Explainer: क्या अनंत सिंह की विधायकी छिन जाएगी? जानें दल-बदल कानून और सदस्यता रद्द होने के नियम
Anti-Defection Law: बिहार की राजनीति में मोकामा के विधायक अनंत सिंह एक बार फिर चर्चा में हैं. जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाते हुए उन्हें छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया है. अब पार्टी ने उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त करने के लिए बिहार विधानसभा के अध्यक्ष प्रेम कुमार के पास याचिका भी दाखिल की है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी से निकाले जाने के बाद अनंत सिंह की विधायकी भी चली जाएगी?
इस मामले को समझने के लिए संविधान की दसवीं अनुसूची और दल-बदल विरोधी कानून के प्रावधानों को जानना जरूरी है. यह कानून विधायकों और सांसदों को राजनीतिक लाभ के लिए पार्टी बदलने से रोकने के मकसद से बनाया गया था. हालांकि, किसी विधायक को पार्टी से निष्कासित कर देना और उसकी विधानसभा सदस्यता समाप्त होना दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं.
आइए, आसान भाषा में समझते हैं कि दल-बदल विरोधी कानून क्या है, इसके तहत सदस्यता कब खत्म हो सकती है और अनंत सिंह के मामले में आगे क्या हो सकता है.
दल-बदल विरोधी कानून क्या है और इसे कब लागू किया गया?
दल-बदल विरोधी कानून का उद्देश्य चुने हुए जनप्रतिनिधियों को राजनीतिक फायदे के लिए अपनी पार्टी का साथ छोड़ने या उसके निर्देशों के खिलाफ जाने से रोकना है.
- 1985 में हुआ संविधान संशोधन: तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार के कार्यकाल में 52वें संविधान संशोधन के जरिए संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई.
- कानून बनाने की जरूरत: उस समय नेताओं के बार-बार पार्टी बदलने से सरकारों की स्थिरता प्रभावित हो रही थी. इसी समस्या को रोकने के लिए यह कानून लाया गया.
- मुख्य उद्देश्य: विधायकों और सांसदों को राजनीतिक सौदेबाजी के लिए पार्टी बदलने से रोकना और जनता के जनादेश का सम्मान सुनिश्चित करना.
- किस पर लागू होता है: यह कानून लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों के साथ-साथ राज्यों की विधानसभाओं और विधान परिषदों के सदस्यों पर भी लागू होता है.
इस कानून के तहत किसी सदस्य को अयोग्य घोषित किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए संविधान में तय शर्तों और प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है.
किन परिस्थितियों में विधायक की सदस्यता जा सकती है?
संविधान की 10वीं अनुसूची में दल-बदल के आधार पर अयोग्यता के प्रावधान दिए गए हैं. किसी विधायक या सांसद की सदस्यता खत्म होने के प्रमुख आधार ये हैं:
- स्वेच्छा से पार्टी छोड़ना: अगर कोई सदस्य अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ देता है, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है. इसके लिए केवल लिखित इस्तीफा देना जरूरी नहीं है. सदस्य के आचरण और गतिविधियों से भी यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है.
- पार्टी के निर्देश के खिलाफ मतदान: अगर कोई विधायक अपनी पार्टी के अधिकृत निर्देश यानी व्हिप के खिलाफ सदन में वोट करता है, तो उसकी सदस्यता खतरे में पड़ सकती है.
- मतदान से गैरहाजिर रहना: यदि सदस्य पार्टी के निर्देश के बावजूद सदन में मतदान से अनुपस्थित रहता है और पार्टी उसे निर्धारित समय के भीतर माफ नहीं करती, तो अयोग्यता की कार्रवाई हो सकती है.
- दूसरी पार्टी में शामिल होना: किसी राजनीतिक दल के टिकट पर चुनाव जीतने के बाद किसी दूसरे दल में शामिल होना भी अयोग्यता का आधार बन सकता है.
