चांदीपुरा वायरस के प्रकोप की जांच तेज होने के साथ केंद्र ने तैनात किया राष्ट्रीय संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया दल
नई दिल्ली, 5 अगस्त (आईएएनएस)। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने चांदीपुरा वायरस रोग (सीएचपीवी) के प्रकोप से निपटने के लिए राष्ट्रीय संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया दल (एनजेओआरटी) को गुजरात और राजस्थान में तैनात किया है।
यह तैनाती देश भर के प्रमुख अनुसंधान संस्थानों की ओर से निरंतर और गहन वैज्ञानिक जांच के साथ-साथ राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) के राज्य निगरानी इकाइयों के सहयोग से समन्वित एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (आईडीएसपी) के अंतर्गत रोग की निरंतर निगरानी के मद्देनजर की गई है।
इन समन्वित प्रयासों का उद्देश्य वायरस के बारे में जानकारी आगे बढ़ाना है, जिसमें इसके संचरण की गतिशीलता, नैदानिक स्पेक्ट्रम, महामारी विज्ञान और संभावित उपचार के तरीके शामिल हैं, साथ ही साक्ष्य-आधारित सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेपों का मार्गदर्शन करना है। एनसीडीसी के सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकालीन संचालन केंद्र (पीएचईओसी) को भी एनजेओआरटी के समर्थन के लिए सक्रिय कर दिया गया है।
राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी), भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और पशुपालन व दुधारू पालन विभाग (डीएएचडी) के विशेषज्ञों के साथ संयुक्त रूप से बनी बहुविषयक एनजेओआरटी टीम, प्रकोप की जांच, महामारी विज्ञान संबंधी आकलन, नैदानिक प्रबंधन, प्रयोगशाला समन्वय, वेक्टर निगरानी और जन स्वास्थ्य उपायों के कार्यान्वयन में दोनों राज्य सरकारों के प्रयासों में सहयोग करेगी। यह टीम जमीनी स्तर पर की गई प्रतिक्रिया की समीक्षा करने के लिए राज्य स्वास्थ्य विभागों के साथ मिलकर कार्य करेगी और अपने क्षेत्र मूल्यांकन को पूरा करने के बाद मंत्रालय को सिफारिशें प्रस्तुत करेगी।
यह तैनाती हाल के वर्षों में चांदीपुरा वायरस के लिए किए गए सबसे व्यापक वैज्ञानिक अनुसंधानों में से एक के बीच हुई है। चेन्नई स्थित आईसीएमआर-राष्ट्रीय महामारी विज्ञान संस्थान (आईसीएमआर-एनआईई), पुद्दुचेरी स्थित आईसीएमआर-राष्ट्रीय वेक्टर नियंत्रण अनुसंधान संस्थान (आईसीएमआर-एनआईवीसीआर), पुणे स्थित आईसीएमआर-राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (आईसीएमआर-एनआईवी), हैदराबाद स्थित आईसीएमआर-राष्ट्रीय पूर्व-नैदानिक अनुसंधान संस्थान (आईसीएमआर-एनआईपीसीआर) और बेंगलुरु स्थित आईसीएआर-राष्ट्रीय पशु चिकित्सा महामारी विज्ञान और रोग सूचना विज्ञान संस्थान (आईसीएआर-एनआईवीईडीआई) के विशेषज्ञ गुजरात राज्य स्वास्थ्य विभाग के साथ मिलकर इस वायरस से जुड़ी बीमारी की जांच कर रहे हैं।
इस सहयोगात्मक अभ्यास में महामारी विज्ञान, विषाणु विज्ञान, कीट विज्ञान, पशु चिकित्सा विज्ञान और प्रयोगशाला निदान के विशेषज्ञ एक साथ आते हैं ताकि चांदीपुरा वायरस संक्रमण के संपूर्ण नैदानिक स्पेक्ट्रम को समझा जा सके-हल्के बुखार से लेकर तीव्र एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) तक-और सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेपों को मजबूत करने के लिए साक्ष्य उत्पन्न किए जा सकें।
