25 वर्ष और लक्ष्य से आगे की एक कहानी:पीएम मोदी की सत्ता की यात्रा से अधिक जिम्मेदारी की यात्रा है
भारत के राजनीतिक इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व रहे हैं, जिनकी यात्रा केवल सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने संगठन निर्माण, विचारधारा, जनसेवा और राष्ट्र निर्माण की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरते हुए अपनी राजनीतिक पहचान बनाई। नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा को भी इसी व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। यह यात्रा एक ऐसे स्वयंसेवक की यात्रा है, जिसने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा से जनसेवा का संस्कार पाया, भारतीय जनता पार्टी के संगठन में काम करते हुए अपनी पहचान बनाई, गुजरात का नेतृत्व किया और प्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में स्वयं को स्थापित किया। 7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। 2026 में वे सरकार के प्रमुख के रूप में 25 वर्ष पूरे कर रहे हैं। इस अवधि में लोगों के जीवन स्तर में सुधार और देश की प्रगति के लिए उनके निरंतर प्रयास और योगदान रहे हैं। लेकिन नरेंद्र मोदी की कहानी 2001 से शुरू नहीं होती। इस लंबी यात्रा के पीछे दशकों का संगठनात्मक जीवन, अनुशासन और वैचारिक प्रशिक्षण रहा है। RSS के स्वयंसेवक से देश के सेवक तक नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन का विकास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ गहराई से जुड़ा रहा है। उनका संगठनात्मक जीवन अहमदाबाद से शुरू हुआ। बाद में उन्होंने प्रचारक के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई। नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व की पृष्ठभूमि को समझने के लिए आरएसएस के स्वयंसेवक के रूप में उनकी भूमिका को समझना महत्वपूर्ण है। स्वयंसेवकों के जीवन में संगठन, अनुशासन, राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता और समाज के बीच लगातार काम करने पर जोर दिया जाता है। इसके बाद वे भारतीय जनता पार्टी के संगठन में सक्रिय हुए। विभिन्न स्तरों पर संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाते हुए वे राष्ट्रीय राजनीति में आगे बढ़े। इसलिए नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा की एक महत्वपूर्ण बुनियाद संगठन निर्माण और कार्यकर्ता-केंद्रित राजनीतिक संस्कृति रही है। 7 अक्टूबर 2001 को जब नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री का पद संभाला, तब राज्य एक कठिन दौर से गुजर रहा था। 2001 में कच्छ सहित गुजरात के बड़े हिस्से में विनाशकारी भूकंप आया था। इससे पहले सूखा और चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाएं भी राज्य को प्रभावित कर चुकी थीं। मोदी ने अपने विभिन्न वक्तव्यों में इन चुनौतियों का उल्लेख किया है। इसके बाद उन्होंने गुजरात में सुशासन का ऐसा मॉडल विकसित करने का प्रयास किया, जिसमें बुनियादी ढांचे का निर्माण, निवेश, बिजली, कृषि, प्रशासनिक सुधार और समग्र विकास प्राथमिकता बने। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने 13 वर्ष तक जिम्मेदारी संभाली। यह उनके प्रशासनिक अनुभव की महत्वपूर्ण नींव बनी, जिसने बाद में उनकी राष्ट्रीय भूमिका को भी आकार दिया। भाजपा नेता से प्रधानमंत्री तक 2014 का लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति में एक निर्णायक मोड़ था। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को लोकसभा में पूर्ण बहुमत मिला। 26 मई 2014 को उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। 2019 में भाजपा को एक बार फिर पूर्ण बहुमत मिला। 