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विकसित भारत के दृष्टिगत आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के मायने

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूत स्थिति को दर्शाता है, जिसमें वैश्विक चुनौतियों के बावजूद उच्च वृद्धि दर का अनुमान है। देखा जाए तो यह बजट 2026-27 से पहले नीतिगत दिशा तय करता है और विकसित भारत 2047 के लक्ष्यों पर जोर देता है। यही वजह है कि आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में वैसे नीतिगत सुधारों पर बल दिया गया है जो आत्मनिर्भरता, रोजगार सृजन और दीर्घकालिक विकास को बढ़ावा दें। कहना न होगा कि ये सभी सुझाव वैश्विक चुनौतियों के बीच लचीलेपन और संरचनात्मक परिवर्तन पर केंद्रित हैं।

जहां तक इस आर्थिक सर्वेक्षण की मुख्य विशेषताओं की बात है तो इस सर्वेक्षण में वित्त वर्ष 2026 के लिए जीडीपी वृद्धि 7.4% और जीवीए 7.3% का प्रथम अनुमान दिया गया है, जबकि एफ वाई (FY) 2027 के लिए 6.8-7.2% का पूर्वानुमान व्यक्त किया गया है। वहीं, निजी उपभोग (जीडीपी का 61.5%) और निवेश (30%) प्रमुख चालक हैं, साथ ही मुद्रास्फीति अप्रैल-दिसंबर 2025 में औसतन 1.7% रही। जबकि राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष (FY) 2026 में 4.4% तक कम होने का लक्ष्य है, जो नीतिगत स्थिरता दर्शाता है।

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कुल मिलाकर अर्थिक सर्वेक्षण के प्रमुख क्षेत्रीय प्रदर्शन इस प्रकार हैं-  क्षेत्र - मुख्य उपलब्धियाँ 

विनिर्माण:  उच्च-तकनीकी गतिविधियों का 46.3% योगदान है; जबकि मोबाइल उत्पादन में 30 गुना वृद्धि (FY15-FY25) हुई है।

कृषि: खाद्यान्न उत्पादन 3577.3 लाख मीट्रिक टन हो चुका है; जबकि पशुपालन में 6.1% वृद्धि दर्ज की गई है।

सेवाएँ:  जीवीए में 9.3% वृद्धि (H1 FY26) हुई है; जबकि वैश्विक निर्यात में 4.3% हिस्सा हो चुका है।

बुनियादी ढांचा: राजमार्ग 60% बढ़े हैं; जबकि विदेशी मुद्रा भंडार $701.4 अरब पर पहुंच चुका है।

इस प्रकार ये आंकड़े उत्साहित करते हैं, क्योंकि जहां विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाऐं संघर्ष कर रही हैं, वही भारतीय अर्थव्यवस्था फर्राटे भर रही है।  

जहां तक आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के नीतिगत निहितार्थ की बात है तो यह सर्वेक्षण आत्मनिर्भरता, स्वदेशी और रणनीतिक लचीलेपन पर जोर देता है, जिसमें पीएलआई (PLI) योजनाओं से 12.6 लाख नौकरियाँ सृजित हुईं हैं। यह ग्रामीण रोजगार में मनरेगा के स्थान पर 'विकसित भारत-जी राम जी' मिशन और एआई (AI) तथा स्वच्छ ऊर्जा पर फोकस सुझाता है, जो रोजगार-सघन विकास को बढ़ावा देगा। कुल मिलाकर, यह उच्च वृद्धि, कम महंगाई और समावेशी नीतियों से 2047 के विकसित भारत लक्ष्य को मजबूत बनाता है।

