Sawan 2026: आखिर कहां है भगवान शिव का ससुराल? सावन में क्यों रहने आते हैं देवो के देव, जानें कनखल से लेकर काशी तक की पौराणिक कथा
Sawan 2026: सावन का महीना भोलेनाथ को समर्पित होता है. इस महीने में उनकी पूजा करने से, व्रत करने से और जलाभिषेक करने का खास महत्व होता है. मान्यता है कि सावन के महीने में उनकी पूजा करने से मनुष्यों को जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है. इस समय प्रकृति बिल्कुल हरी-भरी लगती है. इसलिए, यह माह बहुत पवित्र भी माना जाता है. हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन का महीना पांचवा महीना होता है, जो पूर्णता शिव जी और माता पार्वती को समर्पित है. सावन मास से जुड़ी कई कथाएं हैं, जो आमजन में प्रचलित है. पर क्या आप जानते हैं इस पावन माह में शिव जी पार्वती माता के साथ अपने ससुराल आते हैं? जी हां, आइए आपको बताते हैं इस पौराणिक लोक कथा के बारे में.
आखिर कहां है भगवान शिव का ससुराल?
शिवमहापुराण के अनुसार, सावन मास में शिव जी अपने ससुराल आते हैं. माता पार्वती से उनका विवाह हुआ था. पार्वती मां पर्वत राज हिमालय की पुत्री थी. कैलाश पर्वत उनका मुख्य वास हुआ करता था. एक दिन विवाह के बाद पार्वती माता का मायके जाने की इच्छा हुई और उन्होंने शिव जी से अपनी इच्छा व्यक्त की. पार्वती माता ने शिव जी से भी साथ चलने के लिए कहा.
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भोले-भाले शिव शंकर माता पार्वती के साथ गए हिमालय
माता पार्वती के प्यार भरे आग्रह को सुनकर भोले-भाले और सरल से भगवान शिव ने उनके साथ चलने का मन बना लिया. जिस महीने में भोलेनाथ और माता पार्वती हिमालय आ रहे थे, उस समय सावन का महीना था. इसलिए, तब से ही मान्यता है कि भगवान शिव माता पार्वती के साथ सावन में ससुराल जाते हैं.
सावन महीने से जुड़ी यह कथा दर्शाती है कि विवाह के बाद पति-पत्नी का प्रेम, समझ और साथ कितना जरूरी होता है. यह कथा पारिवारिक रिश्तों की सुंदर व्याख्या करती है. कैसे भगवान शिव जैसे तपस्वी भी पार्वती जी के स्नेहवश ससुराल जाने को तैयार हो जाते हैं.
कनखल मंदिर को क्यों कहां जाता है शिव जी का ससुराल?
उत्तराखंड के हरिद्वार में कनखल नामक ग्राम को भी भगवान शिव का ससुराल माना जाता है. कनखल सनातनियों का प्रमुख तीर्थस्थल है. ऐसी धार्मिक मान्यता है कि सावन के महीने में भगवान शिव कनखल आते हैं और यहीं निवास करते हैं. यहां कनखल में दक्षेश्वर महादेव मंदिर सालों से स्थित है. भक्तों के बीच शिव जी का यह मंदिर भी काफी प्रचलित है. इस मंदिर की कथा इस प्रकार है-
राजा दक्ष ने करवाया था महायज्ञ
राजा दक्ष, जो माता सती के पिता थे और ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे. एक बार कनखल में उन्होंने एक विशाल यज्ञ आयोजित करवाया था. लेकिन उस यज्ञ के लिए उन्होंने अपनी बेटी और भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया था. मगर उसके बावजूद भी सती माता अपने मायके कनखल में आई थी. माता सती ने यहां यज्ञ में सभी देवी-देवताओं को बुलाया गया है लेकिन उनके पति शिव जी के लिए कोई स्थान नहीं था. तब माता सती ने अपने पिता राजा दक्ष से इसका कारण पूछा, जवाब में राजा दक्ष ने भगवान शिव के लिए बुरे-बुरे शब्दों का इस्तेमाल किया.
माता सती ने किया अग्नि स्नान
राजा दक्ष ने माता सती के अपमान के साथ-साथ भोलेनाथ जी का भी घोर अपमान किया था. अपने पति के खिलाफ बुरे शब्दों को सुन माता सती क्रोधित हो गई. उन्होंने कहा कि मेरे पति ने यहां आने से मुझे रोका था लेकिन उनकी बात न मानकर मैंने बहुत बड़ी भूल की है. इसके बाद माता सती ने शिव जी के अपमान को देखते हुए यज्ञ कुंड की अग्नि में ही छलांग लगा दी. उन्होंने अग्नि स्नान कर लिया और प्राण त्याग दिए. वहीं, दूसरी ओर नंदी दौड़ते हुए कैलाश गया, जैसे ही भगवान शिव को सती के अग्नि स्नान के बारे में बताया तो उनकी क्रोधाग्नि भड़क गई. उन्होंने अपनी जटाओं से वीरभद्र को जन्म दिया. वीरभद्र ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया और पूरे ब्रह्मांड को तहस-नहस कर दिया.
