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गाजा बोर्ड ऑफ पीस की वैश्विक कशमकश

गाजा बोर्ड ऑफ पीस अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एक महत्वाकांक्षी पहल है, जो गाजा संघर्ष को सुलझाने के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर शांति स्थापना का एक नया मॉडल प्रस्तुत करती है। चूंकि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र संघ के पारंपरिक ढांचे से बाहर काम करने का अदद प्रयास है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई बहस छिड़ गई है। खासकर वैश्विक कशमकश बढ़ चुकी है, जिसके वैश्विक प्रभाव आने वाले वक्त में महसूस किए जाएंगे।

सवाल है कि आखिर अपनी ही बनाई पुरानी विश्व व्यवस्था की अनदेखी करते हुए अमेरिका बिल्कुल नई तरह की विश्व व्यवस्था क्यों बनाना चाहता है? ब्रेक के बाद वह अपनी ही नीतियों को क्यों बदल देता है। आखिर वह शेष दुनिया को अमेरिकी मुगालते में क्यों रखना चाहता है? आखिर चीन, रूस, भारत, फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे, स्वीडन जैसे कद्दावर देश ऐसे पीस बोर्ड से दूरी क्यों बनाए हुए हैं? खास बात यह कि आखिर गाजा बोर्ड ऑफ पीस के अंतर्राष्ट्रीय मायने क्या हैं? और इसके पीछे के वैश्विक निहितार्थ से किसको क्या फायदा और क्षति होने के कयास लगाये जा रहे हैं? 

आइए सबसे पहले इस बोर्ड के स्वरूप को जान लेते हैं। बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने 2025 में इसकी शुरुआत की, जहां खुद ही वे ही यानी पदेन अमेरिकी राष्ट्रपति इसके प्रमुख होंगे और अन्य सदस्य देश तीन-तीन साल के लिए चुने जाएंगे। वहीं, इसकी स्थायी सदस्यता के लिए 1 अरब डॉलर का योगदान जरूरी है, जबकि कार्यकारी बोर्ड में मार्को रुबियो, जेरेड कुशनर जैसे नाम शामिल हैं। यह बोर्ड गाजा के पुनर्निर्माण, प्रशासन और क्षेत्रीय समन्वय पर केंद्रित है। 

अलबत्ता, इसके गठन को लेकर जो वैश्विक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं उसमें अमेरिका के पिछलग्गू देश यानी पाकिस्तान, सऊदी अरब, कतर, तुर्की, यूएई जैसे 35 से अधिक देशों ने इसमें अपनी भागीदारी की पुष्टि की है। जबकि चीन, फ्रांस, नॉर्वे, स्वीडन ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताकर खारिज कर दिया है। खास बात यह है कि भारत जैसे अहम वैश्विक खिलाड़ी ने फिलिस्तीन समर्थन और यूएन-आधारित दो-राज्य समाधान की नीति के चलते अभी इस पर चुप्पी साध रखी है। 

जहां तक गाजा पीस बोर्ड के भविष्य के निहितार्थ की बात है तो यह बोर्ड यूएनएससी के समानांतर वैकल्पिक तंत्र बन सकता है, जो वैश्विक संघर्षों में मध्यस्थता करेगा। क्योंकि इसे यूएनओ ने 2027 तक सीमित मान्यता दी है, लेकिन रूस-चीन की असहमति से विवाद बढ़ा है। जबकि भारत जैसे उभरते गुटनिरपेक्ष देशों के लिए यह कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा की घड़ी है। यही वजह है कि गाजा बोर्ड ऑफ पीस की अंतरराष्ट्रीय वैधता सीमित और विवादास्पद बनी हुई है, क्योंकि यह यूएनएससी प्रस्ताव 2803 (2025) से 2027 तक की अस्थायी मंजूरी पर टिकी है। 