2024 में नरेंद्र मोदी ने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इस यात्रा का एक विशेष रूप से उल्लेखनीय पक्ष यह है कि एक सामान्य संगठनात्मक कार्यकर्ता देश के सर्वोच्च निर्वाचित प्रशासनिक पद तक पहुंचा। 2014 के बाद नरेंद्र मोदी ने अपने साथ ‘प्रधान सेवक’ की अवधारणा को जोड़ा। उनके समर्थकों के लिए यह शब्द उनकी राजनीतिक शैली का प्रतीक बन गया। इस शैली का मूल विचार है कि सत्ता कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है। ‘सबका साथ, सबका विकास’ से ‘विकसित भारत’ तक प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का शासन बड़े पैमाने पर जनकल्याण और विकासोन्मुखी योजनाओं के लिए जाना जाता है। इनमें जनधन योजना, स्वच्छ भारत अभियान, उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण जैसी योजनाएं शामिल हैं, जिनके माध्यम से लाखों लाभार्थियों तक पहुंचने का प्रयास किया गया। गरीबों का कल्याण सरकार की प्राथमिकताओं में प्रमुख रहा है। आवास, स्वच्छता, बैंकिंग, रसोई गैस, स्वास्थ्य सेवाओं और खाद्य सुरक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों को ध्यान में रखकर योजनाएं तैयार की गईं। इन कार्यक्रमों का मूल उद्देश्य गरीबों और समाज के कमजोर वर्गों तक बुनियादी सुविधाएं और आर्थिक अवसर पहुंचाना रहा है। ‘सबका साथ, सबका विकास’ की राजनीतिक अवधारणा आगे बढ़ते हुए ‘सबका प्रयास’ से जुड़ी और ‘विकसित भारत’ के व्यापक राष्ट्रीय लक्ष्य तक पहुंची। डिजिटल इंडिया : शासन की बदली हुई तस्वीर मोदी युग की एक महत्वपूर्ण विशेषता भारत के सार्वजनिक जीवन का तेजी से डिजिटल होना है। डिजिटल भुगतान, यूपीआई, आधार आधारित सेवाएं, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे ने नागरिकों और सरकार के बीच संवाद और सेवाओं के स्वरूप को बदल दिया है। भारत की डिजिटल क्षमता को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी महत्व मिला। 2023 में भारत की जी20 अध्यक्षता के दौरान डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, ग्लोबल साउथ और समावेशी विकास पर विशेष जोर दिया गया। यह बदलाव केवल तकनीकी परिवर्तन नहीं था। इसके साथ शासन को अधिक प्रत्यक्ष, तेज और नागरिक-केंद्रित बनाने का व्यापक प्रयास भी जुड़ा रहा। महत्वपूर्ण फैसलों के जरिए नेतृत्व प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में ऐसे कई महत्वपूर्ण फैसले हुए, जिनका भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव पड़ा। इनमें 2016 की नोटबंदी, 2017 में जीएसटी की शुरुआत, 2019 में जम्मू-कश्मीर से जुड़े संवैधानिक बदलाव, नागरिकता संशोधन कानून तथा नए रेलवे और आपराधिक कानूनों में किए गए बदलाव शामिल हैं। इन फैसलों को जहां समर्थन मिला, वहीं उनकी आलोचना भी हुई। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में यह स्वाभाविक है। किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय की वास्तविक परीक्षा उसके दीर्घकालिक प्रभाव, नागरिकों के अनुभव और संस्थागत असर से होती है। विश्व मंच पर नया भारत पिछले एक दशक में विश्व मंच पर भारत की भूमिका नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की एक महत्वपूर्ण पहचान बनी है। क्वाड, जी20, ग्लोबल साउथ, अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 2023 में जी20 की भारतीय अध्यक्षता विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही। नई दिल्ली में हुए जी20 शिखर सम्मेलन में अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्य बनाया गया। यह भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं और वैश्विक दक्षिण की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रमुखता देने का एक महत्वपूर्ण संकेत था। मोदी की विदेश नीति का एक प्रमुख संदेश यह रहा है कि भारत विश्व व्यवस्था में केवल एक सहभागी के रूप में नहीं रहेगा, बल्कि प्रभाव पैदा करने में सक्षम एक मजबूत राष्ट्र की भूमिका निभाएगा। स्वयंसेवक के मूल्य और प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री की यात्रा को समझने के लिए उनके स्वयंसेवक जीवन को समझना भी महत्वपूर्ण है। संघ परिवार से उन्हें संगठनात्मक मूल्य मिले। भाजपा में कार्यकर्ता के रूप में उनका लंबा अनुभव और प्रशासनिक नेतृत्व का अनुभव—इन तीनों स्तरों ने मिलकर उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को आकार दिया। इसी कारण उनकी राजनीति में संगठन, कार्यकर्ता और जनभागीदारी को विशेष महत्व मिला है। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे अक्सर स्वयं को जनता का सेवक बताते रहे हैं। 2025 में प्रशासनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने के बाद उन्होंने कहा था कि देशसेवा सबसे बड़ा सम्मान और कर्तव्य है। उन्होंने संविधान के मूल्यों से निर्देशित होकर सामूहिक लक्ष्य ‘विकसित भारत’ को हासिल करने के लिए और अधिक मेहनत करने का संकल्प व्यक्त किया था। 25 वर्ष : लक्ष्य से आगे की एक कहानी सार्वजनिक जीवन में 25 वर्ष व्यक्तिगत रूप से एक लंबी अवधि है। नरेंद्र मोदी के मामले में यह अवधि तीन विशिष्ट भूमिकाओं में फैली हुई है—आरएसएस के स्वयंसेवक, भाजपा के संगठनकर्ता और नेता तथा गुजरात के मुख्यमंत्री और भारत के प्रधानमंत्री। इन 25 वर्षों में भारत ने भी कई बदलाव देखे हैं। अर्थव्यवस्था, तकनीक, बुनियादी ढांचे, डिजिटल भुगतान, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं, विदेश नीति और राजनीतिक सोच के स्तर पर अनेक परिवर्तन हुए हैं। देश इन परिवर्तनों को उनके नेतृत्व की उपलब्धियों के रूप में देखता है। स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री के रूप में मोदी का योगदान इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वतंत्रता के बाद भारत के सबसे प्रभावशाली और परिवर्तनकारी प्रधानमंत्रियों में नरेंद्र मोदी का स्थान महत्वपूर्ण है। केवल चुनावी सफलता के आधार पर उनके योगदान का आकलन करना उचित नहीं होगा। उनके शासन की अपनी एक शैली रही है—निर्णय लेने में दृढ़ता, कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार, डिजिटल परिवर्तन, वैश्विक कूटनीति और देश के लिए दीर्घकालिक लक्ष्य निर्धारित करना। किसी भी नेतृत्व का वास्तविक योगदान समय की कसौटी पर परखा जाता है। उसके निर्णयों के स्थायी परिणाम, संस्थाओं पर प्रभाव, नागरिक जीवन में आए बदलाव और भावी पीढ़ियों पर उसके असर से उसका मूल्यांकन होता है। इस अर्थ में नरेंद्र मोदी के 25 वर्ष स्वतंत्र भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं। सेवा से संकल्प तक संघ की शाखा से शुरू हुई यह यात्रा गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यालय से होती हुई भारत के प्रधानमंत्री पद तक पहुंची है। एक संगठन में काम करने वाले कार्यकर्ता से देश का नेतृत्व करने वाले नेता तक और महत्वपूर्ण लक्ष्यों को हासिल करने का आह्वान करने वाले प्रधानमंत्री तक की यात्रा। यदि उनके 25 वर्षों की इस यात्रा को एक वाक्य में लिखा जाए, तो कहा जा सकता है: यह सत्ता की यात्रा से अधिक जिम्मेदारी की यात्रा है। पद की यात्रा से अधिक सेवा की यात्रा है। यह केवल एक व्यक्ति की यात्रा नहीं, बल्कि एक विचार और भारत के उस संकल्प की यात्रा है, जिसे वे ‘विकसित भारत’ के रूप में देखना चाहते हैं।
135 साल पुरानी लाइब्रेरी क्यों तोड़ना चाहती है सरकार:प्रस्ताव- 2 कमरों में शिफ्ट कर लें 8.9 लाख किताबें
