Responsive Scrollable Menu

कुल्लू दशहरा: माता हिडिंबा की पालकी यात्रा के साथ शुरू हुआ देव महाकुंभ, जानिए महाभारत से जुड़ी कथा

मनाली में माता हिडिंबा के मंदिर से उनकी पालकी के प्रस्थान के साथ कुल्लू अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव का ऐतिहासिक ‘देव महाकुंभ’ शुरू हो गया है। सात दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में हिमाचल प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से देवी-देवताओं की पालकियां और रथ शामिल होते हैं।

भगवान रघुनाथ की रथयात्रा, पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज और सदियों पुरानी धार्मिक परंपराएं इस आयोजन को विशिष्ट बनाती हैं। देश के दूसरे हिस्सों में जहां विजयादशमी पर रावण दहन प्रमुख होता है, वहीं कुल्लू में दशहरे का मुख्य आकर्षण देवी-देवताओं का समागम और भगवान रघुनाथ की पूजा-अर्चना है।

कुल्लू दशहरा उत्सव

कुल्लू दशहरे की खासियत यह है कि यहां देवी-देवताओं को सिर्फ मंदिरों में पूजे जाने वाले आराध्य के रूप में नहीं बल्कि स्थानीय सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। इस उत्सव में सैकड़ों देवी-देवताओं के शामिल होने की परंपरा है। उनकी पालकियों के साथ पुजारी, कारदार, वाद्ययंत्र बजाने वाले कलाकार और श्रद्धालु भी पहुंचते हैं। कुल्लू के धालपुर मैदान में होने वाला यह आयोजन हिमाचल प्रदेश की विशिष्ट देव संस्कृति, लोक परंपराओं और धार्मिक आस्था का प्रतीक है।

माता हिडिंबा के मंदिर की मान्यता

माता हिडिंबा का प्रसिद्ध मंदिर हिमाचल प्रदेश के मनाली में धुंगरी क्षेत्र में स्थित है। इसे हिडिंबा देवी मंदिर और धुंगरी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मनाली शहर से लगभग एक से दो किलोमीटर की दूरी पर देवदार के घने जंगलों के बीच स्थित यह मंदिर अपनी पारंपरिक लकड़ी की वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर की बहुस्तरीय ढलानदार छतें और लकड़ी पर की गई नक्काशी इसे हिमाचल प्रदेश के विशिष्ट धार्मिक स्थलों में शामिल करती हैं।

मंदिर के निर्माण का प्रचलित ऐतिहासिक वर्ष 1553 माना जाता है। माता हिडिंबा को स्थानीय परंपरा में विशेष स्थान प्राप्त है। उन्हें कुल्लू राजपरिवार की कुलदेवी और घाटी की प्रमुख देवी के रूप में भी सम्मान दिया जाता है। कुल्लू दशहरे के अवसर पर मनाली से उनकी पालकी का निकलना इस उत्सव की महत्वपूर्ण धार्मिक परंपराओं में शामिल है।

महाभारत से जुड़ी है माता हिडिंबा की कथा

माता हिडिंबा की धार्मिक मान्यता का संबंध महाभारत की कथा से है। पौराणिक कथा अनुसार, वनवास के दौरान पांडव हिमालय के इस क्षेत्र में पहुंचे थे। यहां भीम का सामना हिडिंब नामक राक्षस से हुआ। हिडिंब की बहन हिडिंबा भीम को देखकर उनसे प्रेम करने लगीं। उन्होंने भीम से विवाह करने की इच्छा जताई। कथा के अनुसार, भीम ने हिडिंब का वध किया और बाद में हिडिंबा से विवाह किया।

भीम और हिडिंबा के पुत्र घटोत्कच हुए जिन्होंने महाभारत के युद्ध में पांडवों की ओर से कौरवों के खिलाफ युद्ध किया था। समय के साथ हिमाचल प्रदेश के मनाली क्षेत्र में हिडिंबा को देवी के रूप में पूजने की परंपरा विकसित हुई। आज उनका मंदिर स्थानीय लोगों के साथ-साथ देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी आस्था का प्रमुख केंद्र है।