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देखा गया कि रूस-चीन जैसे देशों की असहमति से इसकी वैश्विक स्वीकार्यता कमजोर है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून पर सवाल उठाती है। जहां तक इसकी वैधता के आधार की बात है तो यूएनएससी ने इसे गाजा पुनर्निर्माण और विसैन्यीकरण के लिए अंतरिम वैधता प्रदान की, लेकिन यूएनओ के पूर्ण नियंत्रण के बिना। मसलन, बोर्ड को "अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यक्तित्व" दिया गया, जो फिलिस्तीनी तकनीशियनों की समिति और बहुराष्ट्रीय शांति बल के माध्यम से कार्य करता है। हालांकि, सदस्य चयन और जवाबदेही की कमी से इसकी आलोचना भी हो रही है।

जहां तक गाजा पीस बोर्ड के संभावित प्रभाव की बात है तो यह यूएनओ के समानांतर तंत्र के रूप में यूएनओ की एकाधिकार को चुनौती दे सकता है, खासकर वैश्विक संघर्षों में। वहीं, ट्रंप की आजीवन अध्यक्षता जैसी संरचना से लंबे समय में वैधता संकट गहरा सकता है। जबकि भारत जैसे देशों की चुप्पी से बहुपक्षीय संस्थाओं की प्रासंगिकता पर बहस तेज हो रही है। कहना न होगा कि रूस और चीन का गाजा बोर्ड ऑफ पीस में असहयोग अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों को कमजोर करता है, लेकिन बोर्ड की वैधता को पूरी तरह समाप्त नहीं करता। 

दरअसल यह असहमति बहुपक्षीय संस्थाओं की प्रासंगिकता पर सवाल उठाती है और वैकल्पिक गठबंधनों को बढ़ावा दे सकती है। जहां तक इस बोर्ड के कानूनी आधार की बात है तो रूस-चीन ने बोर्ड को यूएन चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के तहत "शक्ति राजनीति" का माध्यम बताकर खारिज किया, जो क्षेत्रीय संप्रभुता के हस्तक्षेप को प्रतिबंधित करता है। यूएनएससी प्रस्ताव 2803 की अस्थायी मंजूरी के बावजूद, इनकी वीटो शक्ति से स्थायी वैधता अवरुद्ध हो सकती है। 

जहां तक गाजा पीस बोर्ड के अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ की बात है तो यह बोर्ड को "सॉफ्ट पावर" तंत्र तक सीमित रखेगा, जहां अमेरिकी प्रभाव वाले देश ही मान्यता देंगे। जबकि लंबे समय में, यह अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में चुनौतियां जन्म दे सकता है, जैसे फिलिस्तीन या प्रभावित देशों द्वारा ICJ में अपील पहल संभव है। वहीं, भारत जैसे तटस्थ देशों को भी अतिरिक्त कूटनीतिक दबाव झेलना पड़ेगा। 

देखा जाए तो भारत गाजा बोर्ड ऑफ पीस पर रणनीतिक चुप्पी अपनाए हुए है, जो बहुपक्षीय संस्थाओं को प्राथमिकता और संतुलित कूटनीति को दर्शाता है। भारत का यह रुख फिलिस्तीन समर्थन, इसराइल के साथ मजबूत संबंधों और यूएन सुधारों पर जोर को अधिक संतुलित करता है। दरअसल भारत की चुप्पी के कारण हैं, क्योंकि वह डांवांडोल अमेरिकी कूटनीति पर ज्यादा एतबार नहीं कर सकता है। भारत के साथ अमेरिकी नीतिगत चालबाजी के चलते ही इंडिया ने दावोस 2026 में गाजा बोर्ड ऑफ पीस के लॉन्च में भाग नहीं लिया, क्योंकि यह यूएन प्रस्तावों पर आधारित दो-राज्य समाधान से भटकता दिखता है।

