अगले साल की शुरुआत से आएंगे प्लास्टिक के नोट:RBI गवर्नर बोले- कम मूल्य वाले नोटों से शुरुआत होगी, ये 30 साल तक चलेंगे
RBI अगले वित्तीय वर्ष यानी 2027-28 की शुरुआत से देश में लंबे समय तक चलने वाले पॉलिमर यानी प्लास्टिक के नोट लॉन्च करने की तैयारी कर रहा है। RBI की मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी, यानी MPC की तीन दिन चली बैठक के बाद गवर्नर संजय मल्होत्रा ने आज 5 अगस्त को बताया कि शुरुआत में पॉलिमर नोट छोटे मूल्य यानी कम वैल्यू के करेंसी नोट जारी किए जाएंगे। इनका मार्केट में सर्कुलेशन और इस्तेमाल सबसे ज्यादा होता है। 30 साल तक चलते है पॉलिमर नोट प्रेस ब्रीफिंग के दौरान गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बताया कि दुनिया के कई देशों जैसे ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में पॉलिमर करेंसी नोट 30 साल से भी अधिक समय तक सफलतापूर्वक उपयोग में रहे हैं। भारत में कागजी नोट, विशेषकर ₹10, ₹20 और ₹50 के छोटे नोट, बहुत जल्द गंदे हो जाते हैं या फटने लगते हैं। पॉलिमर नोट आने से नोटों की उम्र बढ़ेगी, पानी या नमी से ये खराब नहीं होंगे और बार-बार नए नोट छापने का सरकारी खर्च भी कम होगा। सवाल-जवाब में जानें इस खबर से जुड़ी जरूरी बातें… सवाल 1: पॉलीमर नोट क्या होते हैं और सरकार इन्हें क्यों ला रही? जवाब: पॉलीमर बैंकनोट्स कागज के बजाय एक खास किस्म के प्लास्टिक मटेरियल यानी पॉलीमर सबस्ट्रेट पर छापे जाते हैं। ये छूने में तो सामान्य नोटों जैसे ही हल्के होते हैं, लेकिन पानी में भीगने पर भी नहीं गलते और लंबे समय तक चलते हैं। इन्हें लाने की मुख्य वजहें- सवाल 2: क्या पुरानेकागजी नोट बंद हो जाएंगे? जवाब: बिल्कुल नहीं। सरकार और आरबीआई ने पूरी तरह साफ किया है कि पॉलीमर नोट आने से पुराने कागजी नोट चलन से बाहर नहीं होंगे। सवाल 3: पॉलीमर नोट का प्रस्ताव कब आया था? जवाब: भारत ने 2012 में पहली बार नोटों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए पॉलीमर नोट लाने का प्रयास किया था, लेकिन तकनीकी वजहों से प्रोजेक्ट रुक गया था। सवाल 4: दुनिया के किन देशों में प्लास्टिक नोट चलते हैं? दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में पॉलीमर बैंकनोट्स चलन में शामिल किए जा चुके हैं। इनमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम (यूके) और न्यूजीलैंड जैसे देश शामिल हैं। सवाल 5: भारत में कब-कब नोट बदले गए? आजादी से लेकर अब तक भारत में बड़े पैमाने पर 3 बार नोटबंदी या बड़े मूल्य के नोटों को बंद करने का फैसला लिया गया है… 1. पहली बार - जनवरी 1946 (ब्रिटिश काल/आजादी से ठीक पहले): क्या हुआ: तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने ₹500, ₹1000 और ₹10,000 के बड़े नोटों को बंद कर दिया था। मकसद: काले धन और युद्ध के दौरान हुई अवैध कमाई को बाहर निकालना। बाद में: 1954 में सरकार ने ₹1,000, ₹5,000 और ₹10,000 के नोट फिर से शुरू किए थे। 2. दूसरी बार - जनवरी 1978 (मोरारजी देसाई सरकार): क्या हुआ: जनता पार्टी की सरकार ने ₹1,000, ₹5,000 और ₹10,000 के बड़े नोटों को बंद कर दिया। मकसद: चुनाव में होने वाले काले धन के इस्तेमाल और भ्रष्टाचार को रोकना। 