राजा जगत सिंह और भगवान रघुनाथ की कथा

कुल्लू दशहरे के इतिहास से जुड़ी एक अन्य प्रमुख धार्मिक कथा राजा जगत सिंह और भगवान रघुनाथ से भी संबंधित है। लोकमान्यता के अनुसार, राजा जगत सिंह के शासनकाल में एक ब्राह्मण से जुड़े घटनाक्रम के बाद राजा को श्राप मिला था। इस घटना के बाद राजा को पश्चाताप हुआ और उन्हें भगवान रघुनाथ की शरण लेने की सलाह दी गई।

कथा के अनुसार, अयोध्या से भगवान रघुनाथ की प्रतिमा कुल्लू लाई गई। राजा जगत सिंह ने भगवान रघुनाथ को अपनी राजगद्दी पर विराजमान किया और स्वयं को उनका सेवक घोषित कर दिया। इस परंपरा को कुल्लू में भगवान रघुनाथ की सर्वोच्च धार्मिक प्रतिष्ठा स्थापित होने से जोड़ा जाता है। इस कथा के अलग-अलग लोक संस्करण प्रचलित हैं, इसलिए इसे ऐतिहासिक घटनाक्रम के साथ-साथ धार्मिक लोकमान्यता के रूप में भी देखा जाता है।

इसी परंपरा के कारण कुल्लू दशहरे में भगवान रघुनाथ को केंद्रीय स्थान प्राप्त है। उत्सव के दौरान उनकी प्रतिमा को सुसज्जित पालकी में विराजमान कर धालपुर मैदान लाया जाता है। इसके बाद भगवान रघुनाथ की रथयात्रा निकलती है। श्रद्धालु पारंपरिक रस्सियों की मदद से रथ खींचते हैं। इसे भगवान रघुनाथ के प्रति समर्पण और उनकी सर्वोच्चता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

क्यों कहा जाता है देव महाकुंभ

कुल्लू दशहरे को देव महाकुंभ कहे जाने की वजह घाटी के अलग-अलग गांवों से देवी-देवताओं का एक स्थान पर एकत्र होना है। हिमाचल प्रदेश के कई क्षेत्रों में स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। दशहरे के अवसर पर इन देवी-देवताओं को उत्सव में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाता है। उनकी पालकियां और रथ पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ कुल्लू के धालपुर मैदान पहुंचते हैं।

स्थानीय मान्यता के अनुसार, प्रत्येक देवी-देवता का अपना क्षेत्र, मंदिर, परंपरा और अनुयायियों का समुदाय होता है। उनके साथ कारदार, पुजारी, वादक और श्रद्धालु भी यात्रा करते हैं। उत्सव के दौरान धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं और भगवान रघुनाथ की रथयात्रा में स्थानीय देवी-देवताओं की भागीदारी रहती है। यह समागम कुल्लू घाटी की साझा धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक माना जाता है। इस आयोजन में पारंपरिक लोकनृत्य, सांस्कृतिक कार्यक्रम, हस्तशिल्प प्रदर्शनियां और स्थानीय कलाओं से जुड़े आयोजन भी होते हैं। इस तरह कुल्लू दशहरा धार्मिक उत्सव के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश की लोकसंस्कृति और परंपराओं को प्रदर्शित करने का अवसर भी बनता है।

कुल्लू में दशहरे पर नहीं होता रावण दहन

कुल्लू दशहरे की एक प्रमुख विशेषता यह भी है कि यहां रावण दहन के बजाय भगवान रघुनाथ की पूजा और देवी-देवताओं का समागम मुख्य आकर्षण होता है। देश के कई हिस्सों में विजयादशमी के दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं लेकिन कुल्लू में विजयादशमी से दशहरा उत्सव की शुरुआत होती है और अगले सात दिनों तक धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन चलते हैं। इस परंपरा का संबंध राजा जगत सिंह के समय से जुड़ी उस धार्मिक मान्यता से है जिसके अनुसार भगवान रघुनाथ को कुल्लू का प्रमुख आराध्य और वास्तविक शासक स्वीकार किया गया। इसी वजह से उत्सव का केंद्र भगवान रघुनाथ की रथयात्रा और विभिन्न देवी-देवताओं का एकत्र होना रहता है।

