एफएसएसएआई ने डाबर के भ्रामक दावे वाले कई उत्पादों की बिक्री पर रोक लगाई, शेयर करीब 3 प्रतिशत फिसला
नई दिल्ली, 4 अगस्त (आईएएनएस)। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने डाबर इंडिया लिमिटेड के खिलाफ कथित तौर पर 100 प्रतिशत शुद्ध जैसे भ्रामक दावे करने वाले खाद्य उत्पादों की बिक्री को लेकर रोक का आदेश जारी किया है।
खाद्य नियामक ने एफएमसीजी कंपनी के उन उत्पादों की बिक्री को रोकने का निर्देश दिया हैं, जिन पर 100 प्रतिशत नेचुरल,100 प्रतिशत प्योर,100 प्रतिशत प्यूरिटी गारंटीड और 100 प्रतिशत टेंडर कोकोनट वाटर जैसे दावे किए गए थे।
यह कार्रवाई खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की उस टिप्पणी के बाद की गई है, जिसमें कहा गया था कि ये दावे अस्पष्ट, अप्रमाणित और उपभोक्ताओं को गुमराह करने की संभावना रखते हैं।
नियामक के अनुसार, ऐसे दावों का उपयोग खाद्य सुरक्षा एवं मानक (विज्ञापन एवं दावे) विनियम, 2018 का उल्लंघन है।
एफएसएसएआई ने कहा कि डाबर हिमालयन ऑर्गेनिक एप्पल साइडर विनेगर और डाबर ऑर्गेनिक हनी पर एफएसएसएआई की वैध ऑर्गेनिक मंजूरी के बिना जैविक भारत लोगो दिखाया गया था, जो कथित तौर पर फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स (ऑर्गेनिक फ़ूड्स) रेगुलेशंस, 2017 का उल्लंघन है।
इसके अलावा, रेगुलेटर ने कहा कि डाबर होममेड कोकोनट मिल्क को 100 प्रतिशत शुद्धता के दावे के साथ बेचा गया, जिसकी इजाजत कंपाउंड फूड प्रोडक्ट्स के लिए नहीं है।
रेगुलेटर ने यह भी कहा कि कंपनी को गुमराह करने वाले 100 प्रतिशत दावों को बंद करने का निर्देश देने वाला नोटिस पहले भी दिया गया था, लेकिन कोई संतोषजनक सुधारात्मक कार्रवाई नहीं की गई।
एफएसएसएआई ने कंपनी को निर्देश दिया है कि वह पहचाने गए प्रोडक्ट्स की बिक्री तुरंत बंद करे और 15 दिनों के भीतर एक्शन टेकन रिपोर्ट (एटीआर) जमा करे।
इस डेवलपमेंट के बाद डाबर इंडिया के शेयर में गिरावट देखने को मिली है। सुबह 11:30 बजे यह 2.85 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 413.65 रुपए पर कारोबार कर रहा था।
बीते एक महीने में शेयर 8 प्रतिशत और बीते छह महीने में 17 प्रतिशत से ज्यादा लुढ़क चुका है।
--आईएएनएस
एबीएस
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
गट माइक्रोबायोम में बदलाव से कीमोथेरेपी हो सकती है ज्यादा असरदार, नई स्टडी में खुलासा
नई दिल्ली, 4 अगस्त (आईएएनएस)। कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कीमोथेरेपी को और ज्यादा असरदार बनाने की दिशा में वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता मिली है। अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास एमडी एंडरसन कैंसर सेंटर के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी तकनीक खोजी है, जिससे शरीर में मौजूद आंतों के बैक्टीरिया यानी गट माइक्रोबायोम में बदलाव कर कीमोथेरेपी की दवाओं को ट्यूमर तक अधिक मात्रा में पहुंचाया जा सकता है। यह अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल नेचर मैटेरियल्स में प्रकाशित हुआ है।
