देश की 56% गाड़ियों का बीमा नहीं, सुप्रीम कोर्ट बोला- इन सबका चालान काट दो
सुप्रीम कोर्ट ने बिना इंश्योरेंस वाले वाहनों पर सख्ती करते हुए पेट्रोल न देने का सुझाव दिया है। हाईवे कैमरों से ऑटोमैटिक ई-चालान कटेगा। नई कार के लिए 4 और बाइक के लिए 6 साल का बीमा अनिवार्य।
Seven Years After Article 370: अनुच्छेद 370 हटने के 7 साल पूरे! घाटी में अब कैसे हैं हालात? सात साल बाद कैसा है नया जम्मू-कश्मीर?
आज से ठीक सात साल पहले यानी 5 अगस्त 2019 को देश की संसद ने एक ऐसा फैसला लिया था, जिसकी भनक किसी कोकानों-कान नहीं थी। यहाँ तक कि जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने भी बाद के दिनों में साक्षात्कारों के दौरान इस फैसले पर हैरानी जताई थी। आज ही के दिन जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संवैधानिक प्रावधान—अनुच्छेद 370 और आर्टिकल 35ए को निष्प्रभावी करने का फैसला लिया गया।
संसद में हंगामे और लंबी चर्चा के बाद इस पर मुहर लगी और तब से लेकर आज तक जम्मू-कश्मीर एक केंद्र शासित प्रदेश के रूप में अस्तित्व में है। आज इस फैसले के सात साल पूरे होने पर यह चर्चा लाजिमी है कि आखिर इन वर्षों में घाटी की तस्वीर कितनी बदली है और पाकिस्तान के दुष्प्रचार का भारत ने किस तरह जवाब दिया है।
जम्मू-कश्मीर से जुड़ा इतिहास: राजा हरि सिंह के विलय से लेकर अनुच्छेद 370 तक
तीन तलाक की तरह ही अनुच्छेद 370 का मसला भी भारत की आजादी के साथ ही शुरू हुआ था। वर्ष 1948 में जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह ने भारत में विलय से पहले कुछ विशेषाधिकारों की शर्त रखी थी। जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा होने के बाद भी अलग ही रहा और राज्य का अपना अलग संविधान बना, जहाँ भारत के चुनिंदा कानून ही लागू होते थे। इतिहासकार प्रो. संध्या के अनुसार, मार्च 1948 में महाराजा ने शेख अब्दुल्ला के साथ प्रधानमंत्री के रूप में राज्य में एक अंतरिम सरकार नियुक्त की थी।
जुलाई 1949 में शेख अब्दुल्ला और तीन अन्य सहयोगी भारतीय संविधान सभा में शामिल हुए और जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति पर बातचीत की, जिससे अनुच्छेद-370 को अपनाया गया। अंततः 2019 में चुनाव जीतने के बाद मोदी सरकार ने 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 को पूरी तरह खत्म कर दिया।
क्या थे अनुच्छेद-370 के प्रावधान और संविधान पर इसका असर?
अनुच्छेद 370 में यह प्रावधान किया गया था कि रक्षा, विदेश, वित्त और संचार मामलों को छोड़कर भारतीय संसद को राज्य में किसी कानून को लागू करने के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार की मंजूरी की आवश्यकता होगी। इसके चलते जम्मू और कश्मीर के निवासियों की नागरिकता, संपत्ति के स्वामित्व और मौलिक अधिकारों का कानून शेष भारत में रहने वाले नागरिकों से अलग था। अनुच्छेद-370 के तहत अन्य राज्यों के नागरिक जम्मू-कश्मीर में संपत्ति नहीं खरीद सकते थे और केंद्र के पास राज्य में वित्तीय आपातकाल घोषित करने की शक्ति भी नहीं थी।
इसके अलावा, अनुच्छेद-370 (1) (सी) में उल्लेख किया गया था कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 1 अनुच्छेद-370 के माध्यम से कश्मीर पर लागू होता है। जम्मू-कश्मीर का संविधान 17 नवंबर 1956 को अपनाया गया था और 26 जनवरी 1957 को लागू हुआ था, जिसे 5 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति के आदेश (सीओ 272) द्वारा निष्प्रभावी बना दिया गया।
अनुच्छेद 370 के अलावा आर्टिकल-35A कहां से आया और इसके क्या थे मायने?
जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के अलावा संविधान का आर्टिकल-35ए भी लागू था, जो भारत सरकार की ही देन था। यह आर्टिकल-35ए जम्मू-कश्मीर की विधानसभा को कुछ विशेष शक्तियां प्रदान करता था। कश्मीर के भारत में विलय के बाद शेख अब्दुल्ला को वहाँ का अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया गया था। वर्ष 1952 में अब्दुल्ला और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बीच दिल्ली में एक समझौता हुआ था, जिसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अनुच्छेद-370(1)(डी) के तहत 14 मई, 1954 को एक आदेश पारित कर अनुच्छेद-35ए को लागू किया था।
इसके तहत जम्मू-कश्मीर के लोगों को भूमि, कारोबार और रोजगार संरक्षण के विशेषाधिकार दिए गए, जिससे दूसरे राज्यों के लोगों के लिए संपत्ति और रोजगार के अधिकार समाप्त हो गए थे। इसे संसदीय प्रणाली के तहत संविधान संशोधन के बिना लागू किए जाने के कारण इसकी संवैधानिकता हमेशा विवादित रही।
भारतीयों पर क्या असर पड़ा और अनुच्छेद 370 हटने के बाद घाटी में क्या-क्या बदला?
अब जम्मू-कश्मीर में भी देश के सभी केंद्रीय कानून लागू होते हैं, और मनरेगा तथा शिक्षा के अधिकार जैसे कानून भी प्रभावी कर दिए गए हैं। हालांकि, शुरुआती दौर में इसके कुछ विरोध भी देखने को मिले, राजनीतिक पार्टियों ने इसका बहिष्कार किया और सुरक्षा कारणों से लंबे समय तक इंटरनेट भी बैन रखा गया। इन बदलावों के बाद जमीन पर जो बड़े सकारात्मक परिवर्तन आए हैं, वे निम्नलिखित हैं:
- सरहद तक तिरंगा: सबसे बड़ा बदलाव यह आया कि अब कश्मीर में जगह-जगह तिरंगा फहराया जा रहा है। सरकारी भवनों से लेकर सहरद तक लहराता तिरंगा पाकिस्तान समेत दुनिया को संदेश दे रहा है, और अब राष्ट्रीय पर्व पर गाँवों में भी तिरंगा फहरने के साथ राष्ट्रगान गाया जाने लगा है, जबकि पहले लोग यहाँ तिरंगा उठाने से भी घबराते थे।
- पाकिस्तान परस्ती की आवाज़ों पर लगाम: 5 अगस्त 2019 के बाद हुरियत की ओर से कश्मीर के किसी कोने से पाकिस्तान परस्ती की आवाज नहीं उठी। हवा के बदले रुख को भांपकर अलगाववादी खेमे सैयद अली शाह गिलानी और मीरवाइज उमर फारूक की ओर से भी बंद का आह्वान नहीं किया गया। आम कश्मीरियों ने अलगाववादियों के बंद के पोस्टरों को कोई तवज्जो नहीं दी और अब युवाओं का पूरा ध्यान सिर्फ अपने करियर पर है।
पाकिस्तान समर्थकों पर कड़ा शिकंजा, आतंकवाद का सफाया और ऑपरेशन सिंदूरबदलावों के बीच सरकार ने पाकिस्तान परस्त लोगों पर जबरदस्त शिकंजा कसा। आतंकवादियों से साठगांठ और पाकिस्तान के इशारे पर काम करने वाले सरकारी कर्मचारियों को बर्खास्त करना शुरू किया गया। इसी कड़ी में हिजबुल मुजाहिदीन सरगना सैयद सलाहुद्दीन के दो बेटों की सरकारी सेवा समाप्त कर दी गई और हिजबुल आतंकी के साथ गिरफ्तार डीएसपी दविंदर सिंह को भी बर्खास्त कर दिया गया।
- आतंकियों का सफाया: अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से घाटी में आतंकवादियों की कमर टूट चुकी है। पिछले दो वर्षों में घाटी में 130 टॉप कमांडरों समेत 459 आतंकवादियों को मार गिराने में सुरक्षाबलों को सफलता मिली है। सुरक्षाबलों की सख्ती से 149 आतंकियों ने या तो सरेंडर किया है या वे जिंदा पकड़े गए हैं।
- ऑपरेशन सिंदूर: दहशतगर्दों के खिलाफ सबसे ठोस और हालिया सैन्य कार्रवाई 'ऑपरेशन सिंदूर' है, जिसके बाद भारतीय सेना ने मई 2025 में पाकिस्तान के भीतर बने आतंक के अड्डों को नेस्तनाबूद कर दिया।
- पाकिस्तान की बौखलाहट: अनुच्छेद-370 हटने के बाद पाकिस्तान इतना बौखलाया कि सरहद पर हर रोज सीजफायर तोड़ने लगा। जहाँ 2018 में पाकिस्तान ने सीमा पर 1800 बार गोलीबारी की थी, वहीं अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद 2019 में ही सरहद पर 3200 बार गोलाबारी की गई (अगस्त से 31 दिसंबर 2019 के बीच ही 1400 बार उल्लंघन हुआ), और अगले साल 2020 में 5100 बार गोलाबारी कर सारी हदें पार कर दी गईं। इसके बावजूद भारत की मजबूत रणनीति के आगे पाकिस्तान की हर चाल नाकाम साबित हुई है।
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