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जरूरत की खबर- सोया चंक्स के 11 हेल्थ बेनिफिट्स:100 ग्राम सोया में 52 ग्राम प्रोटीन, डाइटीशियन से जानें किन्हें नहीं खाना चाहिए

सोया चंक्स शाकाहारी लोगों के लिए प्रोटीन का बेहतरीन सोर्स है। इसमें प्रोटीन के साथ फाइबर, कैल्शियम और आयरन जैसे कई जरूरी पोषक तत्व भी होते हैं। ये मसल्स और हड्डियों को मजबूत रखने व शरीर की इम्यूनिटी को सपोर्ट करने में मदद करता है। ‘नेशनल सेंटर फॉर कॉम्प्लिमेंटरी एंड इंटीग्रेटिव हेल्थ (NCCIH)’ के मुताबिक, सोया चंक्स कोलेस्ट्रॉल लेवल कम करने में मददगार हैं। इससे महिलाओं में मेनोपॉज के दौरान होने वाले हॉट फ्लैशेज (अचानक तेज गर्मी महसूस होना) से भी राहत मिलती है। कुछ स्टडीज में पता चला है कि इससे ब्रेस्ट कैंसर का रिस्क भी कम हो सकता है। साथ ही यह हड्डियों को मजबूत रखने और ब्लड प्रेशर को संतुलित करने में भी मददगार है। हालांकि, हर व्यक्ति में इसका प्रभाव अलग हो सकता है। फिर भी संतुलित मात्रा में सोया चंक्स आमतौर पर सेहत के लिए फायदेमंद है। इसलिए आज 'जरूरत की खबर' में हम सोया चंक्स की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- एक्सपर्ट: डॉ. अनु अग्रवाल, सीनियर क्लीनिकल डाइटीशियन, फाउंडर- ‘वनडाइडटुडे’ सवाल- सोया चंक्स में कौन-कौन से पोषक तत्व पाए जाते हैं? जवाब- ‘यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर (USDA)’ के मुताबिक, 100 ग्राम सोया चंक्स में लगभग 50 ग्राम प्रोटीन होता है, जो मसल बिल्डिंग और रिकवरी के लिए बेहद फायदेमंद है। सोया चंक्स वेजिटेरियन और वीगन लोगों के लिए प्रोटीन का एक बेहतरीन सोर्स है। इसमें कैल्शियम, आयरन और मैग्नीशियम जैसे कई जरूरी मिनरल्स भी पाए जाते हैं। नीचे दिए ग्राफिक में पानी में भिगोए हुए 100 ग्राम सोया चंक्स की न्यूट्रिशनल वैल्यू देखिए- सवाल- सोया चंक्स कैसे तैयार किए जाते हैं? जवाब- सोयाबीन से तेल निकालने के बाद बचे हुए हिस्से काे बारीक पीस लिया जाता है। फिर इसे प्रोसेस करके ‘सोया चंक्स’ बनाए जाते हैं। इसे बनाने की प्रक्रिया समझिए- सवाल- सोया चंक्स हमारी सेहत के लिए कितने फायदेमंद हैं? जवाब- सोया चंक्स एक हाई-प्रोटीन, लो-फैट और फाइबर से भरपूर फूड है, जो शरीर की कई जरूरतों को पूरा करता है। जैसेकि- नीचे दिए ग्राफिक में इसके हेल्थ बेनिफिट्स देखिए- सवाल- सोया चंक्स को अपनी डाइट में कैसे शामिल कर सकते हैं? जवाब- इसे अपनी रोजमर्रा की डाइट में आसानी से शामिल कर सकते हैं। जैसेकि- सवाल- क्या सोया चंक्स के ज्यादा सेवन से कोई साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं? जवाब- हां, इसके ज्यादा सेवन के कुछ साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं। जैसेकि- कुछ लोगों में सोया से एलर्जी भी होती है, जिससे खुजली, रैशेज या सांस लेने में परेशानी हो सकती है। सोया में मौजूद ‘फाइटोएस्ट्रोजेन थायरॉइड’ से पीड़ित लोगों में हाॅर्मोनल असंतुलन हो सकता है। सवाल- एक दिन में कितना सोया चंक्स खाना सुरक्षित है? जवाब- सीनियर डाइटीशियन डाॅ. अनु अग्रवाल बताती हैं कि आमतौर