वोटर लिस्ट से नाम कटने पर Form-6 भरना जरूरी क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछे सवाल
Supreme Court on Delhi SIR: दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर उठे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है. अदालत ने चुनाव आयोग से सीधा सवाल किया है कि जो नागरिक पहले से मतदाता सूची में दर्ज हैं, उनसे नए वोटर के तौर पर फॉर्म-6 भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है. अदालत ने साफ किया कि अगर कोई व्यक्ति सिर्फ अपना पता बदलता है या कुछ समय के लिए शहर से बाहर जाता है, तो उसे पहली बार वोट देने वाला नहीं माना जा सकता. इस पूरे मामले पर देश की सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग को अपना पक्ष रखने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है.
पुराने वोटरों पर नए नियमों का बोझ
यह पूरा मामला तब गरमाया जब दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची से लगभग 43 लाख लोगों के नाम बाहर कर दिए गए. चुनाव आयोग की इस कार्रवाई के पीछे तर्क दिया गया कि ये लोग या तो अपने पते पर मौजूद नहीं थे या फिर कहीं और चले गए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति जताई. अदालत ने कहा कि फॉर्म-6 सिर्फ उन नागरिकों के लिए तय किया गया है जो जीवन में पहली बार मतदान करने जा रहे हैं. जो लोग वर्ष 2026 की मतदाता सूची में पहले से शामिल हैं, उन्हें केवल पता बदलने के लिए फॉर्म-8 भरने की छूट मिलनी चाहिए. कोर्ट का मानना है कि ऐसे वोटरों से यह झूठा हलफनामा नहीं मांगा जा सकता कि उनका नाम पहले कभी मतदाता सूची में था ही नहीं.
अस्थायी पलायन और मताधिकार की सुरक्षा
सुनवाई के दौरान अदालत ने आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और उनकी वास्तविक परिस्थितियों को रेखांकित किया. पीठ ने कहा कि काम या आजीविका के सिलसिले में किसी का एक या दो महीने के लिए बाहर रहना कोई स्थायी पलायन नहीं है. बहुत से लोग रोजगार की तलाश में या पारिवारिक कारणों से कुछ समय के लिए शहर छोड़ते हैं, लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि उन्होंने अपनी मूल जगह हमेशा के लिए छोड़ दी है. अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि किसी का कुछ समय के लिए अनुपस्थित होना उसे मतदाता सूची से बाहर करने का आधार नहीं बन सकता.
ढांचागत खामियों पर अदालत की दो टूक
मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस बागची ने पूरी प्रक्रिया की खामियों को उजागर करते हुए कड़ा सवाल उठाया. उन्होंने पूछा कि अगर कोई मतदाता किसी कारणवश समय पर गणना फॉर्म नहीं भर पाया, तो क्या वह हमेशा के लिए अपने वोट देने के अधिकार से हाथ धो बैठेगा. उन्होंने इसे चुनावी प्रक्रिया की एक बड़ी ढांचागत विसंगति करार दिया, जिसे तुरंत सुधारे जाने की आवश्यकता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक अंतिम मतदाता सूची तैयार नहीं हो जाती, तब तक महज तारीख बीत जाने के आधार पर किसी भी नागरिक का फॉर्म निरस्त नहीं किया जाना चाहिए. जनता के बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकारों को तकनीकी समय-सीमा की आड़ में नहीं छीना जा सकता.
चुनाव आयोग का पक्ष और समय-सीमा
सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त रुख के बाद चुनाव आयोग ने भी अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की. आयोग के प्रतिनिधियों ने अदालत को भरोसा दिलाया कि वे देर से आने वाले पंजीकरण आवेदनों को स्वीकार करने पर सकारात्मक विचार करेंगे. इसके साथ ही आयोग ने यह संकेत भी दिया कि यदि जरूरत पड़ी, तो 30 अक्टूबर की मौजूदा समय-सीमा को आगे बढ़ाने पर भी विचार किया जा सकता है. अदालत की टिप्पणियों से यह साफ हो गया है कि नागरिकों के मताधिकार की रक्षा करना प्रशासनिक समय-सारणी से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है.
बिहार और बंगाल मामलों पर अदालत का स्पष्टीकरण
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने एक और महत्वपूर्ण कानूनी पहलू पर स्थिति साफ की. उन्होंने कहा कि बिहार एसआईआर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तार्किक विसंगति यानी लॉजिकल डिसक्रिपेंसी के मुद्दे पर कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया था. पश्चिम बंगाल में भी इसे केवल एक कामचलाऊ या अंतरिम व्यवस्था के तौर पर मंजूरी दी गई थी. अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि लोग बिहार से जुड़े आदेश को इस तरह पेश कर रहे हैं जैसे सब कुछ पहले ही तय हो चुका हो. पीठ ने स्पष्ट कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने तार्किक विसंगति वाली श्रेणी को कानूनी मान्यता नहीं दी है, इसलिए इसे आधार बनाकर लोगों को वोट देने से वंचित नहीं किया जा सकता.
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'अर्नब' चक्रवात का नाम बांग्लादेश ने रखा है। इसका उच्चारण 'ओरनब' (Ornab) किया जाता है और यह संस्कृत शब्द 'अर्णव' (arṇava) से आया है, जिसका अर्थ है समुद्र या विशाल जलराशि। बंगालियों के बीच यह एक आम नाम है।
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