लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव कराने से नहीं, बल्कि शुद्ध और विश्वसनीय मतदाता सूची से सुनिश्चित होती है। इसी मूल सिद्धांत को केंद्र में रखते हुए उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के संदर्भ में महत्वपूर्ण आदेश दिया है। उच्चतम न्यायालय ने कोलकाता उच्च न्यायालय को यह अनुमति दी है कि वह तीन वर्ष से अधिक अनुभव वाले सिविल न्यायाधीशों की तैनाती करे और आवश्यकता पड़ने पर झारखंड तथा ओडिशा से भी न्यायिक अधिकारियों की सेवाएं ले। यह निर्णय उस समय आया है जब यह स्पष्ट हुआ कि केवल वर्तमान और सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीशों के सहारे इस विशाल कार्य को समयबद्ध ढंग से पूरा करना कठिन है। देखा जाये तो यदि एक अधिकारी प्रतिदिन दो सौ पंद्रह मामलों का निपटारा करे तब भी लगभग अस्सी दिन लगेंगे। ऐसे में न्यायालय का हस्तक्षेप समय और विश्वसनीयता दोनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
यह प्रकरण राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच चल रहे टकराव का भी द्योतक है। न्यायालय ने दोनों पक्षों की चिंताओं को समान रूप से महत्वपूर्ण मानते हुए मतदाता सूची की पवित्रता और निष्पक्षता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। यह संतुलित दृष्टिकोण स्वागतयोग्य है, क्योंकि लोकतंत्र में संस्थाओं के बीच समन्वय ही स्थिरता का आधार होता है। भाषा को लेकर उठी आपत्ति भी ध्यान देने योग्य थी। यह तर्क दिया गया कि अन्य राज्यों से आने वाले न्यायिक अधिकारी बंगला नहीं समझ पाएंगे। न्यायालय ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि झारखंड और ओडिशा के कुछ हिस्से कभी बंगाल का अंग रहे हैं और वहां की स्थानीय बोलियों से परिचित लोग मिल सकते हैं।
इसके अलावा, चुनाव आयोग को 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने की अनुमति दी गई है, साथ ही यह स्पष्ट किया गया कि सत्यापन की प्रक्रिया जारी रहने पर पूरक सूची भी जारी की जा सकती है। न्यायालय ने अपने विशेष अधिकार का उपयोग करते हुए यह सुनिश्चित किया कि पूरक सूची में शामिल मतदाताओं को भी अंतिम सूची का ही हिस्सा माना जाएगा। इससे उन नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे जिनकी पहचान संबंधी दस्तावेज समय पर प्रस्तुत हो चुके हैं, चाहे वे इलेक्ट्रॉनिक रूप में अपडेट किये गये हों या भौतिक रूप से जमा किए गए हों।
इसके अलावा, आधार कार्ड और माध्यमिक प्रवेश पत्र को पहचान दस्तावेज के रूप में स्वीकार करने का निर्णय भी लिया गया है क्योंकि तार्किक विसंगतियों, जैसे माता पिता के नाम में अंतर या आयु के असंगत अंतर को आधार बनाकर आपत्तियां उठाई गई थीं। यह आदेश इस बात का संकेत है कि जब संवैधानिक संस्थाओं के बीच गतिरोध उत्पन्न हो, तब न्यायपालिका को सक्रिय होकर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करनी होती है। मतदाता सूची की शुचिता जनादेश की विश्वसनीयता का आधार है। यदि यह प्रक्रिया पारदर्शी, त्वरित और न्यायसंगत ढंग से पूरी होती है, तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत होगा।
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लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मंगलवार को एआई इम्पैक्ट समिट में विरोध प्रदर्शन करने के लिए भारतीय युवा कांग्रेस का समर्थन करते हुए उन्हें बब्बर-शेर बताया। जब शर्टलेस प्रदर्शन के सिलसिले में सात पार्टी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद आईवाईसी प्रमुख उदय भानु चिब को चार दिन की पुलिस हिरासत में भेजा गया, तो गांधी ने युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं से डरने की अपील की। भोपाल में कांग्रेस के किसान महाचौपाल को संबोधित करते हुए कांग्रेस सांसद ने कहा कि युवा कांग्रेस के सदस्य 'बब्बर-शेर' हैं। आपको किसी से डरने की जरूरत नहीं है। आपमें देशभक्ति का खून है। आपने हरित क्रांति लाई, उद्योग स्थापित किए, आईटी क्रांति लाई, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन सबका अंत कर दिया।
ये टिप्पणियां पटियाला हाउस कोर्ट द्वारा मंगलवार को एआई समिट विरोध प्रदर्शन मामले में भारतीय युवा कांग्रेस अध्यक्ष उदय भानु चिब को दिल्ली पुलिस को चार दिन की हिरासत में सौंपे जाने के बाद आईं। पुलिस ने बताया कि चिब उन चार सह-आरोपियों द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन का मुख्य सूत्रधार था, जो पुलिस हिरासत में हैं। यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और देश की अखंडता से जुड़ा है।
पुलिस ने इससे पहले भारतीय युवा कांग्रेस अध्यक्ष की सात दिन की हिरासत मांगी थी। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (जेएमएफसी) ने अतिरिक्त लोक अभियोजक (एपीपी) और आरोपी चिब के वकील की दलीलें सुनने के बाद चार दिन की हिरासत मंजूर कर दी।
भारतीय युवा कांग्रेस के सदस्यों ने शुक्रवार को राष्ट्रीय राजधानी में ऑल इम्पैक्ट इंडिया समिट के भारत मंडपम स्थल पर "समझौतावादी प्रधानमंत्री" के नारे लिखे हुए कपड़े उतारकर विरोध प्रदर्शन किया। पार्टी कार्यकर्ताओं ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के विरोध में कपड़े उतारे, जिसके बाद इस मामले में सात युवा कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार किया गया। इसी बीच, भोपाल में राहुल गांधी ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के ढांचे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा और उन्हें समझौतावादी बताते हुए उन पर दबाव का आरोप लगाया। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रंप के टैरिफ के खिलाफ फैसला सुनाए जाने के बाद गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को समझौता रद्द करने की चुनौती दी। प्रधानमंत्री पर भारत को बेच दिया के आरोपों को दोहराते हुए उन्होंने केंद्र सरकार पर भारतीयों का डेटा अमेरिका को देने का आरोप लगाया।
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