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Explainer: रूस, अमेरिका और चीन की ताकत कितनी, भारत पर इसका क्या असर पड़ा?
India Questions Veto Power: एक वीटो और दुनिया के 14 देशों की सहमति बेअसर! संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की यही व्यवस्था आज वैश्विक राजनीति में बहस का बड़ा मुद्दा बनी हुई है. रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर गाजा संकट तक, कई मौकों पर सुरक्षा परिषद बड़े संघर्षों को रोकने में नाकाम रही है. भारत ने भी इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा है कि स्थायी सदस्यता वैश्विक शांति की जिम्मेदारी है, न कि अपने राजनीतिक हित साधने का माध्यम. ऐसे में सवाल है कि आखिर वीटो की ताकत क्या है, पिछले तीन दशकों में इसका इस्तेमाल कैसे हुआ और भारत को इससे क्या नुकसान या फायदा हुआ?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद क्यों सवालों के घेरे में है?
- द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हुआ गठन: दुनिया को भविष्य के विनाशकारी युद्धों से बचाने और अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखने के उद्देश्य से 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई. सुरक्षा परिषद को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने की प्रमुख जिम्मेदारी दी गई.
- आज की दुनिया, 1945 का ढांचा: आठ दशक से अधिक समय बीतने के बाद दुनिया की राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं. भारत जैसी उभरती शक्तियां सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता में अपनी हिस्सेदारी चाहती हैं, लेकिन इसकी मौजूदा व्यवस्था में बदलाव आसान नहीं है.
- बड़े संघर्षों पर सीमित कार्रवाई: रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संकट जैसे मामलों में सुरक्षा परिषद कई बार प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पाई. इसकी एक बड़ी वजह स्थायी सदस्यों के बीच मतभेद और वीटो का इस्तेमाल है.
- भारत ने क्या कहा? संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने कहा है कि स्थायी सदस्यता के साथ बड़ी जिम्मेदारी जुड़ी है. इसका इस्तेमाल संकीर्ण राजनीतिक और रणनीतिक हितों को साधने के लिए नहीं किया जाना चाहिए.
क्या है वीटो पावर और कैसे करती है काम?
- सुरक्षा परिषद में 15 सदस्य: इसमें पांच स्थायी और 10 अस्थायी सदस्य होते हैं. अस्थायी सदस्यों का चुनाव दो साल के लिए किया जाता है.
- पांच देशों के पास विशेष अधिकार: अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं. इन्हें पी5 कहा जाता है.
- एक देश रोक सकता है प्रस्ताव: सुरक्षा परिषद में किसी गैर-प्रक्रियात्मक प्रस्ताव को पारित करने के लिए कम से कम नौ सदस्यों के समर्थन की जरूरत होती है. इसके साथ पांच स्थायी सदस्यों में से किसी का नकारात्मक वोट नहीं होना चाहिए. इनमें से कोई एक देश वीटो कर दे तो प्रस्ताव पारित नहीं हो सकता.
- सभी प्रस्तावों पर वीटो नहीं: वीटो का इस्तेमाल मुख्य रूप से अहम और गैर-प्रक्रियात्मक मामलों में होता है. प्रक्रियात्मक मामलों में स्थायी सदस्य का नकारात्मक वोट प्रस्ताव को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं होता.
- इस व्यवस्था पर विवाद क्यों? मान लीजिए कि सुरक्षा परिषद के 14 सदस्य किसी प्रस्ताव का समर्थन करते हैं, लेकिन एक स्थायी सदस्य उसके खिलाफ वीटो कर देता है. ऐसी स्थिति में भी प्रस्ताव पारित नहीं होगा. यही वजह है कि वीटो को कई देश असमान व्यवस्था मानते हैं.
पिछले तीन दशकों में किस देश ने कितनी बार वीटो लगाया?
1996 से लेकर हालिया वर्षों तक वीटो का इस्तेमाल करने वाले देशों के रिकॉर्ड में बड़ा अंतर दिखाई देता है. दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, इस अवधि में रूस सबसे आगे रहा, जबकि ब्रिटेन और फ्रांस ने वीटो का इस्तेमाल नहीं किया.
