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बम की झूठी धमकी देने वालों पर 10000000 जुर्माना लगाने की तैयारी, जांच के नए तरीकों से जल्द सलाखों के पीछे होंगे अपराधी

School Bomb Threats: स्कूलों को बम से उड़ानें की धमकियां अब अब आम हो चली हैं. आज सुबह ही अहमदाबाद और वडोदरा के कई स्कूलों में बम की धमकी से हड़कंप मच गया. हालांकि जांच में ये झूठी निकली लेकिन इससे बच्चों, अभिावकों और स्कूल प्रशासन कई घंटे डर के साए में रहने को मजबूर रहे. 


इससे पहले भी दिल्ली, मुंबई, जयपुर जैसे शहरों में स्कूलों को बार-बार निशाना बनाया जा रहा है और झूठी बम की खबरें दी जा रही हैं. लगातार हो रही इन घटनाओं के बाद अब सवाल ये है कि ऐसी अफवाह फैलाने वालों पर क्या कार्रवाई होती है? पुलिस इन अपराधियों को कैसे ट्रैक करती है? और ये समस्या क्यों बढ़ रही है, इसके लिए क्या नए कदम उठाए जा रहे हैं? आइए आपको इस खबर में इन सब बातों को सिलसिलेवार तरीके से समझाते हैं.

बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालती हैं ये घटनाएं

पुलिस के अधिकारियों के अनुसार ये धमकियां सिर्फ अफवाह नहीं बल्कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालती हैं. बार-बार ऐसी घटनाएं स्टूडेंट्स में डर पैदा कर रही हैं, उन्हें स्कूल जाने में डर लगता है. पुलिस के अनुसार ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए लोगों में जागरूकता फैलाने की जरूरत है ताकि लोग समझें कि एक मजाक कितना महंगा पड़ सकता है. अगर किसी को इस तरह का झूठ फैलाने वालों के बारे में जानकारी मिले तो तुरंत पुलिस को बताएं यही सबसे सुरक्षित तरीका है.

बम की झूठी अफवाह फैलाने वालों के लिए क्या कहता है कानून?

भारत में झूठी बम धमकियां या अफवाहें फैलाना गंभीर अपराध माना जाता है क्योंकि ये सूचनाएं सार्वजनिक शांति भंग करती हैं और संसाधनों की बर्बादी करती हैं. भारतीय नियमों के अनुसार ऐसे मामलों में सेक्शन 505(1)(b) अगर कोई ऐसी अफवाह फैलाता है जो लोगों में डर या अलार्म पैदा करे तो लागू होता है. इसके अलावा सेक्शन 507 में अगर धमकी अनाम तरीके से दी गई हो जैसे ईमेल या फोन से तो ये क्रिमिनल इंटिमिडेशन माना जाता है. वहीं, ऐसे केस में सेक्शन 182 तब लगता है जब अगर झूठी रिपोर्ट पुलिस या अधिकारियों को दी गई हो जिससे वे कार्रवाई करने पर मजबूर हों.

लग सकता है UAPA, जिसकी सजा है सख्त 

इसके अलावा अगर धमकी ऑनलाइन या ईमेल से आई हो तो आईटी एक्ट की धाराएं भी जोड़ी जा सकती हैं जैसे सेक्शन 66 (कंप्यूटर से जुड़े अपराध). अगर मामला आतंकवाद से जुड़ा लगे तो UAPA (अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट) लग सकता है जो ज्यादा सख्त है. हाल में एयरलाइंस को मिली धमकियों के लिए एयरक्राफ्ट सिक्योरिटी रूल्स में बदलाव हुए लेकिन स्कूलों के लिए मुख्यतः IPC ही आधार है.

बम की झूठी खबर देने पर कितनी है सजा ?

बम की अफवाह या धमकी देने पर अलग-अलग सजा दी जाती है. दरअसल, सजा इस बात पर निर्भर करती है कि मामला कितना गंभीर है. जैसे सामान्य होक्स कॉल में IPC 505 के तहत 3 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है सेक्शन 507 में 2 साल अतिरिक्त जेल और  सेक्शन 182 में 6 महीने जेल या जुर्माना की सजा है. इसके अलावा अगर UAPA लगा तो सजा आजीवन कारावास तक जा सकती है. कानून के जानकारों की मानें तो आतंकी साजिश का हिस्सा होने पर सख्त सजा का प्रावधान है. हाल के सालों में एयरलाइंस के लिए नए नियम आए हैं जहां होक्स कॉल पर 1 करोड़ तक जुर्माना लग सकता है लेकिन स्कूलों के लिए अभी ऐसा स्पेसिफिक नहीं है. 

पुलिस कैसे करती है जांच और अपराधियों को कैसे पकड़ती है?

