न्याय की चौखट पर सियासत और संवैधानिक मर्यादा का संकट
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 12 अक्टूबर 2026 की तारीख एक ऐसी असाधारण और चिंताजनक घटना के रूप में दर्ज हो चुकी है, जिसने संवैधानिक संस्थाओं के बीच पारस्परिक सम्मान की सीमाओं को पूरी तरह से धुंधला कर दिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे 'स्पेशल इनटेंसिव रिवीजन' की प्रक्रिया के खिलाफ विपक्ष के नेता राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के तमाम शीर्ष नेताओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट परिसर तक निकाला गया विरोध मार्च सिर्फ एक राजनीतिक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि वह न्याय की सर्वोच्च देहरी पर जन-दबाव बनाने का एक ऐसा अभूतपूर्व प्रयास था, जिसकी अनुमति हमारा संवैधानिक ढांचा कभी नहीं देता। 15 अक्टूबर 2026 को इस संवेदनशील मामले पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने जो बेहद सख्त रुख अपनाया, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि लोकतंत्र की आत्मा उसकी संस्थाओं की गरिमा और उनकी स्वतंत्रता में बसती है, न कि सड़कों पर उमड़ने वाली राजनीतिक भीड़ के कोलाहल में।
अदालत का सुनवाई के दौरान यह कहना कि "हम आइवरी टावर (हाथीदांत के मीनारों) में नहीं बैठे हैं, हमें सब पता है कि बाहर क्या बयान दिए जा रहे हैं और कोर्ट के भीतर क्या कहा जा रहा है", देश के पूरे राजनीतिक नेतृत्व के लिए एक गंभीर और ऐतिहासिक चेतावनी है। जब देश का विपक्ष का नेता, जिसके पास कैबिनेट मंत्री का दर्जा होता है और जो संसद के भीतर देश की जनता की आवाज का प्रतिनिधित्व करता है, स्वयं समर्थकों की भारी भीड़, नारेबाजी और हंगामे के बीच देश की सर्वोच्च अदालत की रजिस्ट्री में याचिका दाखिल करने पहुंचता है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब न्यायिक प्रक्रियाओं का फैसला भी सड़कों के संख्याबल से तय होगा? यह संपादकीय इसी गहरे और गंभीर संवैधानिक संकट का निष्पक्ष विश्लेषण करने का प्रयास है कि आखिर विपक्ष के इस कदम के पीछे की राजनीति क्या है, न्यायपालिका की चिंताएं कितनी जायज हैं और भारतीय लोकतंत्र को इस अभूतपूर्व संस्थागत टकराव से बचाने के लिए किस तरह के संतुलन की आवश्यकता है।
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इस पूरे विवाद की जड़ें किसी न्यायिक फैसले या अदालती आदेश में नहीं, बल्कि देश की चुनावी प्रक्रिया की शुचिता से जुड़ी हैं। चुनाव आयोग द्वारा हाल ही में शुरू की गई 'स्पेशल इनटेंसिव रिवीजन' की कवायद को लेकर गठबंधन और एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने गंभीर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का मुख्य आरोप है कि इस विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया के नाम पर देश भर में करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए हैं। विपक्ष इसे 'वोटों की चोरी' और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करने की एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश करार दे रहा है। इसी के विरोध में पिछले सप्ताह दिल्ली की सड़कों पर विपक्षी कार्यकर्ताओं द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए गए थे, जहां पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज ने आग में घी का काम किया था।
राजनीतिक रूप से चुनाव आयोग के फैसलों का विरोध करना और उस पर सवाल उठाना विपक्ष का न सिर्फ लोकतांत्रिक अधिकार है, बल्कि उसका कर्तव्य भी है। भारतीय चुनावी राजनीति में ईवीएम से लेकर मतदाता सूचियों में विसंगतियों के दावों तक, विपक्ष हमेशा से मुखर रहा है। इसी सिलसिले में जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव सहित 13 विपक्षी दलों के नेताओं ने एक संयुक्त रिट याचिका के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया, तो देश को लगा कि यह लड़ाई अब पूरी तरह से कानूनी और संवैधानिक दायरे में लड़ी जाएगी। लेकिन, कानूनी याचिका दायर करने की सामान्य प्रक्रिया को जिस तरह से एक विशाल 'राजनीतिक जुलूस' में तब्दील कर दिया गया, उसने इस कानूनी लड़ाई के वास्तविक उद्देश्य पर ही बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए।