चूंकि पीएम मोदी ब्राजील, जर्मनी, जापान और भारत जैसे जी-फोर (G4) देशों के साथ यूएनएससी विस्तार पर फोकस कर रहे हैं, न कि अमेरिकी वैकल्पिक तंत्र पर। इसलिए भी भारत ने इससे दूरी दिखाई है। इसके अलावा, इस बोर्ड में अमेरिकी पिल्ले पाकिस्तान की भागीदारी से भी भारत को क्षेत्रीय संतुलन की चिंता है। इसलिए भारत भविष्य की रणनीति पर बल दे रहा है। अपनी इसी कूटनीति के तहत भारत यूएन सुधारों को आगे बढ़ाते हुए ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करेगा, और गाजा बोर्ड ऑफ पीस को अप्रत्यक्ष रूप से निगरानी में रखेगा। वहीं, यदि यह बोर्ड वैश्विक संघर्षों में विस्तार चाहेगा, तो भारत तटस्थता बनाए रखकर ICJ या यूएन मंचों पर सक्रिय हो सकता है। इसप्रकार भारत की यह "रणनीतिक स्वायत्तता" वाली नीति उसकी लंबी परंपरा को मजबूत करती है। 

कुलमिलाकर भारत की गाजा बोर्ड ऑफ पीस पर चुप्पी रणनीतिक स्वायत्तता और बहुपक्षीय कूटनीति को मजबूत करने की नीति का हिस्सा है। भारत का यह रुख फिलिस्तीन समर्थन, इसराइल के साथ सैन्य सहयोग और अमेरिकी दबाव से संतुलन बनाए रखने के लिए अपनाया गया है। जहाँ तक ऐतिहासिक फिलिस्तीन नीति की बात है तो भारत ने 1947 से फिलिस्तीन के आत्मनिर्णय और दो-राज्य समाधान का समर्थन किया है, जो यूएन प्रस्तावों पर आधारित है। जबकि ट्रंप का यह बोर्ड यूएन ढांचे से बाहर होने के चलते भारत ने इसका खुला समर्थन टाल दिया, ताकि ग्लोबल साउथ में विश्वसनीयता बनी रहे। इससे इसराइल-अमेरिका संतुलन भी बना रहेगा। 

चूंकि इसराइल के साथ रक्षा सौदे (जैसे स्पाइस मिसाइलें) और अमेरिका से तकनीकी सहयोग महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बोर्ड में पाकिस्तान की मौजूदगी से क्षेत्रीय जोखिम बढ़ता है। लिहाजा भारत की चुप्पी कूटनीतिक लचीलापन देती है, जहां भारत मानवीय सहायता जारी रख सकता है बिना राजनीतिक बंधन के। वहीं भारत यूएन सुधार पर फोकस कर रहा है, जहां पीएम मोदी G4 (भारत-ब्राजील-जर्मनी-जापान) के साथ यूएनएससी विस्तार पर जोर दे रहे हैं, न कि वैकल्पिक तंत्रों पर। इसप्रकार यह "देखो और इंतजार करो" रणनीति बोर्ड की वैधता की परीक्षा के बाद निर्णय लेगी। 

यह ठीक है कि भारत को गाजा बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने से कूटनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक लाभ मिल सकते हैं, खासकर अमेरिका के साथ मजबूत साझेदारी को देखते हुए।  हालांकि, यह फिलिस्तीन नीति और ग्लोबल साउथ की विश्वसनीयता से टकरा सकता है। जहां तक इसके कूटनीतिक लाभ की बात है तो भारत को अमेरिका-इसराइल के साथ उच्च-स्तरीय पहुंच मिलेगी, जो मध्य पूर्व में प्रभाव बढ़ाएगा। वहीं वैश्विक शांति मंच पर नेतृत्वकारी भूमिका से यूएनएससी स्थायी सदस्यता की दावेदारी मजबूत होगी। इसलिए यहां पर पाकिस्तान की मौजूदगी के बावजूद, भारत अपना अलग पहचान बना सकता है।

जहां तक भारत के लिए आर्थिक अवसर की बात है तो गाजा की पुनर्निर्माण परियोजनाओं में भारतीय कंपनियां (जैसे L&T) को अनुबंध मिल सकते हैं, जो बुनियादी ढांचे निर्यात को बढ़ावा देंगे। वहीं, इसकी स्थायी सदस्यता के लिए 1 अरब डॉलर निवेश से लंबे समय में लाभदायक साझेदारी बन सकती है। जहां तक रणनीतिक फायदे की बात है तो मानवीय सहायता के जरिए गाजा में सॉफ्ट पावर बढ़ेगा, जो इसराइल से रक्षा सौदों को सुरक्षित रखेगा। वहीं बोर्ड के विस्तार से अन्य क्षेत्रीय विवादों में मध्यस्थता का मौका मिलेगा। 

