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History of Iran Chapter 2 | ईरान में शिया ज्यादा हैं सुन्नी?|Teh Tak

अतीत में ईरान काफी बड़ा और ताकतवर देश रहा है। ईरान की सीमा वक्त के साथ-साथ घटती बढ़ती रही। खासतौर पर अगर आज के ईरान और प्राचीन ईरान की बात करें तो सिकंदर से लेकर तुर्क और अरब देशों के आक्रमणकारियों ने ईरान को अपना निशाना बनाया। बताया जाता है कि सातवीं शताब्दी में अरब के खलीफाओं ने जब अपनी सीमाओं का विस्तार किया तो उन्होंने ईरान के आसपास के देशों पर कब्जा करने के साथ ही ईरान को भी अपने कंट्रोल में ले लिया था। आठवीं सदी तक पारसी बहुसंख्यक देश ईरान में इस्लामी कानूनों को सख्ती से लागू किया जाने लगा। बड़े पैमाने पर यहां धर्मांतरण हुआ। इस्लामी हुकूमत आने के बाद लाखों पारसी पूरब की तरफ पलायन करने लगे। उनमें से कुछ पारसी भारत आकर बस गए। 

इसे भी पढ़ें: History of Iran Chapter 1 | मेसेडोनिया का सिकंदर कैसे बना पर्शिया का सुल्तान |Teh Tak

ईरान में शिया या सुन्नी क्या ज्यादा हैं

ईरान एक इस्लामिक देश है.यहां की लगभग 99 प्रतिशत आबादी इस्लाम धर्म को मानती है। हालांकि, इस्लाम के भीतर भी अलग-अलग धाराएं और संप्रदाय होते हैं। ईरान में रहने वाले मुसलमानों में से करीब 90 से 95 प्रतिशत लोग शिया मुस्लिम हैं, जबकि 5 से 10 प्रतिशत लोग सुन्नी मुस्लिम हैं। इसी वजह से ईरान को दुनिया का सबसे बड़ा शिया बहुल देश माना जाता है। इसके अलावा ईरान में बहुत कम संख्या में यहूदी, ईसाई, पारसी और बहाई समुदाय के लोग भी रहते हैं। बहाई धर्म को ईरान में आधिकारिक मान्यता नहीं मिली हुई है। 

शिया सुन्नी होते कौन हैं-

सुन्नी- सुन्नत का मतलब उस तौर तरीक़े को अपनाना है जिस पर पैग़म्बर मोहम्मद (570-632 ईसवी) ने ख़ुद अमल किया हो और इसी हिसाब से वे सुन्नी कहलाते हैं। दुनिया के लगभग 80-85 प्रतिशत मुसलमान सुन्नी हैं जबकि 15 से 20 प्रतिशत के बीच शिया हैं।
शिया- शिया मुसलमानों की धार्मिक आस्था और इस्लामिक क़ानून सुन्नियों से काफ़ी अलग हैं। वह पैग़म्बर मोहम्मद के बाद ख़लीफ़ा नहीं बल्कि इमाम नियुक्त किए जाने के समर्थक हैं। उनका मानना है कि पैग़म्बर मोहम्मद की मौत के बाद उनके असल उत्तारधिकारी उनके दामाद हज़रत अली थे।
इन दोनो पंथों का बंटवारा पैगंबर मोहम्मद के निधन के बाद हुआ। मोहम्मद साहब के बाद उनका उत्तराधिकारी कौन होगा? इसको लेकर दोनों पंथों में मतभेद हैं। जिस शरिया कानून पर इस्लाम चलता है वो भी इन दोनों पंथों में कुछ मुद्दों में अलग-अलग है। पैगंबर मोहम्मद का जन्म 570ईं के आसपास माना जाता है। उनकी मृत्यु 632 ई के आसपास की मानी जाती है। 40 साल की उम्र में उन्हें अल्लाह का आखिरी दूत घोषित किया गया। 