पर एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए एक दिन में 25 से 30 ग्राम सोया चंक्स सुरक्षित है। पकाने के बाद यह मात्रा लगभग ½ से 1 कटोरी हो जाती है। सवाल- क्या डायबिटिक लोग सोया चंक्स खा सकते हैं? जवाब- हां, इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स लो होता है। इसलिए यह ब्लड शुगर धीरे-धीरे बढ़ाता है। यह डायबिटिक लोगों के लिए बेहतर विकल्प है। सवाल- क्या बच्चों को सोया चंक्स देना सही है? जवाब- हां, सीमित मात्रा में बच्चों को सोया चंक्स दिया जा सकता है। ये उनकी ग्रोथ, मसल डेवलपमेंट और हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद करता है। अगर बच्चे को कोई हेल्थ कंडीशन है तो पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें। सवाल- किन लोगों को सोया चंक्स नहीं खाना चाहिए? जवाब- डॉ. अनु अग्रवाल बताती हैं कि कुछ लोगों के लिए सोया चंक्स नुकसानदायक हो सकते हैं। इसे नीचे दिए ग्राफिक में देखिए- सवाल- मार्केट से सोया चंक्स खरीदते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? जवाब- सोया चंक्स खरीदते समय उनकी क्वालिटी पर ध्यान देना जरूरी है। इसके लिए कुछ बातों का खास ख्याल रखें। जैसेकि- ………………….. जरूरत की ये खबर भी पढ़िए जरूरत की खबर- आपके घर के पास है स्ट्रीट फूड: बढ़ सकता है शुगर, मोटापे का रिस्क, स्टडी में खुलासा, फूड हैबिट सुधारने के 11 टिप्स ‘मद्रास डायबिटीज रिसर्च फाउंडेशन’ की एक स्टडी के मुताबिक, जिन इलाकों में स्ट्रीट फूड के आउटलेट ज्यादा होते हैं, वहां रहने वालों में मोटापा और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा लगभग दो गुना तक बढ़ जाता है। यही स्थिति आगे चलकर डायबिसिटी (Diabesity) यानी मोटापा और डायबिटीज के खतरनाक मेल को जन्म देती है। पूरी खबर पढ़िए…

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मेंटल हेल्थ– होली पर मेरे साथ सेक्शुअल अब्यूज हुआ था:हर साल इस दिन वो ट्रॉमा ट्रिगर हो जाता है, मैं इस दुख से कैसे निकलूं?

सवाल– मेरी उम्र 32 साल है। मैं बचपन में अपने ही रिश्तेदार के हाथों सेक्शुअल अब्यूज का शिकार हो चुकी हूं। मेरे अब्यूज की कहानी का होली से गहरा कनेक्शन है। होली में रंग खेलने के बहाने वो हमेशा मुझे गलत तरीके से छूता था। मेरी उम्र कम थी। मैं डर और संकोच के कारण कुछ कह नहीं पाती थी। उससे बड़ी बात कि मैं समझ भी नहीं पाती थी कि ये क्या हो रहा है। बस अनकंफर्टेबल फील होता था। घर में कभी किसी ने मेरे इस डिसकंफर्ट को नोटिस नहीं किया। ये सिलसिला कुछ 4 साल तक चला होगा। अब मैं एडल्ट और इंडिपेंडेंट हूं, लेकिन होली नजदीक आते ही मेरा पास्ट ट्रॉमा ट्रिगर हो जाता है। मैं अपने दोस्तों और पार्टनर के साथ भी होली खेलने में सहज नहीं महसूस करती। होली के दिन मूड ऑफ रहता है। मैं इस ट्रॉमा से कैसे बाहर निकलूं? एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। सवाल पूछने के लिए आपका बहुत शुक्रिया। मैं आपकी मन:स्थिति समझ सकता हूं। यूं तो होली रंगों और खुशियों का त्योहार है, लेकिन जो भी लोग बचपन में इस त्योहार के बहाने सेक्शुअल