सेंट्रल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी देश की सबसे पुरानी और दूसरी सबसे बड़ी सरकारी लाइब्रेरी है। 1969 में शास्त्री भवन में स्थापित की गई ये लाइब्रेरी अब तक 5500 स्क्वायर मीटर में 4 मंजिल में संचालित की जा रही है। मगर अब इसे सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत तोड़ा जाना है और किताबों को शिफ्ट करने के लिए अभी तक दूसरी जगह नहीं मिली है। लाइब्रेरी में 1702 की दुर्लभ किताबें, सरकारी रिकॉर्ड और गजेटियर भी शामिल हैं। इस लाइब्रेरी में हर दिन सरकारी अधिकारी और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र आते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया, 3 हफ्ते में जवाब मांगा 5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने लाइब्रेरी शिफ्ट करने की जगह को लेकर केंद्र सरकार से तीन हफ्ते में जवाब मांगा है। कोर्ट ने पूछा कि नए सेंट्रल विस्टा प्लान में लाइब्रेरी के लिए कितनी जगह दी गई है? जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने सोमवार को केंद्र से जगह का लेआउट प्लान और पूरा ब्योरा हलफनामे में देने को कहा है। कोर्ट ने पूछा कि 1891 से चल रही लाइब्रेरी और 8.5 लाख किताबों के साथ आरके पुरम में रखी 2 लाख किताबें के लिए क्या सिर्फ दो कमरे दिए जा रहे हैं? आरके पुरम में रखी किताबों का क्या होगा? सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए सीनियर एडवोकेट हरिप्रिया पद्मनाभन को अमिकस क्यूरी नियुक्त किया है। 2023 में संस्कृति मंत्रालय ने नई जगह की मांग की थी सेंट्रल विस्टा नई दिल्ली में रायसीना हिल से लेकर इंडिया गेट तक के इलाके का एक बड़ा पुनर्विकास प्रोजेक्ट है। इस प्रोजेक्ट के तहत, शास्त्री भवन जिसमें 4 मंजिला सेंट्रल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी है, उसे तोड़कर उस जगह कर्तव्य भवन 4 और 5 बनाए जाने हैं। इस प्रोजेक्ट की घोषणा 2019 में की गई थी और सरकार को पहले से ही पता था कि प्रशासनिक केंद्र में किन संस्थाओं को जगह दी जाएगी। अब सवाल ये है कि इतनी पुरानी लाइब्रेरी कैसे कहीं और शिफ्ट होगी? कैसे बनी देश की दूसरी सबसे बड़ी लाइब्रेरी इसे 1901 के इंपीरियल लाइब्रेरी एक्ट के तहत मान्यता मिली थी। इस एक्ट में कहा गया था कि 'इसका मकसद एक रेफरेंस लाइब्रेरी बनाना है, जो स्टूडेंट्स के लिए पढ़ने की जगह हो और भारत के भविष्य के इतिहासकारों के लिए भंडार हो। इसमें भारत के बारे में किसी भी समय लिखी गई हर किताब को देखा और पढ़ा जा सके'। ब्रिटिश भारत के पहले इतिहासकार ने शुरुआत की एफ. डब्ल्यू . फॉरेस्टरवे ब्रिटिश भारत के पहले इतिहासकार, शिक्षक और अभिलेखपाल थे। उन्हें कोलकाता इंपीरियल डिपार्टमेंट का पहला क्यूरेटर अपॉइन्ट किया गया था। फॉरेस्टर ने 'प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ बुक्स एक्ट, 1867' के तहत मिले लगभग एक हजार वॉल्यूम (किताबों के सेट) को इकट्ठा किया, जो कलकत्ता की राइटर्स बिल्डिंग में पड़े हुए थे। इस कलेक्शन और उसी बिल्डिंग में मौजूद दूसरे सचिवालय पुस्तकालयों के अलग-अलग कलेक्शन को मिलाकर 'इंपीरियल लाइब्रेरी' नाम दिया गया, जिसका उद्घाटन 11 मई 1891 को हुआ था। ईस्ट इंडिया कॉलेज, फोर्ट विलियम कॉलेज की किताबें शामिल इस लाइब्रेरी कलेक्शन में ईस्ट इंडिया कॉलेज, फोर्ट विलियम कॉलेज और लंदन में ईस्ट इंडिया कंपनी बोर्ड के लाइब्रेरी की किताबें कलेक्शन का हिस्सा रही हैं। हालांकि जब इंपीरियल लाइब्रेरी एक्ट के तहत एक नई इंपीरियल लाइब्रेरी बनाई गई, तो पुराने इंपीरियल रिकॉर्ड्स ऑफिस का पूरा कलेक्शन नई लाइब्रेरी में नहीं भेजा गया, बल्कि कलेक्शन का एक हिस्सा 'इंपीरियल सचिवालय पुस्तकालय' के पास ही रखा गया था। जिससे ये इंपीरियल लाइब्रेरी से अलग पहचाना जा सके और ये राइटर्स बिल्डिंग में ही काम करता रहा। 1912 में राजधानी बदली और लाइब्रेरी का पता भी 1912 में राजधानी के दिल्ली शिफ्ट होने के साथ ही 'इंपीरियल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी' को भी दिल्ली लाया गया और इसे सिविल लाइन्स, दिल्ली की पुरानी सेक्रेटेरिएट बिल्डिंग में रखा गया। 1913 में इसके कलेक्शन का कुछ हिस्सा शिमला सेक्रेटेरिएट भेज दिया गया। 