12 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के लुटियंस जोन में जो दृश्य दिखाई दिए, वे देश के न्यायिक इतिहास में बेहद दुर्लभ और विचलित करने वाले थे। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के नेतृत्व में हजारों की संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता, विपक्षी दलों के सांसद, छात्र संगठन और समर्थक संसद मार्ग से होते हुए सुप्रीम कोर्ट परिसर की ओर बढ़े। हालांकि सुरक्षा कारणों से पुलिस ने भीड़ को रोकने की कोशिश की, लेकिन विपक्षी नेताओं का एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल और समर्थकों की एक अनियंत्रित भीड़ सुप्रीम कोर्ट के भीतर स्थित 'फाइलिंग काउंटर' तक पहुंच गई।एक ऐसे समय में जब कोर्ट की रजिस्ट्री अपने दैनिक कार्य को समेट रही थी, परिसर के भीतर अचानक पैदा हुए इस राजनीतिक कोलाहल, नारेबाजी और समर्थकों के हुजूम ने सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक तंत्र को कुछ समय के लिए ठप कर दिया। इसके साथ ही, एक तकनीकी और कानूनी पहलू यह भी सामने आया कि इस संयुक्त याचिका में सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने 14 प्रक्रियात्मक खामियां पाई थीं। इनमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पहचान पत्र का धुंधला होना, जरूरी प्राधिकरण दस्तावेजों का गायब होना और यहां तक कि कोर्ट फीस में ₹220 की कमी होना शामिल था। इन मामूली प्रक्रियात्मक त्रुटियों को दूर करने के बजाय, जिस तरह से नेताओं और कार्यकर्ताओं की फौज ने रजिस्ट्री पर दबाव बनाने की कोशिश की, उसने देश के जागरूक वकीलों और नागरिकों को हैरान कर दिया। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन से जुड़े करीब 200 वकीलों ने तत्काल इस घटना का संज्ञान लिया और पत्र लिखकर इस बात पर गहरी चिंता जताई कि देश की सर्वोच्च अदालत को राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन का अखाड़ा बनाया जा रहा है।
जब यह पूरा मामला 15 अक्टूबर को सुनवाई के लिए आया, तो मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ का रुख बेहद कड़ा और मुखर था। कोर्ट ने दो अलग-अलग याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की—पहली याचिका विपक्ष की वह मूल याचिका थी जिसमें चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी; और दूसरी याचिका उन वकीलों की थी जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट परिसर के भीतर राजनीतिक रैलियों, नारेबाजी, और राजनीतिक प्रेस कॉन्फ्रेंस पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने की मांग की थी।अदालत ने दोनों मामलों को बेहद संतुलित लेकिन सख्त तरीके से संभाला। CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि "कोई भी बाहरी दबाव या भीड़ लाकर हमारी न्यायपालिका को डरा-धमका नहीं सकता।" कोर्ट ने सीधे तौर पर याचिकाकर्ता राहुल गांधी के आचरण और उनके इरादों पर सवाल उठाए। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि विपक्ष की मुख्य याचिका पर विचार करना पूरी तरह से 'अनंतिम' है, और राहुल गांधी को सबसे पहले 12 अक्टूबर को कोर्ट परिसर के भीतर और आसपास पैदा हुई अराजकता, भीड़ के प्रवेश और अव्यवस्था पर अपने आचरण की लिखित सफाई देनी होगी। इसके अलावा, कोर्ट ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों को आदेश दिया कि वे उस दिन की सभी सीसीटीवी और डिजिटल फुटेज को सुरक्षित रखें, ताकि यह जांचा जा सके कि इस राजनीतिक जुलूस के दौरान कोर्ट की सुरक्षा से क्या खिलवाड़ हुआ था
यह कानूनी टकराव अब एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गया है जहां अदालत ने चुनाव आयोग , मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी) को नोटिस जारी कर जवाब तो मांग लिया है—जो कि विपक्ष के लिए एक बड़ी वैधानिक राहत हो सकती थी—लेकिन जजों ने तुरंत स्पष्ट किया कि नोटिस जारी करने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि अदालत ने नेताओं के इस आचरण या व्यवहार को स्वीकार या नजरअंदाज कर दिया है।