गाजा बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने से भारत को अमेरिका के साथ कूटनीतिक साझेदारी मजबूत करने और मध्य पूर्व में प्रभाव बढ़ाने का प्रमुख लाभ मिलेगा। यह वैश्विक शांति पहलों में नेतृत्वकारी भूमिका प्रदान करेगा, जो यूएनएससी स्थायी सदस्यता की दावेदारी को बल देगा। इससे अमेरिका के साथ निकटता बढ़ेगी। ट्रंप प्रशासन के कोर सदस्यों (जैसे जेरेड कुशनर) के साथ प्रत्यक्ष संवाद से द्विपक्षीय संबंधों में गहराई आएगी। QUAD और I2U2 जैसे मंचों का विस्तार संभव होगा, जो इंडो-पैसिफिक रणनीति को मजबूत करेगा। 

जहां तक मध्य पूर्व प्रभाव की बात है तो सऊदी, यूएई जैसे सहयोगियों के साथ संयुक्त मंच पर भारत की आवाज मजबूत होगी, जो ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार समझौतों को आसान बनाएगा। वहीं पाकिस्तान की उपस्थिति के बावजूद, भारत क्षेत्रीय मध्यस्थ के रूप में उभर सकता है। इससे उसकी वैश्विक छवि मजबूत होगी। ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधि के नाते मानवीय योगदान से सॉफ्ट पावर बढ़ेगा, जो फिलिस्तीन नीति को संतुलित रखते हुए इसराइल सहयोग को सुरक्षित करेगा। दावोस जैसे मंचों पर नेतृत्व से बहुपक्षीय कूटनीति में नया स्थान बनेगा। 

भारत का गाजा बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का निर्णय पड़ोसी देशों, खासकर पाकिस्तान पर महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रभाव डालेगा। यह क्षेत्रीय संतुलन को बदल सकता है, जहां पाकिस्तान की मौजूदा भागीदारी के बावजूद भारत का प्रवेश प्रतिस्पर्धा बढ़ाएगा। इसका पाकिस्तान पर प्रभाव पड़ेगा। पाकिस्तान ने पहले ही समर्थन की घोषणा की है, लेकिन भारत की भागीदारी से बोर्ड में द्विपक्षीय तनाव उभर सकता है। यह कश्मीर जैसे मुद्दों पर अप्रत्यक्ष दबाव डालेगा, क्योंकि अमेरिकी मंच पर भारत की मजबूत उपस्थिति पाकिस्तान को अलग-थलग कर सकती है।

जहां तक अन्य पड़ोसियों पर असर की बात है तो बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों को मध्य पूर्व शांति पहल से अप्रत्यक्ष लाभ मिलेगा, जैसे मानवीय सहायता और व्यापार मार्ग। हालांकि, चीन के प्रभाव वाले नेपाल-मालदीव में भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका से संतुलन की होड़ तेज हो सकती है। जहां तक क्षेत्रीय संतुलन की बात है तो कुल मिलाकर, यह निर्णय दक्षिण एशिया में भारत को अमेरिका-प्रायोजित मंचों पर नेतृत्व देगा, जो SAARC जैसे क्षेत्रीय मंचों को कमजोर कर सकता है। पड़ोसी देशों को नई कूटनीतिक गतिशीलता का सामना करना पड़ेगा। 

