मंगलवार को मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कांग्रेस खेमे में चल रही उस खींचतान को कम करके आंका, जो दो विधायकों के कैबिनेट में जगह न मिलने पर इस्तीफ़ा देने की पेशकश के बाद शुरू हुई थी। सोमवार को कांग्रेस के 19 विधायकों ने मंत्री पद की शपथ ली। हालांकि, राज्य कैबिनेट के विस्तार में जगह न मिलने के बाद वरिष्ठ कांग्रेस नेता यशवंतरायगौड़ा वी. पाटिल ने विधायक पद से इस्तीफ़ा दे दिया और बेलूर गोपालकृष्ण ने भी इस्तीफ़ा देने की पेशकश की।
पत्रकारों से बात करते हुए डीके शिवकुमार ने कहा कि इस्तीफ़ा देना राजनीति का हिस्सा है। दोनों कांग्रेस नेताओं की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि कैबिनेट में जगह पाने के लिए उन्होंने और जी. परमेश्वर ने धैर्य बनाए रखा था। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस्तीफ़ा देना राजनीति का हिस्सा है। जो इस्तीफ़ा देना चाहते हैं, उन्हें कोई रोक नहीं सकता। अगर वे पार्टी और अपना राजनीतिक भविष्य चाहते हैं, तो उन्हें बने रहना चाहिए। अगर पार्टी है, तो बाकी सब कुछ है। जब धर्म सिंह और सिद्धारमैया के कार्यकाल के दौरान मुझे मंत्री पद नहीं मिला था, तब मैं भी इस्तीफ़ा दे सकता था। क्या मैंने और जी. परमेश्वर ने धैर्य नहीं बनाए रखा था? मैंने सभी मंत्रियों को यह भी निर्देश दिया है कि वे तुरंत अपने-अपने क्षेत्रों का दौरा करें और सूखे से राहत की स्थिति का जायज़ा लें।
इससे पहले सोमवार को शिवकुमार ने उन कांग्रेस नेताओं को भरोसा दिलाया जिन्हें कैबिनेट में शामिल नहीं किया गया था कि उन्हें "सही ज़िम्मेदारियाँ" दी जाएँगी। उन्होंने नाराज़ नेताओं से सब्र रखने को कहा। शपथ ग्रहण समारोह के बाद मीडिया से बात करते हुए शिवकुमार ने माना कि कुछ नेता कैबिनेट में शामिल न किए जाने से नाराज़ हैं और कहा कि पार्टी उनसे बात करेगी और उनकी चिंताओं का समाधान करेगी।
उन्होंने कहा कि हर किसी की अपनी उम्मीदें होती हैं, लेकिन मैं आपको भरोसा दिलाता हूँ कि सभी को सही ज़िम्मेदारियाँ दी जाएँगी और पूरा सम्मान दिया जाएगा। मैं उन सभी लोगों से गुज़ारिश करता हूँ जो नाराज़ हैं कि वे इंतज़ार करें और सब्र रखें। हाँ, कुछ लोग नाराज़ हैं और हम उनसे बात करेंगे। चिंता करने की कोई बात नहीं है। हम अपने सभी नेताओं से बात करेंगे और उनकी चिंताओं का समाधान करेंगे।
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आजकल लगभग हर राजनीतिज्ञ के बयान में एक बात बार-बार सुनाई देती है कि जेन जी यह चाहती है, जेन जी वह चाहती है। चुनावी रणनीतिकारों से लेकर कॉरपोरेट सलाहकारों तक, हर कोई इस पीढ़ी की आकांक्षाओं का विश्लेषण करने में जुटा है। राजनीतिक दल भी दावा कर रहे हैं कि उनकी नीतियां जेन जी की उम्मीदों पर खरी उतरेंगी। यह अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि आज की राजनीति में यह वर्ग कितना निर्णायक बन चुका है। दुनिया के कई देशों में जेन जी ने आंदोलनों के माध्यम से सत्ता प्रतिष्ठानों को चुनौती दी है और कई जगह राजनीतिक परिवर्तन का कारण भी बनी है। ऐसे में कोई भी सरकार या दल युवाओं को हल्के में लेने का जोखिम नहीं उठा सकता। यही वजह है कि प्रधानमंत्री से लेकर विपक्ष के बड़े नेता और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि तक, सभी इस समय जेन जी को अपने पक्ष में आकर्षित करने की कोशिश में लगे हुए हैं।