अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मची हलचल के बीच घरेलू सर्राफा और वायदा बाजार में 5 अगस्त 2026 को सोने-चांदी की कीमतों में फिर बढ़त देखने को मिली है। बुधवार सुबह मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर 24 कैरेट शुद्ध सोने का भाव 1,44,811 रुपये प्रति 10 ग्राम और चांदी की कीमत 2,23,845 रुपये प्रति किलोग्राम दर्ज की गई है। गुडरिटर्न्स के अनुसार, आज 24 कैरेट सोने की कीमत 1,45,900 रुपये प्रति 10 ग्राम चल रही है। चांदी का भाव 2,40,000 रुपये प्रति किलो पहुंच गया है। वैश्विक अनिश्चितता और मुद्रास्फीति की चिंताओं के बीच स्पॉट गोल्ड $4,140 प्रति औंस के करीब कारोबार कर रहा है। चांदी भी चढ़कर $60.80 प्रति औंस के पार पहुंच गई है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीतियों और डॉलर इंडेक्स के दबाव में आने से कीमती धातुओं पर असर पड़ा है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से भी सर्राफा बाजार को समर्थन मिला। ब्रेंट क्रूड घटकर $78.50 प्रति बैरल और अमेरिकी WTI क्रूड $75.20 प्रति बैरल के आसपास आ गया है। भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ₹95.30 -₹95.40 के दायरे में स्थिर बना हुआ है।
औद्योगिक व रिटेल मांग से चांदी को मजबूती मिली है। अमेरिका और मध्य पूर्व क्षेत्र (ईरान) के बीच जारी शांति वार्ताओं की अनिश्चितता के कारण निवेशक सुरक्षित निवेश के रूप में सोने-चांदी को प्राथमिकता दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सोने की कीमत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत बनी हुई है, तब तक सर्राफा बाजार में तेजी का सकारात्मक रुझान बना रह सकता है। निवेशकों को सलाह दी जा रही है कि बड़ा निवेश करने के बजाय गिरावट पर धीरे-धीरे (SIP या सिस्टमैटिक तरीके से) निवेश करें।
इंदौर-भोपाल समेत प्रमुख शहरों का लेटेस्ट रेट (Gold Silver Rate)
- इंदौर और भोपाल में 24 कैरेट का 10 ग्राम का भाव 1,45,800 रुपये बनी हुई है। आभूषण बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले 22 कैरेट का भाव 1,33, 650 रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास चल रहा है।
- 18 कैरेट का दाम 1,09,360 रुपये प्रति 10 ग्राम है। भोपाल व इंदौर में 999 शुद्धता वाली चांदी का भाव 2,40,000 प्रति किग्रा के आसपास बना हुआ है।
- मेरठ, जयपुर, दिल्ली और लखनऊ जैसे शहरों में 24 कैरेट सोने का भाव 1,45,900 , 22 कैरेट का भाव 1,33,750 और 18 कैरेट का भाव 1,09,460 प्रति 10 ग्राम है।
- मुंबई, पुणे, नागपुर, जयपुर, दिल्ली और लखनऊ चांदी का भाव 2,40,000 प्रति किग्रा के आसपास बना हुआ है। चेन्नई, हैदराबाद, विजयवाड़ा, विशाखापत्तनम और केरल में 1 किलो चांदी की कीमत भी 2,40,000 रुपये बनी हुए है।
जरूरी बातें
- शनिवार, रविवार और केंद्र सरकार द्वारा घोषित अवकाश के दिनों में नए भाव जारी नहीं किए जाते हैं, इस दौरान बाजार बंद रहता है।
- सोना खरीदते समय हमेशा BIS हॉलमार्क और HUID कोड जरूर जांचें। हॉलमार्क के निशान में BIS लोगो, कैरेट/शुद्धता, HUID नंबर और सेंटर मार्क होता है।