अब्यूज या किसी भी तरह के गलत व्यवहार का शिकार हुए होते हैं, उनके भीतर यह दिन ट्रॉमा ट्रिगर कर सकता है। यह PTSD (पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) का संकेत है। जिस घटना, जगह, व्यक्ति से हमारा ट्रॉमा जुड़ा हो, उसके आसपास होने पर वही पुराना ट्रॉमा फिर से सतह पर आ जाता है और मानसिक रूप से दुखी, परेशान कर सकता है। PTSD कोई कमजोरी नहीं है लेकिन यहां मैं आपसे एक बात पूरा जोर देकर कहना चाहता हूं कि PTSD कोई कमजोरी नहीं है। नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ एंड केयर एक्सेलेंस (NICE) और रॉयल कॉलेज ऑफ साइकिएट्रिस्ट्स का ये मानना है कि PTSD हमारे शरीर और ब्रेन का डिफेंस मैकेनिज्म है। यह इसलिए विकसित होता है क्योंकि हमारी बॉडी हमें प्रोटेक्ट करना चाहती है। किसी गहरे सदमे या डरावने अनुभव के बाद यह विकसित होता है। इस बात को गहराई से समझने के लिए हमें थोड़ा अपने शरीर की बायोलॉजी को भी समझना पड़ेगा। तो आइए शुरू करते हैं। दर्दनाक घटनाएं और कॉर्टिसोल स्टैंपिंग जब कोई बच्चा सेक्शुअल अब्यूज का शिकार होता है तो उसके शरीर में फाइट-फ्लाइट-फ्रीज मोड एक्टिव हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप: कॉर्टिसोल स्टैंपिंग क्या है? बहुत ज्यादा स्ट्रेस होने पर: इसलिए : हो सकता है कि सरवाइवर को रोजमर्रा की सामान्य बातें, घटनाएं याद न रहें। लेकिन उसे अब्यूज से जुड़ी हरेक बात, हर डिटेल बहुत अच्छे से याद रहती है। जरूरी बात: कॉर्टिसोल हॉर्मोन डेंजर को याद रखने में हमारी मदद करता है, ताकि ठीक वैसा ही खतरा सूंघते ही हम तुरंत एलर्ट हो जाएं। लेकिन इसका नुकसान ये होता है कि हम दुर्घटना से जुड़ी हर सेंसरी डिटेल को जरनलाइज करने लगते हैं। जैसेकि चूंकि आपके अब्यूज की याद होली से जुड़ी है तो आपका ब्रेन हर होली को डेंजर के रूप में याद रखता है। ब्रेन का अलार्म सिस्टम: एमिग्डला की भूमिका एमिग्डला: चाइल्डहुड ट्रॉमा की स्थिति में: इसलिए होली के दौरान जब भी ये चीजें होती हैं- तो एमिग्डला कहता है- "खतरा।" एक व्यक्ति को ये पता है कि अभी खतरा नहीं है। अभी तो मैं सुरक्षित हूं, फिर भी एमिग्डला सुपर एक्टिव होकर ये बताता है कि नहीं, ये बिल्कुल पुरानी वाली सिचुएशन है। आसपास खतरा है। रिएलिटी और ब्रेन मैसेज के बीच में ये जो गैप है, इसी कारण पुराने ट्रॉमा को लेकर अकसर हमारा रिएक्शन हमारे कंट्रोल में नहीं होता। होली ट्रॉमा और PTSD स्क्रीनिंग: सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में कुल 4 सेक्शंस हैं और 13 सवाल हैं। आप इन सवालों को ध्यान से पढ़ें और 0 से 4 के स्केल पर इसे रेट करें। 0 का मतलब है ‘बिलकुल नहीं’ और 4 का मतलब है, ‘हमेशा।’ अंत में अपना टोटल स्कोर काउंट करें और स्कोर की एनालिसिस करें। स्कोर इंटरप्रिटेशन भी ग्राफिक में दिया हुआ है। जैसेेकि अगर आपका टोटल स्कोर 15 से कम है तो इसका मतलब है कि बहुत माइल्ड PTSD है, लेकिन अगर स्कोर 45 से ज्यादा है तो PTSD बहुत हाई है। ऐसे में प्रोफेशनल हेल्प बहुत जरूरी है। CBT (कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी) आधारित मैनेजमेंट प्रोग्राम (होली से एक सप्ताह पहले → होली के दौरान → अगली होली तक) फेज 1: होली से एक सप्ताह पहले तैयारी 1. ट्रिगर को साफ-साफ समझना डायरी में लिखें: CBT सवाल: "आसपास ऐसा कौन सा एविडेंस है, जो ये बताए कि मैं अभी भी असुरक्षित हूं।" 