अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहा परमाणु विवाद एक बार फिर चर्चा में है। कई महीनों से दोनों देशों के बीच रुक-रुक कर बातचीत जारी है ताकि नए परमाणु समझौते पर सहमति बन सके। जिनेवा में दोनों देशों के अधिकारियों के बीच अहम बैठक हुई। इस बैठक का मकसद था अमेरिका की संभावित सैन्य कार्रवाई को टालना। बातचीत के बाद ईरान ने दावा किया कि दोनों पक्ष किसी समझौते के लिए “मार्गदर्शक सिद्धांतों” पर सहमत हुए हैं। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि बातचीत में “थोड़ी प्रगति” जरूर हुई है, लेकिन कई बड़े मुद्दों पर दोनों देशों के बीच अभी भी गहरी खाई बनी हुई है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के कई कारण मौजूद हैं, और ईरान के लिए समझौता करना ही समझदारी होगी। वहीं, डोनाल्ड ट्रंप लगातार नए परमाणु समझौते की बात करते रहे हैं। लेकिन कुछ मौकों पर उन्होंने ईरान में सत्ता परिवर्तन की इच्छा भी जाहिर की है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि अगर हालात बिगड़ते हैं, तो क्या कोई संभावित सैन्य कार्रवाई सिर्फ परमाणु ठिकानों तक सीमित रहेगी — या फिर मामला उससे कहीं आगे बढ़ सकता है?
विरोध प्रदर्शन: जनवरी की शुरुआत में ईरानी शासन द्वारा हजारों प्रदर्शनकारियों की हत्याओं के विरोध में ट्रंप ईरान पर हमला करने के करीब पहुंच गए थे। उन्होंने लिंकन मिसाइल को मध्य पूर्व भेजने का आदेश दिया, क्योंकि ईरान ने उन विरोध प्रदर्शनों पर दमन किया जो शुरू में आर्थिक शिकायतों से प्रेरित थे, लेकिन बाद में इस्लामी गणराज्य के खिलाफ एक जन आंदोलन में बदल गए। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद सत्ता में आए धार्मिक नेतृत्व ने प्रदर्शनों का घातक बल से जवाब दिया और सत्ता पर अपना कब्जा जमाए रखा है। व्यवस्था के कई विरोधी बाहरी हस्तक्षेप को ही बदलाव का सबसे संभावित कारण मान रहे हैं। ट्रंप ने बार-बार ईरान को चेतावनी दी थी कि अगर उसने प्रदर्शनकारियों की हत्या की, तो संयुक्त राज्य अमेरिका सैन्य हस्तक्षेप करेगा और उन्होंने ईरानियों को सरकारी संस्थानों पर कब्जा करने के लिए प्रोत्साहित करते हुए कहा था, मदद आ रही है। उन्होंने पिछले महीने हमले का आदेश वापस ले लिया, यह कहते हुए कि तेहरान ने वाशिंगटन के दबाव में 800 से अधिक फांसी की सजा रोक दी थी, लेकिन तब से उन्होंने ईरान के खिलाफ धमकियां दोहराई हैं।
चेखोव का विमानवाहक पोत: बार-बार धमकियाँ देने के बावजूद, ट्रंप ने दूसरा विमानवाहक पोत मध्य पूर्व भेजकर यह संकेत दिया है कि अगर ईरान के साथ जल्द समझौता नहीं हुआ तो वह उस पर हमला करेंगे। अभी तक समझौते के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं, लेकिन खतरे की घंटी बज रही है, जो एक आसन्न युद्ध का संकेत है।
इजरायली दबाव: एक्सियोस की एक रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली सरकार जनवरी में ट्रंप द्वारा विचारे गए मामूली हमलों से कहीं आगे बढ़कर ईरान के साथ युद्ध के लिए तैयार है। रिपोर्ट के मुताबिक, परमाणु वार्ता के दौरान भी ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने घनिष्ठ समन्वय बनाए रखा और ईरान पर नया आर्थिक दबाव डालने पर सहमति जताई।
तेल का पहलू: मौजूदा तेल बाज़ार ईरान पर हमला करने के लिए ट्रंप को एक रणनीतिक अवसर प्रदान करता है। एक्सियोस की एक रिपोर्ट के अनुसार, बाज़ारों में तेल की पर्याप्त आपूर्ति है, कीमतें अपेक्षाकृत कम हैं, मांग में वृद्धि मामूली है और ईरान की परोक्ष क्षमताएं कमजोर हैं। हमला होने पर तेल की कीमतों में उछाल आएगा। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, अगर वास्तव में तेल का कोई नुकसान नहीं होता है या केवल ईरान के निर्यात में बाधा आती है, तो यह वृद्धि डॉलर और अवधि के संदर्भ में सीमित रहने की संभावना है।
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मीडिल ईस्ट में इतने सारे देश हैं, लेकिन ईरान का नाम आप आए दिन सुनते होंगे। ईरान का हिजबुल्ला, हमास, हूती को समर्थन, उसके लिए मिसाइल हमला। इजरायल को धमकाना। लेकिन ऐसा क्या फायदा है ईरान का जो पूरी दुनिया के खिलाफ जाकर इन ग्रप्स के साथ खड़ा है और इजरायल और अमेरिका को आखें दिखा रहा है। वहीं अमेरिका और ईरान जो कभी एक दूसरे के अच्छे दोस्त और ट्रेडिंग पार्टनर थे, आज फूंटी आंख नहीं भाते हैं। अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबंध लगाकर उसकी अर्थव्यवस्था को जमीन पर ला दिया। फिर भी ईरान सबकुछ दांव पर लगाकर अमेरिका के खिलाफ खड़ा है।
