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​सबरीमाला विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने गठित की 9 जजों की संवैधानिक पीठ, 7 अप्रैल से शुरू होगी भेदभाव मामले की ऐतिहासिक सुनवाई

पठानमथिट्टा: देश के सबसे चर्चित और विवादास्पद कानूनी मामलों में से एक, सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक परंपराओं के नाम पर होने वाले भेदभाव पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्णायक रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने इस मामले की व्यापक समीक्षा के लिए 9 जजों की एक बड़ी संवैधानिक पीठ का गठन कर दिया है।

यह पीठ आगामी 7 अप्रैल से नियमित सुनवाई शुरू करेगी। इस सुनवाई का परिणाम न केवल सबरीमाला बल्कि अन्य धर्मों से जुड़े धार्मिक प्रथाओं और संवैधानिक अधिकारों के संतुलन को तय करेगा।

​9 जजों की पीठ क्यों?

​सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला इसलिए लिया क्योंकि मामला केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं रह गया है। यह कानूनी सवाल उठाता है कि क्या "धार्मिक स्वतंत्रता" (अनुच्छेद 25) का अधिकार "समानता के अधिकार" (अनुच्छेद 14) से ऊपर है? 9 जजों की पीठ इस पर विचार करेगी कि क्या अदालतें किसी धर्म की 'अनिवार्य प्रथाओं' में हस्तक्षेप कर सकती हैं।

इससे पहले 2018 में 5 जजों की पीठ ने महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी, लेकिन उस फैसले के खिलाफ भारी विरोध और दर्जनों पुनर्विचार याचिकाओं के बाद मामले को बड़ी पीठ को सौंपा गया था।

सुनवाई के मुख्य केंद्र बिंदु

​इस ऐतिहासिक सुनवाई के दौरान कोर्ट मुख्य रूप से इन कानूनी पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करेगा:-

धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समानता: क्या संविधान के तहत मिले धार्मिक अधिकारों का इस्तेमाल महिलाओं के साथ भेदभाव के लिए किया जा सकता है?

न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा: क्या कोई अदालत यह तय कर सकती है कि किसी विशेष धर्म की कौन सी परंपरा अनिवार्य है और कौन सी नहीं?

अन्य धर्मों पर प्रभाव: सबरीमाला के साथ-साथ मस्जिदों और दरगाहों में महिलाओं के प्रवेश और गैर-पारसी पुरुषों से शादी करने वाली पारसी महिलाओं के मंदिर प्रवेश के मुद्दों पर भी इस फैसले का असर पड़ेगा।

​पृष्ठभूमि: 2018 का ऐतिहासिक फैसला और विरोध

​2018 में सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के सबरीमाला प्रवेश पर लगी पाबंदी को हटा दिया था। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली पीठ ने इसे 'लैंगिक भेदभाव' बताया था।

हालांकि, इस फैसले के बाद केरल में व्यापक प्रदर्शन हुए और परंपरावादियों ने तर्क दिया कि भगवान अयप्पा 'नैष्ठिक ब्रह्मचारी' हैं, इसलिए वहां महिलाओं का वर्जित होना एक प्राचीन परंपरा है, न कि भेदभाव।

​7 अप्रैल से नियमित जिरह

​चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली यह 9 जजों की पीठ 7 अप्रैल से इस मामले पर दलीलें सुनना शुरू करेगी। कोर्ट ने सभी पक्षों को अपने कानूनी दस्तावेज और लिखित दलीलें पहले ही जमा करने का निर्देश दिया है ताकि सुनवाई सुचारू रूप से चल सके।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भारत के न्यायिक इतिहास में 'धर्म और संविधान' के रिश्तों को परिभाषित करने वाला सबसे बड़ा फैसला साबित होगा।

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