कटहल के छिलके से साफ होगा पानी, 10 मिनट में 90 फीसदी फ्लोराइड हटा
नई दिल्ली, 14 अक्टूबर (आईएएनएस) कटहल का जिस छिलके को अक्सर कचरा समझकर फेंक दिया जाता है, उसी से अब दूषित पानी को साफ करने का रास्ता निकला है। शोधकर्ताओं ने कटहल के छिलके से ऐसी विशेष सामग्री विकसित की है, जो 10 मिनट में पानी से 90 प्रतिशत से अधिक फ्लोराइड हटाने में सफल रही। इस नवाचार को पेटेंट भी मिल चुका है। यह रिसर्च राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) राउरकेला के शोधकर्ताओं ने की है।
इस तकनीक में कटहल के छिलकों से सक्रिय कार्बन तैयार किया जाता है। इसके बाद उसमें जिरकोनियम मिलाकर पानी से फ्लोराइड पकड़ने की क्षमता बढ़ाई जाती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह सामग्री खास तौर पर उन क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो सकती है, जहां भूजल में फ्लोराइड की अधिक मात्रा पेयजल की गुणवत्ता और लोगों के स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, पानी में फ्लोराइड की अधिक मात्रा से दांतों और हड्डियों से जुड़ी फ्लोरोसिस की समस्या हो सकती है।
देश के कई हिस्सों में भूजल में फ्लोराइड की मौजूदगी के कारण सस्ती और टिकाऊ जल शोधन तकनीकों की जरूरत महसूस की जा रही है। फ्लोराइड हटाने के लिए इस्तेमाल होने वाली कुछ मौजूदा तकनीकों की अपनी सीमाएं हैं। मसलन आरओ प्रक्रिया में काफी पानी व्यर्थ होता है और कैल्शियम व मैग्नीशियम जैसे उपयोगी खनिज भी पानी से बाहर निकल सकते हैं। वहीं, कुछ अन्य विधियों में रसायनों का इस्तेमाल करना पड़ता है। ऐसे में कृषि अपशिष्ट से तैयार यह नई सामग्री एक वैकल्पिक उपाय बन सकती है।
एनआईटी राउरकेला की प्रोफेसर सुस्मिता मिश्रा और शोधार्थी डॉ. प्रतिमा मिंज के शोध दल ने यह तकनीक विकसित की है। प्रो. मिश्रा ने बताया कि शोध का मुख्य उद्देश्य कृषि अपशिष्ट का उपयोग जल शुद्ध करने के लिए करना था। कटहल के छिलकों से तैयार सक्रिय कार्बन को जिरकोनियम से संशोधित करने के बाद प्रयोगशाला में उत्साहजनक परिणाम मिले। परीक्षणों में 1 से 5 मिलीग्राम प्रति लीटर फ्लोराइड वाले पानी पर इस सामग्री का प्रयोग किया गया। शोध दल ने 10 से 20 मिनट के भीतर 90 से 97 प्रतिशत से अधिक फ्लोराइड हटाने की क्षमता दर्ज की।
हालांकि, ये परिणाम प्रयोगशाला में जांची गई परिस्थितियों पर आधारित हैं। वास्तविक उपयोग में इसकी प्रभावशीलता का आकलन अभी किया जाना है। इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें फेंके जाने वाले कृषि अपशिष्ट को उपयोगी संसाधन में बदला गया है। इससे भविष्य में ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में घरों तथा सामुदायिक स्तर पर पानी साफ करने के विकल्प विकसित करने में मदद मिल सकती है।
शोध को प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर-4 तक पहुंचाया गया है। शोध दल ने बिजली और रसायनों की लागत को शामिल करते हुए इस सामग्री को तैयार करने की अनुमानित लागत करीब 37 रुपये प्रति ग्राम बताई है। अब टीम इसका भौतिक नमूना विकसित करने के साथ व्यावहारिक उपयोग, लंबे समय तक काम करने की क्षमता और संचालन लागत का आकलन करेगी।
--आईएएनएस
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मेरठ कोर्ट में पहले भी सुनाई जा चुकी है फांसी की सजा? जानें कब-कब सुनाया गया मृत्युदंड का फरमान
मेरठ के चर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड में अदालत के फैसले के बाद एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि क्या मेरठ की अदालत पहले भी किसी मामले में फांसी की सजा सुना चुकी है? इसका जवाब है- हां. मेरठ की अदालतों में पहले भी मृत्युदंड की सजा का फरमान सुनाया जा चुका है.
