Explainer: क्या होता है डेटा सेंटर? न्यूजीलैंड में जिस पर एक साल की रोक लगाने की उठी मांग
Explainer: आपके मोबाइल या कंप्यूटर में मौजूद सैकड़ों तस्वीरें और वीडियो आपके लिए शायद बेहद महत्वपूर्ण होंगी. जो एक डेटा के रूप में आपकी इलेक्ट्रोनिक डिवाइस में स्टोर हैं. लेकिन यही तस्वीरें, वीडियो या कोई फाइल जब ऑनलाइन स्टोर होती हैं, जो हमारे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा रही हैं.
क्योंकि बढ़ते डेटा सेंटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की तकनीकें बिजली और पानी के अधिक प्रयोग और प्रदूषण के कारण पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा रही हैं. इसके अलावा इससे बिजली की अत्यधिक खपत होती है. क्योंकि डेटा सेंटरों को लगातार चालू रखने और कूलिंग सिस्टम चलाने के लिए भारी मात्रा में बिजली की जरूरत होती है, जिससे वैश्विक ऊर्जा संकट और कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है.
न्यूजीलैंड में डेटा सेंटरों पर एक साल रोक की मांग
बता दें कि पिछले हफ्ते न्यूजीलैंड के चुनावी अभियान में 'बिग डेटा' की राजनीति आधिकारिक तौर पर शामिल हो गई, जब ग्रीन पार्टी ने एक पॉलिसी पेश की जिसमें नए AI डेटा सेंटरों पर एक साल की रोक लगाने की मांग की गई. यह पिछले महीने की शुरुआत में न्यूयॉर्क राज्य द्वारा लगाई गई रोक जैसी ही है; न्यूयॉर्क ने यह रोक तब तक लगाई है जब तक राज्य सरकार बड़े डेटा सेंटरों के निर्माण और संचालन के लिए नियम और मानक तय नहीं कर लेती. न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन की सरकार ने खुद इस टेक्नोलॉजी को अपनाया है और उनका कहना है कि न्यूजीलैंड "डेटा सेंटरों के लिए एक अच्छी जगह" है.
जानें क्या होता है डेटा सेंटर?
बता दें कि सबसे बुनियादी स्तर पर, डेटा सेंटर एक बड़ी और ठंडी रखी जाने वाली इमारत होती है, जिसमें सर्वर और दूसरे IT हार्डवेयर के रैक लगे होते हैं. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, डेटा सेंटर में बहुत कॉम्पैक्ट कंप्यूटर होते हैं जिनमें एयर-कंडीशनिंग यूनिट्स लगी होती हैं, जाहिर है डेटा प्रोसेस करने के लिए चिप्स होती हैं और साथ ही स्टोरेज भी होता है."
- इसमें सबसे जरूरी चीज एयर-कंडीशनिंग है. क्योंकि प्रोसेसिंग की तेजी से सब कुछ गर्म हो जाता है. ऐसे में डेटा के मामले में सबसे बड़ी चुनौती सब कुछ ठंडा रखना ही है.
- ये जगहें बहुत शोर-शराबे वाली भी होती हैं. इसके अंदर इंसान को ईयर-मफ्स लगाने पड़ते हैं क्योंकि न सिर्फ सर्वर के फैन, बल्कि उनके आस-पास लगी एयर-कंडीशनिंग यूनिट्स का भी बहुत शोर डेटा सेंटर के अंतर होता है. ऐसे में कुछ डेटा सेंटर को जान-बूझकर ठंडी जगहों पर बनाया जाता है, जिससे आर्टिफिशियल कूलिंग की जरूरत कम से कम पड़े.
कब से मौजूद हैं डेटा सेंटर?
