केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने असम में अंतर्देशीय जलमार्ग को बढ़ावा देने के लिए तीन परियोजनाओं का उद्घाटन किया
डिब्रूगढ़, 27 फरवरी (आईएएनएस)। केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने शुक्रवार को असम के डिब्रूगढ़ में राष्ट्रीय जलमार्ग-2 (ब्रह्मपुत्र नदी) पर तीन प्रमुख अंतर्देशीय जलमार्ग अवसंरचना परियोजनाओं का उद्घाटन किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकास एवं विरासत के संतुलित दृष्टिकोण पर बल दिया।
इन परियोजनाओं में बोगीबील स्थित सीमा शुल्क एवं आव्रजन परिसर, धुबरी स्थित सीमा शुल्क एवं आव्रजन परिसर और डिब्रूगढ़ में भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (आईडब्ल्यूएआई) की हेरिटेज भवन शामिल हैं।
केंद्रीय मंत्री ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि ये परियोजनाएं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गतिशील शासन मॉडल को दर्शाती हैं, जो सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए तीव्र विकास सुनिश्चित करता है।
केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गतिशील नेतृत्व में हम विकास एवं विरासत की स्पष्ट दृष्टिकोण से आगे बढ़ रहे हैं। हम अपनी जड़ें, अपनी विरासत एवं अपनी संस्कृति को संरक्षित रखते हुए प्रगति एवं आर्थिक विकास की दिशा में अग्रसर हैं। ब्रह्मपुत्र केवल एक नदी नहीं है बल्कि यह हमारी जीवनरेखा, हमारा इतिहास और हमारा भविष्य है।”
सोनोवाल ने कहा कि नयी अवसंरचना रसद को मजबूत करेगी, आवागमन को बढ़ावा देगी और पूर्वोत्तर में व्यापार एवं पर्यटन क्षेत्र में नए अवसर प्रदान करेगी।
बोगीबील में सीमा शुल्क एवं आव्रजन परिसर को एक आधुनिक पर्यटन-सह-कार्गो टर्मिनल के रूप में विकसित किया गया है, जो सीमा शुल्क, आव्रजन एवं आईडब्ल्यूएआई प्रशासनिक कार्यों को एक ही परिसर में एकीकृत करता है। इस सुविधा में समर्पित आगमन एवं प्रस्थान प्रतीक्षा हॉल, कार्गो भंडारण क्षेत्र, प्रशासनिक भवन, कर्मचारियों के लिए सुविधाएं एवं एकीकृत सुरक्षा प्रणाली शामिल हैं, जिनका उद्देश्य एनडब्ल्यू-2 के साथ परिचालन दक्षता में सुधार करना तथा भारत-बांग्लादेश प्रोटोकॉल मार्गों के अंतर्गत व्यापार को सुविधाजनक बनाना है।
धुबरी सीमा शुल्क एवं आव्रजन परिसर को पश्चिमी असम में नियामक निरीक्षण को बढ़ावा देने एवं आयात-निर्यात-आयात परिचालन को बढ़ावा देने के लिए तैयार किया गया है, जिससे इस शहर को अंतर्देशीय जल परिवहन और बांग्लादेश एवं भूटान की सीमा पार व्यापार के लिए एक रणनीतिक प्रवेश द्वार के रूप में स्थापित किया जा सके।
डिब्रूगढ़ में पुनर्निर्मित हेरिटेज भवन में स्थापत्य विशेषताओं एवं जीर्णोद्धार के साथ-साथ उन्नत परिचालन अवसंरचना भी शामिल है।
अधिकारियों के अनुसार, यह भवन एनडब्ल्यू-2 पर आईडब्ल्यूएआई की प्रशासनिक आवश्यकताओं को पूरा करेगा तथा नदी पर्यटन को बढ़ावा देगा और क्षेत्र की स्थापत्य विरासत को संरक्षित करेगा।
--आईएएनएस
एबीएस/
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UNCOVERED With Manoj Gairola: US Army ईरान से कुछ ही दूरी पर तैनात, हमला करने से क्यों डर रहे ट्रंप?
UNCOVERED With Manoj Gairola: इसी साल 26 जनवरी 2026 को अमेरिकी युद्धपोत USS Abraham Linkon दर्जनों फाइटर जेट्स और जहाजी बेड़े के साथ अरब सागर पहुंचा. इस एयरक्राफ्ट करियर में F-35 और F-18 जैसे 90 फाइटर जेट्स को ले जाने की क्षमता है. ये ईरान के तट से 500 किमी की दूरी पर तैनात है. इसके तीन हफ्ते के बाद एक और एयरक्राफ्ट कैरियर USS Gerald R Ford भी ईरान के करीब भू मध्य सागर में पहुंच चुका है. ये दुनिया सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर है.