- मनोनीत सदस्यों के लिए नियम: मनोनीत सदस्य सदन में अपनी सीट ग्रहण करने के छह महीने के भीतर किसी राजनीतिक दल में शामिल हो सकते हैं. इसके बाद दल में शामिल होने पर अयोग्यता का प्रावधान लागू हो सकता है.
ध्यान देने वाली बात यह है कि पार्टी के खिलाफ बयान देना या किसी दूसरे उम्मीदवार का प्रचार करना अपने आप में हर परिस्थिति में दल-बदल साबित नहीं करता. यह देखना जरूरी होगा कि संबंधित सदस्य का आचरण संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता के आधारों को पूरा करता है या नहीं.
क्या पार्टी से निष्कासन के बाद विधायकी खत्म हो जाती है?
अनंत सिंह के मामले में यह सबसे अहम सवाल है. किसी राजनीतिक दल के पास अपने सदस्य को पार्टी से निष्कासित करने का अधिकार होता है, लेकिन पार्टी से निष्कासन होने का मतलब यह नहीं है कि विधायक की विधानसभा सदस्यता भी अपने आप खत्म हो जाएगी.
इसमें दोनों प्रक्रियाओं का अंतर समझना जरूरी है:
- पार्टी से निष्कासन: राजनीतिक दल अपने संगठन के नियमों के तहत अनुशासनहीनता या पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए किसी सदस्य को निष्कासित कर सकता है.
- विधानसभा सदस्यता: विधायक की सदस्यता समाप्त करने के लिए संविधान और संबंधित कानून के प्रावधानों के तहत कार्रवाई करनी होती है.
- स्पीकर की भूमिका: दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता से जुड़ी याचिका पर संबंधित सदन के अध्यक्ष या पीठासीन अधिकारी को निर्णय लेना होता है.
- सबूतों की अहमियत: केवल पार्टी के आरोपों के आधार पर सदस्यता खत्म नहीं हो जाती. यह देखना होगा कि आरोपों और उपलब्ध सबूतों से अयोग्यता का आधार साबित होता है या नहीं.
इसलिए अनंत सिंह को जदयू से निकाला जाना और उनकी विधायकी खत्म होना दो अलग-अलग मामले हैं. उनकी विधानसभा सदस्यता पर अंतिम निर्णय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के बाद ही हो सकता है.
दल-बदल कानून में विलय का क्या प्रावधान है?
दल-बदल विरोधी कानून में राजनीतिक दलों के विलय से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अपवाद भी है. हालांकि, इसका इस्तेमाल किसी भी तरह के व्यक्तिगत दल-बदल को सही ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता.
- संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत किसी राजनीतिक दल के विधायक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरे राजनीतिक दल में विलय के लिए सहमत हों, तो उन्हें निर्धारित शर्तों के अधीन अयोग्यता से छूट मिल सकती है.
- उदाहरण के लिए, यदि किसी दल के 30 विधायक हैं, तो कम से कम 20 विधायकों की सहमति जरूरी होगी.
- यदि यह संख्या दो-तिहाई से कम है, तो केवल अलग समूह बना लेने से दल-बदल विरोधी कानून से छूट नहीं मिलती.
- पहले कानून में एक-तिहाई सदस्यों के अलग होने पर विभाजन से जुड़ा अपवाद था, लेकिन 91वें संविधान संशोधन के जरिए 2003 में इसे हटा दिया गया.
इसका मतलब है कि किसी विधायक के लिए केवल यह दावा करना पर्याप्त नहीं होगा कि उसने पार्टी के कुछ अन्य सदस्यों के साथ मिलकर अलग रास्ता अपनाया है. उसे कानून में निर्धारित शर्तों को पूरा करना होगा.
अनंत सिंह पर जदयू ने कार्रवाई क्यों की?
अनंत सिंह के खिलाफ जदयू की कार्रवाई के पीछे पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के विधान परिषद चुनाव से जुड़ा विवाद बताया जा रहा है.
