मिथिला का ‘तरुआ’ बना विरासत की पहचान, कभी था गरीबी का सहारा
मिथिला का पारंपरिक व्यंजन ‘तरुआ’ आज क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है, लेकिन इसकी जड़ें अभाव के दौर से जुड़ी हैं. बुजुर्गों के अनुसार, कभी आर्थिक तंगी के समय बाग-बगीचों में मिलने वाले फूलों और पत्तियों से तरुआ बनाकर अतिथियों का सत्कार किया जाता था. समय के साथ यही साधारण व्यंजन परंपरा, स्वाद और गौरव का प्रतीक बन गया और अब तिलकोर, खम्महाउर व अन्य फूल-पत्तियों का तरुआ मिथिलांचल की खास पहचान माना जाता है.
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