दक्षिण एशिया की भू राजनीति में एक ऐसा भूचाल आया है जिसने इस्लामाबाद से लेकर रावलपिंडी तक नींद उड़ा दी है पूरी दुनिया की। रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने एक ऐतिहासिक घोषणा की है कि 11 अगस्त को बलूचिस्तान का स्वतंत्रता दिवस घोषित कर दिया गया है। यह सिर्फ एक तारीख नहीं है बल्कि पाकिस्तान के अस्तित्व को दी गई सबसे बड़ी चुनौती है। पाकिस्तान के कब्जे से अपनी आजादी का दावा करने के कुछ ही हफ्तों बाद अब बलूच नेतृत्व ने पूरी दुनिया के देशों से अपील की है कि वे बलूचिस्तान को एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दे। आखिर 11 अगस्त का राज क्या है? दरअसल बलूचिस्तान का दावा है कि वे कभी भी ब्रिटिश भारत का हिस्सा नहीं थे बल्कि वे एक अलग रियासत थे। 11 अगस्त 1947 को यानी पाकिस्तान बनने से 3 दिन पहले बलूचिस्तान ने अपनी आजादी का ऐलान किया। हैरानी की बात यह है कि उस समय द न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी इस खबर को छापा था और ऑल इंडिया रेडियो ने दुनिया को बताया था कि बलूचिस्तान आजाद हो चुका है। लेकिन फिर क्या हुआ?
मार्च 1948 में पाकिस्तान की सेना ने जबरन बलूचिस्तान में घुसकर उस पर कब्जा कर लिया। आज के बलूच नेता मीरियार बलूच ये कहते हैं कि पाकिस्तान के साथ उनका रिश्ता सिर्फ और सिर्फ अवैध कब्जे का है। इसलिए 11 अगस्त को फिर से मनाना उस खोई हुई आजादी को वापस पाने की एक सबसे बड़ी मुहिम है। दरअसल रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान के ताजा बयान में पाकिस्तान पर जो आरोप लगाए गए हैं, वह रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। बयान में कहा गया है कि पाकिस्तान का जन्म ही इस पूरे क्षेत्र में अशांति और आतंकवाद का कारण बना है। इसमें साफ तौर पर जिक्र किया गया है कि कैसे पाकिस्तान की नीतियों ने कश्मीर में घुसपैठ की। कैसे 1971 में पूर्वी पाकिस्तान जो अब बांग्लादेश है वहां नरसंहार किया गया पाकिस्तानी सैनिकों के द्वारा और कैसे जॉर्डन में फिलिस्तीनियों के खिलाफ सैन्य अभियान चलाए गए। इतना ही नहीं, बलूच नेतृत्व ने 1998 के चगाई परमाणु परीक्षणों को भी याद दिलाया जो बलूचिस्तान की जमीन पर किए गए थे, और जिससे वहां की पर्यावरण और जनता को भारी नुकसान पहुंचा था। उनका तर्क सीधा है कि जब तक पाकिस्तान अपने मौजूदा नक्शे में रहेगा तब तक ना तो भारत सुरक्षित है और ना ही अफगानिस्तान और ना ही पूरी दुनिया।
अब बलूचिस्तान की यह लड़ाई सिर्फ जंगलों और पहाड़ों तक सीमित नहीं रह गई है। अब यह डिप्लोमेसी की मेज पर पहुंच चुकी है और बलूच नेतृत्व ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय विशेषकर भारत, अमेरिका और यूरोपीय देशों से अपील कर दी है और उनका कहना है कि 60 मिलियन बलूच जनता अपनी संप्रभुता के लिए तैयार खड़े हैं। बलूच दुनिया से पूछ रहे हैं कि अगर सूडान अलग हो सकता है अगर तिमोर लेसे को पहचान मिल सकती है तो बलूचिस्तान को क्यों नहीं? वे चाहते हैं कि दुनिया पाकिस्तान के प्रोपेगेंडा को पीछे छोड़कर बलूचिस्तान की जमीनी हकीकत देखे जहां हर दिन युवा लापता हो रहे हैं और संसाधनों की लूट मची हुई है।
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न्यूज 18 इंडिया के मशहूर शो भैयाजी कहिन के दौरान उस वक्त एक दिलचस्प और सीख देने वाला नजारा देखने को मिला, जब कानपुर से आए एक मीडिया स्टूडेंट ने वरिष्ठ पत्रकार प्रतीक त्रिवेदी से कह दिया कि वह उनकी तरह बनना चाहता है. इस पर प्रतीक त्रिवेदी ने तुरंत मुस्कुराते हुए उसे टोक दिया और कहा, "ये गलती मत कर देना बेटा, हमारे जैसा मत बनना... हमसे बेहतर बनो." पत्रकारिता की बारीकियां समझाते हुए भैयाजी ने कहा कि आज के दौर में मीडिया की पढ़ाई तो हो रही है लेकिन लिखने की आदत छूटती जा रही है. उन्होंने युवा छात्र को गुरुमंत्र देते हुए सलाह दी कि भाषा और वर्तनी का अभ्यास बेहद जरूरी है. पहले अच्छा लिखना सीखो क्योंकि जो अच्छा लिख सकता है, वही बेहतर बोल भी पाएगा. अगर लिखे बिना सिर्फ बोलने पर ध्यान दिया तो ज्ञान का डब्बा गोल हो जाएगा. छात्र को आगे बढ़ने का मूलमंत्र देते हुए उन्होंने कहा कि दूसरों की नकल करने के बजाय अपना आदर्श खुद बनाओ. निष्पक्षता, ईमानदारी, लगातार पढ़ने और लिखने के दम पर ही सच्ची पत्रकारिता संभव है.न्यूज 18 इंडिया के मशहूर शो भैयाजी कहिन के दौरान उस वक्त एक दिलचस्प और सीख देने वाला नजारा देखने को मिला, जब कानपुर से आए एक मीडिया स्टूडेंट ने वरिष्ठ पत्रकार प्रतीक त्रिवेदी से कह दिया कि वह उनकी तरह बनना चाहता है. इस पर प्रतीक त्रिवेदी ने तुरंत मुस्कुराते हुए उसे टोक दिया और कहा, "ये गलती मत कर देना बेटा, हमारे जैसा मत बनना... हमसे बेहतर बनो." पत्रकारिता की बारीकियां समझाते हुए भैयाजी ने कहा कि आज के दौर में मीडिया की पढ़ाई तो हो रही है लेकिन लिखने की आदत छूटती जा रही है. उन्होंने युवा छात्र को गुरुमंत्र देते हुए सलाह दी कि भाषा और वर्तनी का अभ्यास बेहद जरूरी है. पहले अच्छा लिखना सीखो क्योंकि जो अच्छा लिख सकता है, वही बेहतर बोल भी पाएगा. अगर लिखे बिना सिर्फ बोलने पर ध्यान दिया तो ज्ञान का डब्बा गोल हो जाएगा. छात्र को आगे बढ़ने का मूलमंत्र देते हुए उन्होंने कहा कि दूसरों की नकल करने के बजाय अपना आदर्श खुद बनाओ. निष्पक्षता, ईमानदारी, लगातार पढ़ने और लिखने के दम पर ही सच्ची पत्रकारिता संभव है.
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