- 24 कैरेट सोने के आभूषण पर 999, 22 कैरेट पर 916 और 18 कैरेट पर 750 लिखा होता है।
- 24 कैरेट गोल्ड 99.9% शुद्ध होता है और 22 कैरेट में 91.6% शुद्धता ( 8.4% अन्य धातु जैसे तांबा, चांदी, जिंक) होती है।
नोट- ऊपर दी गई सोने-चांदी की कीमतों में जीएसटी, टीसीएस और मेकिंग चार्ज जैसे अन्य शुल्क शामिल नहीं हैं, इसलिए शोरूम या स्थानीय बाजार से आभूषण खरीदते समय कीमतों में अंतर देखने को मिल सकता है। सटीक दरों के लिए अपने स्थानीय जौहरी या ज्वैलर्स शॉप से संपर्क करें।
Continue reading on the app
आज से करीब 65 साल पहले रूस ने सफेद मौत के साम्राज्य को चुनौती दी थी। एक ऐसी चुनौती जिसने दुनिया का भूगोल और इतिहास बदल दिया था। दुनिया के पहले परमाणु ऊर्जा से चलने वाले सिविलियन जहाज लेनिन सिर्फ एक आइस ब्रेकर नहीं था। यह सोवियत संघ का यानी इस समय के रूस और उस समय के सोवियत संघ का वो न्यूक्लियर जिद था जिसने बर्फ की दीवार को हमेशा हमेशा के लिए तोड़ दिया। आज 2026 में इस पुराने जहाज की बात इसलिए हो रही है क्योंकि लेनिन ने जो रास्ता बनाया था आज उसी रास्ते पर भारत और रूस की दोस्ती की सबसे बड़ी इबारत लिखी जा रही है। 1950 के दशक की शीत युद्ध चरम पर था। परमाणु ऊर्जा का मतलब केवल एटम बम समझा जाता था। लेकिन 17 जुलाई 1956 को सेंट पीटर्सबर्ग यानी तब का लेनिन ग्रा एडमिलिट्री शिपयार्ड में कुछ ऐसा हुआ जिसने विज्ञान की दिशा बदल दी। वहां लेनिन की नींव रखी गई। रूस चाहता था कि एक ऐसा जहाज बने जो बिना रुके, बिना ईंधन खत्म हुए महीनों तक आर्कटिक की 2 से 3 मीटर मोटी बर्फ को कागज की तरह फाड़ सके और 3 सितंबर 1959 को यह चमत्कार हकीकत बन गया। जब लेनिन समुद्र में उतरा तो अमेरिका समेत पूरी दुनिया दंग रह गई। अब परमाणु ऊर्जा से चलने वाला दुनिया का यह पहला सतह का जहाज है। इसकी ताकत का अंदाजा आप इस बात से लगाइए कि इसे बार-बार बंदरगाह पर तेल भरने के लिए नहीं रुकना पड़ता है। इतना ही नहीं यह रूस की उस आर्कटिक महत्वाकांक्षा की पहली बड़ी जीत थी जिसने उसे इस क्षेत्र का अघोषित राजा बना दिया। इतना ही नहीं एफएसयूई के विशेषज्ञ व्लादमीर के आंकड़े किसी के भी होश उड़ा सकते हैं। लेनिन ने 30 साल तक लगातार सेवा की।
30 साल का महापराक्रम
सबसे पहला पॉइंट है 26 आर्किटिक नेविगेशन। इसने नॉर्दन सी रूट को एक व्यापारिक मार्ग में बदल दिया। दूसरा है 3741 जहाज। लेनिन ने अकेले करीब 3/4000 जहाजों को बर्फ के बीच से सुरक्षित रास्ता भी दिया है। 6,54,000 समुद्री मील यह दूरी पृथ्वी के 30 चक्कर लगाने के बराबर है। अब आप खुद सोचिए दोस्तों कि अगर लेनिन ना होता तो आज रूस का वो उत्तरी तट व्यापार के लिए कभी खुल ही ना पाता। लेनिन ने यह साबित कर दिखाया कि परमाणु आइस ब्रेकर ही भविष्य है और आज रूस के पास 40 से ज्यादा आइस ब्रेकर है जिनमें आठ परमाणु शक्ति से भी लैस हैं। यह दुनिया का सबसे बड़ा बेड़ा है और इसकी नींव इसी लेनिन ने रखी थी।
भारत और रूस इस बर्फीले रास्ते पर एक साथ क्यों आ रहे हैं?