अज़ान से लेकर नमाज़ तक के तौर तरीके अलग अलग

सुन्नी समुदाय ने हज़रत अबु बक्र के बाद हज़रत उमर, हज़रत उमर के बाद हज़रत उस्मान और हज़रत उस्मान के बाद हज़रत अली को अपना खलीफा चुना। जबकि शिया मुसलमानों ने खलीफा के बजाय हज़रत अली को अपना इमाम माना और हज़रत अली के बाद ग्याहर अन्य इमामों को मोहम्मद साहब का उत्तराधिकारी माना। खलीफा और इमाम का अर्थ लगभग एक जैसा ही है, इन दोनों का ही अर्थ उत्ताराधिकारी का है। यानी दोनों ही समुदायों के बीच असल लड़ाई मोहम्मद साहब के उत्तराधिकारी के पद को लेकर है। हालांकि दोनों ही समुदायों में काफी सारी भिन्नताएं हैं जो दोनों को ही एक दूसरे से अलग करती है। इन दोनों समुदाय के लोगों की अज़ान से लेकर नमाज़ तक के तौर तरीके अलग अलग हैं। 

क्यों दो धड़ों में बंट गए मुसलमान

पैगंबर मोहम्मद साहब अपने शहर पहुंचे और कुछ ही महीनों के बाद उनका निधन हो गया। मोहम्मद साहब के निधन के बाद मोहम्मद साहब की गद्दी पर उनका कौन वारिस बैठेगा इसी को लेकर दोनों ही समुदाय अलग-थलग पड़ गए। एक पक्ष का मानना था कि मोहम्मद साहब ने किसी को अपना वारिस नहीं बनाया है। इसलिए योग्य शख्स को चुना जाए। दूसरे पक्ष का मानना था कि पैगंबर मोहम्मद ने गदीर के मैदान में जो घोषणा की थी वो वारिस को लेकर ही थी। एक धड़े ने पैगंबर मोहम्मद के ससुर अबु बक्र को अपना नेता माना। जबकि दूसरे धड़े ने पैगंबर मोहम्मद के दामाद हजरत अली को अपना नेता माना। पैगंबर मोहम्मद के कथनों और कार्यों यानी सुन्ना में विश्वास रखने वाले सुन्नी कहलाए। हजरत अली को पैगंबर मोहम्मद का वारिस मानने वाले शियाने अली यानी शिया कहलाए। 

ईरान में शिया क्यों ज्यादा हैं?

ईरान में शिया इस्लाम की जड़ें बहुत गहरी हैं। यहां मुख्य रूप से बारह इमामों को मानने वाला शिया संप्रदाय को देश का राजकीय धर्म माना जाता है। शिया मुसलमानों का मानना है कि पैगंबर मोहम्मद के बाद नेतृत्व उनके परिवार के लोगों को मिलना चाहिए था। शिया बारह इमामों में विश्वास रखते हैं। बारहवें इमाम, इमाम महदी, एक दिन वापस लौटेंगे और न्याय स्थापित करेंगे। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान में शिया धर्मगुरुओं की ताकत बहुत बढ़ गई। आज धर्मगुरु राजनीति में बड़ा रोल निभाते हैं, सुप्रीम लीडर सबसे ताकतवर पद होता है, धार्मिक विद्वानों की बात को सामाजिक और कानूनी मामलों में अंतिम माना जाता है। ईरान की सरकार और कानून व्यवस्था पर शिया इस्लाम का सीधा असर दिखाई देता है।

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History of Iran Chapter 1 | मेसेडोनिया का सिकंदर कैसे बना पर्शिया का सुल्तान |Teh Tak

युद्ध के मैदान में सिकंदर खड़ा है। सामने एक रथ पड़ी है और उस पर एक लाश पड़ी है। ये लाश उस राजा की होती है जो धरती पर सबसे बड़े साम्राज्य का अधिनायक था। सिकंदर अपने दुश्मन की मौत से दुखी था। उसे जिंदा पकड़ना चाहता था। निराशा से भरा सिकंदर राजा के मृत शरीर के पास जाता है। उसकी ऊंगली में से अंगूठी उतारकर खुद पहन लेता है। इसी के साथ मिसिडोनिया का सिकंदर पर्शिया का सुल्तान बन जाता है। सिकंदर ने जब पर्शिया पर आक्रमण किया तो वहां डेरियस III का शासन था। सिकंदर की जीत के बाद, फारसी साम्राज्य का पतन हो गया, और सिकंदर ने एक विशाल साम्राज्य पर शासन करना शुरू कर दिया। सिकंदर की मौत के बाद 200 सालों तक फारस सामंतों के कब्जे में रहा। सातवीं सदी में ईरान में इस्लाम आया। इससे पहले ईरान में जरदोश्त के धर्म के अनुयायी रहते थे। ईरान के इतिहास को मोटा माटी हम तीन हिस्सों में बांट सकते हैं। 630 ईसवी से पहले, 630 ईसवी के बाद और 1800 के बाद। एक-एक कर इन्हें समझते हैं। शुरुआत ईसा से 2000 साल पहले से करते हैं।