डेटा सेंटर्स को लेकर बहस और दिलचस्पी बढ़ने के बावजूद, ये कोई नया कॉन्सेप्ट नहीं है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि न्यूजीलैंड में 1980 के दशक से ही किसी न किसी रूप में डेटा सेंटर्स मौजूद रहे हैं, जब क्लाउड कंप्यूटिंग के शुरुआती रूप में आए थे. जिसमें किसी और के सर्वर पर फाइलें, डेटा और दूसरी कंप्यूटिंग सर्विस स्टोर करना और उन्हें नेटवर्क या इंटरनेट कनेक्शन के जरिए एक्सेस किया जाता था.
- टेलीकॉम उन पहली कंपनियों में से एक थी जिसने अपने डेटा सेंटर्स बनाए थे, और उसके बाद न्यूजीलैंड पोस्ट, द वेयरहाउस और कई सरकारी विभागों जैसी दूसरी बड़ी कंपनियों और सर्विस ने भी डेटा सेंटर्स बनाना शुरू किया.
- 'ऑन-प्रिमाइसेस' डेटा सेंटर्स अभी भी बनाए जा रहे हैं. पिछले साल व्हेनुआपई एयरबेस पर सरकार का एक ऐसा डेटा सेंटर खुला जो देश के सबसे संवेदनशील पब्लिक डेटा को होस्ट करता है.
- लेकिन जैसे-जैसे क्लाउड-कंप्यूटिंग की मांग बढ़ी, डेटाकॉम जैसी थर्ड-पार्टी कंपनियों ने बड़े डेटा सेंटर्स बनाए. जो इंफ्रास्ट्रक्चर को मैनेज करती थीं और जिन कंपनियों को जरूरत होती थी, उन्हें जगह किराए पर देती थीं.
किराए पर भी बनाए जाते हैं डेटा सेंटर
एक कंपनी के तौर पर, आप किसी और के डेटा सेंटर में सर्वर हार्डवेयर के कुछ रैक रखने के लिए पैसे दे सकते हैं, और अपने एप्लिकेशन चला सकते हैं. इसमें बिलिंग सिस्टम, इवेंट टिकटिंग- ऐसी कोई भी चीज शामिल हो सकती है जिसके लिए काफी ज्यादा प्रोसेसिंग पावर की जरूरत होती है.
- हाल ही में, माइक्रोसॉफ्ट और अमेजन वेब सर्विसेज (AWS) जैसी कंपनियों ने 'हाइपरस्केल' डेटा सेंटर्स बनाए हैं या किराए पर लिए हैं, जो उन सभी को क्लाउड कंप्यूटिंग सर्विस देते हैं जो इसके लिए पैसे देना चाहते हैं.
- स्थानीय स्तर पर मौजूद इन डेटा सेंटर्स से "लेटेंसी" (डेटा ट्रांसफर में लगने वाला समय) का फायदा मिलता है. पहले, न्यूजीलैंड में AWS या ऐसी ही किसी सर्विस का इस्तेमाल करने वाला कोई भी व्यक्ति सिडनी या उससे भी दूर होस्ट किए गए सर्वर से अपना डेटा एक्सेस करता था.
डेटा सेंटर को लेकर अब क्या है परेशानी?
ऐसे में सवाल उठता है कि जब ये डेटा सेंटर पहले से ही मौजूद हैं तो अब हर कोई इतना परेशान क्यों हो रहा है? जिसके लिए न्यूजीलैंड व दुनिया भर के कई देशों में इसका तेजी से विरोध शुरू हो गया है. दरअसल, जिस चीज का विरोध हो रहा है, उनके बीच मुख्य अंतर इनका पैमाना और उसका मकसद है.
- क्योंकि जिन नए डेटा सेंटरों का प्रस्ताव है और जो बनाए जा रहे हैं, वे AI डेटा सेंटर हैं- जिनका मकसद खास AI मॉडल को ट्रेन करना और चलाना है. 'डेटाग्रिड' - साउथलैंड में बनने जा रहा बड़े पैमाने का डेटा सेंटर न्यूजीलैंड में बनने वाली ऐसी पहली 'AI फैक्टरी' है. ये अलग तरह के डेटा सेंटर हैं, जिन्हें बहुत ज्यादा बिजली और पानी की जरूरत होती है.