ये धमकियां ज्यादातर ईमेल या सोशल मीडिया से आती हैं इसलिए जांच साइबर फोरेंसिक पर टिकी होती है. सबसे पहले धमकी मिलते ही पुलिस, बम स्क्वॉड, डॉग स्क्वॉड और फायर ब्रिगेड पहुंचते हैं. स्कूल खाली कराया जाता है सर्च होती है. अगर होक्स कॉल निकली तो FIR दर्ज होती है. ये एफआईआर अननोन पर्सन के खिलाफ होती है.जांच के दौरान साइबर सेल IP एड्रेस ट्रेस करती है. ईमेल प्रोवाइडर्स (जैसे मेल.आरयू या जीमेल) से डेटा मांगती है. लेकिन ज्यादातर अपराधी VPN (वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क) या डार्क वेब यूज करते हैं जो लोकेशन छिपाता है. विदेशी सर्वर्स से आने पर इंटरनेशनल एजेंसियों से मदद ली जाती है.

लगातार क्यों बढ़ रही है समस्या, जांच के क्या नए तरीके अपनाए जा रहे हैं?

जानकारी के अनुसार 2025-26 में ये धमकियां तेजी से बढ़ी हैं. दिल्ली-NCR में सैकड़ों स्कूल इससे प्रभावित हुए हैं. इसके बाद MeitY (मिनिस्ट्री ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड IT) VPN यूज पर नियम बनाने की सोच रही है, क्योंकि ये ट्रेसिंग रोकते हैं वहीं, स्कूल लेवल पर मॉक ड्रिल्स, CCTV बढ़ाना, एंट्री चेक अभिभावकों से सहयोग मांगा जा रहा है.

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क्या मौत के बाद भी जिंदा रहती है चेतना? नई रिसर्च ने बदल दी वैज्ञानिक सोच

अब तक माना जाता रहा है कि मौत का मतलब है दिमाग और दिल का हमेशा के लिए बंद हो जाना. लेकिन हाल ही में हुए एक नई रिसर्च इस सोच को चुनौती दे रही है. वैज्ञानिकों का कहना है कि चेतना यानी Consciousness, मौत के बाद भी कुछ समय तक मौजूद रह सकती है.

कई अध्ययनों में सामने आए चौंकाने वाले नतीजे

Arizona State University की शोधकर्ता अन्ना फाउलर ने दर्जनों वैज्ञानिक अध्ययनों की समीक्षा की. इनमें Near Death Experience, हार्ट अटैक के दौरान चेतना और मरते समय दिमाग की गतिविधियों पर रिसर्च शामिल थी.

20% मरीजों को याद रहा ‘मौत का वक्त’

रिसर्च में सामने आया कि हार्ट अटैक से बचने वाले करीब 20 फीसदी लोगों को उस समय की घटनाएं याद थीं, जब उनका दिमाग काम करना बंद कर चुका था. कुछ मरीजों ने बताया कि दिल रुकने के बावजूद वे आसपास की बातें समझ पा रहे थे।

वैज्ञानिकों ने इंसानों और जानवरों में रिकॉर्ड किया कि मरते समय दिमाग की गतिविधि अचानक सामान्य जागने की स्थिति से भी ज्यादा तेज हो जाती है.
कुछ मामलों में तो दिल रुकने के बाद भी न्यूरॉन्स सक्रिय पाए गए.

90 मिनट बाद तक भी चल सकती है दिमाग में हलचल 

अन्ना फाउलर ने बताया कि कुछ स्टडीज में देखा गया है कि मौत घोषित होने के 90 मिनट बाद तक भी दिमाग में हलचल बनी रहती है. उन्होंने यह बात American Association for the Advancement of Science की एक कॉन्फ्रेंस में कही. फाउलर के मुताबिक मौत कोई एक सेकंड की घटना नहीं है. यह मिनटों और घंटों में होने वाली प्रक्रिया है. उन्होंने कहा कि जैविक मौत तुरंत अपरिवर्तनीय नहीं होती.

ऑर्गन डोनेशन और CPR पर पड़ेगा असर

इस रिसर्च का असर ऑर्गन डोनेशन के समय और CPR की समय सीमा पर भी पड़ सकता है. अगर दिमाग देर तक सक्रिय रहता है, तो इलाज और पुनर्जीवन की संभावनाएं बढ़ सकती हैं. 

क्या कहते हैं डॉक्टर? 

इस हफ्ते डॉ. सैम पार्निया ने भी चौंकाने वाला खुलासा किया. वे NYU Langone School of Medicine में क्रिटिकल केयर रिसर्च के डायरेक्टर हैं. उन्होंने बताया कि कुछ मरीजों ने कहा कि उन्होंने अपनी मौत की घोषणा तक सुनी थी. 2023 की उनकी स्टडी में CPR के दौरान एक घंटे तक दिमाग की उच्च स्तरीय तरंगें दर्ज की गईं.

सोच, याददाश्त और चेतना बनी रहती है

इन ब्रेन वेव्स का संबंध सोचने, याद रखने और जागरूकता से था. इससे यह संकेत मिलता है कि दिल रुकने के बाद भी चेतना पूरी तरह खत्म नहीं होती. शोधकर्ताओं का मानना है कि मौत को अब एक स्थिर सीमा नहीं, बल्कि एक बदलती प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए. यह रिसर्च चिकित्सा, नैतिकता और दर्शन तीनों क्षेत्रों में नई बहस छेड़ रही है.

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