पार्टी के आरोपों के मुताबिक:
- जदयू ने इस चुनाव में नीरज कुमार को अपना अधिकृत उम्मीदवार बनाया था.
- अनंत सिंह पर आरोप है कि उन्होंने पार्टी के उम्मीदवार के बजाय जन सुराज के प्रत्याशी अनुज सिंह के पक्ष में प्रचार किया.
- आरोपों के अनुसार, उन्होंने सार्वजनिक सभाओं और रैलियों के जरिए दूसरे उम्मीदवार का समर्थन किया.
- पार्टी ने इसे अनुशासनहीनता और पार्टी नेतृत्व के निर्देशों की अनदेखी माना.
- इसी विवाद के बाद 24 अक्टूबर को अनंत सिंह और पूर्व विधायक नीलम देवी को छह साल के लिए पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित किए जाने की जानकारी सामने आई.
यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि पार्टी के अनुशासन संबंधी आरोप और दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता के आधार अलग-अलग हैं. विधानसभा अध्यक्ष को यह देखना होगा कि अनंत सिंह का आचरण दसवीं अनुसूची के तहत सदस्यता समाप्त करने का आधार बनता है या नहीं.
अनंत सिंह की विधायकी पर फैसला कौन करेगा?
अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता को लेकर दाखिल याचिका पर निर्णय लेने की जिम्मेदारी बिहार विधानसभा के अध्यक्ष प्रेम कुमार की होगी.
इस प्रक्रिया में कई अहम चरण हो सकते हैं:
- याचिका पर विचार: विधानसभा अध्यक्ष सबसे पहले जदयू की ओर से दाखिल याचिका और उसमें लगाए गए आरोपों पर विचार करेंगे.
- पक्ष रखने का अवसर: मामले की प्रकृति और लागू प्रक्रिया के अनुसार संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जा सकता है.
- सबूतों की जांच: अध्यक्ष को यह देखना होगा कि क्या उपलब्ध सामग्री से संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता का आधार स्थापित होता है.
- निर्णय: सभी प्रासंगिक तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद अध्यक्ष निर्णय लेंगे.
- अदालत में चुनौती: यदि संबंधित पक्ष निर्णय से असहमत होता है, तो वह कानूनी आधार पर अदालत में उसे चुनौती दे सकता है.
यह प्रक्रिया पूरी होने से पहले यह कहना सही नहीं होगा कि अनंत सिंह की विधायकी निश्चित रूप से खत्म हो जाएगी.
क्या विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को अदालत में चुनौती दी जा सकती है?
दल-बदल विरोधी कानून के तहत विधानसभा अध्यक्ष के फैसले की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है.
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का 1992 का किहोतो होलोहन फैसला महत्वपूर्ण है.
- इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दल-बदल से जुड़े मामलों में अध्यक्ष का निर्णय न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह बाहर नहीं है.
- यदि निर्णय में संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन, गंभीर कानूनी त्रुटि या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी जैसे आधार हों, तो उसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है.
- हालांकि, अदालत में चुनौती देने का मतलब यह नहीं है कि सदस्यता अपने आप बहाल हो जाएगी. इसका परिणाम मामले के तथ्यों और अदालत के आदेश पर निर्भर करेगा.
इसलिए अगर अनंत सिंह के खिलाफ सदस्यता समाप्त करने का फैसला आता है, तो उनके पास कानूनी उपाय अपनाने का विकल्प हो सकता है.
अगर अनंत सिंह की विधायकी चली गई तो क्या होगा?
यदि विधानसभा अध्यक्ष अनंत सिंह को दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य घोषित कर देते हैं, तो मोकामा विधानसभा सीट खाली हो सकती है. इसके बाद चुनाव आयोग और संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार आगे की प्रक्रिया तय होगी.
- मोकामा सीट पर उपचुनाव की स्थिति बन सकती है.