- रूस: करीब 39 बार वीटो का इस्तेमाल किया गया. सीरिया के गृहयुद्ध और यूक्रेन से जुड़े प्रस्तावों पर रूस ने कई बार अपने हितों के अनुरूप फैसलों को रोकने के लिए वीटो लगाया.
- अमेरिका: करीब 24 बार वीटो का इस्तेमाल किया. इनमें इजरायल और फलस्तीन से जुड़े मामले प्रमुख रहे हैं. अमेरिका का कहना रहा है कि वह इजरायल की सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखता है.
- चीन: करीब 20 बार वीटो का इस्तेमाल किया. सीरिया और दूसरे अंतरराष्ट्रीय विवादों में चीन ने कई बार रूस के साथ मिलकर प्रस्तावों का विरोध किया.
- ब्रिटेन और फ्रांस: दिए गए आंकड़ों में 1996 के बाद इन दोनों देशों की ओर से वीटो के इस्तेमाल का उल्लेख नहीं है.
ध्यान दें: ये आंकड़े एक खास समयावधि के लिए दिए गए हैं. वीटो की कुल संख्या और देशों के रिकॉर्ड समय के साथ बदलते हैं. इसलिए इन्हें संबंधित अवधि के आंकड़ों के रूप में ही समझना चाहिए.
रूस और अमेरिका ने वीटो का इस्तेमाल क्यों किया?
- रूस का रुख: रूस ने सीरिया और यूक्रेन जैसे मामलों में उन प्रस्तावों का विरोध किया, जिन्हें वह अपने रणनीतिक हितों के खिलाफ मानता था. सीरिया में बशर अल असद सरकार से जुड़े प्रस्तावों और यूक्रेन पर रूसी कार्रवाई की आलोचना करने वाले प्रस्तावों पर उसका वीटो चर्चा में रहा.
- अमेरिका की प्राथमिकता: अमेरिका ने इजरायल से जुड़े प्रस्तावों पर कई बार वीटो का इस्तेमाल किया. गाजा युद्ध के दौरान भी युद्धविराम और इजरायली सैन्य कार्रवाई से संबंधित प्रस्तावों पर अमेरिकी रुख को लेकर विवाद हुआ.
- आलोचकों का आरोप: आलोचकों के मुताबिक, दोनों देशों ने कई मौकों पर वैश्विक सहमति से ज्यादा अपने राष्ट्रीय और रणनीतिक हितों को प्राथमिकता दी.
- बड़ा सवाल: अगर सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य ही अपने सहयोगियों या अपने हितों से जुड़े मामलों में निष्पक्ष फैसला नहीं होने देते, तो दुनिया में शांति कायम करने की उसकी भूमिका कितनी प्रभावी रह जाती है?
चीन ने मसूद अजहर के मामले में भारत का रास्ता कैसे रोका?
भारत के लिए वीटो जैसी व्यवस्था की चुनौती केवल सुरक्षा परिषद के औपचारिक फैसलों तक सीमित नहीं रही है. आतंकवाद से जुड़े मामलों में भी चीन ने कई बार भारत की कोशिशों में बाधा डाली.
- मसूद अजहर का मामला: जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक आतंकवादी सूची में शामिल कराने के लिए भारत लंबे समय से प्रयास कर रहा था.
- चीन की तकनीकी रोक: चीन ने कई बार इस प्रस्ताव पर तकनीकी रोक लगाई. प्रतिबंध समिति में सूचीबद्ध करने के मामलों में आम सहमति की जरूरत होती है. ऐसे में एक देश की आपत्ति भी फैसले को रोक सकती है.
- वीटो से अलग, असर लगभग वैसा: तकनीकी रोक औपचारिक वीटो नहीं होती, लेकिन इससे प्रस्ताव पर फैसला लंबे समय तक टल सकता है.
- आखिरकार 2019 में मिली सफलता: अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद चीन ने अपनी आपत्ति वापस ली और मई 2019 में मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक आतंकवादी सूची में शामिल किया गया.
यह मामला दिखाता है कि सुरक्षा परिषद के बाहर भी संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध व्यवस्था में किसी देश की आपत्ति महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.
इतिहास में भारत को वीटो से कब मिला फायदा?
