NCP में हुआ बड़ा बदलाव, सुनेत्रा पवार बनाई नई राष्ट्रीय अध्यक्ष
एनसीपी में नेतृत्व परिवर्तन के साथ एक नई राजनीतिक पारी की शुरुआत हो गई है. पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में सुनेत्रा पवार को सर्वसम्मति से राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया. वर्किंग प्रेसिडेंट प्रफुल्ल पटेल ने उनके नाम का प्रस्ताव रखा, जिसे महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष सुनील तत्कारे ने अनुमोदित किया. बैठक में मौजूद सदस्यों ने हाथ उठाकर उनके नेतृत्व पर भरोसा जताया.
भावनात्मक पृष्ठभूमि में आया फैसला
सुनेत्रा पवार का अध्यक्ष चुना जाना केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि एक भावनात्मक क्षण भी माना जा रहा है. उनके पति और महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार का 28 जनवरी 2026 को बारामती में एक विमान हादसे में निधन हो गया था. इस दुखद घटना के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर चर्चाएं तेज थीं, जिनका समापन अब सुनेत्रा पवार के चयन के साथ हुआ.
राजनीतिक विरासत और पारिवारिक पृष्ठभूमि
18 अक्टूबर 1963 को महाराष्ट्र के ओसमानाबाद में जन्मी सुनेत्रा पवार एक राजनीतिक और कृषक परिवार से ताल्लुक रखती हैं. उनके पिता Padamsinh Patil पूर्व राज्य मंत्री और लोकसभा सांसद रह चुके हैं. परिवार का राजनीतिक प्रभाव लंबे समय से महाराष्ट्र की राजनीति में देखा जाता रहा है.
उनके बड़े भाई भी सक्रिय राजनीति में रहे हैं और विभिन्न दलों से जुड़े रहे हैं. इस तरह सुनेत्रा पवार का पारिवारिक नेटवर्क राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में गहरी जड़ें रखता है.
नई जिम्मेदारी, नई चुनौती
पार्टी के भीतर यह बदलाव ऐसे समय आया है जब एनसीपी को संगठनात्मक मजबूती और राजनीतिक दिशा की जरूरत है. सुनेत्रा पवार के सामने पार्टी को एकजुट रखना, कार्यकर्ताओं में विश्वास बनाए रखना और आगामी चुनावी रणनीति को धार देना बड़ी चुनौती होगी.
परिवार की अगली पीढ़ी भी राजनीति में
सुनेत्रा पवार और अजित पवार के दो बेटे हैं जय पवार और पार्थ पवार. पार्थ पवार ने 2019 के लोकसभा चुनाव में मावल सीट से चुनाव लड़ा था, हालांकि उन्हें सफलता नहीं मिली. बावजूद इसके, पवार परिवार की अगली पीढ़ी भी राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने की कोशिश कर रही है.
एनसीपी में यह नेतृत्व परिवर्तन पार्टी के भविष्य की दिशा तय करेगा. अब सभी की नजरें इस बात पर होंगी कि सुनेत्रा पवार अपने अनुभव और पारिवारिक राजनीतिक विरासत के सहारे पार्टी को किस तरह नई ऊर्जा और रणनीति प्रदान करती हैं.