अमेरिकी एम्बेसी पर हमला और फिर ऐसे बिगड़े संबंध की कभी जुड़ न पाए
1979 में ईरानी रेवोल्यूशन के दौर में नवंबर 4, 1979 को तेहरान की अमेरिकी एम्बेसी पर हमला हुआ। इसमें 63 लोगों को कब्जे में लिया गया। उसके बाद तीन और लोगों को बंदी बनाकर लाया गया।कुल 66 लोगों को बंदी बनाया गया। छात्रों ने बंधकों के बदले अमेरिका से शाह को लौटाने की मांग की जो उस वक्त ईरान से भागकर अमेरिका की पनाह में थे। अमेरिका ने जवाब में देश के बैंकों में मौजूद ईरान की संपत्ति जब्त कर ली। अमेरिकी राष्ट्रपति ने बाकायदा आर्मी ऑपरेशन Eagle Claw की मदद से बंधकों को छुड़वाने की कोशिश भी की थी, लेकिन ये सफल न हो पाया। इस ऑपरेशन में 8 अमेरिकी सर्विसमैन और 1 ईरानी नागरिक की मौत भी हो गई थी। सितंबर में इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला बोल दिया। ईरान को साथ की जरूरत थी। लेकिन लगभग सभी देशों की शर्त थी कि अमेरिकी नागरिकों को कैद में रख कर ईरान मदद की अपेक्षा नहीं कर सकता। जिसके बाद अल्जीरिया के राजनयिकों की मध्यस्थता से कुछ दिन बाद उनमें से कई लोगों को छोड़ा गया, लेकिन बचे 52 लोगों को तेहरान की अमेरिकी एम्बेसी में ही 444 दिनों तक रहना पड़ा यानी पूरे डेढ़ साल तक। इन 52 बंधकों को 20 जनवरी, 1981 में छुड़वाया गया था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने इसे ब्लैकमेल और आतंकवाद की घटना बताई थी। ये घटना इतनी ताकतवर थी कि अमेरिका में भी जिमी कार्टर को अपनी सत्ता गंवानी पड़ गई थी। इसे ईरान में अमेरिकी के दखल का विरोध बताया जा रहा था। इस घटना के बाद से अमेरिका और ईरान के रिश्ते कभी सामान्य नहीं हो पाए।
ओबामा ने साइन की ऐतिहासिक न्यूक्लियर डील, ट्रंप ने किया बैक-ऑफ
2015 में जब ओबामा प्रेसिडेंट थे तो अमेरिका ने ईरान के साथ एक न्यूक्लियर डील साइन की थी। वर्ष 2015 में ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कई विश्व शक्तियों फ्रांस, ब्रिटेन,रूस, चीन और जर्मनी के बीच हुआ यह एक ऐतिहासिक समझौता था. सामूहिक रूप से इस समझौते को P5+1 के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन 8 मई 2018 को डोनाल़्ड ट्रंप ने इस न्यूक्लियर डील से अपने कदम वापस खींच लिए। उन्होंने कहा कि अमेरिका अब न्यूक्लियर डील में भागीदार नहीं होगा। उन्होंने कहा कि ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को नियंत्रित करने में विफल रहा। ट्रंप ने कहा था कि मीडिल ईस्ट में फैली अशांति के पीछे ईरान जिम्मेदार है। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता ही रहा। ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रमों पर लगे प्रतिबंधों को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया। सऊदी अरब के तेल टैंकर पर ड्रोन अटैक हुआ तो अमेरिका ने आरोप लगाया कि ये ईरान ने करवाया है। 2019 में अमेरिका के एक ड्रोन को ईरान ने मार गिराया। ईरान ने कहा कि वो उनके हवाई क्षेत्र में घूम रहा था।
कासिम सुलेमानी की मौत और बिगड़े रिश्ते
8 अप्रैल 2019 को ट्रंप ने एक और अनोखे फैसले में ईरान की इस्लामिक रिव्यल्यूशनरी गार्ड कॉप्स को फॉरेन टेररिस्ट ऑर्गनाइजेशन का दर्जा दे दिया। ये पहली बार था जब किसी दूसरी देश की सेना को आतंकवादी संगठन कहा गया। 28 दिसंबर 2019 को इराक के अंदर मौजूद अमेरिकी मिल्ट्री बेस पर रॉकेट अटैक हुआ। इसमें एक अमेरिकी कॉट्रैक्टर की मौत हो गई। इस हमले के लिए अमेरिका ने ईरान की मीलिट्री को जिम्मेदार ठहराया। फिर आया जनवरी 2020 का वक्त जब फ्लोरिडा में अपने घर पर छुट्टियां मना रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आधी रात एक ट्वीट किया जिसमें एक शब्द भी नहीं लिखा बस अमेरिका के झंडे को पोस्ट भर कर दिया। दरअसल, ट्रंप के इस ट्वीट की क्रोनोलाजी इराक के बगदाद में अमेरिकी सेना के उस एयर स्ट्राइक से जुड़ी थी। जिसमें उसने ईरान के सबसे ताकतवर जनरल कासिम सुलेमानी को मार डाला। कासिम ही थे जो पश्चिम एशिया में ईरान के लिए किसी भी मिशन को अंजाम देते थे। कुद्स फोर्स ईरान के रेवॉल्यूशनरी गार्ड्स की विदेशी यूनिट का हिस्सा है। इसे ईरान की सबसे ताकतवर और धनी फौज माना जाता है। उनकी मौत से यकीनन एक मुल्क के तौर पर ईरान बुरी तरह जख्मी हुआ। ट्रंप ने उस वक्त कहा कि उन्हें खबर मिली थी कि जनरल सुलेमानी अमेरिका के खिलाफ किसी अटैक की प्लानिंग कर रहे थे।
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