- अब तक बने डेटा सेंटरों के मुकाबले इनका पैमाना बहुत बड़ा है. डेटाग्रिड फैसिलिटी 280 मेगावाट बिजली का इस्तेमाल करेगी, जिससे यह 'टीवाई एल्युमीनियम स्मेल्टर' के बाद देश में बिजली की दूसरी सबसे बड़ी उपभोक्ता बन जाएगी.
- इसे रोजाना 6,00,000 लीटर तक भूजल निकालने की मंज़ूरी भी मिली है. जो 'काइकोउरा' जैसे शहर की खपत के बराबर है. हालांकि कंपनी का कहना है कि वह ज्यादातर बारिश के पानी का इस्तेमाल करेगी.
- हालांकि प्रोसेसिंग ज्यादा कुशल होती जा रही है, लेकिन बिजनेस और समाज में AI के तेजी से इस्तेमाल का मतलब है कि इसकी कुल ग्लोबल एनर्जी खपत बढ़ रही है.
2030 डेटा सेंटर्स की एनर्जी खपर हो जाएगी दोगुनी
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी और यूनाइटेड नेशंस के एक रिसर्च ग्रुप, दोनों ने हाल ही में रिपोर्ट जारी की हैं जिनमें अनुमान लगाया गया है कि 2030 तक डेटा सेंटर की एनर्जी खपत दोगुनी हो जाएगी. एक और फर्क मकसद का है. न्यूज़ीलैंड में डेटा सेंटर पहले या तो स्थानीय लोगों के मालिकाना हक और संचालन में थे, या स्थानीय यूजर्स को डेटा-होस्टिंग और दूसरी सेवाएं देते थे. लेकिन जो डेटा सेंटर सिर्फ AI मॉडल को ट्रेन करने के लिए बनाया गया है, वह ऐसा नहीं करता है.
ये भी पढ़ें: Explainer: क्या है 84,084 करोड़ रुपये की 'समुद्र मंथन योजना'? जानिए कैसे घटेगी विदेशी तेल पर भारत की निर्भरता
Surat Mobile Thief Video: मोबाइल चोरी पड़ गई उलटी, लोगों ने पकड़ा रंगे हाथ, फिर जमकर हुई धुनाई
बस स्टॉप पर यात्रियों को अपना आसान निशाना समझने वाले एक मोबाइल चोर की चाल उस वक्त उलटी पड़ गई, जब लोगों ने उसे रंगे हाथ पकड़ लिया. इसके बाद मौके पर ऐसा हंगामा मचा कि देखते ही देखते भीड़ जुट गई और आरोपी की जमकर धुनाई कर दी. यह घटना सूरत के खरवरनगर BRTS जंक्शन की है, जहां कई यात्री बस का इंतजार कर रहे थे. इसी दौरान एक युवक भीड़ का फायदा उठाकर किसी यात्री का मोबाइल चुराने की कोशिश कर रहा था. लेकिन उसकी हरकत पर मौजूद लोगों की नजर पड़ गई और उन्होंने उसे मौके पर ही दबोच लिया.मोबाइल चोरी की कोशिश से नाराज यात्रियों का गुस्सा फूट पड़ा. लोगों ने आरोपी की मौके पर ही पिटाई कर दी और उसे भागने का कोई मौका नहीं दिया. बाद में आरोपी को पुलिस के हवाले कर दिया गया. घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और आरोपी को हिरासत में लेकर थाने ले गई. फिलहाल उससे पूछताछ की जा रही है और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि वह किसी चोरी करने वाले गिरोह से जुड़ा है या नहीं.इस पूरी घटना का वीडियो भी सामने आया है, जो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. वीडियो में लोगों को आरोपी को पकड़कर उसकी पिटाई करते और बाद में पुलिस के हवाले करते देखा जा सकता है.
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
News Nation
News18


