- अनंत सिंह की राजनीतिक रणनीति और भविष्य की चुनावी संभावनाओं पर असर पड़ सकता है.
- जदयू के लिए यह मामला पार्टी अनुशासन और संगठनात्मक नियंत्रण के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा.
- यदि अध्यक्ष का फैसला अदालत में चुनौती दिया जाता है, तो मामले की कानूनी स्थिति आगे के आदेशों से प्रभावित हो सकती है.
हालांकि, उपचुनाव कब होगा और अनंत सिंह उसमें चुनाव लड़ पाएंगे या नहीं, यह आगे की कानूनी स्थिति, लागू अयोग्यता संबंधी नियमों और चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा.
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ਬਿਨਾਂ ਸਿਫ਼ਾਰਸ਼ 70 ਹਜ਼ਾਰ ਤੋਂ ਵੱਧ ਸਰਕਾਰੀ ਨੌਕਰੀਆਂ, ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਸਿੱਖਿਆ ਦਾ ਹੱਬ ਬਣਾਉਣ ’ਚ ਜੁਟੇ CM ਭਗਵੰਤ ਮਾਨ
Punjab News: ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਭਗਵੰਤ ਸਿੰਘ ਮਾਨ ਨੇ ਐਲਾਨ ਕੀਤਾ ਹੈ ਕਿ ਪੂਰੇ ਸੂਬੇ ਨੂੰ ਸਿੱਖਿਆ ਦੇ ਇੱਕ ਵੱਡੇ ਕੇਂਦਰ ਵਜੋਂ ਵਿਕਸਤ ਕੀਤਾ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ. ਉਨ੍ਹਾਂ ਸਪੱਸ਼ਟ ਕੀਤਾ ਕਿ ਸੂਬੇ ਦੇ ਸਰਕਾਰੀ ਸਕੂਲਾਂ ਦੇ ਬੁਨਿਆਦੀ ਢਾਂਚੇ ਨੂੰ ਮਜ਼ਬੂਤ ਕਰਨ ਅਤੇ ਪੜ੍ਹਾਈ ਦੀ ਗੁਣਵੱਤਾ ਵਿੱਚ ਸੁਧਾਰ ਲਿਆਉਣ ਲਈ ਸਰਕਾਰੀ ਖਜ਼ਾਨੇ ਵਿੱਚ ਫੰਡਾਂ ਦੀ ਕੋਈ ਕਮੀ ਨਹੀਂ ਆਉਣ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇਗੀ. ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਸੂਬਾ ਸਰਕਾਰ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਦੇ ਬਿਹਤਰ ਭਵਿੱਖ ਲਈ ਲਗਾਤਾਰ ਨਵੇਂ ਰਾਹ ਖੋਲ੍ਹ ਰਹੀ ਹੈ, ਤਾਂ ਜੋ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਧਰਤੀ ’ਤੇ ਹੀ ਅੱਗੇ ਵਧਣ ਦੇ ਪੂਰੇ ਮੌਕੇ ਮਿਲ ਸਕਣ.
ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾਅਵਾ ਕੀਤਾ ਕਿ ਮੌਜੂਦਾ ਸਰਕਾਰ ਵੱਲੋਂ ਹੁਣ ਤੱਕ 70 ਹਜ਼ਾਰ ਤੋਂ ਵੱਧ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਨੂੰ ਪੱਕੀਆਂ ਸਰਕਾਰੀ ਨੌਕਰੀਆਂ ਦਿੱਤੀਆਂ ਗਈਆਂ ਹਨ. ਉਨ੍ਹਾਂ ਮੁਤਾਬਕ ਇਹ ਸਾਰੀਆਂ ਭਰਤੀਆਂ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਮੈਰਿਟ ਦੇ ਆਧਾਰ ’ਤੇ ਕੀਤੀਆਂ ਗਈਆਂ ਹਨ ਅਤੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਕਿਸੇ ਵੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੀ ਸਿਫ਼ਾਰਸ਼ ਜਾਂ ਰਿਸ਼ਵਤ ਦੀ ਕੋਈ ਭੂਮਿਕਾ ਨਹੀਂ ਰਹੀ.