2. बाउंड्री डिफेंस का अभ्यास अपने लिए कुछ स्टेटमेंट तैयार करें। जो भी होली खेलना चाहे, उससे कहें: प्रतिदिन ये वाक्य बोलने का अभ्यास करें। 3. प्रेडिक्टिबिलिटी प्लानिंग प्लान: प्रेडिक्टिबिलिटी हमारे एमिगडला को शांत रखती है । जब पहले से पता होता है कि आगे क्या होने वाला है तो ब्रेन स्ट्रेस मोड में नहीं जाता। 4. रेगुलेशन प्रैक्टिस (प्रतिदिन) फेज 2: होली के दौरान एक्टिव मैनेजमेंट प्लान A. रिअल टाइम ग्राउंडिंग खुद से कहें: “ये साल 2026 है। अब मैं पूरी तरह सुरक्षित हूं।” B. अफेक्ट ब्रिज इंटरप्शन खुद से पूछें: “अब मैं कितने साल की हूं?” जवाब : “वो घटना तब की थी। तब मैं बच्ची थी, वलनरेबल थी। लेकिन अब मैं एडल्ट हूं। अब मैं सेफ हूं।” C. धीरे-धीरे एक्सपोजर बढ़ाना फेज 3: रिवायरिंग प्रोग्राम होली के बाद से लेकर अगली होली तक 1. हर महीने थोड़ा एक्सपोजर 2. कॉग्निटिव रीस्ट्रक्चरिंग अपने ट्रॉमा से जुड़े विचारों को चुनौती दें। उसे रीफ्रेज करें। पुराना विचार: “सभी त्योहार अनसेफ होते हैं.” संतुलित विचार: “कुछ अनुभव खराब और असुरक्षित थे. लेकिन अब मैं सेफ्टी का ध्यान रखती हूं। अब मैं सुरक्षित हूं।” 3. बॉडी रेगुलेशन हैबिट 4. एनुअल रिव्यू प्रोफेशनल हेल्प कब जरूरी है? सामान्य स्थितियों में सेल्फ हेल्प से ही काफी मदद मिल सकती है, लेकिन अगर लक्षण गंभीर हों तो प्रोफेशनल हेल्प की सलाह दी जाती है। जैसेकि अगर ट्रॉमा के फ्लैशबैक बहुत गंभीर हों या मन में खुद को नुकसान पहुंचाने का ख्याल आए तो ऐसे में प्रोफेशनल हेल्प लेना जरूरी है। फाइनल क्लिनिकल निष्कर्ष स्ट्रेस हॉर्मोन कॉर्टिसोल ने आपको बचाने के लिए उस ट्रॉमा मेमोरी को मजबूत कर दिया। एमिग्डला ने खतरे को तेजी से पहचानना सीख लिया। लेकिन अब आप CBT आधारित एक्सपोजर और सेल्फ हेल्प से अपने ब्रेन के पुराने विचारों को बदल सकती हैं। धीरे-धीरे अपने ब्रेन को ये सिखा सकती हैं कि वो बुरी घटना बीत चुकी है। हर होली बुरी नहीं होती, हर स्पेस अनसेफ स्पेस नहीं होता। यहां हमारा मकसद जबर्दस्ती होली मनाना, सेलिब्रेशन में शामिल होना नहीं है। हमारा मकसद है, अपने दिमाग की आजादी को फिर से हासिल करना। अगर आप पूरे साल अभ्यास करें तो अगले साल होली पिछली होली से अलग और बेहतर महसूस हो सकती है। ……………… ये खबर भी पढ़िए मेंटल हेल्थ– पार्टी करता रहा, दोस्त का फोन नहीं उठाया: उस रात उसने आत्महत्या कर ली, क्या दोस्त की मौत का जिम्मेदार मैं हूं? दोस्त की मृत्यु के लिए स्वयं को दोष देना या जिम्मेदार मानना ठीक नहीं है। आपका गिल्ट इस बात का सबूत बिल्कुल नहीं है कि अपने दोस्त की मौत के लिए आप जिम्मेदार हैं। लेकिन ये इस बात का संकेत जरूर है कि आप एक संवेदनशील और जिम्मेदार इंसान हैं, जो अब एक गहरी तकलीफ से गुजर रहा है। आगे पढ़िए…

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