शिव जी ने वीरभद्र को कनखल भेजा और आदेश दिया की राजा दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दें. इस घटना के बाद राजा दक्ष की राजधानी कनखल में भी वीरभद्र ने कोहराम मचाया. सभी देवी-देवता शिव जी के इस रौद्र रूप से भयभीत हो गए थे. सभी ने भगवान शिव से ब्रह्मांड की रक्षा के लिए प्रार्थना की. तब भगवान शिव कनखल में अपने ससुराल आए और राजा दक्ष के धड़ पर एक बकरे का सिर लगा दिया. इसके बाद राजा दक्ष ने शिव जी का अपमान किए जाने पर उनसे क्षमा याचना की और विध्वंस थमा.
राजा दक्ष की पत्नी ने शिव जी से किया ससुराल आने का अनुरोध
राजा दक्ष की पत्नी प्रसुति सती माता की मां थी. उन्होंने शिव जी से अनुरोध किया कि वे हर वर्ष श्रावण मास में कनखल आए और वहां एक महीने के लिए वास करें. भगवान शिव ने अपनी सास की प्रार्थना को स्वीकार किया और कहा जाता है कि तब से हर साल भगवान शिव कनखल में जाते हैं और निवास करते हैं.
कनखल में बना पहला स्वयंभू शिवलिंग
राजा दक्ष को जीवन दान देने के बाद कनखल में एक स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ था. उस शिवलिंग का नाम दक्षेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है. मान्यता है कि यह ब्रह्मांड का पहला स्वयंभू शिवलिंग है. हर वर्ष सावन के महीने में कनखल में दक्षेश्वर महादेव मंदिर में भगवान शिव का जलाभिषेक करने के लिए लाखों भक्त इक्ट्ठा होते हैं.
काशी नगरी कैसे बना माता पार्वती का ससुराल?
सनातन धर्म में काशी सिर्फ एक शहर नहीं बल्कि आस्था, भावना और मोक्ष का केंद्र माना जाता है. कहते हैं कि यह शहर उतना ही पुराना है जितना खुद समय है. यही वजह है कि इसे आनंदवन और मोक्ष नगरी भी कहते हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, काशी नगर भगवान शंकर का सबसे प्रिय धाम है. यहां आज भी भगवान शिव, माता पार्वती के साथ विराजमान हैं. कथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव का माता पार्वती से विवाह हुआ तो वे उन्हें अपने साथ कैलाश पर्वत ले गए. कुछ समय तक तो सब ठीक रहा, लेकिन फिर एक दिन माता पार्वती जी को लगा कि शादी के बाद भी वे अपने पिता के घर ही रह रही हैं. दरअसल, कैलाश पर्वत भी हिमालय की एक श्रृंखला है. इसलिए, उन्हें ऐसा लगता था.
कैसे हुई थी काशी की स्थापना?
इसके बाद एक दिन माता पार्वती ने भोलेनाथ से कहा कि हर स्त्री विवाह के बाद अपने पति के घर जाती है, पर मैं तो अब तक अपने पिता के घर ही रह रही हूं. माता पार्वती की यह बात सुनकर भगवान शिव उन्हें लेकर पृथ्वी पर ले आए और गंगा तट पर बसे उस दिव्य स्थान काशी को अपना घर बनाया. काशी स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर में स्वयं महादेव विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान है. यह मंदिर न सिर्फ श्रद्धालुओं के लिए आस्था का मुख्य केंद्र है बल्कि सनातन संस्कृति और अध्यात्म का अद्भुत संगम भी है. मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से भगवान विश्वनाथ के दर्शन करतें हैं, वह अपने सारे पापों से मुक्त हो जाते हैं और उसके जीवन में शांति एवं समृद्धि आती है.
महादेव के त्रिशूल पर टिकी है मोक्ष नगरी काशी
कहा जाता है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन भगवान विश्वनाथ की आराधना करता है, उसकी जीवन यात्रा की सारी जिम्मेदारी स्वयं महादेव अपने ऊपर ले लेते हैं. भक्त के दुख, संकट और कष्ट मिटाकर शिव उसे मोक्ष का मार्ग प्रदान करते हैं. यही कारण है कि काशी को मोक्ष नगरी भी कहा जाता है. काशी की गलियों, घाटों और मंदिरों में जीवन और मृत्यु दोनों का अनोखा संगम देखने को मिलता है. लोग अपने जीवन के अंतिम क्षण काशी में बिताने आते हैं. ऐसा विश्वास है कि जो व्यक्ति काशी में अपने प्राण त्यागता है, उसे मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है.
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(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए प्रदान की गई है. News Nation इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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