साध्वी प्रेम बाईसा की हार्ट अटैक से हुई थी मौत:कंपाउंडर की 3 स्तर पर लापरवाही आई सामने; 44 लोगों के बयान लिए थे
कथावाचक साध्वी प्रेम बाईसा की मौत हार्ट अटैक से हुई थी। जोधपुर पुलिस कमिश्नर ओमप्रकाश ने यह खुलासा शनिवार शाम किया है। कमिश्नर ने बताया- मेडिकल बोर्ड की विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार साध्वी की मौत का मुख्य कारण फेफड़ों की गंभीर बीमारी के चलते आया हार्ट अटैक (कार्डियोपल्मोनरी अरेस्ट) था। जांच में यह भी सामने आया है कि इलाज के दौरान कंपाउंडर देवी सिंह की ओर से नियमों की अनदेखी की गई। इस स्थिति में लापरवाही सामने आई। पुलिस कमिश्नर ने बताया कि 12 फरवरी को मिली एफएसएल रिपोर्ट और हिस्टोपैथोलॉजिकल रिपोर्ट के आधार पर बोर्ड ने निष्कर्ष निकाला है कि मौत 'शॉक' के कारण हुई, जो फेफड़ों की बीमारी (अस्थमा/सीओपीडी) के परिणामस्वरूप आए कार्डियोपल्मोनरी अरेस्ट से हुई। कमिश्नर ने स्पष्ट किया कि साइंटिफिक जांच और इन्वेस्टिगेशन में साध्वी के शरीर में जहर का नहीं पाया गया है। साथ ही किसी भी प्रकार के यौन अपराध या बाहरी व आंतरिक चोट के निशान भी शरीर पर नहीं मिले हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए गठित एसआईटी ने इस मामले में हर स्तर पर साक्ष्य जुटाए हैं। कंपाउंडर की तीन स्तर पर लापरवाही आई सामने 1.ड्रग रूल्स की अवहेलना- जो इंजेक्शन दिया गया वह 'शेड्यूल-एच' श्रेणी का था, जिसे केवल एक रजिस्टर्ड डॉक्टर ही लिख या दे सकता है। 2.नेशनल मेडिकल कमीशन एक्ट 2019- कंपाउंडर एक रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिसनर नहीं था, फिर भी उसने डॉक्टर के स्तर की दवा एडमिनिस्टर की। 3. नेशनल नर्सिंग एंड मिडवाइफरी कमीशन एक्ट 2023- नर्सिंग कोर्स करने के बावजूद उसने उन सीमाओं का उल्लंघन किया जो एक नर्स या कंपाउंडर के लिए तय हैं। पुलिस ने पाया कि कंपाउंडर को साध्वी की मेडिकल स्थिति की पहले से जानकारी थी, इसके बावजूद उसने निर्धारित मानकों की अवहेलना की। मेडिकल बोर्ड से दोबारा मांगी राय पुलिस कमिश्नर ओमप्रकाश ने बताया कि कुछ दवाओं के प्रभाव को लेकर मेडिकल बोर्ड से दोबारा राय मांगी है। बोर्ड की अंतिम राय आने के बाद कंपाउंडर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता और राजस्थान मेडिकल एक्ट 1952 के तहत कार्रवाई की जाएगी। बता दें जोधपुर शहर के बोरानाडा इलाके में आरती नगर स्थित आश्रम में 28 जनवरी को साध्वी प्रेम बाईसा की तबीयत बिगड़ी थी। तब उन्हें जुकाम होने और सांस लेने में परेशानी होना बताया गया था। तब इलाज के लिए कंपाउंडर देवीलाल सिंह को बुलाया गया था। कंपाउंडर देवीसिंह ने दो इंजेक्शन लगाए थे। इंजेक्शन लगने के तुरंत बाद उनकी तबीयत अचानक और ज्यादा बिगड़ गई थी। परिजन उन्हें लेकर पाल रोड स्थित प्रेक्षा हॉस्पिटल पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया था। साध्वी के पिता वीरमनाथ हॉस्पिटल से शव को आरती नगर स्थित आश्रम ले आए थे। पुलिस की दखल के बाद देर रात को शव एमजीएच मॉर्च्युरी में रखवाया था। इसके अगले दिन 29 जनवरी को देर शाम एमजीएच हॉस्पिटल में पोस्टमॉर्टम के बाद शव परिजनों को सौंपा गया था। 