अटलांटिक महासागर का नाम बदलकर ये कर दो...गूगल के CEO से ट्रंप ने की ऐसी डिमांड, सुनते ही सुंदर पिचाई बोले- बिल्कुल नहीं
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को दावा किया कि उन्होंने डिजिटल मैप पर अटलांटिक महासागर का नाम बदलकर 'ट्रंप महासागर' रखने के बारे में सोचा था, लेकिन गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई द्वारा इस प्रस्ताव का विरोध किए जाने के बाद उन्होंने यह विचार छोड़ दिया।
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ट्रंप ने सुंदर पिचाई के साथ हुई अपनी बातचीत को याद किया
सुंदर पिचाई के साथ हुई अपनी बातचीत को याद करते हुए, ट्रंप ने बताया कि उन्होंने गूगल से उसके मैप पर दिखने वाले नाम को बदलने के लिए कहा था, लेकिन पिचाई ने इस अनुरोध को ठुकरा दिया। ट्रंप ने कहा कि मैंने गूगल मैप्स को फोन करके अटलांटिक महासागर का नाम बदलकर 'ट्रंप महासागर' करने के लिए कहा। सुंदर ने कहा कि नहीं, नहीं, नहीं'। उन्होंने कहा कृपया हमसे ऐसा करने के लिए न कहें।
ट्रंप ने बताया कि गूगल ने उनसे कहा कि वे ऐसा बदलाव नहीं कर सकते, क्योंकि महासागर कई देशों तक फैले होते हैं। उन्होंने जॉर्जिया के डाल्टन में एक चुनावी रैली के दौरान इस बारे में बात की। उन्होंने बताया कि उन्होंने गूगल से संपर्क करके एक महासागर का नाम बदलकर अपने नाम पर रखने का सुझाव दिया था, लेकिन कंपनी ने इसे मानने से इनकार कर दिया।
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सुंदर पिचाई ने अटलांटिक महासागर का नाम बदलकर 'ट्रंप महासागर' होने से कैसे बचाया?
ट्रंप के अनुसार, गूगल के प्रतिनिधियों ने उन्हें बताया कि किसी महासागर का नाम बदलना अन्य भौगोलिक विशेषताओं का नाम बदलने से अलग है, क्योंकि महासागर कई देशों तक फैले होते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने आगे कहा कि मैपिंग और नेविगेशन कंपनी उनकी मांग पूरी नहीं कर सकी, क्योंकि महासागर कई देशों में फैले होते हैं। ट्रंप ने कहा, "उन्होंने कहा कि महासागर अलग होते हैं, सर। ये कई देशों तक फैले होते हैं। हालांकि, बाद में ट्रंप ने स्पष्ट किया कि उनका यह सुझाव सिर्फ एक मजाक था। उन्होंने यह भी कहा कि यह उनके द्वारा दिए गए अब तक के सबसे खराब सुझावों में से एक नहीं था। इससे पहले भी ट्रंप ने प्रमुख भौगोलिक विशेषताओं का नाम अमेरिका या अपने नाम पर रखने का सुझाव दिया था।
सऊदी छोड़ भागने लगे अमेरिकी, क्या ट्रंप भांप गए हूतियों का बड़ा प्लान?
यमन के हूती विद्रोही अंसारुल्लाह सऊदी अरब पर इस कदर भारी पड़ रहे हैं कि वहां मौजूद अमेरिका भी घबरा गया है। मीडिया रिपोर्ट दावा कर रही है कि ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन ने सऊदी अरब में मौजूद अमेरिकी एंबेसी से अपने एंप्लाइज और उनकी फैमिली को तुरंत सऊदी अरब छोड़ने का हुक्म दे दिया है। जिस तरह हूतियों से उलझकर सऊदी अरब की रुसवाई हो रही है, उससे अमेरिका को खतशा पैदा हो गया है कि कहीं हूती उसके ठिकानों पर मारना शुरू ना कर दें। अभी तक अमेरिका हूती सऊदी जंग में सीधे नहीं उतरा है और यमन में हूतियों से भिड़ने का उसका पुराना अनुभव बहुत ही खराब रहा है। हूती लड़ाकों ने सऊदी के एयरपोर्ट, तेल फैसिलिटी और बुनियादी ढांचे पर खूब मिसाइल और ड्रोन मारे हैं। बुधवार को हुए ताजा हमलों में तीन लोगों की मौत हुई है। इसमें दम्माम के इंटरनेशनल हवाई अड्डे पर हमला और एक तेल फैसिलिटी पर किया गया ड्रोन अटैक शामिल है। बताया जा रहा है कि आगे आने वाली जंग के मद्देनजर अमेरिका ने सऊदी के साथ-साथ अपनी दूसरी एंबेसी के एंप्लाइजस को भी यूएई, जॉर्डन, क़तर और बहरीन से भी जाने का आदेश दिया है। हालांकि बाद में अमेरिकी स्पोक पर्सन टॉमी पिगाट ने सऊदी दूतावास के कर्मचारियों को हटाए जाने के आदेश की तस्दीक की है। हालांकि पिगॉट ने साफ किया है कि यह आदेश केवल सऊदी अरब में मौजूद उन अमेरिकी सरकारी कर्मचारियों और उनकी फैमिली के सदस्यों पर लागू होता है जिनकी मौजूदगी की जरूरत नहीं है। यानी वो एंप्लई और फैमिली जो वहां गैर जरूरी तौर पर मौजूद है और उन्हें सऊदी से हटाया जा रहा है और वापस अमेरिका भेजा जा रहा है।