कहना न होगा कि आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में उन नीतिगत सुधारों पर जोर दिया गया है जो आत्मनिर्भरता, रोजगार सृजन और दीर्घकालिक विकास को बढ़ावा दें। ये सुझाव वैश्विक चुनौतियों के बीच लचीलेपन और संरचनात्मक परिवर्तन पर केंद्रित हैं। यदि ग्रामीण रोजगार सुधार की दृष्टि से देखा जाए तो मनरेगा के स्थान पर 'विकसित भारत-जी राम जी अधिनियम 2025' की स्थापना का सुझाव दिया गया है, जो जवाबदेही बढ़ाएगा, अवसंरचना सुधरेगी और आय सुरक्षा मजबूत करेगा। यह ग्रामीण रोजगार को विकसित भारत 2047 के अनुरूप संरेखित करेगा।

वहीं, स्वदेशी और उत्पादन रणनीति के क्षेत्र में अनुशासित स्वदेशी अपनाने, निवेश लागत कम करने, उन्नत विनिर्माण मजबूत करने और रणनीतिक अपरिहार्यता की त्रिस्तरीय रणनीति का आह्वान किया गया है। जबकि राष्ट्रीय इनपुट लागत न्यूनीकरण रणनीति के तहत संसाधनों को किफायती बनाकर निर्यात और रोजगार बढ़ेगा। वहीं, एआई (AI) और प्रौद्योगिकी पर फोकस के तहत एआई (AI) को भारत की पूँजी, ऊर्जा और बाजार की वास्तविकताओं के अनुरूप अपनाने पर जोर दिया गया है, जबकि डेटा को रणनीतिक संसाधन मानते हुए घरेलू मूल्य बनाए रखने का ढांचा सुझाया गया।

वहीं, संप्रभु एआई (AI) बनाम एप्लीकेशन्स के ट्रेड-ऑफ बैलेंस करने की सिफारिश की गई है। जबकि ऊर्जा और पर्यावरण सुधार के दृष्टिगत राष्ट्रीय न्यूक्लियर एनर्जी मिशन को ₹20,000 करोड़ आवंटन से 2047 तक 100 GW क्षमता का लक्ष्य ,निर्धारित किया गया है। जबकि सौर/पवन ट्रांजिशन के संसाधन तीव्रता पर ध्यान देने की आवश्यकता जताई गई है। वहीं, PPP ढांचे को ट्रांजेक्शन-सेंट्रिक से सिस्टम-लेवल मार्केट बिल्डिंग की ओर ले जाना महत्वपूर्ण पहल है।

वहीं, अन्य प्रमुख सुझाव के दृष्टिगत श्रम कोड्स लागू कर 77 लाख नौकरियाँ सृजित करना और गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा जैसी महत्वपूर्ण फहल की गई है। जबकि डिजिटल कृषि मिशन, ई-नाम विस्तार और पीएम (PM) किसान जैसी योजनाओं से किसान आय सुरक्षा की जरूरत पर बल दिया गया है। वहीं, संस्थागत क्षमता गहराई और संरचनात्मक सुधारों से संप्रभु रेटिंग सुधार जैसी दूरदर्शिता पूर्ण पहल की गई है। कहना न होगा कि इन नीतिगत सुधारों से आत्मनिर्भरता, रोजगार सृजन और दीर्घकालिक विकास को बढ़ावा मिलेगा। 

- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

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हिंसा के दौर में गांधी के सिद्धांतों की प्रासंगिकता

2 अक्तूबर 1869 को पोरबंदर में जन्मे महात्मा गांधी जीवन पर्यन्त देशवासियों के लिए आदर्श नायक बने रहे। देश के स्वतंत्रता संग्राम में उनके अविस्मरणीय योगदान से पूरी दुनिया सुपरिचित है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नायकों में से एक महात्मा गांधी का आज 78वां बलिदान दिवस है, जिनकी 30 जनवरी 1948 को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। अहिंसा की राह पर चलते हुए भारत को ब्रिटिश गुलामी से मुक्ति दिलाने वाले गांधी जी ने पूरी दुनिया को अपने विचारों से प्रभावित किया था। अपने अनुभवों के आधार पर उन्होंने कई किताबें लिखी, जो हमें आज भी जीवन की नई राह दिखाती हैं क्योंकि उनके ये अनुभव, उनके विचार आज भी उतने ही सार्थक हैं, जितने उस दौर में थे। सही मायनों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी देश के करोड़ों युवाओं के पथ प्रदर्शक हैं। उनके जीवन के तीन महत्वपूर्ण सूत्र थे, जिनमें पहला था सामाजिक गंदगी दूर करने के लिए झाडू का सहारा। दूसरा, जाति-पाति और धर्म के बंधन से ऊपर उठकर सामूहिक प्रार्थना को बल देना। तीसरा, चरखा, जो आगे चलकर आत्मनिर्भरता और एकता का प्रतीक माना गया।

