यों खास: स्वर्णरेखा सिर्फ पानी का स्रोत नहीं है. इसके कुछ हिस्सों में मिलने वाले सोने के बारीक कण आसपास के ग्रामीणों के लिए कमाई का जरिया भी हैं. खासकर चांडिल और आसपास के इलाकों में लोग पारंपरिक तरीकों से इन कणों को निकालते हैं.
नदी की रेत में सोना कहां से आता है?
- चट्टानों से जुड़ा है सोने का रहस्य: नदी में सोने के कण मिलने के पीछे भूगर्भीय प्रक्रियाएं जिम्मेदार होती हैं. नदी के बहाव क्षेत्र में मौजूद कुछ चट्टानों और खनिजयुक्त मिट्टी में सोने के अंश हो सकते हैं.
- कैसे नदी तक पहुंचता है सोना: समय के साथ बारिश, हवा, पानी के बहाव और चट्टानों के कटाव से छोटे-छोटे कण अलग होते हैं. ये कण मिट्टी, बालू और दूसरे खनिजों के साथ नदी में पहुंच सकते हैं.
- क्या है प्लेसर डिपॉजिट: जब नदी के बहाव के साथ आए भारी खनिजों के कण रेत या तलछट में जमा हो जाते हैं, तो ऐसे जमाव को प्लेसर निक्षेप कहा जाता है. सोने के कणों का नदी की रेत में जमा होना भी इसी प्रक्रिया से जुड़ा हो सकता है.
- सोना नीचे क्यों बैठ जाता है: सोना कई सामान्य खनिजों और रेत के मुकाबले काफी भारी होता है. इसलिए पानी के बहाव में सही परिस्थितियां मिलने पर इसके कण नीचे की तलछट में जमा हो सकते हैं.
- हर जगह सोना नहीं मिलता: नदी के सभी हिस्सों में सोने की मात्रा एक जैसी नहीं होती. कणों की मौजूदगी स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों, चट्टानों और पानी के बहाव पर निर्भर करती है.
कैसे रेत और मिट्टी से सोने के कण निकालते हैं ग्रामीण?
स्वर्णरेखा के किनारे रहने वाले ग्रामीण सोना निकालने के लिए बड़ी मशीनों या आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल नहीं करते. उनका काम पारंपरिक अनुभव और धैर्य पर आधारित है. यह हुनर कई परिवारों में पीढ़ियों से चला आ रहा है.
- सबसे पहले जगह की पहचान: ग्रामीण नदी के ऐसे हिस्सों को चुनते हैं, जहां पानी का बहाव अपेक्षाकृत धीमा हो और भारी कण जमा होने की संभावना हो.
- पत्थरों और रेत को हटाना: चुनी गई जगह से बड़े पत्थर हटाए जाते हैं. इसके बाद बालू और नीचे जमा तलछट को इकट्ठा किया जाता है.
- बर्तन में मिट्टी भरना: निकाली गई मिट्टी और रेत को लोहे की फली, थाली या दूसरे उपयुक्त बर्तन में रखा जाता है.
- पानी में गोल-गोल घुमाना: बर्तन को पानी में धीरे-धीरे घुमाया जाता है. इससे हल्की रेत और मिट्टी बहकर बाहर निकल जाती है, जबकि भारी खनिजों के कण नीचे रह जाते हैं.
- सोने के कणों को अलग करना: बार-बार छंटाई और धुलाई करने के बाद बचे हुए पदार्थ में से सोने के बारीक कण अलग किए जाते हैं. यह काम काफी सावधानी से करना पड़ता है, क्योंकि कण बेहद छोटे हो सकते हैं.
- धूप में सुखाना: जमा किए गए कणों को सुखाया जाता है और फिर संभालकर रखा जाता है. इसके बाद इन्हें स्थानीय खरीदारों या सुनारों को बेचा जा सकता है.
यह पूरी प्रक्रिया काफी धीमी होती है. कई बार घंटों मेहनत करने के बाद भी बहुत कम सोना हाथ लगता है. इसलिए इस काम में अनुभव के साथ-साथ किस्मत की भी अहम भूमिका रहती है.
सोना निकालने के लिए ग्रामीणों को कितनी मेहनत करनी पड़ती है?
- घंटों पानी में रहना: ग्रामीणों को कई घंटे नदी के किनारे या पानी के भीतर बैठकर काम करना पड़ता है. इस दौरान शरीर लगातार पानी और गीली मिट्टी के संपर्क में रहता है.
- गर्मी और ठंड की चुनौती: गर्मियों में तेज धूप और सर्दियों में ठंडे पानी के बीच काम करना आसान नहीं होता. बारिश के मौसम में नदी का जलस्तर और तेज बहाव जोखिम बढ़ा सकते हैं.
- कमर और जोड़ों में दर्द: लगातार झुककर काम करने से कमर, घुटनों और जोड़ों में दर्द की शिकायत हो सकती है. लंबे समय तक एक ही मुद्रा में बैठना भी परेशानी बढ़ाता है.
- त्वचा और संक्रमण का खतरा: गंदे पानी, गीली मिट्टी और लंबे समय तक हाथ-पैर पानी में रखने से त्वचा संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.