इस पूरे प्रकरण का सबसे चिंताजनक और दूरगामी पहलू यह है कि यह हमारे संविधान के बुनियादी सिद्धांत 'शक्तियों के पृथक्करण' पर सीधा प्रहार करता है। हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में संसद कानून बनाती है, कार्यपालिका (जिसमें चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्थाएं शामिल हैं) उन्हें लागू करती है, और न्यायपालिका इस बात की समीक्षा करती है कि क्या वे कानून और प्रशासनिक कदम संविधान के अनुरूप हैं या नहीं। इन तीनों अंगों के बीच एक बेहद महीन और अदृश्य मर्यादा रेखा होती है। जब विधायिका या विपक्ष के नेता न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए 'अदालती घेराव' जैसी शैली अपनाते हैं, तो वह मर्यादा रेखा पूरी तरह टूट जाती है।सुप्रीम कोर्ट कोई राजनीतिक मंच या दिल्ली का जंतर-मंतर नहीं है, जहां धरने, प्रदर्शन या संख्याबल के जरिए अपनी मांगों को मनवाया जा सके। अदालतें केवल और केवल तथ्यों, साक्ष्यों, नजीरों और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर चलती हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, जो अदालत में राहुल गांधी का पक्ष रख रहे हैं—और जो स्वयं देश के जाने-माने कानूनविद और पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री रह चुके हैं—वे भली-भांति जानते हैं कि अदालत के भीतर पेश किए जाने वाले तर्कों का वजन इस बात से तय नहीं होता कि कोर्ट रूम के बाहर कितने हजार लोग नारे लगा रहे हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कोर्ट में जो चिंताएं उठाईं कि "अदालत को राजनीतिक जुलूसों से घेरना पूरी तरह से अस्वीकार्य है", वह किसी एक राजनीतिक दल की चिंता नहीं, बल्कि देश के पूरे कानूनी तंत्र की सामूहिक चिंता होनी चाहिए।
- अशोक भाटिया
वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
चुनाव आयोग के अधिकारियों को नहीं, मतदाता सूची की नीति बदलिए
किसी भी लोकतंत्र की मजबूती के लिए पारदर्शी, विश्वसनीय और समावेशी मतदाता सूची जरूरी है। लेकिन भारत के नेताओं और नौकरशाहों के गठजोड़ ने इसे एक हास्यास्पद विषय बना दिया है। यदि प्रत्येक व्यक्ति के जन्मभूमि पर ही मतदाता पहचान पत्र बना दिया जाए, और उसके पलायन के बावजूद उसका स्थाई नंबर नहीं बदलने दिया जाए, तो इससे बहुत सारे गड़बड़ झाले को रोका जा सकता है। इसे आधार कार्ड से लिंक करने पर व्यक्ति की वास्तविक पहचान भी सुनिश्चित होती है। लेकिन हमारी नौकरशाही ऐसा कभी नहीं होने देगी।
भारत में राजनीतिक कारणों से जितने पाकिस्तानियों और बांग्लादेशियों के मतदाता पहचान पत्र बनाए गए, उसके लिए तत्कालीन बीएलओ, एसडीएम और डीएम के अलावा राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि जिम्मेदार नहीं हैं, तो कौन है? क्या कभी इस लापरवाही की जिम्मेदारी सुनिश्चित करने की कोशिश की गई? इनकी जमीनी लापरवाहियों या राजनीतिक पक्षपात के लिए इन्हें कड़ी सजा मिलनी चाहिए, न कि राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त और केंद्रीय मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ अनर्गल आरोप लगाए जाने चाहिए।
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एडॉल्फ हिटलर ने कहा था कि यदि तुम एक झूठ को सौ बार दोहराओगे तो वह लोगों को सच लगने लगेगा। जिन नेताओं ने अल्पसंख्यकों की आड़ में, झुग्गी-झोपड़ियों की आड़ में गलत मतदाता पहचान पत्र बनवा लिए, जब एसआईआर में ये पकड़ में आने लगे तो विपक्ष का बेचैन होना स्वाभाविक है। चाहे कांग्रेस हो भाजपा हो या क्षेत्रीय दल, अब इस खेल में सभी पारंगत दिख रहे हैं। यदि नौकरशाही तभी इस खेल को पकड़ लेती तो आज चुनाव आयोग को इतनी कड़ी मशक्कत नहीं करनी पड़ती। इस पूरे खेल में ग्राम पंचायत, नगर पंचायत, नगरपालिका, नगर निगम, विधानसभा और लोकसभा की मतदाता सूची में जो गड़बड़झाला है, उसे भी यदि समय रहते नहीं रोका गया, तो मतदाताओं को न्याय मिल पाएगा, इस बात की कोई गारंटी नहीं है। क्योंकि हर चुनाव में मतदाता सूची बदल जाना राजनीतिक व प्रशासनिक खेल नहीं तो क्या है? हर चुनाव के वक्त कुछ ऐसे वास्तविक लोग मिल जाएंगे, जिनके नाम ही मतदाता सूची से गायब मिलेंगे। आखिर इस लापरवाही के लिए सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी कौन सुनिश्चित करेगा।
