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‘घुसपैठियों’ को मनमाने तरीके से तीसरे देशों में खदेड़ रहे हैं Trump, Washington Post की रिपोर्ट से हुए खुलासे से पूरी दुनिया में मचा हड़कंप

अमेरिका अब किसी विदेशी नागरिक को अपने देश से बाहर निकालने के लिए उसके मूल देश के दरवाजे पर दस्तक देने और वहां से हरी झंडी मिलने का इंतजार नहीं करता। ट्रंप प्रशासन ने निर्वासन की पूरी परिभाषा ही बदल दी है। जिस व्यक्ति को अमेरिका से बाहर करना है, उसका देश उसे वापस लेगा या नहीं, इस बात पर अब अमेरिका माथापच्ची करने में समय नहीं गंवाता। अमेरिका अब खुद उसके लिए कोई तीसरा ठिकाना तलाश रहा है और उसे वहां पहुंचाने के लिए अपनी तिजोरी से धन खर्च कर रहा है। यानी जिस व्यक्ति को अमेरिका नहीं रखना चाहता, उसे उसके अपने देश में भेजने की बजाय किसी ऐसे देश में धकेला जा रहा है, जिससे उसका कोई नाता तक नहीं है। इस पूरी कवायद में अमेरिका उन देशों को पैसा भी दे रहा है, ताकि वे इन लोगों को अपने यहां रखने के लिए तैयार हो जाएं। यह केवल निर्वासन नहीं, बल्कि अमेरिकी धन, कूटनीतिक दबाव और वैश्विक प्रभाव के सहारे खड़ा किया जा रहा एक ऐसा तंत्र है, जिसमें अमेरिका तय कर रहा है कि उसके यहां से निकाला गया व्यक्ति आखिर दुनिया के किस कोने में पहुंचेगा।

देखा जाये तो अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की आव्रजन नीति अब केवल सीमा बंद करने, गिरफ्तारी और निर्वासन तक सीमित नहीं रह गई है। अमेरिकी समाचार पत्र वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी एक पड़ताल में जो खुलासा किया है उससे पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी विदेश विभाग के जिस तंत्र का मूल काम दुनिया भर से उत्पीड़ित लोगों को शरण और पुनर्वास दिलाना था, उसी को अब दूसरे देशों में लोगों को धकेलने वाली एक विशाल निर्वासन व्यवस्था में बदल दिया गया है। इस पूरी कवायद के लिए कम से कम 410 करोड़ डॉलर की राशि स्वीकृत या प्रतिबद्ध की जा चुकी है और 31 देशों के साथ समझौते किए गए हैं।

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रिपोर्ट के मुताबिक इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में विदेश विभाग के भीतर बनाया गया नया कार्यालय है। इसका नेतृत्व क्रिश्चियन एरहार्ट कर रहे हैं, जो पहले करीब दो दशक तक अमेरिकी दूतावासों की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े रहे थे। अब वही अधिकारी अफ्रीका और दूसरे क्षेत्रों में घूम-घूमकर सरकारों को ऐसे लोगों को स्वीकार करने के लिए तैयार कर रहे हैं, जिनका उन देशों से कोई संबंध तक नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक क्रिश्चियन एरहार्ट को कई विदेशी सरकारों के सामने सामान्य अधिकारी नहीं, बल्कि सीधे व्हाइट हाउस के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उनके पीछे ट्रंप प्रशासन के प्रभावशाली अधिकारी स्टीफन मिलर की निर्णायक भूमिका बताई गई है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिका इन देशों को केवल कूटनीतिक दबाव से नहीं मना रहा, बल्कि भारी आर्थिक प्रोत्साहन भी दे रहा है। कम से कम 81 करोड़ डॉलर सीधे 13 विदेशी सरकारों को देने की प्रतिबद्धता सामने आई है। इसके अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन के लिए 179 करोड़ डॉलर और संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी संस्था के लिए 124 करोड़ डॉलर की राशि का प्रावधान किया गया है। इन संस्थाओं को इन समझौतों का प्रत्यक्ष पक्ष नहीं बताया गया है, लेकिन संबंधित देशों को निर्वासित लोगों को स्वीकार करने के लिए तैयार करने की प्रक्रिया में इन पैसों को प्रोत्साहन के रूप में इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है।