ਧੂਰੀ ਦੇ ਯੁਵਕ ਮੇਲੇ ’ਚ CM ਮਾਨ ਨੇ ਸਾਂਝੀਆਂ ਕੀਤੀਆਂ ਪੁਰਾਣੀਆਂ ਯਾਦਾਂ
ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਭਗਵੰਤ ਮਾਨ ਧੂਰੀ ਹਲਕੇ ਦੇ ਪਿੰਡ ਬਰੜਵਾਲ ਸਥਿਤ ਦੇਸ਼ ਭਗਤ ਕਾਲਜ ਵਿਖੇ ਕਰਵਾਏ ਗਏ ਖੇਤਰੀ ਯੁਵਕ ਮੇਲੇ ਵਿੱਚ ਪਹੁੰਚੇ ਸਨ. ਇਸ ਸਮਾਗਮ ਦੌਰਾਨ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਦੇ ਹੁਨਰ ਅਤੇ ਉਤਸ਼ਾਹ ਨੂੰ ਦੇਖ ਕੇ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਕਾਫ਼ੀ ਖੁਸ਼ ਨਜ਼ਰ ਆਏ. ਉਨ੍ਹਾਂ ਸੋਸ਼ਲ ਮੀਡੀਆ ’ਤੇ ਵੀ ਆਪਣੇ ਤਜਰਬੇ ਸਾਂਝੇ ਕਰਦਿਆਂ ਦੱਸਿਆ ਕਿ ਕਾਲਜ ਦੇ ਦਿਨਾਂ ਦੌਰਾਨ ਉਹ ਖੁਦ ਵੀ ਅਜਿਹੇ ਮੰਚਾਂ ਰਾਹੀਂ ਅੱਗੇ ਵਧੇ ਸਨ.
ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਨੂੰ ਸਲਾਹ ਦਿੰਦਿਆਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਮੁਕਾਬਲਿਆਂ ਵਿੱਚ ਹਿੱਸਾ ਲੈਣਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਵੱਡੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਹੈ. ਜਿੱਤਣ ਵਾਲਿਆਂ ਨੂੰ ਹਮੇਸ਼ਾ ਨਿਮਰ ਰਹਿਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ, ਜਦਕਿ ਜਿਹੜੇ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਜਿੱਤ ਹਾਸਲ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦੇ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਦੁੱਗਣੀ ਮਿਹਨਤ ਨਾਲ ਅੱਗੇ ਵਧਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ. ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਨੂੰ ਕਿਹਾ ਕਿ ਉਹ ਸਿਰਫ਼ ਆਪਣੀ ਪੜ੍ਹਾਈ ਅਤੇ ਹੁਨਰ ’ਤੇ ਧਿਆਨ ਦੇਣ, ਬਾਕੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਸਰਕਾਰ ਨਿਭਾ ਰਹੀ ਹੈ.
ਸਿਰਫ਼ ਡਿਗਰੀ ਨਹੀਂ, ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਦੀ ਸੋਚ ਵਿਕਸਤ ਕਰਨ ’ਤੇ ਵੀ ਜ਼ੋਰ
ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਦਿਆਂ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਸਿੱਖਿਆ ਨੂੰ ਸਿਰਫ਼ ਕਲਾਸਰੂਮ ਦੀਆਂ ਚਾਰਦੀਵਾਰੀਆਂ, ਕਿਤਾਬਾਂ ਅਤੇ ਪ੍ਰੀਖਿਆਵਾਂ ਦੇ ਨਤੀਜਿਆਂ ਤੱਕ ਸੀਮਤ ਨਹੀਂ ਰੱਖਿਆ ਜਾ ਸਕਦਾ. ਅਸਲ ਸਿੱਖਿਆ ਉਹ ਹੈ, ਜੋ ਵਿਅਕਤੀ ਅੰਦਰ ਸੁਤੰਤਰ ਸੋਚ ਪੈਦਾ ਕਰੇ, ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਦਾ ਅਹਿਸਾਸ ਜਗਾਏ ਅਤੇ ਆਪਣੀ ਸੱਭਿਆਚਾਰਕ ਵਿਰਾਸਤ ਦਾ ਸਤਿਕਾਰ ਕਰਨਾ ਸਿਖਾਏ.
ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਦੀ ਊਰਜਾ ਅਤੇ ਪ੍ਰਤਿਭਾ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਸਭ ਤੋਂ ਕੀਮਤੀ ਪੂੰਜੀ ਦੱਸਦਿਆਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਸੂਬੇ ਦੀ ਤਰੱਕੀ ਇਸ ਗੱਲ ’ਤੇ ਨਿਰਭਰ ਕਰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਨੌਜਵਾਨ ਪੀੜ੍ਹੀ ਨੂੰ ਅੱਗੇ ਵਧਣ ਲਈ ਕਿੰਨਾ ਮਜ਼ਬੂਤ ਮੰਚ ਦਿੱਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ. ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਵਿਦਿਅਕ ਸੰਸਥਾਵਾਂ ਦਾ ਕੰਮ ਸਿਰਫ਼ ਡਿਗਰੀਆਂ ਦੇਣਾ ਨਹੀਂ, ਸਗੋਂ ਸੰਵੇਦਨਸ਼ੀਲ, ਸਮਝਦਾਰ ਅਤੇ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰ ਨਾਗਰਿਕ ਤਿਆਰ ਕਰਨਾ ਵੀ ਹੈ, ਜੋ ਸਮਾਜ ਦੇ ਵਿਕਾਸ ਵਿੱਚ ਆਪਣਾ ਯੋਗਦਾਨ ਪਾ ਸਕਣ.
39 ਕਾਲਜਾਂ ਦੇ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਨੇ ਲਿਆ ਹਿੱਸਾ, 60 ਸੱਭਿਆਚਾਰਕ ਗਤੀਵਿਧੀਆਂ ਕਰਵਾਈਆਂ
ਇਸ ਖੇਤਰੀ ਯੁਵਕ ਮੇਲੇ ਵਿੱਚ 39 ਕਾਲਜਾਂ ਦੇ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਨੇ ਵੱਧ-ਚੜ੍ਹ ਕੇ ਹਿੱਸਾ ਲਿਆ. ਮੇਲੇ ਦੌਰਾਨ ਚਾਰ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਮੰਚਾਂ ’ਤੇ ਲਗਭਗ 60 ਸੱਭਿਆਚਾਰਕ ਗਤੀਵਿਧੀਆਂ ਕਰਵਾਈਆਂ ਗਈਆਂ. ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਨੇ ਪੰਜਾਬੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਪਟਿਆਲਾ ਅਤੇ ਇਸ ਦੇ ਯੁਵਕ ਭਲਾਈ ਵਿਭਾਗ ਦੀ ਸ਼ਲਾਘਾ ਕੀਤੀ, ਜੋ ਕਈ ਸਾਲਾਂ ਤੋਂ ਅਜਿਹੇ ਸਮਾਗਮ ਕਰਵਾ ਰਹੇ ਹਨ.
ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਨਾਟਕ, ਸੰਗੀਤ, ਲੋਕ ਕਲਾ ਅਤੇ ਸਾਹਿਤ ਨਾਲ ਜੁੜੇ ਮੁਕਾਬਲੇ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਦੀ ਝਿਜਕ ਦੂਰ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਅਹਿਮ ਭੂਮਿਕਾ ਨਿਭਾਉਂਦੇ ਹਨ. ਇਸ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਅੰਦਰ ਟੀਮ ਭਾਵਨਾ, ਅਨੁਸ਼ਾਸਨ ਅਤੇ ਵੱਡੇ ਮੰਚਾਂ ’ਤੇ ਖੜ੍ਹੇ ਹੋਣ ਦਾ ਹੌਸਲਾ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ.
ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਅਜਿਹੇ ਯੁਵਕ ਮੇਲੇ ਪੁਰਾਣੀਆਂ ਰਵਾਇਤਾਂ ਅਤੇ ਨਵੀਂ ਪੀੜ੍ਹੀ ਵਿਚਕਾਰ ਇੱਕ ਮਜ਼ਬੂਤ ਪੁਲ ਦਾ ਕੰਮ ਕਰਦੇ ਹਨ. ਇਨ੍ਹਾਂ ਰਾਹੀਂ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਲੋਕ ਨਾਚ, ਲੋਕ ਸੰਗੀਤ ਅਤੇ ਰਵਾਇਤੀ ਖੇਡਾਂ ਨੂੰ ਜਿਊਂਦਾ ਰੱਖਣ ਵਿੱਚ ਮਦਦ ਮਿਲਦੀ ਹੈ.
‘ਰੰਗਲਾ ਪੰਜਾਬ’ ਬਣਾਉਣ ਲਈ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਦਾ ਸਾਥ ਜ਼ਰੂਰੀ
ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਭਗਵੰਤ ਮਾਨ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ’ਤੇ ਨਿਵੇਸ਼ ਕਰਨਾ ਅਸਲ ਵਿੱਚ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਭਵਿੱਖ ਨੂੰ ਸੰਵਾਰਨ ਦੇ ਬਰਾਬਰ ਹੈ. ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ‘ਰੰਗਲਾ ਪੰਜਾਬ’ ਬਣਾਉਣ ਦਾ ਸੁਪਨਾ ਤਾਂ ਹੀ ਸਾਕਾਰ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ, ਜਦੋਂ ਸੂਬੇ ਦੀ ਨੌਜਵਾਨ ਪੀੜ੍ਹੀ ਗਿਆਨ, ਆਤਮਵਿਸ਼ਵਾਸ ਅਤੇ ਰਚਨਾਤਮਕ ਸੋਚ ਨਾਲ ਭਰਪੂਰ ਹੋਵੇਗੀ.
ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਨੂੰ ਅਪੀਲ ਕੀਤੀ ਕਿ ਉਹ ਕਦੇ ਵੀ ਆਪਣੇ ਸੁਪਨਿਆਂ ਨੂੰ ਛੋਟਾ ਨਾ ਸਮਝਣ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਆਪਣੀ ਸਮਰੱਥਾ ਨੂੰ ਘੱਟ ਸਮਝਣ. ਸਹੀ ਮਾਰਗਦਰਸ਼ਨ ਅਤੇ ਢੁਕਵੇਂ ਮੌਕੇ ਮਿਲਣ ’ਤੇ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਨੌਜਵਾਨ ਪੂਰੀ ਦੁਨੀਆ ਵਿੱਚ ਆਪਣਾ ਨਾਮ ਰੌਸ਼ਨ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹਨ.
ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਸਰਕਾਰ ਦਾ ਮਕਸਦ ਹਰ ਉਸ ਬੱਚੇ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚ ਕਰਨਾ ਹੈ, ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਕੁਝ ਨਵਾਂ ਕਰਨ ਦਾ ਜਜ਼ਬਾ ਹੈ. ਸਰਕਾਰ ਇਹ ਯਕੀਨੀ ਬਣਾਉਣਾ ਚਾਹੁੰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਸਾਧਨਾਂ ਦੀ ਘਾਟ ਕਾਰਨ ਕੋਈ ਵੀ ਹੁਨਰ ਪਿੱਛੇ ਨਾ ਰਹਿ ਜਾਵੇ.
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