भारत का गाजा बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होना क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग में अमेरिका-केंद्रित गठबंधनों को मजबूत कर सकता है, लेकिन पाकिस्तान के साथ तनाव बढ़ा सकता है। यह QUAD और I2U2 जैसे मंचों को मध्य पूर्व तक विस्तार देगा, जहां भारत की भूमिका बढ़ेगी। वहीं दक्षिण एशिया में बदलाव भी होगा। खासकर पाकिस्तान की बोर्ड उपस्थिति के बावजूद भारत का प्रवेश कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा लाएगा, जो कश्मीर जैसे मुद्दों पर अप्रत्यक्ष दबाव डालेगा। वहीं SAARC जैसे पारंपरिक मंच कमजोर हो सकते हैं, जबकि द्विपक्षीय सुरक्षा संवाद (भारत-श्रीलंका, भारत-बांग्लादेश) मजबूत होंगे। जहां तक इसके व्यापक सुरक्षा प्रभाव की बात है तो चीन के असहयोग से इंडो-पैसिफिक में नया ध्रुवीकरण हो सकता है, जहां भारत अमेरिका के साथ समुद्री सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी सहयोग बढ़ाएगा। वहीं पड़ोसी देशों को नई गतिशीलता का सामना करना पड़ेगा, जैसे नेपाल-मालदीव में संतुलन की होड़। 

गाजा बोर्ड ऑफ पीस में भारत की भागीदारी से समुद्री सुरक्षा सहयोग में इंडो-पैसिफिक और मध्य पूर्व की ओर विस्तार होगा, जहां QUAD और I2U2 जैसे गठबंधनों को मजबूती मिलेगी। वहीं अमेरिका के साथ संयुक्त नौसैनिक अभ्यास बढ़ेंगे, जो हिंद महासागर में चीन के प्रभाव को संतुलित करेंगे। जहां तक हिंद महासागर फोकस की बात है तो भारत को गाजा तट से लाल सागर तक समुद्री मार्गों की निगरानी में भूमिका मिलेगी, जो ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार सुरक्षा को मजबूत करेगा। वहीं मालदीव, श्रीलंका जैसे पड़ोसियों के साथ कोलंबो सिक्योरिटी कॉन्क्लेव (CSC) के तहत क्षमता निर्माण तेज होगा। जहां तक रणनीतिक बदलाव की बात है तो पाकिस्तान की बोर्ड उपस्थिति से अरब सागर में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, लेकिन भारत अमेरिकी खुफिया साझा करने से पनडुब्बी निगरानी और एंटी-पाइरेसी ऑपरेशंस में आगे रहेगा। कुल मिलाकर, यह SAGAR विजन को मध्य पूर्व तक ले जाएगा। 

- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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इतिहास का सबसे लंबा अनुत्तरित प्रश्न नेताजी की मौत

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत का रहस्य आज भी अनसुलझा है। दरअसल उनकी मृत्यु के संबंध में कई दशकों से यही दावा किया जाता रहा है कि 18 अगस्त 1945 को सिंगापुर से टोक्यो (जापान) जाते समय ताइवान के पास फार्मोसा में उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था और उस हवाई दुर्घटना में उनका निधन हो गया था। नेताजी ने 16 अगस्त 1945 को टोक्यो से ताइपेई के लिए उड़ान भरी थी और जापानी द्वितीय विश्व युद्ध का उनका विमान 18 अगस्त की सुबह ताइपेई के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। उसके बाद जापान सरकार द्वारा घोषणा की गई थी कि उस दुर्घटना में विमान में सवार सभी 25 लोगों की मौत हो गई, जिनमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस भी शामिल थे। 18 अगस्त 1945 को ताइवान के ताइपेई में विमान दुर्घटना में उनकी मौत की जापान सरकार द्वारा की गई आधिकारिक घोषणा को भारत सरकार ने भी स्वीकार कर लिया था लेकिन आज भी कई लोग इसे मानने को तैयार नहीं हैं। दरअसल उनके जीवित होने और गुमनामी में जीवन जीने के दावे किए जाते रहे हैं और इस विषय पर कई बार जांच भी हुई है। हालांकि नेताजी के जीवित होने का दावा करने वाले लोगों ने कई बार अपने दावों का समर्थन करने के लिए सबूत पेश किए लेकिन उन सबूतों को प्रायः संदिग्ध माना गया है और कहा जाता रहा है कि उनके जीवित होने के दावे के समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं हैं।