यानी तस्वीर बेहद साफ है। जिस व्यवस्था में कभी अमेरिका दूसरे देशों से भागकर आए लोगों को सुरक्षित जीवन देने के लिए धन लगाता था, अब उसी धन का इस्तेमाल ऐसे देशों को तैयार करने में हो रहा है जो अमेरिका से निकाले गए लोगों को अपने यहां रखने के लिए राजी हों। ट्रंप प्रशासन ने शरणार्थी पुनर्वास की पुरानी दिशा को पलटकर उसे निर्वासन केंद्रित बना दिया है। प्रशासन के अपने एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया है कि संबंधित विभाग की दिशा पूरी तरह बदल दी गई है।

बताया जा रहा है कि कोस्टा रिका भेजी गई उड़ानों में चीन, रूस, ईरान और अफगानिस्तान के लोग थे। इस्वातिनी भेजे गए लोगों में वियतनाम, लाओस, क्यूबा और जमैका के नागरिक शामिल थे। युगांडा केवल अफ्रीकी नागरिकों को लेने पर सहमत हुआ, जबकि कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य ने अफ्रीकी नागरिकों को ही स्वीकार करने से इंकार कर दिया। कुछ देश गंभीर अपराधों के आरोपियों को भी लेने के लिए तैयार हैं, जबकि कुछ ने अपराध की प्रकृति के आधार पर सीमाएं तय की हैं।

अब तक 25 हजार से अधिक लोगों को कम से कम 28 तीसरे देशों में भेजे जाने का अनुमान है। इनमें करीब 20 हजार लोग मेक्सिको भेजे गए। बाकी लोगों को मुख्यतः अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों में धकेला गया। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि इनमें ऐसे लोग हैं जिनके खिलाफ अंतिम निर्वासन आदेश हैं, लेकिन उनके अपने देश उन्हें वापस लेने से इंकार करते हैं या उन्हें वहां भेजने पर उत्पीड़न का खतरा है। प्रशासन का दावा है कि तीसरे देश का रास्ता ऐसे कठिन मामलों को निपटाने का साधन है।

लेकिन यहीं से इस नीति का सबसे गंभीर कानूनी पक्ष शुरू होता है। आलोचकों और आव्रजन वकीलों का आरोप है कि तीसरे देश में भेजकर वहां से संबंधित व्यक्ति को उसके मूल देश में जबरन भेजे जाने का रास्ता बनाया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी कानून में ऐसे स्थान पर भेजना जहां व्यक्ति को उत्पीड़न या यातना का खतरा हो, गंभीर कानूनी सवाल खड़े करता है। गत शुक्रवार को एक संघीय अपीली अदालत ने इस नीति को गैरकानूनी ठहराते हुए कहा कि प्रभावित लोगों को तीसरे देश में भेजे जाने से पहले पर्याप्त सूचना और अपने भय या खतरे से जुड़े दावे रखने का अवसर नहीं दिया गया। हालांकि प्रशासन से इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने की उम्मीद है।

दूसरी ओर, पनामा का मामला इस पूरी व्यवस्था की असली तस्वीर दिखाता है। जनवरी 2025 में अमेरिका ने 299 लोगों को पनामा भेजा, जबकि उनका पनामा से कोई संबंध नहीं था। इनमें ईरानी नागरिक अरसलान सालेह फर्द भी थे। उन्हें न स्थायी निवास मिला, न काम करने का अधिकार और न ही अपने भविष्य की कोई स्पष्ट राह। भाषा की समस्या, आर्थिक तंगी और कानूनी अनिश्चितता ने उन्हें ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया जहां वह महीनों तक एक अस्थायी व्यवस्था में फंसे रहे।