इस बात में कोई दो राय नहीं कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति मतदाता के मताधिकार में निहित है। यह अधिकार तभी सार्थक है, जब प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में दर्ज हो और कोई अपात्र व्यक्ति गलत तरीके से उसमें शामिल न रहे। इसलिए मतदाता सूची तैयार करने, उसमें संशोधन करने और उसकी शुद्धता सुनिश्चित करने की प्रक्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि कोई अधिकारी इसमें लापरवाही बरतता पाया जाता है तो उसके लिए भी सख्त सजा का प्रावधान हो।
जब भी मतदाता सूची में गड़बड़ियों, नाम कटने, दोहरी प्रविष्टियों अथवा पात्र मतदाताओं के छूट जाने की शिकायतें सामने आती हैं, तो चुनाव आयोग के अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल उठने लगते हैं। लेकिन क्या हर समस्या के लिए मैदानी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों व राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जिम्मेदार ठहराना उचित है? या हमें उन नीतियों, नियमों और प्रक्रियाओं की समीक्षा करनी चाहिए, जिनके तहत मतदाता सूची तैयार की जाती है? नए मतदाताओं के नाम जोड़ना और मृतकों के नाम डिलीट करना चुनाव आयोग की वार्षिक जिम्मेदारी है। इस हेतु हर वर्ष अभियान चलाया जाता है।
सवाल है कि अधिकारियों की जवाबदेही के साथ नीतिगत सुधार भी जरूरी है। इसके लिए संसद को भी सचेष्ट होना पड़ेगा। मतदाता सूची तैयार करने का काम व्यापक और संवेदनशील है। इसमें करोड़ों नागरिकों के विवरण का सत्यापन, नए मतदाताओं का पंजीकरण, मृत व्यक्तियों के नाम हटाना, स्थानांतरित नागरिकों के विवरण का अद्यतन और दोहरी प्रविष्टियों की पहचान जैसे अनेक कार्य शामिल होते हैं।
यदि इन प्रक्रियाओं में त्रुटियां होती हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। जानबूझकर लापरवाही, पक्षपात या नियमों के उल्लंघन के प्रमाण मिलने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए। लेकिन प्रत्येक प्रशासनिक त्रुटि को केवल कर्मचारियों की विफलता मान लेना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।
यह भी देखना होगा कि निर्धारित समयसीमा व्यावहारिक है या नहीं, उपलब्ध संसाधन पर्याप्त हैं या नहीं, सत्यापन की प्रक्रिया कितनी सरल है और नागरिकों को अपनी शिकायतों के समाधान के लिए कितनी आसानी से अवसर मिलता है।
सवाल है कि मतदाता सूची की नीति में किन बदलावों की जरूरत है?
पहला, प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम जोड़ने की प्राथमिकता। मतदाता सूची की शुद्धता का अर्थ केवल गलत नाम हटाना नहीं, बल्कि प्रत्येक पात्र नागरिक को सूची में शामिल करना भी है। किसी पात्र मतदाता का नाम हटने या दर्ज न होने से उसके मताधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए नाम हटाने की प्रक्रिया में उचित सूचना, सत्यापन और अपना पक्ष रखने का अवसर सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
दूसरा, नाम काटने की प्रक्रिया पारदर्शी हो। किसी मतदाता का नाम सूची से हटाने के लिए स्पष्ट नियम, सत्यापन योग्य आधार और निर्धारित प्रक्रिया होनी चाहिए। नागरिक को, जहां नियमों के तहत आवश्यक हो, प्रस्तावित कार्रवाई की सूचना और आपत्ति दर्ज कराने का अवसर मिलना चाहिए। केवल तकनीकी रिकॉर्ड या अपूर्ण जानकारी के आधार पर किसी पात्र मतदाता का अधिकार प्रभावित नहीं होना चाहिए।
तीसरा, मृत और स्थानांतरित मतदाताओं के मामलों में सावधानी जरूरी है। मृत व्यक्तियों के नाम हटाना और स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाताओं के रिकॉर्ड को अद्यतन करना आवश्यक है। लेकिन एक ही नाम, समान आयु या मिलते-जुलते पते के आधार पर किसी व्यक्ति को गलत तरीके से सूची से बाहर नहीं किया जाना चाहिए। पहचान और निवास के सत्यापन के लिए विश्वसनीय प्रक्रिया जरूरी है।