दरअसल नेताजी का शव कभी नहीं मिला और कुछ अन्य कारणों से भी उनकी मौत के दावों पर आज तक विवाद बरकरार है। उनकी मृत्यु का रहस्य जानने के लिए विभिन्न सरकारों द्वारा पूर्व में कुछ आयोगों का गठन भी किया जा चुका है और कोलकाता हाईकोर्ट द्वारा नेताजी के लापता होने के रहस्य से जुड़े खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की मांग पर सुनवाई के लिए स्पेशल बेंच भी गठित की गई किन्तु अभी तक रहस्य से पर्दा नहीं उठा है। फैजाबाद के गुमनामी बाबा से लेकर छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले तक में नेताजी के होने संबंधी कई दावे भी पिछले दशकों में पेश हुए किन्तु सभी की प्रामाणिकता संदिग्ध रही और नेताजी की मौत का रहस्य यथावत बरकरार है। हालांकि जापान सरकार बहुत पहले ही इस बात की पुष्टि कर चुकी है कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान में कोई विमान हादसा हुआ ही नहीं और भारत सरकार द्वारा कुछ समय पूर्व सार्वजनिक की गई नेताजी से संबंधित कुछ गोपनीय फाइलों में मिले एक नोट से तो यह सनसनीखेज खुलासा भी हुआ कि 18 अगस्त 1945 को हुई कथित विमान दुर्घटना के बाद भी नेताजी ने तीन बार 26 दिसम्बर 1945, 1 जनवरी 1946 तथा फरवरी 1946 में रेडियो द्वारा राष्ट्र को सम्बोधित किया था। इस खुलासे के बाद से ही नेताजी की मौत का रहस्य और गहरा गया था।

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नेताजी के जीवित रहने को लेकर किए गए विभिन्न दावों में कहा गया कि वे विमान दुर्घटना में नहीं मारे गए थे बल्कि जीवित बच गए थे और उन्होंने अपने जीवन का बाकी हिस्सा गुप्त रूप से बिताया। ऐसे ही दावों में से एक दावा यह भी था कि विमान दुर्घटना में नेताजी को गंभीर रूप से चोटें लगी थी लेकिन वे जीवित बच गए थे और उन्हें एक जापानी अस्पताल में ले जाया गया था, जहां उनका इलाज किया गया और बाद में उन्हें सोवियत संघ ले जाया गया, जहां उन्हें एक गुप्त शिविर में रखा गया। एक अन्य दावा यह भी था कि नेताजी ने विमान दुर्घटना में बचने के लिए अपना रूप बदल लिया था। उन्होंने अपना नाम और पहचान बदल ली थी और एक गुप्त जीवन जीने लगे थे। कुछ लोगों ने यह दावा भी किया कि उन्होंने नेताजी को गुप्त रूप से रहने के दौरान देखा है। हालांकि इन तमाम दावों में से किसी का भी कोई पुख्ता सबूत कभी नहीं मिला लेकिन इन दावों को लेकर सच्चाई जानने को लेकर लोगों में सदैव उत्सुकता रही है। उनकी मौत के रहस्य को सुलझाने के लिए कई बार जांच आयोग भी बैठाए गए, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण जांच आयोग न्यायमूर्ति ताराचंद की अध्यक्षता में 1956 में बैठाया गया था। ताराचंद आयोग ने अपने निष्कर्ष में कहा था कि नेताजी की मृत्यु विमान दुर्घटना में हुई थी। आयोग ने कहा था कि नेताजी के जीवित रहने के दावे के समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं है लेकिन आयोग के निष्कर्षों को कई लोगों ने चुनौती दी थी, जिनका कहना था कि आयोग ने नेताजी के जीवित रहने के दावों की पर्याप्त जांच नहीं की थी। आज भी दावे के साथ यह कहना मुश्किल है कि नेताजी की मृत्यु कैसे हुई थी। हो सकता है कि वे विमान दुर्घटना में मारे गए हों या यह भी हो सकता है कि वे जीवित बच गए हों और उन्होंने अपना जीवन गुप्त रूप से बिताया हो। कुल मिलाकर, उनकी मौत का रहस्य आज भी अनसुलझा है और इस रहस्य को सुलझाने के लिए और अधिक जांच की आवश्यकता है।

- योगेश कुमार गोयल
(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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