जांच के अंतर्गत प्रभावित जिलों में तीव्र बुखार संबंधी बीमारी (एएफआई) और एईएस से पीड़ित रोगियों की सक्रिय निगरानी तेज कर दी गई है, साथ ही साथ लक्षणहीन संक्रमणों का अनुमान लगाने और वायरस के संचरण की वास्तविक सीमा का आकलन करने के लिए समुदाय-आधारित सीरोसर्वेक्षण किए जा रहे हैं। प्रयोगशाला टीमें साथ ही साथ निदान संबंधी परीक्षणों को मजबूत करने और बीमारी के रोगजनन को बेहतर ढंग से समझने के लिए बेहतर पशु मॉडल विकसित करने पर कार्य कर रही हैं।
जांच का मुख्य उद्देश्य वायरस के संचरण चक्र को समझना है। हालांकि चांदीपुरा वायरस के वाहक के रूप में सैंडफ्लाई को प्रमुख माना जाता है, वैज्ञानिक यह भी जांच कर रहे हैं कि क्या मच्छर, किलनी और सूक्ष्म कीट जैसे अन्य आर्थ्रोपोड भी इसके संचरण में भूमिका निभा सकते हैं। प्रभावित क्षेत्रों से एकत्र किए गए बड़ी संख्या में वाहक नमूनों का प्रयोगशाला में विश्लेषण किया जा रहा है। अधिकारियों ने इस बात पर बल दिया है कि वैज्ञानिक जांच पूरी होने तक वर्तमान प्रकोप के लिए जिम्मेदार वाहक की पहचान करना जल्दबाजी होगी।
यह पता लगाने के लिए पशु निगरानी का दायरा भी बढ़ाया गया है कि क्या यह वायरस घरेलू पशुओं में फैल रहा है जो संभावित रूप से वायरस के वाहक बन सकते हैं। गायों, भैंसों और बकरियों के रक्त के नमूनों के साथ-साथ दूध के नमूने भी परीक्षण के लिए एकत्र किए गए हैं। अब तक लगभग 70 पशुओं के रक्त के नमूने एकत्र किए गए हैं और चांदीपुरा वायरस और अन्य संबंधित रोगजनकों के लिए उनका विश्लेषण किया जा रहा है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि प्रयोगशाला जांच पूरी होने तक कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है।
वर्तमान में जारी जांच में गुजरात में 2024 में हुए चांदीपुरा वायरस के प्रकोप से मिले सबक का भी उपयोग किया जा रहा है। उस प्रकोप के दौरान, सैंडफ्लाई सहित कई वाहक प्रजातियों को एकत्र करके परीक्षण किया गया था, लेकिन सभी नमूनों में सीएचपीवी नहीं पाया गया और किसी विशिष्ट वाहक को निर्णायक रूप से दोषी नहीं ठहराया जा सका।
वैज्ञानिक इस बात की भी बारीकी से जांच कर रहे हैं कि क्या वायरस में कोई आनुवंशिक परिवर्तन हुआ है। गांधीनगर स्थित गुजरात जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान केंद्र (जीबीआरसी) में वर्तमान रोग से प्राप्त वायरस के नमूनों का संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण किया जा रहा है। प्रारंभिक विश्लेषण में मामूली आनुवंशिक भिन्नताएं पाई गई हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्धारित करने से पहले कि वर्तमान में फैल रहा वायरस पिछले प्रकोपों से जुड़े उपभेदों से विकसित हुआ है या नहीं, विस्तृत तुलनात्मक जीनोमिक अध्ययन आवश्यक हैं।
बढ़ते वैज्ञानिक प्रमाणों को पुष्ट करते हुए आईसीएमआर-एनआईवी, पुणे के शोधकर्ताओं ने आईसीएमआर -राजेंद्र मेमोरियल नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ रिसर्च (आईसीएमआर-आरएमएनआईएचआर), पटना, बीजे मेडिकल कॉलेज (बीजेएमसी), अहमदाबाद, पशुपालन और दुधारू विभाग और स्वास्थ्य व परिवार कल्याण विभाग, गुजरात सरकार के सहयोग से हाल ही में चांदीपुरा वायरस एन्सेफलाइटिस के प्रकोप की जांच, गुजरात, भारत, 2024 शीर्षक से एक शोध पत्र प्रकाशित किया है, जिसमें पिछले वर्ष के प्रकोप के दौरान किए गए बहुविषयक जांचों का दस्तावेजीकरण किया गया है।
