Delimitation पर सर्वदलीय बैठक की मांग, Shaina NC बोलीं संसद में रचनात्मक हो विपक्ष
शिवसेना नेता शायना एनसी ने शनिवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे गए उस पत्र का स्वागत किया, जिसमें परिसीमन प्रस्तावों पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की गई है। साथ ही, उन्होंने विपक्ष से संसदीय कार्यवाही में रचनात्मक रूप से भाग लेने का आग्रह किया। खड़गे की मांग पर प्रतिक्रिया देते हुए शायना एनसी ने कहा कि यह अच्छी बात है कि विपक्ष ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के साथ उनसे मिलने की इच्छा जताई है। लेकिन सच तो यह है कि जब संसद सत्र चल रहा होता है और मल्लिकार्जुन खड़गे को संसद के भीतर बैठकर चर्चा और बहस करनी चाहिए, तब वे वहां मौजूद नहीं होते, बल्कि संसद के बाहर विरोध-प्रदर्शन कर रहे होते हैं।" उन्होंने विपक्ष के नेताओं से संसदीय कार्यवाही में सकारात्मक रूप से हिस्सा लेने और महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा व बहस में शामिल होने का आग्रह किया।
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उन्होंने कहा उन्हें संसद सत्र में भी सकारात्मक रूप से भाग लेना चाहिए।" खड़गे ने प्रधानमंत्री मोदी को चौथा पत्र लिखकर परिसीमन (डिलिमिटेशन) के प्रस्तावों पर चर्चा के लिए तत्काल सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है, ताकि संसद में पेश किए जाने और अंतिम रूप दिए जाने से पहले इन पर बात हो सके। शुक्रवार को भेजे गए अपने पत्र में, खड़गे ने इस बात पर चिंता जताई कि 13 अगस्त, 2026 को मानसून सत्र के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित (एडजॉर्न साइन डाई) होने के बाद से 64 दिन बीत चुके हैं, जो कि एक "अभूतपूर्व" स्थिति है, क्योंकि सत्र का औपचारिक सत्रावसान (प्रोरोग) भी नहीं हुआ है। उन्होंने सरकार को चेतावनी दी कि राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति बनाए बिना कोई भी बड़ा संवैधानिक संशोधन न लाया जाए। खड़गे ने लिखा, "13 अगस्त, 2026 को संसद का मानसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुए 64 दिन हो चुके हैं और संसद के दोनों सदनों का अभी तक सत्रावसान नहीं हुआ है। यह स्थिति अभूतपूर्व है।" कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी याद दिलाया कि उन्होंने इससे पहले 11 अप्रैल, 16 जुलाई और 27 अगस्त को प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर परिसीमन पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की थी। खड़गे ने अप्रैल में पेश किए गए 'परिसीमन संवैधानिक संशोधन विधेयक' का जिक्र किया, जो 17 अप्रैल को लोकसभा में जरूरी दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में विफल रहा था। सरकार से नए प्रस्तावों पर आगे बढ़ने से पहले राजनीतिक दलों से सलाह लेने का आग्रह करते हुए खड़गे ने कहा, "कृपया अपने नए प्रस्तावों को संसद में विचार के लिए अंतिम रूप देने से पहले उन पर विस्तृत चर्चा के लिए एक सर्वदलीय बैठक बुलाएं।
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सभी राजनीतिक दलों को आपस में, एक-दूसरे के साथ और अन्य सभी हितधारकों के साथ विचार-विमर्श करने के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए।" उन्होंने बिना उचित परामर्श के संसद में संवैधानिक संशोधनों को जबरन पारित कराने के खिलाफ भी चेतावनी दी और कहा, "कृपया एक बार फिर किसी बड़े संवैधानिक संशोधन विधेयक को संसद में जबरन पारित कराने की कोशिश न करें, जैसा कि आपने पहले भी किया था और जिसका वही हश्र हुआ, जिसका वह हकदार था।" कांग्रेस ने मानसून सत्र की स्थिति पर स्पष्टता मांगी है और मांग की है कि संसद में कोई भी नया कानून लाने से पहले राजनीतिक दलों और क्षेत्रीय हितधारकों को प्रस्तावित बदलावों की जांच करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाए। ( खड़गे के पत्र पर शायना एनसी ने कहा कि विपक्ष को संसद में सकारात्मक रूप से भाग लेना चाहिए।
Emergency ने देश को Rule of Law का फर्क सिखाया, लखनऊ में बोले योगी आदित्यनाथ
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार को लखनऊ में डॉ. राम मनोहर लोहिया नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के पांचवें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए भारत के राजनीतिक और संवैधानिक इतिहास के कुछ अहम पलों को याद किया। इनमें 1975 में आपातकाल (इमरजेंसी) लागू होना और अनुच्छेद 370 को हटाना शामिल है। छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने 1975 के आपातकाल का जिक्र किया और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस हंसराज खन्ना द्वारा जताई गई असहमति को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि उस दौर ने देश को 'कानून के शासन' (rule of law) और 'कानून के जरिए शासन' के बीच का अंतर सिखाया। मुख्यमंत्री ने कहा यह वही उत्तर प्रदेश है, जिसके हाई कोर्ट ने 12 जून को भारत के सबसे शक्तिशाली पद पर बैठे व्यक्ति का चुनाव रद्द कर दिया था। ठीक 13 दिन बाद, इसके बदले में देश में आपातकाल लगा दिया गया... उस समय सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस हंसराज खन्ना ने अकेले असहमति जताई थी, और उन्हें इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। लेकिन इतिहास कभी बेकार नहीं जाता। हाल ही में आपने देखा होगा कि 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने उसी अकेली असहमति को सही माना। 1975 ने देश को 'कानून के शासन' और 'कानून के जरिए शासन' के बीच का फर्क सिखाया। देश के लिए 1975 का यही सबक है।
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जब हम दीक्षांत समारोहों में जाते हैं, तो वहां दिए जाने वाले भाषण अक्सर काफी लंबे और विस्तृत होते हैं। इसलिए, उस परंपरा से हटकर, मैं आपसे कुछ अलग तरह से बात करना चाहता हूँ। आपके कार्यक्षेत्र और आपके करियर के रास्ते को ध्यान में रखते हुए। पिछले कुछ वर्षों में, आपने शायद यहाँ इन्हीं विषयों पर चर्चा सुनी और देखी होगी। केशवानंद भारती और पुट्टास्वामी जैसे महत्वपूर्ण कानूनी मामलों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ये मुद्दे अक्सर कानूनी चर्चाओं में आते हैं और अदालतों में इन पर बहस होती है। "कानूनी चर्चाओं में हमें अक्सर इन मामलों का जिक्र मिलता है—केशवानंद भारती मामले से लेकर पुट्टास्वामी मामले तक। ये ऐसे विषय हैं जिन पर हम अक्सर अदालतों में चर्चा और बहस करते हैं। इसीलिए आज आपके दीक्षांत समारोह के अवसर पर, जब आप अपनी डिग्रियां प्राप्त कर रहे हैं, मैं यहाँ आया हूँ ताकि हम इन्हीं मुद्दों पर फिर से बात कर सकें। मुख्यमंत्री ने 16 मई 2014 का भी जिक्र किया, जब 30 वर्षों के बाद देश में किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने।
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