प्रधानमंत्री किसान योजना की 22वीं किस्त की तारीख नजदीक आ रही है, ऐसे में आगामी किस्तों के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए पिछले वितरण की तारीखों पर एक नजर डालना जरूरी है। पिछले साल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) योजना की 19वीं किस्त 24 फरवरी को जारी की थी। 2024 में, 16वीं किस्त की राशि 28 फरवरी को जमा की गई थी। 2023 में, 13वीं किस्त का हस्तांतरण 27 फरवरी को किया गया था।
पिछले वर्षों की तारीखों के इस क्रम से संकेत मिलता है कि लाभार्थी किसान फरवरी के अंतिम सप्ताह में 22वीं किस्त प्राप्त करने की उम्मीद कर सकते हैं। इस योजना के तहत, आने वाले दिनों में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) प्रणाली के माध्यम से लाभार्थियों के खातों में राशि जमा की जाएगी। पीएम किसान योजना की 22वीं किस्त की प्रतीक्षा कर रहे किसान आधिकारिक वेबसाइट https://pmkisan.gov.in पर नवीनतम अपडेट देख सकते हैं। लाभार्थियों की सूची में उल्लिखित पात्र किसानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनका आधार कार्ड उनके बैंक खाते से जुड़ा हो, क्योंकि धनराशि सीधे उनके खाते में स्थानांतरित की जाएगी।
लाभार्थी सूची में अपना नाम कैसे जांचें
किसान निम्न चरणों का पालन करके ऑनलाइन अपनी स्थिति सत्यापित कर सकते हैं:
- होमपेज पर "लाभार्थी सूची" विकल्प पर क्लिक करें।
- राज्य, जिला, उप-जिला, ब्लॉक और गांव का चयन करें।
- "रिपोर्ट प्राप्त करें" पर क्लिक करें।
पात्रता मानदंड
यह योजना उन छोटे और सीमांत किसानों को कवर करती है जिनके नाम पर कृषि योग्य भूमि पंजीकृत है। लाभार्थी की पहचान भूमि अभिलेखों के आधार पर की जाएगी। हालांकि, संस्थागत भूमिधारक, आयकरदाता, सेवारत या सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी (निर्धारित पेंशन सीमा से ऊपर), और डॉक्टर, इंजीनियर और वकील जैसे पेशेवर इसके लिए अपात्र रहेंगे। कृषि योग्य भूमि के बिना व्यक्ति भी पात्र नहीं हैं।
दस्तावेज़ और अनुपालन संबंधी आवश्यकताएँ
देरी से बचने के लिए, लाभार्थियों को यह सुनिश्चित करना होगा:
- आधार कार्ड उनके बैंक खाते से जुड़ा हो
- ई-केवाईसी पूरा हो
- बैंक खाते की जानकारी सही हो
- भूमि अभिलेखों को ठीक से अपडेट किया गया हो
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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सुप्रीम कोर्ट से आज ऐसा झटका लगा जिसने चुनाव से पहले पूरी सियासत को हिला दी है। आज सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि एसआईआर पर राज्य सरकार और इलेक्शन कमीशन के बीच चल रहा टकराव बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और अब इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी न्यायिक अधिकारियों की देखरेख में होगी। अदालत नेक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को आदेश दिया कि जिला जज और एडीजे स्तर के बेदाग रिकॉर्ड वालेअधिकारियों को इस काम में लगाया जाए जो लोगों के दावे और आपत्तियों पर फैसला करेंगे। यानी अब वोटर लिस्ट पर अंतिम मोहर सरकार नहीं न्यायपालिका की निगरानी में लगेगी। तो ये फैसला ममता सरकार के लिए बड़ा चुनावी झटका माना जा रहा है क्योंकि जिस प्रक्रिया पर सत्ता का नियंत्रण माना जा रहा था वही अब कोर्ट की निगरानी में चली गई है। अब साफ संदेश यह है कि बंगाल में अब चुनावी खेल नियमों से होगा ना कि सत्ता की शर्तों पर और यही वजह है कि इस फैसले को दीदी की राजनीति के लिए बड़ा झटका और आने वाले चुनाव का टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है। तो आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले को समझेंगे। बताएंगे कि कैसे ममता बनर्जी के लिए बैटल ऑफ बंगाल बड़ा मुसीबत बनता जा रहा है।