वर्तमान जांचों को भारत के अस्पताल-आधारित तीव्र एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) निगरानी नेटवर्क की ओर से और समर्थन प्राप्त है, जो देश भर के 15 तृतीयक देखभाल अस्पतालों में फैला एक बहुकेंद्रित भावी निगरानी कार्यक्रम है। मानकीकृत नैदानिक प्रोटोकॉल, सीरोलॉजिकल और आणविक निदान व चयनात्मक अगली पीढ़ी के अनुक्रमण का उपयोग करते हुए, यह नेटवर्क प्रकोप का पता लगाने को मजबूत करने, एईएस के एटियलॉजी की समझ में सुधार करने और समय पर सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्रवाई का समर्थन करने के लिए महत्वपूर्ण महामारी विज्ञान और प्रयोगशाला साक्ष्य उत्पन्न कर रहा है।
राष्ट्रीय संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया दल की तैनाती और कई राष्ट्रीय संस्थानों की ओर से समानांतर जांच के साथ केंद्र ने गुजरात और राजस्थान को वैज्ञानिक और जमीनी सहायता में भी काफी विस्तार किया है, जो एक समन्वित वन हेल्थ दृष्टिकोण को दर्शाता है और यह चांदीपुरा वायरस के प्रकोप को बेहतर ढंग से समझने और नियंत्रित करने के लिए मानव, पशु और वेक्टर निगरानी को एकीकृत करता है।
--आईएएनएस
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महाराष्ट्र में बैन एनालॉग पनीर, बेचने पर होगी जेल, जानें क्या होता है Analog पनीर और अंतर
What is Analog Paneer: महाराष्ट्र सरकार ने पब्लिक हेल्थ को ध्यान में रखते हुए राज्य में एनालॉग (कृत्रिम/नॉन-डेयरी) पनीर के निर्माण, बिक्री, भंडारण, परिवहन और वितरण पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है. इस फैसले के साथ महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ के बाद ऐसा कदम उठाने वाला देश का दूसरा राज्य बन गया है. खाद्य सुरक्षा आयुक्त तुकाराम मुंढे द्वारा 30 जुलाई को जारी आदेश के अनुसार, राज्य में एनालॉग या नॉन-डेयरी पनीर के निर्माण, प्रोसेसिंग, पैकिंग, स्टोरेज, परिवहन, थोक और खुदरा बिक्री तथा बिक्री के लिए पेश करने पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है.
असली बताकर बेचने पर होगी कार्रवाई
खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने स्पष्ट किया है कि राज्य में अगर कोई व्यक्ति या दुकान व कंपनी एनालॉग पनीर को असली डेयरी पनीर बताकर बेचता है, तो इसे उपभोक्ताओं को गुमराह करना और Food Safety and Standards Act, 2006 के तहत अनुचित व्यापारिक गतिविधि माना जाएगा. ऐसे मामलों में कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी.
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नकली पनीर बेचने पर होगी 6 महीने की जेल
कानून के तहत, अपराध की गंभीरता के आधार पर 6 महीने तक की जेल और 1 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. वहीं, यदि असुरक्षित खाद्य पदार्थ के सेवन से किसी व्यक्ति की मौत होती है, तो आजीवन कारावास और कम से कम 10 लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है.