ऐसे मामले पहले भी सामने आए हैं, जिनमें आरोपियों को हत्या का दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड सुनाया गया था. हालांकि, किसी अदालत की ओर से फांसी की सजा सुनाने और उस सजा पर अंतिम रूप से अमल होने के बीच कई कानूनी प्रक्रियाएं होती हैं.
सौरभ राजपूत हत्याकांड में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को दोषी ठहराए जाने के बाद मेरठ की न्यायिक व्यवस्था और पुराने फैसलों को लेकर भी चर्चा हो रही है. आइए जानते हैं कि मेरठ में पहले किन मामलों में मृत्युदंड सुनाया गया और ऐसे मामलों में कानून की प्रक्रिया क्या होती है.
सौरभ राजपूत हत्याकांड ने फिर बढ़ाई चर्चा
मेरठ के सौरभ राजपूत हत्याकांड ने पूरे देश का ध्यान खींचा था. इस मामले में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला पर सौरभ की हत्या करने के आरोप लगे थे. मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखा और दोनों आरोपियों को दोषी ठहराने की मांग की.
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 30 सितंबर 2026 को मेरठ की जिला अदालत ने दोनों को दोषी ठहराया. अभियोजन पक्ष ने उनके लिए मृत्युदंड की मांग की थी.
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है. कोर्ट की ओर से किसी आरोपी को दोषी ठहराना और उसे फांसी की सजा सुनाना अलग-अलग न्यायिक चरण हैं. दोषसिद्धि के बाद कोर्ट को सजा के सवाल रप भी विचार करना होता है. इसलिए इस मामले में अंतिम सजा से संबंधित जानकारी को कोर्ट के आधिकारिक आदेश
के आधार पर ही बताया जाना चाहिए.
इस मामले के बाद यह जानने में लोगों की दिलचस्पी बढ़ी कि मेरठ की अदालतों में इससे पहले भी मृत्युदंड के फैसले सुनाए गए हैं या नहीं...
2007 का तिहरा हत्याकांड: पांच आरोपियों को सुनाई गई थी फांसी की सजा
मेरठ में मृत्युदंड के चर्चित पुराने मामलों में वर्ष 2007 का तिहरा हत्याकांड शामिल है. इस मामले में बनीसराय इलाके में डॉक्टर नसीरुद्दीन, उनके बेटे प्रिंस और मोहम्मद हसीन की हत्या हुई थी.
इस मामले की सुनवाई के बाद 4 अगस्त 2007 को कोर्ट ने पांच आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई थी. उस समय यह फैसला काफी चर्चा में आया था, क्योंकि एक ही मामले में पांच लोगों को मृत्युदंड दिया गया था.
हालांकि, सत्र कोर्ट का फैसला इस मामले का अंतिम न्यायिक पड़ाव नहीं रहा. आरोपियों ने उच्च अदालत में अपील की. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक 5 सितंबर 2008 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी मृत्युदंड की सजा को उम्रकैद में बदल दिया.
यह मामला बताता है कि निचली अदालत में फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद भी उच्च अदालत में फैसले की समीक्षा हो सकती है. अपील के दौरान साक्ष्यों, परिस्थितियों और कानून के आधार पर सजा में बदलाव किया जा सकता है.
छोटू उर्फ अजय का मामला: 2011 में सुनाया गया मृत्युदंड
मेरठ की अदालत में मृत्युदंड सुनाए जाने का एक अन्य उदाहरण छोटू उर्फ अजय से जुड़ा मामला है. उपलब्ध न्यायिक जानकारी के मुताबिक, मेरठ के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने 5 जनवरी 2011 को हत्या के मामले में छोटू उर्फ अजय को फांसी की सजा सुनाई थी.
