India-New Zealand FTA: भारत और न्यूजीलैंड के बीच लागू हुआ FTA, जानें क्या-क्या सस्ता होगा
India-New Zealand FTA: भारत और न्यूजीलैंड के बीच व्यापार संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया जा हर रहा है. दोनों देशों के बीच नया समझौता हुआ है, जिसके तहत अब दोनों देशों के अंतर्गत व्यापार भी बढ़ेगा. इससे भारतीय कंपनियों को विदेशी बाजारों में नए अवसर मिलेंगे और न्यूजीलैंड के व्यवसायों को भारत के विशाल बाजार तक पहुंच आसान हो जाएगी.
न्यूजीलैंड के बाजार में भारतीय कपड़े, जूते और दवाइयां कितनी कॉम्पिटेटिव होंगी और क्या इससे न्यूजीलैंड में भारतीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर खुलेंगे? सबसे पहले, समझते हैं कि FTA क्या है? एफटीए का मतलब है मुक्त व्यापार समझौता. यह दो या दो से अधिक देशों के बीच एक समझौता है जिसके तहत वे एक-दूसरे के सामान और सेवाओं को अपने बाजारों में बेहतर पहुंच प्रदान करने के लिए आयात शुल्क या सीमा शुल्क कम करते हैं. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि दोनों देशों के बीच सभी उत्पादों पर सभी शुल्क हटा दिए जाएंगे. विभिन्न उत्पादों के लिए अलग-अलग शर्तें, समय सीमाएं और छूट लागू हो सकती हैं. यह समझौता वस्त्र, परिधान, जूते, चमड़े के सामान, फार्मास्यूटिकल्स, मशीनरी और इंजीनियरिंग उत्पादों को कवर करता है. चाय , कॉफी, मसाले, प्रोसेस्ड फूड्स, सी फूड , प्लास्टिक और रबर उत्पादों के निर्यातकों को भी बढ़े हुए अवसर मिल सकते हैं.
एक सेल्फी बताएगी कैंसर से बचने की कितनी उम्मीद? एआई के नए प्रयोग ने जगाई उम्मीद
नई दिल्ली, 20 अक्टूबर (आईएएनएस)। मोबाइल फोन से खींची गई एक साधारण सेल्फी भी कैंसर मरीजों की सेहत और उनके जीवित रहने की संभावनाओं का अनुमान लगाने में मदद कर सकती है। वैज्ञानिकों ने एआई आधारित एक ऐसा टूल बनाया है, जो चेहरे की तस्वीर को भांप कर मरीज की जैविक उम्र और कैंसर से जुड़े जोखिमों का आकलन कर सकता है। हालांकि, यह तकनीक अभी शोध के स्तर पर है और इसे किसी मरीज के भविष्य का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।
अमेरिका के मैसाचुसेट्स स्थित मास जनरल ब्रिघम के शोधकर्ताओं ने इस तकनीक को विकसित किया है। 19 अक्टूबर को इससे जुड़े अध्ययन के निष्कर्ष ‘द लैंसेट डिजिटल हेल्थ’ पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं। शोधकर्ताओं ने इस एआई मॉडल को 4 करोड़ से अधिक चेहरे की तस्वीरों के आधार पर प्रशिक्षित किया, ताकि वह अलग-अलग उम्र और विविध पृष्ठभूमि के लोगों के चेहरे की विशेषताओं को समझ सके।
इस शोध में दो पूरक एआई टूल विकसित किए गए हैं। ‘एफएएचआर-फेसएज’ (एफएएचआर-फेसएज) चेहरे के आधार पर किसी व्यक्ति की जैविक उम्र का अनुमान लगाता है और उससे कैंसर में जीवित रहने की संभावना का आकलन करने में मदद करता है। वहीं, ‘एफएएचआर-फेससर्वाइवल’ चेहरे की तस्वीर से सीधे जीवित रहने से जुड़े जोखिम का अनुमान लगाने की कोशिश करता है।
जैविक उम्र का मतलब केवल जन्म के बाद बीते वर्षों से नहीं है, बल्कि यह इस बात का अनुमान है कि शरीर की स्थिति उसकी वास्तविक उम्र के मुकाबले कैसी दिखाई देती है। कई बार एक ही उम्र के दो लोगों की शारीरिक स्थिति में काफी अंतर हो सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि चेहरे पर दिखाई देने वाले कुछ संकेत शरीर की समग्र सेहत के बारे में उपयोगी जानकारी दे सकते हैं।
अध्ययन में एआई के दोनों टूल चेहरे के अलग-अलग हिस्सों पर ध्यान देते हैं। जैविक उम्र का अनुमान लगाने वाला मॉडल माथे, कनपटियों और नाक के किनारों से मुंह तक जाने वाली रेखाओं का विश्लेषण करता है। वहीं, कैंसर में जीवित रहने से जुड़े जोखिम का आकलन करने वाला मॉडल मुख्य रूप से आंखों के नीचे और नाक के ऊपरी हिस्से के आसपास की विशेषताओं पर ध्यान देता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, दोनों टूल चेहरे से मिलने वाली अलग-अलग जानकारियों का इस्तेमाल करते हैं। इसका उद्देश्य डॉक्टरों को मरीज की स्थिति समझने के लिए एक अतिरिक्त आकलन उपलब्ध कराना है, ताकि उपचार से जुड़े फैसलों में अधिक व्यक्तिगत दृष्टिकोण अपनाया जा सके।
इस तकनीक का संभावित महत्व इसलिए भी है क्योंकि कैंसर के उपचार में मरीज की उम्र के साथ उसकी शारीरिक क्षमता और समग्र स्वास्थ्य भी मायने रखते हैं। यदि एआई किसी मरीज में अधिक जोखिम के संकेत पहचानने में मदद करता है, तो डॉक्टर उसके अन्य चिकित्सकीय आंकड़ों और जांचों के साथ इस जानकारी पर विचार कर सकते हैं।
हालांकि, विशेषज्ञों के सामने अभी कई चुनौतियां हैं। चेहरे की तस्वीर से निकाला गया अनुमान कैंसर के प्रकार, बीमारी की अवस्था, मरीज के मेडिकल रिकॉर्ड और उपचार के प्रति उसकी प्रतिक्रिया की जगह नहीं ले सकता। यह भी सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि अलग-अलग त्वचा रंगों, उम्र और अन्य विशेषताओं वाले लोगों के मामले में तकनीक समान रूप से विश्वसनीय रहे।
चेहरे की तस्वीरें निजी जैविक पहचान से जुड़ी जानकारी भी होती हैं। इसलिए ऐसी तकनीक के चिकित्सकीय इस्तेमाल में मरीज की सहमति, डेटा की सुरक्षा और गलत अनुमान के संभावित प्रभावों पर भी ध्यान देना होगा।
इस शोध को कैंसर के उपचार में एआई की संभावनाओं की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। भविष्य में यदि व्यापक परीक्षणों से इसकी विश्वसनीयता साबित होती है, तो एक साधारण तस्वीर डॉक्टरों को मरीज की स्थिति समझने में अतिरिक्त मदद दे सकती है। लेकिन किसी भी मरीज के उपचार और उसके भविष्य से जुड़े फैसले चिकित्सकीय जांच, विशेषज्ञों की सलाह और उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर ही लिए जाने चाहिए।
--आईएएनएस
केआर/
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