वीटो की व्यवस्था पर बहस करते समय यह समझना जरूरी है कि इसका इस्तेमाल हमेशा भारत के खिलाफ नहीं हुआ. कुछ मौकों पर इसी अधिकार ने भारत को कूटनीतिक मदद भी पहुंचाई.
- कश्मीर का मुद्दा: शीतयुद्ध के दौर में कश्मीर को लेकर सुरक्षा परिषद में भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद पहुंचा. उस समय सोवियत संघ ने कई मौकों पर भारत के हितों के अनुकूल रुख अपनाया.
- 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध: पूर्वी पाकिस्तान में संघर्ष के दौरान सुरक्षा परिषद में युद्धविराम से जुड़े प्रस्ताव लाए गए. सोवियत संघ ने दिसंबर 1971 में भारत के हितों से जुड़े कूटनीतिक घटनाक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कई प्रस्तावों को वीटो किया.
- बांग्लादेश के गठन पर असर: भारत के नजरिए से इन वीटो ने सैन्य और कूटनीतिक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण समय दिया. इससे बांग्लादेश के निर्माण की दिशा में चल रही घटनाओं पर भी असर पड़ा.
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि वीटो की व्यवस्था ने हर बार भारत के हितों को नुकसान पहुंचाया. असली समस्या यह है कि इसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से और किस परिस्थिति में किया जाता है.
भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता क्यों चाहिए?
भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसकी भूमिका लगातार बढ़ी है. इसके बावजूद उसे सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता नहीं मिली है.
- पुरानी व्यवस्था में प्रतिनिधित्व की कमी: भारत का मानना है कि 1945 में बनाई गई व्यवस्था आज की वैश्विक वास्तविकताओं को पूरी तरह नहीं दर्शाती.
- जी-4 देशों की मांग: भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान सुरक्षा परिषद में सुधार और स्थायी सदस्यता के विस्तार की मांग करते रहे हैं.
- चीन की भूमिका: सुरक्षा परिषद के विस्तार और नए स्थायी सदस्यों को शामिल करने के मुद्दे पर चीन का रुख महत्वपूर्ण है. संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में बदलाव के लिए पांचों स्थायी सदस्यों सहित सदस्य देशों की निर्धारित मंजूरी जरूरी होती है.
- सिर्फ सदस्यता नहीं, बराबरी भी: भारत चाहता है कि सुरक्षा परिषद में नए स्थायी सदस्य बनाए जाने पर उन्हें पुराने स्थायी सदस्यों के बराबर अधिकार मिलें. भारत के नजरिए से स्थायी सदस्यों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटना असमानता को बनाए रखेगा.
वीटो पर जवाबदेही का नियम कितना असरदार है?
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2022 में एक व्यवस्था अपनाई, जिसके तहत सुरक्षा परिषद में वीटो का इस्तेमाल होने पर महासभा में चर्चा कराई जा सकती है. इसका उद्देश्य वीटो लगाने वाले देश से उसके फैसले पर जवाब मांगना और पारदर्शिता बढ़ाना है.
- फैसले पर चर्चा संभव: वीटो के बाद महासभा में संबंधित मुद्दे पर बहस हो सकती है और सदस्य देश अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं.
- लेकिन वीटो खत्म नहीं होता: यह व्यवस्था किसी स्थायी सदस्य के वीटो को रद्द नहीं करती. यानी चर्चा के बावजूद मूल प्रस्ताव सुरक्षा परिषद में पारित नहीं हो पाता.
- भारत की मांग: भारत का जोर केवल जवाबदेही बढ़ाने पर नहीं, बल्कि सुरक्षा परिषद की संरचना और वीटो व्यवस्था में व्यापक सुधार पर है.
क्या बदल पाएगी दुनिया की यह व्यवस्था?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जिस संस्था को दुनिया में शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी दी गई, उसके फैसले पांच देशों के विशेषाधिकारों से प्रभावित होते हैं. रूस, अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने कई मामलों में इसकी कार्यक्षमता पर सवाल खड़े किए हैं. वहीं, मसूद अजहर जैसे मामलों में चीन की आपत्तियों ने भारत की चिंताओं को बढ़ाया है.
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