US ने यूरोप-मिडिल ईस्ट में 150 से ज्यादा एयरक्राफ्ट तैनात किए
अमेरिकी अखबार द् वाशिंगटन पोस्ट की एक खबर के अनुसार अब तक अमेरिका ने यूरोप और मिडिल ईस्ट में अपने फौजी अड्डों पर 150 से ज्यादा एयरक्राफ्ट तैनात कर दिए हैं. 2003 में हुए इराक युद्ध के बाद मिडिल ईस्ट में ये अमेरिकी सेना की सबसे बड़ी तैनाती है. अमेरिका चाहता है कि ईरान उसके साथ न्यूक्लियर सरेंडर करने वाली डील करे...और न्यूक्लियर हथियार बनाने के अपने सारे कार्यक्रम रद्द कर दे.
इसके साथ ही अमेरिका ईरान के मिसाइल प्रोग्राम पर भी लगाम लगाना चाहता है. 19 फरवरी को ट्रंप ने धमकी दी थी अगर ये डील ना हो पाई, तो अमेरिका ईरान पर 10 दिन के भीतर ही अटैक कर देगा.
वेनेजुएला जैसा आसान टारगेट है ईरान?
अब सवाल ये है कि क्या ईरान अमेरिका के लिए उतना ही आसान टारगेट है जैसा कि वेनेजुएला था जहां अमेरिकी कमांडोज ने वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को रातोंरात उठा लिया...या फिर 2003 में इराक में सद्दाम हुसैन की सत्ता का खात्मा कर दिया.
आज UNCOVERED के अपने एपिसोड में हम आपको बताएंगे कि ट्रंप के सामने क्या-क्या विकल्प हैं?
ईरान की गिनती दुनिया के टॉप 20 देशों में होती है
दरअसल अमेरिका को ये अच्छे से मालूम है कि ईरान की तुलना वेनेजुएला या इराक से नहीं कर सकते. आबादी और क्षेत्रफल दोनों के हिसाब से ईरान की गिनती दुनिया के टॉप 20 देशों में होती है. इसके अलावा पिछले 10 सालों से भारी आर्थिक पाबंदियों के बावजूद ईरान की फौजी ताकत काफी मजबूत है. इसका उदाहरण पिछले साल जून में इजरायल के साथ हुए 12 दिन के युद्ध में दिखा था. जब ईरान ने इजरायल पर सैंकड़ों मिसाइलें दाग दी थी. जिनमें से कई मिसाइलें तो इजरायल के एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देकर अपने टारगेट पर गिरी थीं. इसी दौरान जब अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर बम गिराए तो जवाब में ईरान ने कतर में मौजूद अमेरिकी एयरबेस पर भी मिसाइल से हमला किया था.
ईरान की ड्रोन पावर भी बहुत मजबूत है...रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ईरान ने रूस की मदद के लिए हजारों कि संख्या में ड्रोन भेजे थे. जो काफी सफल रहे.
जब से ईरान पर International Sanctions लगे तब से उसने अपना पूरा ध्यान अपने ही देश में क्रूज मिसाइल, बैलेस्टिक मिसाइल, ड्रोन, टैंक और Armoured vehicles बनाने में लगा दिया.
ईरान चाइना से एंटीशिप मिसाइल्स खरीद रहा
समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार...ईरान चाइना से एंटीशिप मिसाइल्स खरीद रहा है. 290 किमी की रेंज वाली इन सुपरसोनिक मिसाइल्स में इतनी ताकत है कि वो समुद्र में किसी भी युद्धपोत को डुबो सकें. अगर ये मिसाइल्स अमेरिका के साथ युद्ध शुरू होने से पहले ईरान के पास आ गईं तो अमेरिका के ताकतवर एयरक्राफ्ट कैरियर्स को भी खतरा हो सकता है.
रॉयटर्स की रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि ईरान...चाइना से Surface To Air Missile System, Anti Ballistic Missile और Anti Satellite हथियार खरीदने की बात भी कर रहा है.
यहां हम ये भी बता दें कि ईरान का सालना रक्षा बजट करीब 8 बिलियन डॉलर यानी कि करीब 75 हजार करोड़ रु का है....ये तो बात रही ईरान की ताकत की, अब बात अमेरिका के एक्शन की करते हैं...मतलब ये कि अमेरिका के पास क्या-क्या ऑप्शंस हैं?
अमेरिका के पास युद्ध के लिए पर्याप्त हथियार नहीं
वाशिंगटन पोस्ट की 23 फरवरी की एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के टॉप जनरल डैन केन ने ट्रंप को व्हाइट हाउस की एक मीटिंग में सावधान किया था कि अमेरिका के पास युद्ध के लिए पर्याप्त हथियार नहीं है. उनका कहना था कि काफी मात्रा में हथियार पहले ही इजरायल और यूक्रेन युद्ध में इस्तेमाल हो चुके हैं.