यह भी पढ़ें - बारामती क्रैश के बाद डीजीसीए की बड़ी कार्रवाई, वीएसआर के 4 प्लेन 'ग्राउंड' करने की तैयारी
बाजार की पाठशाला: आखिर क्यों फीकी पड़ रही हीरों की चमक, सोने-चांदी की लगातार बढ़ रही मांग
मुंबई, 26 फरवरी (आईएएनएस)। हीरे सदियों से मानव इतिहास का हिस्सा रहे हैं। प्राचीन यूनानियों से लेकर आधुनिक दौर तक हीरे को मजबूती, वैभव और प्रेम का प्रतीक माना जाता रहा है। मशहूर कोहिनूर हीरा तो आक्रमण, साजिश और सत्ता संघर्ष का केंद्र रहा है। शादी-ब्याह में हीरे की अंगूठी को हमेशा के लिए का प्रतीक माना जाता है।
अब हालात बदलते दिख रहे हैं। पिछले दो साल में प्राकृतिक हीरों की कीमतें लगभग 26 प्रतिशत तक गिर गई हैं। वहीं, लैब में बनाए जाने वाले हीरे (लैब-ग्रोउन) 2020 के मुकाबले करीब 74 प्रतिशत तक सस्ते हो चुके हैं। महंगाई के इस दौर में इतनी बड़ी गिरावट असामान्य मानी जा रही है। लंदन के मशहूर हीरा बाजार हैटन गार्डन के एक जौहरी के अनुसार, अभी हीरा खरीदना ठीक समय नहीं है। कुछ समय में यह और सस्ता हो सकता है।
दुनिया की बड़ी हीरा कंपनी डी बीयर्स ने बताया कि 2024 की शुरुआत में उसके पास 2 अरब डॉलर का हीरा का स्टॉक था, जो साल के अंत तक भी नहीं बिक सका। कंपनी ने खदानों में उत्पादन 20 प्रतिशत तक घटा दिया है और उसकी मूल कंपनी एंग्लो अमेरिकन ने उसे बेचने का फैसला किया है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, कोरोना महामारी के बाद रिवेंज स्पेंडिंग के कारण हीरों की मांग अचानक बढ़ी थी, और टली हुई शादियों और लग्जरी खर्च ने बाजार को उछाल दिया था, लेकिन अब वह मांग सामान्य हो चुकी है। चीन में आर्थिक सुस्ती, वैश्विक मंदी का डर और शादियों की संख्या में कमी भी कीमतों में गिरावट की बड़ी वजह है।
सबसे बड़ा बदलाव लैब-ग्रोउन हीरों का तेजी से बढ़ता बाजार है। पहले इन्हें बनाने में कई हफ्ते लगते थे, लेकिन अब कुछ ही घंटों में तैयार हो जाते हैं। इनकी उत्पत्ति (सोर्स) साफ होती है, इसलिए युवा ग्राहक इन्हें ज्यादा नैतिक और पर्यावरण के अनुकूल मानते हैं। आज ब्राइडल ज्वेलरी बाजार में करीब 45 प्रतिशत हिस्सेदारी लैब-ग्रोउन हीरों की है।
अमेरिका में एक कैरेट प्राकृतिक हीरे की औसत कीमत मई 2022 में 6,819 डॉलर थी, जो दिसंबर तक गिरकर 4,997 डॉलर रह गई। वहीं समान आकार का लैब-ग्रोउन हीरा 3,410 डॉलर से गिरकर सिर्फ 892 डॉलर तक पहुंच गया। सस्ते होने के कारण ग्राहक अब बड़े आकार के हीरे खरीद पा रहे हैं।
हालांकि, कुछ पारंपरिक जौहरी अब भी प्राकृतिक हीरों को बेहतर मानते हैं। उनका कहना है कि लैब-ग्रोउन हीरे बनाए जाते हैं, उनमें इतिहास या दुर्लभता नहीं होती।
इतिहास बताता है कि हीरा उद्योग पहले भी झटके झेल चुका है। 18वीं सदी में ब्राजील में नए भंडार मिलने से कीमतें दो-तिहाई तक गिर गई थीं। बाद में दक्षिण अफ्रीका में खोज से भी बाजार हिला था, लेकिन मार्केटिंग और नए ग्राहकों ने उद्योग को संभाल लिया।
वहीं, सोने और चांदी की मांग लगातार बढ़ रही है और विशेषज्ञ इनमें निवेश की सलाह दे रहे हैं, तो वहीं हीरों की चमक फीकी पड़ने की वजह से लोग इसमें निवेश से कतरा रहे हैं, क्योंकि हीरों का बाजार एक भावनात्मक और कृत्रिम मूल्य पर टिका है। अगर लोगों का भरोसा और चाहत कम होती है, तो इसकी चमक और फीकी पड़ सकती है।
--आईएएनएस
डीबीपी/डीकेपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
News Nation


