Continue reading on the app

देवास के राजोदा में जवारा विसर्जन के बीच मधुमक्खियों का हमला, 40 से ज्यादा घायल, 2 किमी तक भागे लोग

मध्य प्रदेश के देवास जिले के राजोदा गांव में मंगलवार सुबह करीब 9 बजे उस वक्त हड़कंप मच गया, जब जवारा विसर्जन के दौरान अचानक मधुमक्खियों के झुंड ने लोगों पर हमला कर दिया। इस अचानक हुए हमले में 40 से ज्यादा लोग डंक लगने से घायल हो गए हैं।

कुएं में कूदने से पानी के छींटे छत्ते पर पड़े

जवारा विसर्जन के समय करीब 200 लोग कुएं के पास इकट्ठा हुए थे। इसी बीच 5-6 लोग नहाने के लिए कुएं में कूद गए। कुएं के ठीक ऊपर पीपल के पेड़ पर मधुमक्खियों का एक बड़ा छत्ता लगा हुआ था। नहाते समय पानी के छींटे सीधे छत्ते पर जा लगे, जिससे गुस्से में आकर मधुमक्खियों ने वहां मौजूद पूरी भीड़ पर एक साथ हमला बोल दिया।

जान बचाने के लिए 2 किलोमीटर तक दौड़े ग्रामीण

हमला इतना जोरदार था कि शुरुआत में लोगों को लगा कि मधुमक्खियां थोड़ी देर में शांत हो जाएंगी, लेकिन वे और ज्यादा आक्रामक हो गईं। इसके बाद लोग खुद को बचाने के लिए सड़कों पर करीब 2 किलोमीटर तक भागते रहे। घायल संतोष पाटीदार ने बताया कि कुछ लोगों ने खुद पर नेट ओढ़ लिया और 15 मिनट तक डर के मारे उसी में छिपे रहे।

कान्हा के शरीर से निकले 200 डंक

अस्पताल के डॉक्टर शरद वीरपरा ने बताया कि हमले में घायल हुए 11 लोगों को जिला अस्पताल लाया गया था। इनमें कान्हा नाम के एक युवक की हालत बेहद गंभीर बनी हुई है, क्योंकि उसके शरीर से 200 से ज्यादा डंक निकाले गए हैं। उसकी नाजुक हालत को देखते हुए डॉक्टरों ने उसे तुरंत इंदौर के एमवाय अस्पताल रेफर कर दिया है।

गांव में ही दी गई प्राथमिक चिकित्सा

ग्रामीण अशोक चौधरी ने बताया कि इस दुखद घटना में गांव के लगभग 40 से अधिक लोग घायल हुए हैं। कई लोगों को बहुत ज्यादा डंक नहीं लगे थे, इसलिए उन्हें राजोदा गांव में ही ड्रिप चढ़ाकर प्राथमिक इलाज दिया गया है। फिलहाल इंदौर रेफर किए गए युवक को छोड़कर बाकी सभी घायलों की स्थिति खतरे से बाहर और सामान्य बताई जा रही है।

Continue reading on the app

  Sports

Asian Para Games Day 2: दूसरे दिन भारत ने जीते 5 गोल्ड और टूटे गेम्स रिकॉर्ड्स, एथलेटिक्स में ऐतिहासिक प्रदर्शन

Asian Para Games Day 2: एशियन पैरा गेम्स का दूसरा दिन भारत के नाम रहा. भारत ने 5 गोल्ड मेडल समेत कुल 24 मेडल अपने नाम किए. जिसके चलते भारत मेडल टैली में 35 मेडल्स के साथ छठे स्थान पर पहुंच गया है. Tue, 20 Oct 2026 20:15:59 +0530

  Videos
See all

Sanjay Raut Albania Post Controversy Breaking: देश विरोध सोच 'एक्सपोज'! | Controversy #tmktech #vivo #v29pro
2026-10-20T15:14:49+00:00

Sanjay Raut Albania Post: राउत की देश विरोधी सोच एक्सपोज ! #shorts #congress #sanjayraut #cjp #viral #tmktech #vivo #v29pro
2026-10-20T15:17:10+00:00
Editor Choice
See all
Photo Gallery
See all
World News
See all
Top publishers