ट्रम्प का मिडटर्म चुनाव में क्या होगा? ईरान युद्ध और महंगाई से बढ़ी मुश्किलों का कितना असर
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सामने घरेलू राजनीति में बड़ी चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है. ईरान के साथ जारी युद्ध, पेट्रोल की बढ़ती कीमतों और महंगाई को लेकर अमेरिकी जनता में नाराजगी बढ़ रही है. इसका असर ट्रम्प की लोकप्रियता पर भी पड़ा है. नवंबर 2026 में होने वाले मिडटर्म चुनाव से ठीक पहले सामने आए एक नए सर्वे ने रिपब्लिकन पार्टी की चिंता बढ़ा दी है.
रॉयटर्स/इप्सोस के 19 अक्टूबर 2026 को जारी सर्वे के मुताबिक, ट्रम्प की अप्रूवल रेटिंग गिरकर 31% पर आ गई है. यह उनके दोनों राष्ट्रपति कार्यकालों के दौरान दर्ज सबसे निचले स्तर पर है. वहीं, अगर अभी कांग्रेस के चुनाव कराए जाएं, तो डेमोक्रेटिक पार्टी को रिपब्लिकन पार्टी के मुकाबले स्पष्ट बढ़त मिलती दिखाई दे रही है.
सवाल है कि जिस ट्रम्प ने चुनाव के दौरान अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने और देश के हितों को प्राथमिकता देने का वादा किया था, उनकी लोकप्रियता में इतनी गिरावट क्यों आई? ईरान युद्ध का अमेरिकी परिवारों की जेब पर क्या असर पड़ा है? और 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनाव ट्रम्प के राजनीतिक भविष्य को किस तरह प्रभावित कर सकते हैं? आइए, इस पूरे घटनाक्रम को आसान भाषा में समझते हैं.
ट्रम्प की अप्रूवल रेटिंग में गिरावट का क्या मतलब है?
अमेरिका में अप्रूवल रेटिंग से पता चलता है कि कितने लोग राष्ट्रपति के कामकाज से संतुष्ट हैं. यह चुनावी नतीजों का सीधा अनुमान नहीं होती, लेकिन जनता के मौजूदा रुझान को समझने का महत्वपूर्ण संकेत जरूर देती है.
रॉयटर्स/इप्सोस के ताजा सर्वे में केवल 31% अमेरिकी वयस्कों ने ट्रम्प के कामकाज को मंजूरी दी. इसके मुकाबले डेमोक्रेटिक पार्टी को कांग्रेस चुनाव के लिए 47% पंजीकृत मतदाताओं का समर्थन मिला, जबकि रिपब्लिकन पार्टी को 35% लोगों ने पसंद किया. यानी दोनों पार्टियों के बीच 12 प्रतिशत अंकों का अंतर दिखाई दिया.
यह स्थिति रिपब्लिकन पार्टी के लिए इसलिए भी चिंताजनक है, क्योंकि मिडटर्म चुनाव में मतदाता केवल स्थानीय उम्मीदवारों को नहीं देखते, बल्कि राष्ट्रपति की नीतियों के प्रति अपना समर्थन या विरोध भी जाहिर करते हैं.
हालांकि, सर्वे के आंकड़ों को अंतिम चुनाव परिणाम नहीं माना जा सकता. वास्तविक नतीजे इस बात पर निर्भर करेंगे कि अलग-अलग राज्यों और निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाता किसे चुनते हैं.
ईरान युद्ध ट्रम्प के लिए राजनीतिक संकट कैसे बना?
ट्रम्प की लोकप्रियता में गिरावट की एक बड़ी वजह ईरान के साथ जारी सैन्य संघर्ष है. 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल की ओर से ईरान पर सैन्य कार्रवाई शुरू होने के बाद यह संघर्ष अमेरिकी राजनीति और अर्थव्यवस्था का प्रमुख मुद्दा बन गया.
ट्रम्प प्रशासन ने ईरान के खिलाफ कार्रवाई को अमेरिकी सुरक्षा और रणनीतिक हितों से जोड़कर पेश किया. लेकिन युद्ध लंबा खिंचने के साथ इसके खर्च, संभावित परिणाम और आम लोगों पर पड़ने वाले आर्थिक प्रभाव को लेकर सवाल बढ़ने लगे.