अमेरिकी फौज की रक्षा के लिए THAAD Interceptor Missiles जरूरी
ईरान की Topography और Geography को देखते हुए अमेरिकी फौज की रक्षा के लिए THAAD Interceptor Missiles बहुत जरूरी हैं. लेकिन इनका काफी ज्यादा इस्तेमाल इजरायल 12 दिन के युद्ध में कर चुका है. इसी तरह से Patriot Missiles का इस्तेमाल यूक्रेन में काफी हुआ है. ये ऐसे हथियार हैं जिनके प्रोडक्शन की कैपेसिटी लिमिटेड है. इसी तरह से अमेरिकी नेवी के काफी हथियार हूती के विरुद्ध यमन में इस्तेमाल हो चुके हैं.
यहां इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि अगर ईरान जैसे बड़े देश में खामेनई की सत्ता को बदलने के लिए युद्ध लड़ा जाएगा तो उसमें ईरान के हजारों ठिकानों पर हमला करना होगा. और ईरान के पड़ोसी अरब देशों के समर्थन के बिना ये संभव नहीं है.
अमेरिका के लिए जंग को लेकर क्या चुनौती?
ये बात इसलिए उठ रही है क्योंकि मिडिल ईस्ट में अमेरिका के तमाम सहयोगी देश ये साफ कर चुके हैं कि वे ईरान के खिलाफ जंग में ना अपनी जमीन इस्तेमाल करने देंगे और ना एयर स्पेस. इन देशों में शामिल है, जॉर्डन, सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, कुवैत और कतर. इनके अलावा ईरान के पड़ोसी और नाटो के सदस्य तुर्किए ने भी अमेरिका को ना कह दिया है.
ऐसे में रॉयटर्स में छपी एक खबर के मुताबिक अमेरिका के एक पूर्व रक्षा अधिकारी का कहना है कि अगर अरब देशों ने ईरान पर हमले के लिए अपना एयरस्पेस इस्तेमाल करने से मना कर दिया, तो अमेरिका के लिए ईरान के अलग-अलग ठिकानों पर हमला करना मुश्किल होगा.
2003 में क्या थे हालात
यहां हम बता दें कि 2003 में जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया था तो उस समय अमेरिका ने तीन लाख की Ground Forces वहां तैनात की थी, जिसमें बड़ी संख्या NATO के सदस्य देशों की भी थी. इसके साथ ही इराक पर हवाई हमलों या Ground Attack के लिए कुवैत और सउदी अरब में मौजूद मिलिट्री ठिकानों का इस्तेमाल हुआ था.
अभी अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में जितनी भी फौजी तैनाती की है उसमें Additional Ground Forces नहीं भेजी है. एक खास बात और ...जब इराक पर हमला हुआ था तब अमेरिका के 500 फौजी शुरुआत में ही मारे गए थे. ऐसे में अगर ईरान युद्ध में अमेरिकी फौजी मरे तो अमेरिका में बवाल होना तय है...और ट्रंप के खिलाफ माहौल बनते देर नहीं लगेगी.
ट्रंप के पास क्या है दूसरा विकल्प?
इतिहास गवाह है कि ईरान जैसे बड़े देश में सत्ता परिवर्तन बिना ग्राउंड फोर्सेज के नहीं हो सकता.
ऐसे में ट्रंप के सामने एक दूसरा विकल्प है Limited Strikes का...यानी बिना ग्राउंड फोर्सेज भेजे हवाई हमले करके ईरान की सैन्य क्षमता को नष्ट किया जाए. लेकिन ऐसे में भी ईरान जवाबी हमला तो करेगा ही...और ये हमले पूरे मिडिल ईस्ट में मौजूद अमेरिका के सैन्य ठिकानों पर हो सकते हैं. इसके अलावा हिजबुल्ला और हूती जैसे ईरान के समर्थन वाले मिलिशिया भी एक्टिव होकर हमले कर सकते हैं.
ऐसे में युद्ध चाहे बड़ा हो या Limited Strikes हों, इसके दो नतीजे हो सकते हैं... पहला कि ईरान की आवाम में अमेरिका विरोधी माहौल बनेगा और कट्टरपंथी शासन मजबूत होगा. दूसरा ये कि अरब देश भी अमेरिका के इस कदम का विरोध करेंगे. इसकी वजह ये है कि ईरान भले ही एक वक्त में अरब देशों का दुश्मन रहा हो, लेकिन अब वो कमजोर है और अरब देशों को ज्यादा ताकतवर हो चुके इजरायल से खतरा महसूस होता है.
ऐसे में ट्रंप के लिए Diplomatic Solution यानी बातचीत के जरिए ही मसले को हल करने का विकल्प सबसे मुफीद है.
इस पूरे विश्लेषण पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं.
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