इस पूरी नीति का सामरिक महत्व केवल आव्रजन तक सीमित नहीं है। दरअसल, अमेरिका अब निर्वासन को विदेश नीति के एक औजार में बदलता दिखाई दे रहा है। अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कमजोर या आर्थिक रूप से निर्भर देशों को धन देकर लोगों को स्वीकार कराने से वॉशिंगटन को उन सरकारों पर नया प्रभाव हासिल करने का अवसर मिलता है। लेकिन इससे मानवाधिकारों पर अमेरिकी विश्वसनीयता भी कमजोर पड़ सकती है, क्योंकि जिन देशों में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों की अमेरिकी रिपोर्टें स्वयं मौजूद हैं, उन्हीं देशों के साथ निर्वासन समझौते किए जा रहे हैं।

साथ ही रणनीतिक स्तर पर ट्रंप प्रशासन एक और संदेश दे रहा है। अमेरिका में प्रवेश या वहां टिके रहना ही नहीं, बल्कि निर्वासन के बाद आपका अगला ठिकाना भी वॉशिंगटन तय कर सकता है। यह व्यवस्था संभावित प्रवासियों के बीच भय पैदा करने के लिए भी इस्तेमाल हो रही है। यानी निर्वासन अब वैश्विक स्तर पर बनाया गया निवारक दबाव तंत्र बनता जा रहा है।

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि अमेरिका ने शरणार्थियों के संरक्षण के लिए बने अपने पुराने ढांचे को इतनी तेजी से उलटकर निर्वासन की मशीनरी क्यों बना दिया? उससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब इस व्यवस्था के लिए अरबों डॉलर की आर्थिक प्रतिबद्धताएं की जा रही हैं, दर्जनों देशों को धन के सहारे तैयार किया जा रहा है और हजारों लोगों को ऐसे देशों में भेजा जा रहा है जिनसे उनका कोई रिश्ता नहीं, तो क्या यह केवल सीमा नियंत्रण की नीति है या अमेरिकी विदेश नीति के चरित्र में एक बुनियादी बदलाव है?

बहरहाल, वॉशिंगटन पोस्ट की पड़ताल का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि अमेरिका की शरणार्थी व्यवस्था का एक हिस्सा अब शरण देने की बजाय लोगों को अमेरिका से बाहर धकेलने के लिए इस्तेमाल हो रहा है। साथ ही इस पूरी मशीनरी के पीछे केवल सीमा नहीं, पैसा, कूटनीति, दबाव और वैश्विक शक्ति का इस्तेमाल दिखाई दे रहा है।

-नीरज कुमार दुबे

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वेस्टइंडीज के पॉवेल और रदरफोर्ड को ICC की फटकार:एक-एक डिमेरिट पॉइंट भी मिला; रदरफोर्ड ने वाइड नहीं मिलने पर अंपायर से की बहस

