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सर्बिया ने अपने नागरिकों से कहा, ‘जितनी जल्दी हो सके’ ईरान छोड़ दें

नई दिल्ली, 21 फरवरी (आईएएनएस)। पोलैंड के बाद सर्बिया ने अपने नागरिकों से ईरान छोड़ने की अपील की है। सर्बियाई विदेश मंत्रालय ने अपनी वेबसाइट पर बयान जारी किया।

बयान में कहा गया, “सुरक्षा व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति के कारण, सर्बिया गणराज्य के नागरिकों को ईरान जाने की सलाह नहीं दी जाती है। वहीं, ईरान में मौजूद सभी लोगों को जल्द से जल्द देश छोड़ने की सलाह दी जाती है।”

दरअसल, अमेरिका ने पिछले 22 साल में मिडिल ईस्ट में सबसे बड़ी सैन्य तैनाती की है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस्लामिक रिपब्लिक के न्यूक्लियर प्रोग्राम पर सैन्य कार्रवाई की धमकी भी दे रहे हैं। इन्हीं सब चेतावनियों और धमकियों के बीच, सर्बिया ने ईरान में अपने नागरिकों से “जितनी जल्दी हो सके” देश छोड़ने की अपील की है।

बाल्कन देश ने जनवरी में ही सर्बियाई नागरिकों को ईरान छोड़ने और वहां न जाने के लिए कहा था। दिसंबर 2025 के अंत और जनवरी 2026 की शुरुआत में देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन चल रहे थे।

गुरुवार को ही पोलिश पीएम डोनाल्ड टस्क ने अपने लोगों से ईरान न जाने और वहां से लौट आने की अपील की थी। उन्होंने कहा कि वर्तमान स्थिति को देखते हुए ईरान में मौजूद पोलिश नागरिकों को तुरंत वहां से निकल जाना चाहिए क्योंकि हथियारों से लैस लड़ाई की आशंका के कारण कुछ ही घंटों में निकलना मुमकिन नहीं होगा।

टस्क ने कहा, “प्लीज तुरंत ईरान छोड़ दें… और किसी भी हालत में इस देश में न जाएं।” वारसा के पास जिलोंका शहर में मीडिया के हवाले से कहा, मैं किसी को डराना नहीं चाहता, लेकिन हम सब जानते हैं कि मैं किस बारे में बात कर रहा हूं। लड़ाई की आशंका है।

प्रधानमंत्री ने चेतावनी दी कि कुछ या बहुत ज्यादा घंटों में लोगों को निकालना मुमकिन नहीं हो पाएगा। उन्होंने पोलैंड के लोगों से चेतावनी को गंभीरता से लेने की अपील की थी।

पोलैंड की सरकार ने इस बारे में डिटेल नहीं दी कि कितने पोलिश नागरिक ईरान में रह रहे हैं।

टस्क ने कहा, हमारे अनुभव बुरे रहे हैं। कुछ लोग ऐसी अपीलों को कम आंकते हैं।

इस बीच अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर ट्रंप हमला करने का फैसला लेते हैं तो उनके पास कई सैन्य विकल्प मौजूद हैं। इनमें सीमित और टारगेटेड हमले से लेकर ऐसे सैन्य अभियान भी शामिल हैं जो कई हफ्तों तक चल सकते हैं। कुछ में तेहरान के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाने की भी तैयारी शामिल है।

--आईएएनएस

केआर/

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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1952 में बंगाली भाषा के लिए जान गंवाने वालों को ढाका यूनिवर्सिटी में दी गई श्रद्धांजलि

ढाका, 21 फरवरी (आईएएनएस)। बांग्लादेश में शनिवार को 1952 के भाषा आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई। इस मौके पर बांग्लादेश की ढाका यूनिवर्सिटी में नेशनल शहीद स्मारक पर स्टूडेंट्स, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक समर्थक अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के मौके पर शहीदों को पुष्पांजलि अर्पित करने के लिए इकट्ठा हुए।

इस ऐतिहासिक दिन को यादगार बनाने के लिए लोग आधी रात के ठीक बाद इकट्ठा हुए और शहीदों को सम्मान देने के लिए सुबह तक वहां मौजूद रहे। इस समारोह में बंगाली भाषा की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान करने वालों के प्रति गहरा सम्मान दिखाया गया।

आईएएनएस से ​​बात करते हुए एक स्टूडेंट ने कहा, “मेरा मानना ​​है कि अगर कोई अंग्रेजी शिक्षण संस्थानों में भी पढ़ता है, तो भी उसे बंगाली भाषा सीखनी चाहिए और उसका सम्मान करना चाहिए। नहीं तो, बांग्ला के लिए संघर्ष का मकसद अपना मतलब खो देगा।”

छात्र नेता मकसोदा मोनी ने भी शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा, “आज अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है। इस दिन, हम सभी भाषा शहीदों को याद करते हैं और उनका सम्मान करते हैं। 1952 में आज ही के दिन स्टूडेंट्स और आम नागरिक अपनी मातृभाषा को मान्यता देने की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे थे। उनके बलिदान की वजह से, हम आज गर्व से बंगाली बोल पाते हैं।”

इस मौके पर मौजूद एक सामाजिक कार्यकर्ता अफरीना परवीन ने इस दिन को दुनिया भर में मिली पहचान पर खुशी जताई। उन्होंने कहा, “मुझे गर्व है और मैं शुक्रगुजार हूं कि अब पूरी दुनिया में इंटरनेशनल मदर लैंग्वेज डे मनाया जाता है। मैं उन भाषा शहीदों को अपना गहरा सम्मान और प्यार देती हूं जिन्होंने इसे मुमकिन बनाया।”

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के एक समर्थक ने कहा, “मुझे 21 फरवरी की सुबह इस कार्यक्रम का हिस्सा बनकर गर्व महसूस हो रहा है। यह दिन हमारी मातृभाषा का है। 1952 में, पाकिस्तानी आर्मी ने उन स्टूडेंट्स को मार डाला था, जब उन्होंने उर्दू को अकेली सरकारी भाषा के तौर पर थोपने का विरोध किया था। हम बंगाली हैं, हमारी मां बंगाली हैं और हमारी मातृभाषा बंगाली है। उनकी कुर्बानी को कभी नहीं भुलाया जाएगा।”

इंटरनेशनल मदर लैंग्वेज डे हर साल 21 फरवरी को मनाया जाता है। यह भाषाई विविधता को बनाए रखने और कई भाषाओं वाली शिक्षा को बढ़ावा देने के महत्व पर जोर देता है। 2026 की थीम कई भाषाओं वाली शिक्षा पर युवाओं की आवाजें है, जो भाषाई विरासत को बचाने में युवाओं की भूमिका पर जोर देती है।

इस दिन की शुरुआत 1952 में हुई थी, जब ढाका में स्टूडेंट्स ने बांग्ला को सरकारी भाषा के तौर पर मान्यता देने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था। प्रदर्शन हिंसक हो गए, जिसके कारण कई प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई। यह घटना देश के इतिहास में एक अहम पल बन गई।

नवंबर 1999 में, यूनेस्को ने 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस घोषित किया और संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2002 में इसे मनाने का समर्थन किया। तब से, यह दिन दुनियाभर में सांस्कृतिक विविधता का जश्न मनाने और खतरे में पड़ी भाषाओं के बचाव के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है।

--आईएएनएस

केके/वीसी

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