युद्ध के मामले में ट्रम्प को एक राजनीतिक विरोधाभास का सामना करना पड़ रहा है. उन्होंने अमेरिकी हितों को प्राथमिकता देने और विदेशों में लंबे सैन्य संघर्षों से बचने की बात कही थी. ऐसे में ईरान के साथ जारी युद्ध उनके समर्थकों के एक वर्ग के लिए भी असहज स्थिति पैदा कर सकता है.
युद्ध का असर केवल विदेश नीति तक सीमित नहीं है. जब किसी सैन्य संघर्ष के कारण ईंधन महंगा होता है और घरेलू खर्च बढ़ते हैं, तो मतदाता सरकार की रणनीति को अपनी आर्थिक स्थिति से जोड़कर देखने लगते हैं.
पेट्रोल की बढ़ती कीमतों ने क्यों बढ़ाई परेशानी?
अमेरिकी मतदाताओं के लिए महंगाई सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक है. पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने का असर परिवहन, माल ढुलाई, कृषि और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत पर पड़ता है.
ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ा. यह जलमार्ग दुनिया के लिए महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति मार्गों में शामिल है. यहां व्यापार बाधित होने की आशंका भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों को प्रभावित कर सकती है.
अक्टूबर में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें युद्ध शुरू होने के बाद से काफी बढ़ी हैं. इससे वाहन चलाने वाले लोगों के साथ-साथ उन कारोबारियों पर भी दबाव पड़ा है, जो माल पहुंचाने के लिए ईंधन पर निर्भर हैं.
इसका राजनीतिक असर समझना आसान है. अगर किसी परिवार की आमदनी उतनी ही रहे, लेकिन पेट्रोल, किराना और बिजली पर खर्च बढ़ जाए, तो सरकार के आर्थिक प्रदर्शन को लेकर असंतोष बढ़ सकता है.
यही वजह है कि ट्रम्प के लिए युद्ध का अंत तलाशना केवल विदेश नीति का सवाल नहीं, बल्कि घरेलू राजनीतिक जरूरत भी बन गया है.
मिडटर्म चुनाव क्या हैं और ट्रम्प के लिए क्यों अहम हैं?
अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव हर चार साल में होते हैं, जबकि मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच में आयोजित किए जाते हैं. 2026 के मिडटर्म चुनाव 3 नवंबर को होने हैं. इनमें कांग्रेस के दोनों सदनों प्रतिनिधि सभा और सीनेटकी सत्ता का समीकरण प्रभावित हो सकता है.
अभी रिपब्लिकन पार्टी का दोनों सदनों में नियंत्रण है. यदि डेमोक्रेट्स इनमें से किसी एक सदन में बहुमत हासिल कर लेते हैं, तो ट्रम्प के लिए अपनी नीतियों को आगे बढ़ाना मुश्किल हो सकता है.
कांग्रेस के पास कानून बनाने, सरकारी खर्च को मंजूरी देने और प्रशासन की निगरानी करने जैसी महत्वपूर्ण शक्तियां हैं. विपक्षी पार्टी को बहुमत मिलने पर वह सरकारी फैसलों की जांच के लिए सुनवाई कर सकती है और प्रशासन से जवाब मांग सकती है.
अगर डेमोक्रेट्स दोनों सदनों पर नियंत्रण हासिल कर लेते हैं, तो ट्रम्प के सामने राजनीतिक चुनौती और बड़ी हो सकती है. हालांकि, राष्ट्रपति के वीटो अधिकार और सीनेट में विधायी प्रक्रियाओं जैसी बाधाएं भी महत्वपूर्ण रहेंगी.
क्या रिपब्लिकन पार्टी को चुनाव में नुकसान हो सकता है?
ताजा सर्वे डेमोक्रेट्स के लिए उत्साह बढ़ाने वाले हैं. 47% के मुकाबले 35% का समर्थन अंतर बताता है कि राष्ट्रीय स्तर पर रिपब्लिकन पार्टी को मतदाताओं के बीच कठिन मुकाबले का सामना करना पड़ सकता है. खास तौर पर महिलाओं के बीच डेमोक्रेट्स को समर्थन मिलने की बात भी सर्वे में सामने आई है.
हालांकि, अमेरिकी चुनाव व्यवस्था में राष्ट्रीय लोकप्रियता और सीटों के नतीजों के बीच सीधा संबंध नहीं होता. प्रतिनिधि सभा की सीटें अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों से चुनी जाती हैं, जबकि सीनेट के चुनावों में राज्यों का महत्व होता है.