चौथा, तकनीक का उपयोग हो, लेकिन मानवीय सत्यापन के साथ जरूरी है। डिजिटल डेटाबेस, ऑनलाइन आवेदन और स्वचालित प्रणाली मतदाता सूची को बेहतर बनाने में सहायक हो सकते हैं। हालांकि, तकनीकी गड़बड़ी, डेटा में विसंगति या गलत मिलान की स्थिति में मानवीय समीक्षा और सुधार का अवसर उपलब्ध होना चाहिए। तकनीक नागरिकों की सुविधा बढ़ाए, उनके अधिकारों में बाधा न बने।
पांचवां, शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित हो। नाम जुड़वाने, संशोधन कराने या गलत तरीके से नाम हटाए जाने की शिकायतों के लिए सरल और समयबद्ध व्यवस्था होनी चाहिए। नागरिकों को आवेदन की स्थिति जानने, निर्णय का कारण समझने और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अपील करने की सुविधा मिलनी चाहिए।
छठा, अधिकारियों को पर्याप्त संसाधन और प्रशिक्षण मिलना चाहिए। मतदाता सूची तैयार करने वाले कर्मचारियों पर यदि सीमित समय में अत्यधिक काम का दबाव है, तो त्रुटियों की आशंका बढ़ सकती है। इसलिए पर्याप्त कर्मचारी, व्यावहारिक समयसीमा, स्पष्ट दिशा-निर्देश और उचित प्रशिक्षण भी नीतिगत सुधार का हिस्सा होने चाहिए।
सबसे बड़ी बात यह कि राजनीतिक विवाद से ऊपर उठकर समीक्षा हो। मतदाता सूची का मुद्दा अक्सर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बन जाता है। एक पक्ष नामों को हटाए जाने पर सवाल उठाता है, तो दूसरा पक्ष सूची की शुद्धता और दोहरी प्रविष्टियों को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर देता है।
इन दोनों चिंताओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है। न तो हर नाम हटाए जाने को गलत मानना उचित है और न ही प्रत्येक कार्रवाई को स्वतः सही मान लेना। महत्वपूर्ण यह है कि हर निर्णय के पीछे स्पष्ट आधार हो, नियम सभी पर समान रूप से लागू हों और शिकायतों का समाधान प्रमाणों के आधार पर किया जाए। मतदाता सूची की विश्वसनीयता केवल चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है। यह नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों और चुनावी प्रक्रिया पर जनता के भरोसे से जुड़ा विषय है।
सवाल है कि अब आगे का रास्ता क्या है? तो जवाब यही होगा कि मतदाता सूची की नीति की नियमित समीक्षा की जानी चाहिए। इसमें राजनीतिक दलों, नागरिक समाज, चुनाव संबंधी विशेषज्ञों और आम मतदाताओं से सुझाव लिए जा सकते हैं। नाम जोड़ने और हटाने के आंकड़े, शिकायतों की स्थिति तथा उनके निस्तारण की जानकारी उचित गोपनीयता और कानूनी सीमाओं के भीतर सार्वजनिक की जानी चाहिए।
साथ ही, मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि कोई पात्र नागरिक अनावश्यक प्रशासनिक बाधाओं के कारण अपने मताधिकार से वंचित न हो और सूची की शुद्धता भी बनी रहे। यदि किसी के पास वैध मतदाता पहचान पत्र है, लेकिन मतदाता सूची से उनका नाम नदारत है तो ऐसे व्यक्तियों को वोट डालने का अधिकार मिलना चाहिए।
वस्तुतः चुनाव आयोग के अधिकारियों की जवाबदेही जरूरी है, लेकिन जवाबदेही का अर्थ केवल दोष तय करना नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमियों को दूर करना भी है। यदि नियम जटिल हैं, प्रक्रियाएं अस्पष्ट हैं या संसाधन अपर्याप्त हैं, तो केवल अधिकारियों को बदलने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए ऐसी मतदाता सूची चाहिए, जिसमें प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम हो, प्रत्येक गलत प्रविष्टि को निष्पक्ष प्रक्रिया से सुधारा जाए और किसी का मताधिकार मनमाने ढंग से प्रभावित न हो।
इसलिए मूल प्रश्न यही है—क्या हम हर विवाद के बाद अधिकारियों पर कार्रवाई तक सीमित रहेंगे, या ऐसी पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक-अनुकूल नीति बनाएंगे, जिससे गलतियों की संभावना ही कम हो जाए? मतदाता सूची की नीति में सुधार लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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