ईरान को पहले पर्शिया कहा जाता था या फारस भी कहते थे। 2000 साल पहले यूरेशिया यानी यूरोप और एशिया के बीच बड़े-बड़े मैदानों में रहने वाले कबीलाई लोग उस इलाके में आए जिसे आज ईरान कहा जाता है ईरान में सबसे पहले जिन लोगों का निवास था उन्हें एलेमाइट कहते थे धीरे-धीरे राजशाही की शुरुआत हुई और ईरान में जो साम्राज्य उपजा उसे कहा गया असीरियन साम्राज्य। असीरियन के बाद मेडियन नाम का एंपायर स्थापित हुआ इन लोगों की राजधानी थी। हमदान राजाओं की बात करें तो ईरान के इतिहास में एक बड़े महान राजा का नाम था सायरस द ग्रेट जिसने मेडियन साम्राज्य को हराकर एकमेनड एंपायर की स्थापना की। सायरस ने ईरान का साम्राज्य पूर्वी यूरोप तक फैलाया और उन्हीं के दौर में हिंदुस्तान का उत्तरी हिस्सा मसलन अफगानिस्तान और सिंधु नदी के पश्चिम का इलाका ईरान के कब्जे में चला गया। सायरस को ग्रेट सिर्फ इसीलिए नहीं कहा जाता। सायरस एक उदारवादी राजा थे। क्षत्रप यह शब्द सायरस के दौर से निकला है उनके राज्य में अलग-अलग इलाकों में क्षत्रप नियुक्त किए गए जो जनता की भलाई के लिए काम करते थे। इसके अलावा सायरस ने जब बेबीलोन को जीता तो वहां के गुलाम यहूदियों को आजाद कर उन्हें वापस जेरूसलम जाने की इजाजत दी। इसी के चलते यहूदी लोग भी सायरस का बड़ा सम्मान करते हैं।
इसी के चलते यहूदी लोग भी सायरस का बड़ा सम्मान करते हैं यहूदी इतिहास के अनुसार इस घटना के बाद यहूदी वापस जेरूसलम गए और वहां अपना मंदिर बनाया। सायरस के बाद डेरियस जर्क्स नाम के राजा हुए जिनके समय में फारस का साम्राज्य और फला फूला। टेरिस के समय तो फारस का साम्राज्य इस कदर फैल चुका था कि दुनिया की 44 प्रतिशत जनता पर फारस रूल करता था। फारस पर 331 बीसी तक एकमेनड एंपायर का राज रहा।  इस दौरान उनके राजाओं से कुछ गलतियां भी हुई इनमें सबसे बड़ी गलती थी। ग्रीस और मेसेडोनिया पर आक्रमण इस आक्रमण का बदला लेने के लिए मेसेडोनिया के राजा सिकंदर ने फारस पर आक्रमण किया। सैन्य बल में कमजोर होने के बावजूद सिकंदर ने फारस के राजा डेरियस को हरा दिया। कहानी कहती है कि सिकंदर से संधि के लिए डेरियस ने कई खत लिखे। सिकंदर ने जवाब दिया आगे से जब भी खत लिखोगे मुझे अपने बराबर संबोधित नहीं करोगे तुम्हारे लिए मैं किंग ऑफ एशिया हूं। फारस पर कब्जे के बाद सिकंदर भारत आया, लेकिन विश्व विजय का सपना लेकर उसे लौटना पड़ा। 
सिकंदर की असमय मृत्यु के बाद फारस पर सैल्युकेट वंश ने शासन किया उनके बाद पार्थियन वंश आया 200 साल तक फारस सामंतों के कब्जे में रहा। फिर एक और ताकतवर साम्राज्य ससानियन का उदय हुआ जिसके फाउंडर का नाम अर्धशीर था। अर्धशीर के बाद शाहपुर राजा बने। शाहपुर को ईरान में शाहों के शाह शहंशाह के तौर पर जाना जाता है क्योंकि इनके पाले में अनोखा रिकॉर्ड है। शाहपुर वो पहले राजा थे जिन्होंने महान रोमन साम्राज्य के एक राजा वैलेरियन को युद्ध बंदी बना लिया था। इस्लाम के आगमन के बाद लगभग दो सदी तक फारस पर अरबों का रूल रहा। इस दौरान तुर्क कबीलों का भी पर्शिया में आगमन हुआ अब्बासी खिलाफत के समय तुर्क लड़ाकों को गुलामों की तरह फौज में भर्ती किया जाता था। कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली पर राज किया था। वहीं गजनवी वंश जिनके एक शासक महमूद गजनवी ने भारत पर आक्रमण किया। इस वंश ने भी कुछ वक्त के ईरान पर शासन किया था। 
11वीं सदी में फारस पर सेलजुक वंश का राज हो गया यह दौर इस्लाम के गोल्डन पीरियड के तौर पर जाना जाता है जब पर्शिया में एक बार फिर फारसी भाषा का उदय हुआ।