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अमेरिकी कर्मचारियों को हटाने के पीछे सऊदी अरब में हुतियों के आम लोगों को निशाना बनाकर किए जा रहे हमलों का हवाला दिया गया है। अमेरिका ने चेतावनी दी है कि हालात तेजी से और ज्यादा गंभीर रूप ले सकते हैं। एक्सपर्ट कहते हैं कि अमेरिका के इशारे और एक्शन बता रहे हैं कि अंसारुल्लाह सऊदी अरब पर और तगड़े हमले कर सकते हैं। इतना ही नहीं सऊदी अरब के सरहदी प्रांतों पर भी खतरा मंडरा रहा है। ब्राज़लियाई जर्नलिस्ट पेपे का दावा है कि यमन के अंसारुल्लाह बाहर से हमला करके सऊदी नहीं जीतेंगे। तुम्हें अंदर के लोग ही सौंप देंगे। दरअसल नजरान, जिजान और असीर ये तीन प्रांत 1934 से पहले यमन का हिस्सा हुआ करते थे। 1934 में सऊदी और यमन में जंग हुई थी। यमन हार गया। सऊदी ने ब्रिटिश की मदद से तीन इलाके छीन लिए। मीडिया रिपोर्ट में दावा किया जाता है कि आज भी वहां के लोग खुद को यमनी मानते हैं। सऊदी नहीं।
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जर्नलिस्ट पेपे का दावा है कि सऊदी के सरहदी इलाकों से लेकर यमन में यह चर्चा चल पड़ी है कि वह अपना हिस्सा सऊदी अरब से वापस लेकर रहेंगे। अगर ऐसा हो गया तो सऊदी किंगडम को बहुत बड़ा झटका होगा। हाल ही के दिनों में जारी अमेरिकी सुरक्षा अलर्ट में कहा गया था कि अमेरिकी सरकारी कर्मचारियों को किसी भी सऊदी हवाई अड्डे का इस्तेमाल करने के लिए खास अनुमति की जरूरत होगी। हूती लड़ाकों ने बार-बार रियाद के किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट को निशाना बनाया है और गंभीर हमले के बाद यह एयरपोर्ट 10 अक्टूबर से बंद था। हालांकि बुधवार को सीमित संख्या में सऊदी एयरलाइंस की उड़ानों का संचालन फिर से शुरू हुआ। बावजूद इसके लुफथानसा और एयर फ्रांस जैसी अहम एयरलाइंस ने नवंबर के मध्य तक अपनी उड़ाने रद्द कर दी हैं। हूतियों के साथ जंग लेकर सऊदी अरब बुरी तरह फंस गया है। यमन के तीसरे सबसे बड़े शहर ताई को हूतियों ने घेर लिया है। जिसके लिए सऊदी को जद्दोजहद करनी पड़ रही है। 27 शहर रणनीतिक रूप से भी होती और सऊदी समर्थित सेना के लिए महत्वपूर्ण है। मिडिल ईस्ट के रणक्षेत्र में अंसारुल्लाह यानी होती लड़ाकों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वे केवल सऊदी अरब समर्थित सेना पर भारी नहीं पड़ रहे बल्कि पूरे यमन के युद्ध क्षेत्र का नक्शा बदलने के बेहद करीब पहुंच चुके हैं। यमन के तीसरे सबसे बड़े और ऐतिहासिक शहर ताईच को हूतियों ने चारों तरफ से लोहे के शिकंजे की तरह घेर लिया। ताईच की इस चौतरफा घेराबंदी के बाद यमन की रियाद समर्थित कठपुतली सरकार और उसके आका सऊदी अरब के पसीने छूटने लगे। ताईच कोई साधारण शहर नहीं है बल्कि यह यमन के दक्षिणी पहाड़ी इलाके का वह अंतिम अभैद्य किला माना जाता है जिसके पार सीधे अदन और बाब अल मंदेब स्टेट का जरूरी रास्ता जाता है। अगर हूतियों का परचम ताइज पर पूरी तरह लहरा जाता है तो यह सऊदी गठबंधन के लिए एक ऐसी करारी और शर्मनाक पराजय बन जाएगी जिसने उसका पूरा सैन्य ढांचा ताश के पत्तों की तरह ढहाने में कामयाबी पा जाएगा। सऊदी अरब के लाखों करोड़ों डॉलर के बारूद और हवाई हमलों को धता बताते हुए हूतियों ने दक्षिण पश्चिम यमन में अपनी पकड़ को इतना मजबूत कर लिया कि ताई से अदन को जोड़ने वाला लगभग 200 किमी लंबा सप्लाई रूट पूरी तरीके से कट चुका है।
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