अक्टूबर 2024 में नई दिल्ली में एक ऐतिहासिक बैठक होती है। भारत के जहाज रानी मंत्रालय और रूस की परमाणु दिग्गज रूसाटम के बीच एक वर्किंग ग्रुप बनता है। इसका मकसद है नॉर्दर्न सी रूट यानी एनएसआर को भारत के लिए मेन स्ट्रीम बनाना। भारत के लिए यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इसके तीन बड़े कारण हैं। पहला है समय की बचत। स्वेज नहर के मुकाबले यह रास्ता यूरोप तक पहुंचने में 40% कम लेता है। दूसरा है सुरक्षा। लाल सागर यानी रेड सी में जहाजों पर हमले हो रहे हैं। लेकिन आर्कटिक का रास्ता पूरी तरह सुरक्षित और रूस के नियंत्रण में है। तीसरा मुख्य पॉइंट है ऊर्जा सुरक्षा। भारत रूस से कच्चा तेल और कोयला मंगाता है और यह रास्ता इस सप्लाई को तेज और सस्ता बना देता है। आज भारत न सिर्फ इस रास्ते का इस्तेमाल कर रहा है बल्कि रूस के साथ मिलकर विशाल बुनियादी ढांचे का निर्माण भी कर रहा है और यह दोस्ती का वो स्तर है वो प्रमाण है जहां रूस अपनी सबसे एडवांस तकनीक भारत के साथ साझा कर रहा है और इस वक्त कर रहा है। आज लेनिन रिटायर हो चुका है और मूरमास बंदरगाह पर एक भव्य संग्रहालय के रूप में खड़ा है। यह पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र तो है ही, लेकिन यह रूस की उस तकनीक की विरासत का जीता जागता सबूत भी है।
आर्कटिक में रूस का साझेदार बना भारत
लेनिन से शुरू हुआ यह सफर आज आर्कटिका और साइबेरिया जैसे नए महाशक्तिशाली जहाजों पर पहुंच चुका है। इतना ही नहीं रूस आज आर्कटिक में जो भी कर रहा है भारत उसमें इसका सबसे बड़ा साझेदार बनकर उभर चुका है। यह साझेदारी आने वाली सदी की ग्लोबल सप्लाई चेन को बदल कर रख देगी और इतिहास भी बदल दी जाएगी। लेकिन दोस्तों वो कहा जाता है ना कि संकट का साथी ही असली मित्र होता है और वैश्विक राजनीति के मंच पर अगर किसी दो देशों की दोस्ती इस मुहावरे पर सटीक बैठती है, फिट बैठती है तो वो है भारत और रूस की पक्की दोस्ती। पिछले सात दशकों में दुनिया का भूगोल बदल गया। महाशक्तियां बदल गई और युद्धों के कारण समीकरण बदल गए। लेकिन नई दिल्ली और मॉस्को के बीच का भरोसा कभी खत्म नहीं हुआ। भारत रूस यानी तब का सोवियत संघ की दोस्ती की शुरुआत भारत की आजादी के तुरंत बाद हो गई थी। नॉर्दर्न सीट यानी एनएसआर के जरिए भारत और रूस एक ऐसा समुद्री रास्ता तैयार कर रहे हैं जो स्वेज नहर के मुकाबले 40% छोटा और सस्ता है। भारत और रूस की यारी दोस्ती कोई मजबूरी नहीं है बल्कि एक ऐतिहासिक जरूरत भी है। रूस को अपनी अर्थव्यवस्था के लिए भारत जैसे विशाल बाजार और भरोसेमंद दोस्त की जरूरत है। तो दूसरी तरफ भारत को अपनी रक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक संतुलन के लिए रूस के साथ की बहुत ज्यादा आवश्यकता है। अब लेनिन आइस ब्रेकर की तरह ही यह दोस्ती भी वक्त की जमी हुई बर्फ को काटकर भविष्य का रास्ता बनाने का दम रखती है।
Continue reading on the app