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अब चश्मे से पूछ सकेंगे सवाल? Nothing ला रहा है AI Smart Glasses, ChatGPT का भी मिल सकता है साथ

Nothing दो तरह के AI Smart Glasses पर काम कर सकता है. एक मॉडल में म्यूजिक और कॉलिंग, जबकि दूसरे में कैमरा, ChatGPT और रियल-टाइम ट्रांसलेशन मिल सकता है. लॉन्च की तारीख अभी कन्फर्म नहीं है.

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सुप्रीम कोर्ट बोला- इंटरनेट इस्तेमाल करना बच्चों का अधिकार:इससे पूरी तरह दूर रखना बेतुका; बैन लगाना ऑनलाइन सुरक्षा का सही तरीका नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इंटरनेट इस्तेमाल करना हर बच्चे का मौलिक अधिकार है। बच्चों को इससे पूरी तरह दूर रखना बेतुका होगा। कोर्ट ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा और उनकी आजादी एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं। उन्हें दोनों का अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट पर गलत कंटेंट मौजूद होने के कारण बच्चों को इससे दूर रखना समस्या का सही समाधान नहीं है। उम्र के आधार पर इंटरनेट इस्तेमाल करने पर पूरी तरह रोक लगाने से बच्चे ज्यादा असुरक्षित वेबसाइटों और प्लेटफॉर्म पर जा सकते हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि बच्चों को इंटरनेट से दूर करना नहीं, बल्कि उन्हें ऑनलाइन सुरक्षित रखना जरूरी है। इसके लिए अदालत ने सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही तय करने, बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट को हटाने और ऑनलाइन सुरक्षा के उपाय मजबूत करने के निर्देश दिए हैं। क्या मामला था? सुप्रीम कोर्ट बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री (CSEAM) को सोशल मीडिया और दूसरी ऑनलाइन सेवाओं से हटाने की व्यवस्था मजबूत करने से जुड़े मामले की सुनवाई कर रहा था। इसी दौरान अदालत के सामने यह सवाल आया कि बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए क्या उन्हें इंटरनेट और सोशल मीडिया से पूरी तरह दूर रखा जाना चाहिए। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि इंटरनेट जानकारी, पढ़ाई और विचारों के आदान-प्रदान का अहम माध्यम है। दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले कई बच्चों के लिए यह सीखने और जानकारी पाने का एकमात्र जरिया हो सकता है। विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए भी इंटरनेट उनके जैसे लोगों से जुड़ने और साथ पाने का माध्यम बन सकता है। उम्र के आधार पर पूरी तरह रोक लगाना सही नहीं कोर्ट ने कहा कि सिर्फ कानून बनाकर बच्चों को इंटरनेट इस्तेमाल करने से रोक देने पर वे इसका इस्तेमाल बंद नहीं कर देंगे। इसके बजाय वे ऐसे प्लेटफॉर्म या वेबसाइट पर जा सकते हैं, जहां सुरक्षा के इंतजाम कम हों और खतरे ज्यादा हों। अदालत ने यह भी चिंता जताई कि इंटरनेट इस्तेमाल करने पर रोक के डर से ऑनलाइन धमकी या शोषण का सामना कर रहे बच्चे अपने माता-पिता, अभिभावकों या भरोसेमंद लोगों को इसकी जानकारी देने से बच सकते हैं। उन्हें डर हो सकता है कि घटना बताने पर उन्हें इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए डांट पड़ेगी। कोर्ट ने उम्र के आधार पर सभी बच्चों पर एक जैसी रोक लगाने को ऐसा उपाय बताया, जिसके असरदार होने के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। उसने यह चिंता भी जताई कि हर यूजर की उम्र पता करने के लिए लगातार निजी जानकारी जुटानी और उसकी निगरानी करनी पड़ सकती है। इससे निजता के उल्लंघन और डेटा के गलत इस्तेमाल का खतरा बढ़ सकता है। बच्चों की सुरक्षा के लिए सुझाए ये उपाय सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इंटरनेट इस्तेमाल करने का अधिकार होने का मतलब यह नहीं है कि बच्चों के लिए सुरक्षा संबंधी नियम नहीं बनाए जाने चाहिए। बच्चों की उम्र के हिसाब से उचित और संतुलित उपाय जरूरी हैं। कोर्ट ने सुझाव दिया कि सोशल मीडिया पर बच्चों के अकाउंट बनाने में माता-पिता की सहमति, मार्गदर्शन और निगरानी को अहमियत दी जा सकती है। अदालत ने बच्चों के अकाउंट डिफॉल्ट रूप से निजी रखने, अनजान वयस्कों के संदेश और संपर्क सीमित करने तथा बच्चों को दिखाए जाने वाले विज्ञापनों और कंटेंट पर नियंत्रण रखने जैसे उपाय सुझाए। छोटे बच्चों के लिए अलग ‘चाइल्ड मोड’ भी बनाया जा सकता है। इन उपायों को लागू करने का तरीका केंद्र सरकार तय करेगी। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि सरकार बच्चों की पहुंच उन सेवाओं या कंटेंट तक सीमित कर सकती है, जो उनके लिए नुकसानदेह हैं। उदाहरण के तौर पर, वयस्क सामग्री वाली वेबसाइटों पर रोक लगाने से सरकार को नहीं रोका गया है। बच्चों से जुड़े आपत्तिजनक कंटेंट के लिए बनेगा राष्ट्रीय डेटाबेस कोर्ट ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट को पहचानने और हटाने के लिए राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने का निर्देश दिया। इसमें प्रमाणित कंटेंट की डिजिटल पहचान यानी हैश और उन वेबसाइटों के लिंक रखे जाएंगे, जहां यह सामग्री उपलब्ध है। डेटाबेस में असली फोटो या वीडियो नहीं रखे जाएंगे। इस व्यवस्था से सोशल मीडिया कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म पर मौजूद सामग्री का मिलान डेटाबेस से कर सकेंगी। इससे एक प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद वही सामग्री दूसरे प्लेटफॉर्म पर दोबारा अपलोड होने पर भी पहचानी जा सकेगी। कोर्ट ने डेटाबेस में दर्ज हर सामग्री की कई स्तरों पर जांच करने को कहा। कम से कम तीन प्रशिक्षित विशेषज्ञ स्वतंत्र रूप से तय करेंगे कि संबंधित सामग्री बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी है या नहीं। गलत पहचान के कारण वैध कंटेंट न हटे, इसके लिए रिकॉर्ड रखने, स्वतंत्र ऑडिट और शिकायत निवारण की व्यवस्था भी करनी होगी। सोशल मीडिया कंपनियों को 2 घंटे में देनी होगी रिपोर्ट कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया कंपनियों को बच्चों के यौन शोषण से जुड़ा कंटेंट हटाने के साथ भारतीय कानून के तहत संबंधित पुलिस इकाई या साइबर क्राइम पोर्टल को भी जानकारी देनी होगी। अगर कोई कंपनी अपनी जांच में ऐसा कंटेंट हटाती है, जिसका स्रोत पता नहीं है, तो उसे दो घंटे के भीतर रिपोर्ट करनी होगी। शिकायत के बाद कंटेंट हटाने के मामले में भी शिकायत का निपटारा होने के दो घंटे के भीतर रिपोर्ट देनी होगी। राष्ट्रीय डेटाबेस में दर्ज कंटेंट से मिलान होने पर हटाई गई सामग्री की जानकारी संबंधित प्राधिकरण को हर सप्ताह एक साथ देनी होगी। अदालत ने कंपनियों को अपनी वेबसाइट और ऐप पर शिकायत अधिकारी की जानकारी स्पष्ट रूप से दिखाने और ऐसे मामलों के लिए अलग शिकायत विकल्प देने को कहा। हर शिकायत की प्राप्ति 24 घंटे के भीतर बतानी होगी। साथ ही, शिकायतकर्ता को फैसले और उसके कारण की जानकारी देनी होगी। नियम तोड़ने वाली कंपनियों पर जुर्माने पर विचार सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से उन सोशल मीडिया कंपनियों पर आर्थिक जुर्माना लगाने की व्यवस्था पर विचार करने को कहा, जो आईटी कानून और नियमों का पालन नहीं करतीं। जुर्माना तय करते समय उल्लंघन की गंभीरता, उसकी अवधि, बार-बार हुई चूक और कंपनी के आकार व कारोबार को ध्यान में रखने की बात कही गई। कोर्ट ने पेड और सब्सक्रिप्शन वाली सेवाओं पर भी सख्त निगरानी रखने को कहा, ताकि इनके जरिए बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री न दिखाई जाए और न फैलाई जाए। सरकार से ऐसी सामग्री के प्रसार से होने वाली कमाई जब्त करने के विकल्प पर भी विचार करने को कहा गया। बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षा की शिक्षा देने पर जोर कोर्ट ने कहा कि तकनीकी उपायों के साथ बच्चों को ऑनलाइन खतरों की पहचान करना और उनकी शिकायत करना भी सिखाना जरूरी है। बच्चों की उम्र के अनुसार सहमति, सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श, निजी जानकारी की सुरक्षा, ऑनलाइन शोषण और शिकायत दर्ज कराने के तरीकों की जानकारी दी जानी चाहिए। अदालत ने NCERT और राज्य शैक्षिक संस्थाओं को बाल मनोवैज्ञानिकों, शिक्षकों और अभिभावक विशेषज्ञों की सलाह से इस विषय पर पढ़ाई की सामग्री तैयार करने को कहा। केंद्र सरकार को इन निर्देशों को लागू करने की प्रगति पर हलफनामा दाखिल करना होगा। मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर 2026 को होगी।

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