इस मामले में भी मृत्युदंड के फैसले के बाद उच्च अदालत की न्यायिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण रही. ऐसे मामलों में केवल निचली अदालत के आदेश के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि फांसी की सजा अंतिम रूप से कायम रही या उस पर अमल हुआ.
मृत्युदंड के मामलों में उच्च अदालत की समीक्षा विशेष महत्व रखती है. कोर्ट को यह देखना होता है कि दोषिसिद्ध और सजा कानून और उलब्ध साक्ष्यों के अनुरूप हैं या नहीं.
इसलिए पुराने मामलों की चर्चा करते समय फैसले की तारीख के साथ-साथ अपील में आए परिणाम का उल्लेख करना भी जरूरी है.
क्या हर हत्या के मामले में फांसी हो सकती है?
भारतीय कानून में हत्या के मामले में मृत्युदंड का प्रावधान है, लेकिन यह हर दोषी को नहीं दिया जाता. कोर्ट अपराध की प्रकृति, उसकी गंभीरता, उपलब्ध साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों पर विचार करती है.
सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड देने के लिए 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' यानी अत्यंत दुर्लभ मामलों का सिद्धांत विकसित किया है. इसका मतलब है कि फांसी की सजा सामान्य नियम नहीं, बल्कि असाधारण परिस्थितियों में दी जाने वाली सजा है.
अदालत को यह भी विचार करना होता है कि क्या आजीवन कारावास जैसी दूसरी सजा पर्याप्त होगी या मामले की परिस्थितियां मृत्युदंड को उचित ठहराती हैं.
इसी वजह से दो अलग-अलग हत्या के मामलों में अदालतों के फैसले अलग हो सकते हैं. केवल अपराध की चर्चा या जनभावना के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी दोषी को मृत्युदंड मिलना चाहिए.
फांसी की सजा के बाद क्या होती है कानूनी प्रक्रिया?
सत्र अदालत द्वारा मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद भारतीय आपराधिक प्रक्रिया के तहत हाईकोर्ट की पुष्टि जरूरी होती है. हाईकोर्ट सजा और संबंधित रिकॉर्ड की समीक्षा करता है. वह मृत्युदंड की पुष्टि कर सकता है, सजा बदल सकता है या कानून के अनुसार अन्य आदेश दे सकता है.
इसके बाद परिस्थितियों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में अपील या अन्य कानूनी उपाय अपनाए जा सकते हैं. दोषी के पास संविधान के तहत दया याचिका का विकल्प भी हो सकता है.
इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मृत्युदंड जैसी अपरिवर्तनीय सजा में किसी प्रकार की न्यायिक त्रुटि न रह जाए. इसलिए किसी समाचार में 'फांसी की सजा सुनाई गई' और 'दोषी को फांसी दे दी गई' जैसे वाक्यों का इस्तेमाल अलग-अलग अर्थों में करना चाहिए.
मेरठ में पहले भी हुए हैं मृत्युदंड के फैसले
मेरठ की अदालतों में पहले भी मृत्युदंड सुनाए जाने के उदाहरण मौजूद हैं. वर्ष 2007 के तिहरे हत्याकांड में पांच आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई गई थी, जिसे बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उम्रकैद में बदल दिया. वहीं, छोटू उर्फ अजय के मामले में भी जनवरी 2011 में मृत्युदंड सुनाए जाने का उल्लेख न्यायिक रिकॉर्ड में मिलता है.
सौरभ राजपूत हत्याकांड ने इस विषय को फिर चर्चा में ला दिया है. हालांकि, किसी भी मामले में अदालत का वास्तविक फैसला, सजा और अपील का परिणाम आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड के आधार पर ही समझना चाहिए. मृत्युदंड के मामलों में दोषसिद्धि से लेकर अंतिम फैसले तक की कानूनी प्रक्रिया उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितना कि अदालत का प्रारंभिक आदेश.
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