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भारत में ‘झूठी स्मृतियों’ का संकट क्या है? सुभाष काक के तर्क समझिए
सुभाष काक अपने लेख में तर्क देते हैं कि झूठी स्मृतियां केवल व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक समस्या नहीं, बल्कि समाज और राजनीति को प्रभावित करने वाली शक्ति भी हो सकती हैं. शिक्षा, जाति-व्यवस्था, प्राचीन भारतीय ज्ञान और आरक्षण पर उनके तर्क क्या हैं? जानिए पूरा विश्लेषण.
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