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  Sports

Super 8 में Team India की हार पर मंथन, खराब Strategy से लेकर Playing XI पर उठे गंभीर सवाल

अहमदाबाद में खेले गए सुपर 8 मुकाबले के बाद भारतीय खेमे में आत्ममंथन का दौर शुरू हो गया है। 188 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए टीम 111 पर सिमट गई और 76 रन से हार झेलनी पड़ी। इस हार ने सिर्फ नेट रन रेट को -3.800 तक नहीं गिराया, बल्कि टीम चयन और रणनीति पर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह रहा कि अक्षर पटेल जैसे उपयोगी ऑलराउंडर को प्लेइंग इलेवन से बाहर क्यों रखा गया। हालांकि यह अकेला कारण नहीं था। मैदान पर 11 खिलाड़ी मौजूद थे, लेकिन फैसलों और शॉट चयन में समझदारी की कमी साफ दिखी।

गौरतलब है कि भारत ने टी20 विश्व कप इतिहास में 150 से अधिक रन का सफल पीछा सिर्फ तीन बार किया है, और उन तीनों मुकाबलों में विराट कोहली की अहम भूमिका रही थी। इस बार 188 रन का लक्ष्य था, लेकिन बल्लेबाजी क्रम लय नहीं पकड़ सका।

दक्षिण अफ्रीका ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी चुनी और पावरप्ले में 20 रन पर तीन विकेट गंवा दिए थे। इसके बावजूद डेविड मिलर ने 35 गेंदों पर 63 रन की पारी खेलकर मैच का रुख बदल दिया। उनके साथ डेवॉल्ड ब्रेविस ने संयम और आक्रामकता का संतुलन दिखाया। दोनों के बीच 97 रन की साझेदारी ने टीम को 187 तक पहुंचाया।

भारत की पारी की शुरुआत में ही झटका लगा जब एडेन मार्करम की ऑफ स्पिन पर ईशान किशन बड़ा शॉट खेलने के प्रयास में आउट हो गए। मौजूद जानकारी के अनुसार इस टूर्नामेंट में भारत के 12 विकेट दाएं हाथ के ऑफ स्पिनरों ने लिए हैं और उनमें से अधिकांश पार्ट-टाइम गेंदबाज रहे हैं। यह आंकड़ा लापरवाही की ओर इशारा करता है।

तिलक वर्मा से उम्मीद थी कि वह पारी संभालेंगे, लेकिन उन्होंने भी जल्दबाजी दिखाई। अनुभवी बल्लेबाजों से उम्मीद थी कि वे साझेदारी बनाकर दबाव कम करेंगे, मगर लगातार बड़े शॉट की कोशिश ने हालात बिगाड़ दिए। कप्तान सूर्यकुमार यादव और बाद में हार्दिक पांड्या भी परिस्थिति के अनुरूप संयम नहीं दिखा सके।

मध्यक्रम के विफल होने के बाद निचला क्रम ज्यादा देर टिक नहीं पाया। टीम 18.5 ओवर में ऑलआउट हो गई। सहायक कोच ने स्वीकार किया कि टीम ने बड़े स्तर पर गलतियां की हैं और सुधार की जरूरत है।

अब स्थिति यह है कि सेमीफाइनल की उम्मीद जिंदा रखने के लिए भारत को अपने अगले दोनों मैच बड़े अंतर से जीतने होंगे। साथ ही अन्य नतीजों पर भी नजर रहेगी। यह हार सिर्फ स्कोरबोर्ड पर नहीं, बल्कि रणनीतिक सोच और मैच जागरूकता की कमी को भी उजागर करती है। आगे का रास्ता कठिन जरूर है, लेकिन वापसी की संभावना अभी भी बाकी है।
Mon, 23 Feb 2026 21:03:15 +0530

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