डेमोक्रेट्स को प्रतिनिधि सभा में बेहतर संभावनाएं दिखाई दे रही हैं, लेकिन सीनेट पर नियंत्रण हासिल करना अधिक चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है. इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि रिपब्लिकन पार्टी दोनों सदनों में बहुमत खो देगी.
क्या ट्रम्प की नीतियों में बदलाव हो सकता है?
चुनाव से पहले राजनीतिक दबाव बढ़ने पर सरकार अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव कर सकती है. ट्रम्प ने 8 अक्टूबर को कहा था कि अमेरिका नवंबर के मिडटर्म चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करेगा. उन्होंने ईरान के साथ बातचीत में प्रगति का हवाला दिया था, हालांकि युद्ध समाप्त करने को लेकर अनिश्चितता बनी हुई थी.
यदि ऊर्जा की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो प्रशासन पर युद्ध को सीमित करने, बातचीत आगे बढ़ाने और घरेलू महंगाई पर ध्यान देने का दबाव बढ़ सकता है.
लेकिन केवल युद्ध रोकने से आर्थिक स्थिति तुरंत सामान्य हो जाएगी, इसकी गारंटी नहीं है. तेल आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, महंगाई और उपभोक्ता मांग जैसे कई कारक कीमतों को प्रभावित करते हैं.
ट्रम्प के लिए जनता का भरोसा सबसे बड़ी चुनौती
डोनाल्ड ट्रम्प की गिरती अप्रूवल रेटिंग अमेरिकी राजनीति में बदलते जनमत का संकेत है. ईरान युद्ध, बढ़ती ईंधन कीमतें और महंगाई ने उनकी सरकार के सामने मुश्किलें बढ़ा दी हैं. 3 नवंबर के मिडटर्म चुनाव यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि इन परिस्थितियों का असर कांग्रेस में सत्ता के समीकरण पर कितना पड़ता है.
यदि डेमोक्रेट्स मजबूत प्रदर्शन करते हैं, तो ट्रम्प के शेष कार्यकाल में जांच, नीतिगत टकराव और विधायी बाधाएं बढ़ सकती हैं. दूसरी ओर, रिपब्लिकन पार्टी बहुमत बनाए रखती है, तो राष्ट्रपति को अपनी नीतियां आगे बढ़ाने का अधिक अवसर मिल सकता है.
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ट्रम्प चुनाव से पहले अर्थव्यवस्था और ईरान युद्ध को लेकर मतदाताओं की चिंताओं को दूर कर पाएंगे, या जनता की नाराजगी उनकी पार्टी के लिए चुनावी नुकसान में बदल जाएगी.
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'आतंकवाद पर नहीं चलेगा दोहरापन', SCO में राजनाथ सिंह का सख्त संदेश, सामने बैठे थे पाक डिप्टी PM
Rajnath Singh SCO Meet: ताजिकिस्तान की राजधानी दुशान्बे में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ की महत्वपूर्ण बैठक में भारत ने आतंकवाद के मुद्दे पर बेहद कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अंतरराष्ट्रीय मंच से सीधे तौर पर उन देशों को चेतावनी दी जो आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं या उसे अपनी नीतियों का हिस्सा बनाए हुए हैं. इस बैठक की खास बात यह रही कि जब रक्षा मंत्री यह कड़ा संदेश दे रहे थे, तब पाकिस्तान के विदेश मंत्री और उप प्रधानमंत्री इशाक डार ठीक उनके सामने वाली मेज पर बैठे थे. राजनाथ सिंह ने बिना किसी लाग-लपेट के दुनिया को बताया कि आतंकवाद और विकास कभी भी एक साथ नहीं चल सकते.
आतंकवाद पर दोहरे मापदंड स्वीकार नहीं
रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में साफ शब्दों में कहा कि आतंकवाद किसी भी समाज के विकास के लिए सबसे बड़ा खतरा है. जब किसी इलाके में आतंक पांव पसारता है, तो वहां केवल इंसानी जानों का नुकसान ही नहीं होता, बल्कि पूरे व्यापार और आर्थिक निवेश पर भी बहुत गहरा संकट खड़ा हो जाता है. उन्होंने कहा कि आतंकवाद समाज को कट्टरता की ओर धकेलता है और नई पीढ़ी से आगे बढ़ने के बेहतरीन अवसर छीन लेता है. सिंह ने जोर देकर कहा कि आतंक की किसी भी घटना को किसी भी तर्क से सही नहीं ठहराया जा सकता और इस बुराई से निपटने के मामले में दुनिया का कोई भी देश दोहरा रवैया नहीं अपना सकता.