3. तीसरी बार - 8 नवंबर 2016 (नरेंद्र मोदी सरकार): क्या हुआ: रात 8 बजे प्रधानमंत्री मोदी ने देश में चल रहे ₹500 और ₹1,000 के नोटों को रातों-रात अमान्य घोषित कर दिया। बदलाव: इनकी जगह ₹500 का नया नोट और पहली बार ₹2,000 का नया नोट जारी किया गया। ₹2000 के नोट की वापसी (मई 2023): 19 मई 2023 को RBI ने 'क्लीन नोट पॉलिसी' के तहत ₹2,000 के नोट को चलन (सर्कुलेशन) से वापस लेने का ऐलान किया। हालांकि इसे नोटबंदी नहीं कहा गया क्योंकि इसे बैंक में जमा करने या बदलने का समय दिया गया था।
गाड़ी का बीमा नहीं तो पेट्रोल-डीजल न मिले:सुप्रीम कोर्ट का निर्देश- नई कारों का बीमा 4 और बाइक के लिए 6 साल का हो
जिस गाड़ी का थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस नहीं है, तो उसे पेट्रोल-डीजल ना दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह पायलट प्रोजेक्ट तैयार करने का निर्देश दिया है। इसके तहत बीमा न होने पर पेट्रोल पंपों पर गाड़ियों को फ्यूल देने से मना कर दिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ ही नई गाड़ियों के लिए अनिवार्य थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस की समय सीमा भी बढ़ा दी है। आइए सवाल-जवाब में समझते हैं कि कोर्ट का निर्देश क्या है, यह कैसे लागू होगा और इसका आम जनता पर क्या असर पड़ेगा । Q1. सुप्रीम कोर्ट ने पेट्रोल-डीजल और गाड़ियों के इंश्योरेंस को लेकर क्या निर्देश दिया? उत्तर: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने केंद्र सरकार को एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने का निर्देश दिया है। इसके तहत पेट्रोल पंपों को गाड़ियों के वैलिड थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस से जोड़ा जाएगा। अगर किसी गाड़ी का बीमा वैलिड नहीं पाया जाता है, तो पेट्रोल पंप पर उसे पेट्रोल या डीजल देने से मना कर दिया जाएगा। जब तक गाड़ी मालिक बीमा नहीं करा लेता, तब तक गाड़ी को ईंधन नहीं मिलेगा। Q2. सुप्रीम कोर्ट ने इतना सख्त कदम उठाने का फैसला क्यों किया? उत्तर: कोर्ट के सामने पेश आंकड़ों के मुताबिक, देश की सड़कों पर चलने वाली गाड़ियों में से लगभग 56% गाड़ियों का कोई बीमा ही नहीं है। स्टैंडिंग कमेटी ऑन फाइनेंस (2024-25) की रिपोर्ट के अनुसार, जब इन वाहनों से सड़क हादसे होते हैं, तो पीड़ितों या उनके परिवारों को उचित और समय पर मुआवजा नहीं मिल पाता। Q3. पेट्रोल पंपों पर बीमा की जांच कैसे की जाएगी? उत्तर: सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार, पायलट प्रोजेक्ट पर इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी और सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय मिलकर काम करेंगे। पेट्रोल पंपों और मुख्य सड़कों पर ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकॉग्निशन कैमरे लगाए जाएंगे। ये कैमरे गाड़ी के नंबर प्लेट को इंश्योरेंस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (IIB) और केंद्र सरकार के वाहन (VAHAN) पोर्टल के डेटा से ऑटोमैटिक कनेक्ट करके बीमा स्टेटस चेक करेंगे। पेट्रोलियम और नेचुरल गैस मंत्रालय ने इस व्यवस्था पर सहमति दी है। Q4. नई गाड़ी खरीदने वालों के लिए थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस के नियमों में क्या बदलाव होगा? उत्तर: कोर्ट ने नई गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन के समय खरीदे जाने वाले अनिवार्य थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस की जरूरी समयसीमा को 1 साल के लिए बढ़ा दिया है… 2018 में कारों के लिए 3 साल और बाइक्स के लिए 5 साल का नियम लागू किया गया था, लेकिन 8 साल बीतने के बाद भी करोड़ों गाड़ियां बिना बीमा के चल रही हैं। इसीलिए यह समयसीमा बढ़ाई गई है। Q5. सड़क पर चेकिंग के दौरान पुलिस कैसे पता लगाएगी कि इंश्योरेंस है या नहीं? उत्तर: वर्तमान में राज्यों की पुलिस के पास मौके पर तुरंत इंश्योरेंस चेक करने का कोई एक समान सिस्टम नहीं है। इसलिए कोर्ट ने निर्देश दिया है कि राज्य पुलिस को हैंडहेल्ड डिवाइसेज या मोबाइल एप्स दिए जाएं। ये डिवाइसेज VAHAN पोर्टल और इंश्योरेंस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (IIB) के डेटाबेस से सीधे जुड़े होंगे। इससे पुलिस तुरंत गाड़ियों का रियल-टाइम बीमा स्टेटस चेक कर सकेगी और चालान (E-challan) काट सकेगी। Q6. टोल प्लाजा पर लंबी लाइनों और रुकने की समस्या से निपटने के लिए क्या निर्देश हैं? उत्तर: नेशनल हाईवे पर हादसों और टोल प्लाजा पर लगने वाली लंबी कतारों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया है कि चुनिंदा कॉरिडोर पर एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जाए। इसके तहत टोल प्लाजा पर वाहनों को रोकने की प्रक्रिया को खत्म कर ऑटोमैटिक डिटैक्शन सिस्टम (ANPR सिस्टम) से बदला जाएगा, ताकि गाड़ियां बिना रुके गुजर सकें। Q7. बिना बीमा वाली गाड़ियों से आम लोगों और सड़क दुर्घटना पीड़ितों को क्या नुकसान होता था? उत्तर: मोटर व्हीकल एक्ट (MVA) की धारा 146 के तहत थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस जरूरी है। इसका मुख्य उद्देश्य सड़क हादसे के शिकार लोगों को तुरंत आर्थिक मुआवजा दिलाना है। जब गाड़ी का बीमा नहीं होता, तो पीड़ितों या उनके परिजनों को मुआवजे और जिम्मेदारी तय कराने के लिए सालों तक अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं। खासकर उन परिवारों के लिए स्थिति भयावह हो जाती है, जहां हादसे में कमाने वाले व्यक्ति की मौत हो जाती है या वह स्थायी रूप से दिव्यांग हो जाता है। Q8. क्या वाहन मालिकों को बीमा के लिए अतिरिक्त विकल्प या कस्टमाइजेशन की सुविधा मिलेगी? उत्तर: हां, सुप्रीम कोर्ट ने IRDA को निर्देश दिया है कि वह प्राइवेट वाहन मालिकों को अलग-अलग पॉलिसी ऑप्शन उपलब्ध कराए। इसमें बेस थर्ड-पार्टी कवर के साथ-साथ पर्सनल एक्सीडेंट कवर, एड-ऑन और ओन-डैमेज कवर चुनने के कई विकल्प मिलने चाहिए, ताकि लोग अपनी जरूरत के हिसाब से बीमा चुन सकें। Q8. थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस होता क्या है? जब आपकी गाड़ी से किसी दूसरे व्यक्ति (तीसरे पक्ष), उसकी गाड़ी या उसकी संपत्ति को नुकसान पहुंचता है, तो बीमा कंपनी उस नुकसान की भरपाई करती है। मोटर व्हीकल्स एक्ट की धारा 146 के तहत भारत में हर वाहन का थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस होना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इसमें आपकी अपनी गाड़ी के नुकसान का कवर शामिल नहीं होता।
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 



