30 जनवरी को बाड़मेर के परेऊ गांव में साध्वी प्रेम बाईसा को समाधि दी गई थी। 2 फरवरी को विसरा सैंपल जांच के लिए भेजे गए थे। 11 दिन में एफएसएल जांच पूरी हुई। इसके बाद रिपोर्ट गुरुवार को जोधपुर पुलिस को सौंप दी गई। पुलिस ने एफएसएल जांच और पोस्टमाॅर्टम रिपोर्ट के आधार पर विशेषज्ञों से भी राय ली। प्रेम बाईसा की मौत से जुड़ी ये 4 खबरें भी पढ़िए… 1. राजस्थान- साध्वी की संदिग्ध परिस्थिति में मौत के बाद समाधि:पिता बोले- गलत इंजेक्शन से गई जान; भक्तों ने पिता पर ही सवाल उठाए 2. राजस्थान- कथावाचक साध्वी प्रेम बाईसा की मौत के बाद हंगामा-तनाव:पिता का दावा- इंजेक्शन के कारण जान गई 3. दावा– राजस्थान की साध्वी की इंजेक्शन से मौत हुई:पिता बोले- उनके अंतिम शब्द थे 'मुझे न्याय दिलाना', इसलिए 4 घंटे बाद इंस्टाग्राम पोस्ट की 4. साध्वी को इंजेक्शन लगाने वाला नर्सिंग-ऑफिसर पहली बार आया सामने:कहा- प्रेम बाईसा को सांस लेने में दिक्कत थी, 2 इंजेक्शन लगाए थे
पाकिस्तान में प्रेस आजाद नहीं, पत्रकारों के खिलाफ कानून का कर रहा बेजा इस्तेमाल: आईएफजे
इस्लामाबाद, 14 फरवरी (आईएएनएस)। पाकिस्तान में प्रेस की आजादी खतरे में है। इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स (आईएफजे) और उससे जुड़े पाकिस्तान फेडरल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (पीएफयूजे) ने डिजिटल पत्रकार और यूट्यूब होस्ट सोहराब बरकत को लंबे समय तक हिरासत में रखने के लिए कानून के बेजा इस्तेमाल की निंदा करते हुए उनकी तुरंत रिहाई के लिए आवाज उठाई है।
पाकिस्तानी न्यूज आउटलेट सियासत के पत्रकार और इस्लामाबाद में रहने वाले 31 साल के बरकत को पिछले साल 26 नवंबर को यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस में जाते समय इस्लामाबाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हिरासत में लिया गया था।
फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एफआईए) द्वारा गिरफ्तारी के बाद, उन्हें लाहौर में नेशनल साइबर क्राइम इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनसीसीआईए) में ट्रांसफर कर दिया गया और तब से वे प्री-ट्रायल हिरासत में हैं।
18 जनवरी को, सियासत ने बरकत की लगातार हिरासत से बढ़े हुए दबाव और ऑपरेशनल मुश्किलों का हवाला देते हुए अपने इस्लामाबाद ऑफिस को बंद करने का ऐलान कर दिया।
आईएफजे की ओर से जारी एक बयान में कहा गया, बार-बार हो रही एफआईआर, खासकर जब पत्रकार हिरासत में है, तो यह सही प्रक्रिया को दरकिनार करने और मीडिया के खिलाफ कानूनी सिस्टम को हथियार बनाने की एक स्पष्ट कोशिश है। न्यायिक उत्पीड़न का यह तरीका न सिर्फ समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, बल्कि पूरे पाकिस्तान में स्वतंत्र रिपोर्टिंग पर पड़ने वाले डरावने असर को भी दिखाता है। आईएफजे पाकिस्तानी अधिकारियों से सोहराब बरकत को तुरंत रिहा करने और क्रिटिकल रिपोर्टिंग को चुप कराने के लिए क्रिमिनल लॉ का गलत इस्तेमाल बंद करने की अपील करता है।