विधानसभा में उठ चुका है मुद्दा
गौरतलब है कि पिछले साल महाराष्ट्र विधानसभा में भी इस मुद्दे को उठाया गया था, जहां विधायकों ने एनालॉग पनीर पर बैन लगाने की मांग की थी. सरकार के इस फैसले को उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है. सरकार के इस फैसले अब बाजार में नकली पनीर की बिक्री पर रोकथाम होगी और सुरक्षित खाद्य पदार्थ की बिक्री की जा सकेगी.
क्या है एनालॉग पनीर?
एनालॉग पनीर, पारंपरिक पनीर का एक नॉन-डेयरी विकल्प है, जो मिल्क फैट्स की बजाय वेजिटेबल ऑयल्स, स्टार्च, इमल्सीफायर और अन्य आर्टिफिशियल चीजों का उपयोग करके बनाया जाता है. यह असली पनीर की तुलना में उत्पादन में काफी सस्ता होता है और इसमें प्रोटीन का स्तर भी बहुत कम होता है. हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस पनीर में हाइड्रोज वाले वेजिटेबल्स ऑयल होते हैं. इनमें ट्रांस फैट्स और सैचुरेटेड फैट्स होते हैं.
एनालॉग पनीर खाने के नुकसान
वेजिटेबल ऑयल और फैट्स होने की वजह से यह पनीर कोलेस्ट्रॉल के मरीजों और हार्ट के मरीजों की परेशानी बढ़ सकती है. इससे कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ सकती है. साथ ही शरीर में इंफ्लामेशन बढ़ सकती है. इस पनीर का इस्तेमाल आमतौर पर रेस्टोरेंट और होटलों में होता है. ऐसे में जो लोग बाहर का खाना ज्यादा खाते हैं, उन्हें हार्ट अटैक का खतरा बढ़ सकता है. इन लोगों को लिवर से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं. इन्हें पाचन तंत्र से जुड़ी समस्याएं भी हो सकती हैं. इस पनीर में रसायनों की मात्रा अधिक होती है, जिस वजह से ये किडनी को भी नुकसान पहुंचा सकता है. बहुत ज्यादा एनालॉग पनीर का सेवन करने से शरीर में पोषक तत्वों की कमी हो सकती है.
कैसे ढूंढे एनालॉग पनीर और पारंपरिक पनीर में फर्क?
1.आयोडिन टेस्ट- इसके लिए आपको पनीर के कुछ टुकड़ों को पानी में उबालना है. इसके बाद ठंडा कर लें. फिर उसमें आयोडीन की कुछ बूंदे डालें. अगर पनीर का रंग नीला या काला हो जाता है, तो यह एनालॉग पनीर है.
2.पारंपरिक पनीर- असली पनीर दूध को फाड़कर बनाया जाता है. शुद्ध दूध से बना पनीर छूने पर नरम और हाथ से मसलने पर आसानी से बिखर जाता है.
3.पैकेट पर जांच- यदि पैकेट वाला पनीर खरीदा है तो उसके पैकेट पर सामग्री सूची को ध्यान से पढ़ें. इस पर 'एनालॉग' या वनस्पति फैट का जिक्र किया गया है तो यह असली पनीर नहीं है.
4.पकाने पर असर- असली पनीर गर्म करने पर मुलायम होता है जबकि एनालॉग पनीर गर्म होने पर मसलने लगता है और उसमें से तेल अलग होने लगता है.
5.स्वाद- असली पनीर का स्वाद दूध जैसा होता है. उसकी खुशबू दूध जैसी होगी, जबकि एनालॉग पनीर गर्म होने पर केमिकल जैसी गंध रिलीज करता है. इसका आफ्टरटेस्ट भी अजीब केमिकल जैसा लगता है.
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