क्या है पूरा मामला
पश्चिम बंगाल में एसआईआर मसले परसुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच विश्वास की कमी है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि ये न्यायिक अधिकारी एसआईआर प्रक्रिया में निर्वाचन रजिस्ट्रेशन अधिकारियों (ईआरओ) के कार्य का निर्वहन करेंगे। यह कदम इस विवाद के मद्देनजर उठाया गया कि क्या राज्य ने चुनाव आयोग (ईसीआई) को ईआरओ के रूप में कार्य करने के लिए पर्याप्त संख्या में एसडीएम रैंक (ग्रुप बी) के अधिकारी उपलब्ध कराए है या नहीं? राज्य सरकार ने अपनी ओर से चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त माइक्रो-ऑब्जर्वर और विशेष रोल ऑब्जर्वर पर आपत्ति जताई थी। बेंच ने आदेश में कहा कि दोनों संवैधानिक बॉडी यानी लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच दुर्भाग्यपूर्ण आरोप-प्रत्यारोप और दोषारोपण की स्थिति से स्पष्ट है कि उनके बीच विश्वास का अभाव है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों की सहमति को देखते हुए, हमारे पास लगभग कोई अन्य विकल्प नहीं है सिवाय इसके कि हम कलकत्ता हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से अनुरोध करते हैं कि वे वर्तमान में कार्यरत न्यायिक अधिकारियों और अतिरिक्त जिला न्यायाधीश या जिला न्यायाधीश के पद के पूर्व न्यायिक अधिकारियों को उपलब्ध कराएं, जो लंबित दावों की समीक्षा सकें।
राज्य के रुख पर एससी ने जताई निराशा
राज्य की ओर से कपिल सिब्बल और मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि ग्रुप बी अधिकारी उपलब्ध कराए गए है। वहीं, ईसीआई की ओर से दामा शेषाद्रि नायडू ने कहा कि ऐसे एसडीएम रैंक अधिकारी, जो अर्द्ध-न्यायिक आदेश पारित कर सके, उपलब्ध नहीं कराए गए। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के रुख पर निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि ईआरओ के रूप में कार्य करने के लिए अधिकारियों की आवश्यकता है। चीफ जस्टिस ने कहा कि वे ईआऱओ के रूप में अधिकारी मांग रहे है। हमे राज्य से सहयोग की अपेक्षा थी। सीनियर वकील श्याम दीवान पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश हुए और कहा कि माइक्रो-ऑब्जर्वर को आदेश पारित करने से रोके जाने के बाद, ईसीआई ने स्पेशल रोल ऑब्जर्वर नामक एक नई श्रेणी के अधिकारी नियुक्त कर दिए है, जो ईआरओ द्वारा पारित आदेशों की व्यापक समीक्षा कर रहे है। उन्होंने कहा कि स्पेशल रोल ऑब्जर्वर ईआरओ पर हावी नहीं हो सकते। वे किस आधार पर सामूहिक रूप से ईआरओ के निर्णयों को अस्वीकार कर सकते है? चुनाव आयोग की ओर से नायडू ने इस दावे का खंडन किया और कहा कि स्पेशल रोल ऑब्जर्वर शुरुआत से ही नियुक्त थे।
कलकत्ता हाई कोर्ट को निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट को निर्देश दिया है कि जिला जज या अतिरिक्त जिला जल स्तर के वर्तमान और पूर्व न्यायिक अधिकारियों को निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के रूप में नियुक्त किया जाए। इस कदम का उद्देश्य है कि लंबित दावों और आपत्तियों का निष्पक्ष व पारदर्शी निपटारा हो सके। इसी वजह से शीर्ष अदालत को नई व्यवस्था अपनानी पड़ी। आंकड़े बताते हैं कि करीब 5 लाख नाम अब तक खारिज किए जा चुके हैं, जबकि लगभग 5 लाख लोग सुनवाई में शामिल नहीं हुए। करीब 55 लाख नाम अब भी विभिन्न स्तरों पर सत्यापन के लिए लंबित हैं। कुल मिलाकर करीब 70 लाख लोग वोटर लिस्ट से हटाए जा सकते हैं। 28 फरवरी को फाइनल लिस्ट जारी की जानी है।
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