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर जेन जी चाहती क्या है? क्या वह केवल सोशल मीडिया पर सक्रिय, ट्रेंड चलाने वाली और क्षणिक मुद्दों पर प्रतिक्रिया देने वाली पीढ़ी है? या फिर उसके भीतर भविष्य को लेकर गंभीर बेचैनी भी है? हाल में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्रों का आंदोलन इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर देता है। वहां जुटे युवाओं की मांगें किसी वैचारिक बहस से अधिक अपने भविष्य को सुरक्षित करने की थीं। वे समय पर परीक्षाएं चाहते हैं, पारदर्शी भर्ती चाहते हैं, पेपर लीक से मुक्ति चाहते हैं और वर्षों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने की बजाय योग्यता के आधार पर अवसर चाहते हैं।
दरअसल, जेन जी का सबसे बड़ा एजेंडा सम्मानजनक अवसर है। यह पीढ़ी दान या अनुकंपा नहीं चाहती, बल्कि निष्पक्ष व्यवस्था चाहती है। उसे यह स्वीकार नहीं कि मेहनत कोई करे और नौकरी किसी पेपर माफिया या भ्रष्ट तंत्र की वजह से अटक जाए। उसे यह भी स्वीकार नहीं कि एक भर्ती प्रक्रिया पूरी होने में चार-पांच वर्ष लग जाएं और इस बीच उसकी उम्र, ऊर्जा और उम्मीदें खत्म होती चली जाएं। डिजिटल युग में पली-बढ़ी यह पीढ़ी हर चीज में पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा करती है। इसलिए सरकारों के दावों और वास्तविकता के बीच का अंतर उसे तुरंत दिखाई देता है।
जेन जी की दूसरी बड़ी अपेक्षा संवाद है। यह पीढ़ी आदेश सुनने की बजाय अपनी बात सुने जाने की अपेक्षा रखती है। यदि सरकारें, विश्वविद्यालय, आयोग और राजनीतिक दल युवाओं से नियमित संवाद करें, उनकी शिकायतों का समयबद्ध समाधान दें और निर्णय प्रक्रिया को पारदर्शी बनाएं, तो असंतोष स्वतः कम हो सकता है। इसके विपरीत जब समस्याओं को टालने या आंदोलनों को केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा मानकर दबाने की कोशिश होती है, तब अविश्वास और गहरा होता है।
राजनीतिक दलों को भी यह समझना होगा कि जेन जी केवल नारों और भावनात्मक अपीलों से प्रभावित होने वाली पीढ़ी नहीं है। वह घोषणापत्र पढ़ती है, आंकड़ों की जांच करती है, तथ्यों की पड़ताल करती है और सोशल मीडिया के माध्यम से नेताओं की बातों की तुलना उनके काम से करती है। इसलिए रोजगार, शिक्षा, कौशल विकास, स्टार्टअप, अनुसंधान, डिजिटल अर्थव्यवस्था और सुशासन जैसे मुद्दे अब केवल नीति दस्तावेजों तक सीमित नहीं रह सकते; उनका असर जमीन पर दिखाई देना चाहिए।
देखा जाये तो जेन जी की सबसे बड़ी मांग बहुत सरल है। वह चाहते हैं एक ऐसा भारत, जहां प्रतिभा को अवसर मिले, व्यवस्था भरोसेमंद हो और भविष्य अनिश्चितता का पर्याय न बने। जो सरकारें और राजनीतिक दल इस संदेश को समझेंगे, वही आने वाले वर्षों की राजनीति का नेतृत्व करेंगे। और जो इसे केवल एक चुनावी नारा समझेंगे, उन्हें यह पीढ़ी उतनी ही तेजी से नकार भी सकती है, जितनी तेजी से वह किसी को लोकप्रिय बनाती है।
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