भारत के खिलाफ रांची में खेले गए दूसरे टी-20 में वेस्टइंडीज के बल्लेबाज रोवमन पॉवेल और शेरफेन रदरफोर्ड को ICC नेफटकार लगाई है। दोनों खिलाड़ियों को एक-एक डिमेरिट पॉइंट भी दिया गया है। ICC के मुताबिक, पॉवेल ने आउट होने के बाद बल्ले से गेंद को दूर मारकर नियम तोड़ा, जबकि रदरफोर्ड ने अंपायर के वाइड नहीं देने के फैसले पर नाराजगी जताई। दोनों खिलाड़ियों ने अपने अपराध स्वीकार कर लिए हैं। पॉवेल ने आउट होने के बाद बल्ले से गेंद दूर मारी रोवमन पॉवेल पर ICC की आचार संहिता के अनुच्छेद 2.2 के उल्लंघन का आरोप लगा। यह नियम अंतरराष्ट्रीय मैच के दौरान क्रिकेट उपकरणों, कपड़ों, मैदान के उपकरणों या अन्य सुविधाओं के दुरुपयोग से संबंधित है। वेस्टइंडीज की पारी के छठे ओवर में भारतीय गेंदबाज मयंक यादव ने पॉवेल को आउट किया। पवेलियन लौटते समय पॉवेल ने अपने बल्ले से गेंद को दूर मार दिया। ICC ने इस व्यवहार को आचार संहिता का उल्लंघन माना और उन्हें आधिकारिक फटकार के साथ एक डिमेरिट पॉइंट दिया। रदरफोर्ड ने वाइड नहीं मिलने पर जताई नाराजगी शेरफेन रदरफोर्ड को ICC की आचार संहिता के अनुच्छेद 2.8 के उल्लंघन का दोषी पाया गया। यह नियम अंतरराष्ट्रीय मैच में अंपायर के फैसले पर असहमति जताने से संबंधित है। मामला वेस्टइंडीज की पारी के 13वें ओवर का है। अंपायर ने गेंद को वाइड नहीं दिया, जिससे रदरफोर्ड नाराज हो गए। उन्होंने अंपायर के सामने आक्रामक तरीके से अपनी नाराजगी जाहिर की। चार अधिकारियों ने लगाए थे आरोप दोनों खिलाड़ियों के खिलाफ आरोप मैदानी अंपायर जयरामन मदनगोपाल और रोहन पंडित, तीसरे अंपायर नितिन मेनन तथा चौथे अंपायर वीरेंद्र शर्मा ने लगाए थे। भारत सीरीज में 2-1 से आगे 5 मैचों की सीरीज में भारत 2-1 से आगे हैं। टीम ने वेस्टइंडीज के खिलाफ पहला मैच 8 विकेट और तीसरा मैच 14 रन से जीता था। दूसरे मैच में वेस्टइंडीज ने कप्तान शाई होप के शतक की बदौलत 6 विकेट से जीत दर्ज की थी। -------------------------------------------------- स्पोर्ट्स की यह खबर भी पढ़ें… अभिषेक शर्मा ने सबसे तेज 2000 टी-20 रन बनाए:एक साल में सबसे ज्यादा छक्के लगाने में सूर्या की बराबरी; तिलक के 50 कैच पूरे भारत ने तीसरे टी-20 मैच में वेस्टइंडीज को 14 रन से हरा दिया। इंदौर में खेले गए मुकाबले में अभिषेक शर्मा टी-20 इंटरनेशनल में सबसे तेज 2 हजार रन बनाने वाले खिलाड़ी बन गए। अभिषेक ने एक साल में सबसे ज्यादा छक्के लगाने में सूर्यकुमार यादव की बराबरी भी की। वहीं तिलक वर्मा टी-20 में 50 कैच पूरे करने वाले पांचवे भारतीय खिलाड़ी बन गए। पूरी खबर

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अन्वय द्रविड़ के 151 रन और आर्यवीर सहवाग का शानदार शतक, वीनू मांकड़ ट्रॉफी में चमके दिग्गजों के लाडले

Anvay Dravid Aaryavir Sehwag slams hundred : राहुल द्रविड़ के छोटे बेटे अन्वय द्रविड़ ने वीनू मांकड़ ट्रॉफी में कर्नाटक की कप्तानी करते हुए गुजरात के खिलाफ 100 गेंदों पर 151 रनों की तूफानी पारी खेली. उनकी इस शतकीय पारी की बदौलत कर्नाटक ने 358 रनों के विशाल लक्ष्य को पांच विकेट शेष रहते हासिल कर लिया. वहीं, दूसरे मुकाबले में वीरेंद्र सहवाग के बेटे आर्यवीर सहवाग ने दिल्ली के लिए 143 गेंदों पर 173 रन बनाए, लेकिन उनकी यह शानदार पारी भी टीम को जीत नहीं दिला सकी. Fri, 16 Oct 2026 23:01:42 +0530

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