पत्रकार पर प्रिवेंशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम्स एक्ट (पीईसीए) के तहत तीन अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गईं। पहली 5 अगस्त, 2025 को दर्ज हुई थी; उसमें बरकत पर सरकारी संस्थाओं के बारे में ‘सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली बातें’ और गलत जानकारी फैलाने का आरोप है। ये आरोप कथित तौर पर एक विपक्षी एक्टिविस्ट के साथ उनके इंटरव्यू से जुड़ा है।
दूसरी 26 अगस्त, 2024 को दर्ज हुई थी; उसमें ‘हेट स्पीच’, ‘मानहानि’ और ‘साइबर हैरेसमेंट’ के आरोप शामिल हैं।
तीसरी 5 दिसंबर, 2025 को दर्ज की गई थी, जब बरकत पहले से ही कस्टडी में थे। इसमें ‘साइबर टेररिज्म’ और ‘गलत जानकारी’ फैलाने के आरोप शामिल हैं। यह आरोप कथित तौर पर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में विरोध प्रदर्शनों की सोशल मीडिया कवरेज और बलूचिस्तान की जानी-मानी ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट महरंग बलूच के नोबेल शांति पुरस्कार नॉमिनेशन से जुड़ा है।
आईएफजे के मुताबिक, दिसंबर 2025 में कोर्ट ने बरकत को दो मामलों में जमानत दे दी थी, लेकिन लाहौर हाई कोर्ट ने 21 जनवरी को उसकी तीसरी जमानत अर्जी खारिज कर दी। प्रॉसिक्यूशन ने उसे भगोड़ा करार दिया था।
पत्रकार की लीगल टीम का कहना है कि बरकत को उसकी गिरफ्तारी से पहले शुरुआती शिकायतों के बारे में कभी नहीं बताया गया था। हाल ही में, 3 फरवरी को, एनसीसीआईए ने एक संबंधित मामले में पत्रकार को पहले दी गई जमानत को चुनौती देने और रद्द करने के लिए कदम उठाया।
पाकिस्तान फेडरल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (पीएफयूजे) ने कहा, पत्रकारों को गलत तरीके से गिरफ्तार करना प्रेस की आजादी पर रोक लगाने जैसा है और यह किसी भी तरह से मंजूर नहीं है। सरकार को पत्रकार को तुरंत रिहा करना चाहिए।
इससे पहले, पाकिस्तान की ह्यूमन राइट्स काउंसिल (एचआरसी) ने बरकत की मनमाने ढंग से हिरासत, उनको जबरदस्ती गायब करने के पैंतरे और न्यायिक उत्पीड़न पर गंभीर चिंता जताई थी, और चेतावनी दी थी कि यह मामला देश में प्रेस की आजादी, सही प्रक्रिया और संवैधानिक सुरक्षा उपायों के मामले में परेशानी का सबब बनता है।
पाकिस्तान के एचआरसी के अनुसार, बरकत को हिरासत में लेने के बाद गैर-कानूनी तरीके से लाहौर ट्रांसफर कर दिया गया था, और बाद में उन्हें कई मामलों में फंसा दिया गया, जबकि इस्लामाबाद हाई कोर्ट में यह कहा गया था कि उनके खिलाफ कोई जांच या मामला पेंडिंग नहीं है और वह यात्रा करने के लिए आजाद है।
पिछले साल दिसंबर में कहा गया, कोर्ट के फैसले और बाद की कार्रवाइयों के बीच विरोधाभास साफ दिखता है। ये कानून की अनदेखी दर्शाता है।
मानवाधिकार संस्था ने कहा था, कानूनी प्रक्रिया के अहम स्टेज पर एक के बाद एक मामलों का सामने आना बेल में रुकावट डालने और हिरासत को लंबा खींचने के मकसद से लगता है, जिससे कानूनी तरीकों के गलत इस्तेमाल को लेकर चिंता और बढ़ गई है।
--आईएएनएस
केआर/
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