10 फरवरी 1931 को नई दिल्ली में नए सेक्रेटेरिएट के उद्घाटन के साथ, इंपीरियल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी को नॉर्थ ब्लॉक में शिफ्ट कर दिया गया और शिमला में चल रही सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी को भी इंपीरियल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी में मिला दिया गया। 300 स्क्वायर मीटर के दो कमरों का ऑफर, नामंजूर सेंट्रल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी को सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत तोड़ा जा रहा है। सीपीडब्ल्यूडी ने सभी मंत्रालयों को 30 सितंबर तक भवन खाली करने को समय दिया था। हालांकि, आवास और शहरी कार्य मंत्रालय और सीपीडब्ल्यूडी अब तक इस लाइब्रेरी के लिए नई जगह नहीं ढूंढ पाए हैं। लाइब्रेरी के लिए कर्तव्य भवन-2 में 300 स्क्वायर मीटर की दो कमरों की जगह ऑफर की गई थी, जिसे लाइब्रेरी प्रशासन ने इनकार कर दिया। ये लाइब्रेरी CSL भारतीय राज्य के लिए एक वर्किंग आर्काइव (कामकाजी संग्रह) के तौर पर काम करती है, जो इसकी संस्थागत यादों और पिछली सरकारों के कामों और फैसलों का रिकॉर्ड रखता है। यह सरकार के अपने रिकॉर्ड रूम जैसा है। इतनी बड़ी आर्काइव को बगैर किसी सुरक्षा के यूंही छोड़ना चिंताजनक बात है। किताबों को सुरक्षित रखना बड़ा संघर्ष रिपोर्ट के मुताबिक, नेशनल आर्काइव्स एनेक्सी को गिराने और नेशनल म्यूजियम के कलेक्शन को दूसरी जगह ले जाने पर लोगों के बीच बातचीत हुई और विशेषज्ञों की राय ली गई। इससे पता चलता है कि नेशनल म्यूजियम का कलेक्शन 'युगे युगीन भारत म्यूजियम' में ले जाया जा रहा है, जो नॉर्थ और साउथ ब्लॉक की इमारतों में बन रहा है। लेकिन इसकी सही इन्वेंट्री और कैटलॉगिंग, संरक्षण की सुविधाएं, नाजुक और दुर्लभ चीजों के लिए क्लाइमेट-कंट्रोल्ड स्टोरेज, डिजिटाइजेशन, ट्रेंड स्टाफ और लोगों की पहुंच की जरूरत होगी। अस्थाई बदलाव स्थायी क्यों हो सकता है? CSL की क्षेत्रीय भाषाओं का सेक्शन, 'तुलसी सदन लाइब्रेरी’ मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन के निर्माण के लिए 2011 में अस्थायी तौर पर बंद कर दिया गया था। इसके सामान को नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के परिसर में रख दिया गया और ये लाइब्रेरी आज भी बंद है। बिना किसी फाइनल जगह के लाखों दुर्लभ दस्तावेजों को अस्थायी स्टोरेज में ले जाने से उनके खराब होने या खोने का खतरा बढ़ जाता है। जब कोई कलेक्शन स्टोरेज में रखा होता है, तो अधिकारियों और रिसर्च करने वालों की रिकॉर्ड्स तक पहुंच भी नहीं हो पाती है। कौन करता है इसकि सुरक्षा का काम लाइब्रेरी का मंत्रालय इसके लिए जिम्मेदार होता है। पहले ये लाइब्रेरी शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत थी बाद में इसे संस्कृति मंत्रालय को दे दिया गया। कलेक्शन प्रोटोकॉल का क्या होता है नियम जिन इमारतों में आर्काइव (पुराने दस्तावेज) रखे हों, उन्हें खाली करने से पहले कैटलॉगिंग और क्लाइमेट-कंट्रोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था करना जरूरी शर्त होनी चाहिए। पहले डिजिटाइज करें- किसी भी जगह से सामान हटाने से पहले दुर्लभ और नाज़ुक चीजों को डिजिटाइज किया जाना चाहिए। तुलसी सदन को फिर से खोलें- तुलसी सदन लाइब्रेरी को फिर से खोलने के लिए एक समय-सीमा वाला प्लान बनाएं। CSL को दूसरी जगह ले जाने का मामला दिखाता है कि रीडेवलपमेंट के प्लान में उन संस्थानों से पहले ही नई इमारतें बनाने की योजना बना ली गई थी, जिन्हें उनमें आना था। शास्त्री भवन खाली होने से पहले लाइब्रेरी को पक्की जगह मिलती है या नहीं, इससे पता चलेगा कि सेंट्रल विस्टा अपनी पुरानी गलतियों को दोहराने से बचता है या नहीं। -------------------- ये खबर भी पढ़ें.. 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