दरअसल, आजकल कई तरह के कैंसर के इलाज में नैनोपार्टिकल-आधारित कीमोथेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें दवा को बेहद छोटे कणों में पैक करके शरीर में भेजा जाता है, ताकि वह सीधे ट्यूमर तक पहुंच सके। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि दवा का बड़ा हिस्सा ट्यूमर तक पहुंचने से पहले ही लिवर साफ कर देता है। लिवर में मौजूद खास प्रतिरक्षा कोशिकाएं, जिन्हें कुप्फर सेल्स कहा जाता है, इन दवा कणों को खून से तेजी से हटाने लगती हैं। इसका नतीजा यह होता है कि मरीज को दी गई दवा का पूरा फायदा नहीं मिल पाता।
शोधकर्ताओं ने पाया कि इस पूरी प्रक्रिया में हमारी आंतों के बैक्टीरिया की भी बड़ी भूमिका होती है। ये बैक्टीरिया बाइल एसिड नामक रसायन बनाते हैं, जो लिवर की कोशिकाओं को संकेत भेजते हैं कि वे दवा को कितनी तेजी से साफ करें।
रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने मेट्रोनिडाजोल नाम की एक सामान्य एंटीबायोटिक का सीमित समय के लिए इस्तेमाल किया। इससे कुछ खास तरह के बैक्टीरिया कम हो गए और बाइल एसिड का स्तर भी घट गया। इसके बाद लिवर की कुप्फर कोशिकाएं कम सक्रिय हो गईं और उन्होंने दवा को पहले की तुलना में बहुत कम मात्रा में हटाया।
इसका फायदा यह हुआ कि कीमोथेरेपी की दवा शरीर में लगभग दोगुने समय तक बनी रही। इससे दवा ज्यादा मात्रा में ट्यूमर तक पहुंची, ट्यूमर की वृद्धि धीमी हुई और कई प्रकार के कैंसर के प्रीक्लिनिकल मॉडल में मरीजों के जीवित रहने की अवधि भी बढ़ी। यह असर कोलन, ब्रेस्ट, मेलानोमा और पैंक्रियाटिक कैंसर जैसे कई कैंसर मॉडलों में देखा गया।
वैज्ञानिकों ने यह भी जांचा कि यह असर एंटीबायोटिक की वजह से हुआ या वास्तव में गट माइक्रोबायोम की वजह से। इसके लिए उन्होंने फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांट (एफएमटी) का प्रयोग किया। इसमें एंटीबायोटिक दिए गए मॉडल के आंतों के बैक्टीरिया दूसरे मॉडल में स्थानांतरित किए गए। खास बात यह रही कि दूसरे मॉडल में भी बिना एंटीबायोटिक दिए वही सकारात्मक परिणाम मिले। इससे साबित हुआ कि असली बदलाव माइक्रोबायोम की वजह से हुआ, न कि दवा के सीधे प्रभाव से।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह खोज कैंसर के इलाज की सोच बदल सकती है। अब तक वैज्ञानिक केवल कीमोथेरेपी की दवा को बेहतर बनाने पर काम कर रहे थे, लेकिन यह अध्ययन बताता है कि मरीज के शरीर का माइक्रोबायोम भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
फिलहाल यह रिसर्च प्रीक्लिनिकल स्तर पर हुई है और इसे सीधे मरीजों पर लागू नहीं किया जा सकता। हालांकि, मेट्रोनिडाजोल पहले से मंजूर और सुरक्षित दवा है, इसलिए भविष्य में क्लिनिकल ट्रायल के जरिए यह देखा जा सकता है कि क्या कम अवधि के लिए इस एंटीबायोटिक का इस्तेमाल नैनोपार्टिकल आधारित कीमोथेरेपी के साथ करने से मरीजों को बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में गट माइक्रोबायोम और बाइल एसिड की जांच यह पता लगाने में भी मदद कर सकती है कि कौन-से मरीज कीमोथेरेपी से सबसे ज्यादा लाभ उठा सकते हैं। यदि आगे के अध्ययन सफल रहते हैं, तो कैंसर का इलाज केवल दवा और ट्यूमर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मरीज के माइक्रोबायोम को ध्यान में रखकर भी उपचार की नई रणनीतियां तैयार की जा सकेंगी।
--आईएएनएस
पीआईएम/एएस
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others
News Nation