- कमाई की अनिश्चितता: दिनभर काम करने के बाद भी यह तय नहीं होता कि कितने कण मिलेंगे. कई बार पूरी मेहनत के बावजूद कमाई बहुत कम होती है.
इस तरह सोने के छोटे-छोटे कणों को निकालने के पीछे ग्रामीणों की लंबी मेहनत और रोजी-रोटी का संघर्ष छिपा है.
कितनी होती है कमाई और किसे बेचते हैं सोना?
स्वर्णरेखा नदी से सोना निकालने वाले ग्रामीणों की कमाई इस बात पर निर्भर करती है कि दिनभर में कितने कण मिलते हैं और खरीदार उन्हें किस कीमत पर खरीदता है.
- स्थानीय व्यापारियों को बिक्री: ग्रामीण आम तौर पर निकाले गए कण स्थानीय सुनारों या छोटे व्यापारियों को बेचते हैं.
- मामूली कमाई: उपलब्ध स्थानीय विवरणों के मुताबिक, कुछ ग्रामीणों को दिनभर की मेहनत के बदले करीब 100 से 200 रुपये तक मिल पाते हैं. हालांकि यह कमाई हर व्यक्ति और हर दिन के लिए एक जैसी नहीं होती.
- सोना मिलने की कोई गारंटी नहीं: कभी ज्यादा कण मिल जाते हैं, तो कभी बहुत कम. कई बार पूरा दिन मेहनत करने के बावजूद बिक्री के लायक सोना नहीं मिल पाता.
- परिवार के कई सदस्य करते हैं काम: कुछ परिवारों में महिलाएं, बुजुर्ग और दूसरे सदस्य भी इस काम में सहयोग करते हैं. इससे परिवार की कुल मेहनत बढ़ती है, लेकिन आमदनी फिर भी सीमित रह सकती है.
- आजीविका का पुराना साधन: रोजगार के दूसरे साधनों की कमी वाले कुछ ग्रामीण परिवारों के लिए यह काम अतिरिक्त या नियमित कमाई का जरिया बना हुआ है.
यहां एक बात समझना जरूरी है कि नदी से सोना मिलना और उससे अच्छी कमाई होना दो अलग बातें हैं. सोने के कणों की मात्रा बहुत कम होने के कारण यह काम किसी बड़े खजाने की तलाश जैसा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने का संघर्ष है.
स्वर्णरेखा नदी सिर्फ सोने के लिए ही क्यों नहीं है खास?
- कई इलाकों के लिए जलस्रोत: स्वर्णरेखा नदी अपने आसपास के क्षेत्रों में पानी और प्राकृतिक संसाधनों का महत्वपूर्ण स्रोत है.
- स्थानीय जीवन से गहरा रिश्ता: नदी के किनारे बसे लोगों की आजीविका, परंपराएं और रोजमर्रा की गतिविधियां इससे जुड़ी हुई हैं.
- पीढ़ियों से चला आ रहा हुनर: रेत से सोने के कण अलग करने की पारंपरिक तकनीक स्थानीय लोगों के अनुभव और पीढ़ियों से मिले ज्ञान को दिखाती है.
- प्रकृति और रोजगार का संबंध: नदी में मिलने वाले सोने के कण यह समझने का अवसर देते हैं कि भूगर्भीय प्रक्रियाएं किस तरह स्थानीय लोगों की आजीविका को प्रभावित कर सकती हैं.
- पर्यावरण की सुरक्षा भी जरूरी: नदी में अत्यधिक रेत निकालना, कचरा डालना या अनियंत्रित खुदाई करना पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकता है. इसलिए नदी के प्राकृतिक बहाव और पारिस्थितिकी की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है.
स्वर्णरेखा की चमक के पीछे छिपी जिंदगी की सच्चाई
स्वर्णरेखा नदी का नाम सुनते ही मन में सोने से भरी किसी नदी की तस्वीर उभर सकती है, लेकिन हकीकत इससे काफी अलग है. यहां सोने के बड़े टुकड़े नहीं, बल्कि रेत और तलछट में मिले बेहद छोटे कण लोगों की मेहनत का आधार बनते हैं.
- नदी से सोना निकालने का काम धैर्य, अनुभव और लगातार मेहनत मांगता है.
- इससे होने वाली कमाई सीमित और अनिश्चित रहती है.
- कई ग्रामीण परिवार आज भी पारंपरिक तरीके से इन कणों को निकालकर अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने की कोशिश करते हैं.
- नदी का भूगर्भीय महत्व, स्थानीय लोगों का पारंपरिक ज्ञान और पर्यावरण की सुरक्षा, तीनों पहलू इस कहानी को खास बनाते हैं.
स्वर्णरेखा की असली कहानी सिर्फ सोने के कणों की नहीं, बल्कि उन लोगों के संघर्ष की है, जो नदी की रेत में अपनी रोजी-रोटी तलाशते हैं. उनके लिए सोने की चमक किसी अमीर बनने के सपने से ज्यादा परिवार का पेट भरने और जिंदगी आगे बढ़ाने की उम्मीद है.
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