Deputy Prime Minister/Foreign Minister Senator Mohammad Ishaq Dar @MIshaqDar50 called on the President of Tajikistan, H.E. Emomali Rahmon, along with other Heads of Government Delegations of SCO Member States.
— Ministry of Foreign Affairs - Pakistan (@ForeignOfficePk) October 20, 2026
President Rahmon welcomed the leaders and emphasized the importance… pic.twitter.com/9RlsbQ2Woh
पनाहगारों और मददगारों के लिए कोई जगह नहीं
पाकिस्तान की ओर सीधा संकेत करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि जो लोग आतंकियों को धन मुहैया कराते हैं, उन्हें हथियार देते हैं या अपनी जमीन पर सुरक्षित ठिकाने देते हैं, उनके लिए इस सभ्य दुनिया में कोई जगह नहीं होनी चाहिए. उन्होंने सभी सदस्य देशों से आह्वान किया कि आतंक के इस पूरे तंत्र को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए सबको मिलकर और पूरी ताकत के साथ कदम उठाने होंगे. भारत पहले भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह बात दोहराता रहा है कि सीमा पार से चलने वाली आतंकी गतिविधियों को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और भारत अपनी सुरक्षा के साथ किसी भी सूरत में समझौता नहीं करेगा.
सुरक्षा बलों की चौकसी और आतंकियों का अंत
राजनाथ सिंह ने कुछ दिन पहले नई दिल्ली में दिए गए अपने उस बयान की याद भी ताजा कर दी, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत अब किसी भी नापाक हरकत का बेहद करारा उत्तर देने में पूरी तरह सक्षम है. उन्होंने बताया था कि पिछले कुछ सालों में सुरक्षा बलों की कड़ी निगरानी की वजह से देश में दाखिल होने वाले आतंकियों की उम्र बहुत घट गई है. जो भी भारत के खिलाफ हथियार उठाने की जुर्रत करता है, हमारे जवान एक साल के भीतर ही उसका खात्मा कर देते हैं. सीमा पर तैनात जवान हर तरह के खतरे से निपटने के लिए दिन-रात तैयार बैठे हैं.
आर्थिक सहयोग और व्यापार की नई राह
सुरक्षा के गंभीर मसलों के साथ-साथ रक्षा मंत्री ने एससीओ देशों के बीच व्यापारिक और आर्थिक साझेदारी को बढ़ाने पर भी गहराई से चर्चा की. उन्होंने वर्ष 2026 से 2030 के लिए तय की गई आर्थिक कार्य योजना का भारत की ओर से पुरजोर समर्थन किया. उन्होंने कहा कि देशों के बीच आर्थिक संबंध ऐसे होने चाहिए जिनसे हर एक सदस्य देश को बराबर का लाभ मिले. आज के दौर में जब वैश्विक स्तर पर कई तरह के उतार-चढ़ाव आ रहे हैं, तब एक मजबूत और भरोसेमंद सप्लाई चेन बनाना बेहद जरूरी हो चुका है.
आधुनिक तकनीक और क्षेत्रीय विकास पर जोर
राजनाथ सिंह ने आगे कहा कि क्षेत्रीय संपर्क और व्यापार को बढ़ाने के लिए पारदर्शी और टिकाऊ नियम बनाने होंगे. सभी देशों को मिलकर ऐसी नीतियां तैयार करनी चाहिए जिससे आम लोगों का जीवन स्तर सुधरे और युवाओं के लिए नए रोजगार पैदा हों. विकास की इस दौड़ में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना समय की सबसे बड़ी मांग है. भारत ने पहले ही साफ कर दिया है कि वह क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने वाले हर सकारात्मक प्रयास में आगे बढ़कर हिस्सा लेगा.
ताशकंद और दुशान्बे के केंद्रों का समर्थन
अपने भाषण के आखिर में रक्षा मंत्री ने संगठन के प्रशासनिक और सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने वाले फैसलों का भी स्वागत किया. उन्होंने ताशकंद में यूनिवर्सल सेंटर और दुशान्बे में एंटी-ड्रग सेंटर को एससीओ के स्थायी अंग बनाने की पहल की सराहना की. उन्होंने कहा कि नशीले पदार्थों की तस्करी और संगठित अपराध भी आतंक को बढ़ावा देने में बड़ी भूमिका निभाते हैं, इसलिए इन बुराइयों से निपटने के लिए ऐसे केंद्रों की भूमिका आने वाले समय में बहुत अहम साबित होगी.
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