गांधी जी प्रायः कहा करते थे कि प्रसन्नता ही एकमात्र ऐसा इत्र है, जिसे आप दूसरों पर डालते हैं तो उसकी कुछ बूंदें आप पर भी गिरती हैं। वे कहते थे कि किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके कपड़ों से नहीं, उसके चरित्र से होती है। दूसरों की तरक्की में बाधा बनने वालों और नकारात्मक सोच वालों में सकारात्मकता का बीजारोपण करने के उद्देश्य से ही उन्होंने कहा था कि आंख के बदले आंख पूरी दुनिया को ही अंधा बना देगी। लोगों को समय की महत्ता और समय के सही सदुपयोग के लिए प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा था कि जो व्यक्ति समय को बचाते हैं, वे धन को भी बचाते हैं और इस प्रकार बचाया गया धन भी कमाए गए धन के समान ही महत्वपूर्ण है। वह कहते थे कि आप जो कुछ भी कार्य करते हैं, वह भले ही कम महत्वपूर्ण हो सकता है किन्तु सबसे महत्वपूर्ण यही है कि आप कुछ करें। लोगों को जीवन में हर दिन, हर पल कुछ न कुछ नया सीखने के लिए प्रेरित करते हुए गांधी जी कहा करते थे कि आप ऐसे जिएं, जैसे आपको कल मरना है लेकिन सीखें ऐसे कि आपको हमेशा जीवित रहना है। उनकी बातों का देशवासियों के दिलोदिमाग पर गहरा असर होता था।

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महात्मा गांधी के विचारों में ऐसी शक्ति थी कि विरोधी भी उनकी तारीफ किए बगैर नहीं रह सकते थे। ऐसे कई किस्से भी सामने आते हैं, जिससे उनकी ईमानदारी, स्पष्टवादिता, सत्यनिष्ठा और शिष्टता की स्पष्ट झलक मिलती है। एक बार महात्मा गांधी सरोजिनी नायडू के साथ बैडमिंटन खेल रहे थे। सरोजिनी नायडू के दाएं हाथ में चोट लगी थी। यह देखकर गांधी जी ने भी अपने बाएं हाथ में ही रैकेट पकड़ लिया। सरोजिनी नायडू का ध्यान जब इस ओर गया तो वह खिलखिलाकर हंस पड़ी और कहने लगी, ‘आपको तो यह भी नहीं पता कि रैकेट कौनसे हाथ में पकड़ा जाता है?’ इस पर बापू ने जवाब दिया, ‘आपने भी तो अपने दाएं हाथ में चोट लगी होने के कारण बाएं हाथ में रैकेट पकड़ा हुआ है और मैं किसी की भी मजबूरी का फायदा नहीं उठाना चाहता। अगर आप मजबूरी के कारण दाएं हाथ से रैकेट पकड़कर नहीं खेल सकती तो मैं अपने दाएं हाथ का फायदा क्यों उठाऊं?’

जिस समय द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ, उस समय देश के अधिकांश नेता इस बात के पक्षधर थे कि देश को अंग्रेजों से आजाद कराने का अब बिल्कुल सही मौका है और इस स्वर्णिम अवसर का लाभ उठाते हुए उन्हें इस समय देश में बड़े पैमाने पर आन्दोलन छेड़ देना चाहिए। दरअसल उन सभी का मानना था कि अंग्रेज सरकार द्वितीय विश्व युद्ध में व्यस्त रहने के कारण भारतवासियों के इस आन्दोलन का सामना नहीं कर पाएगी और आखिरकार उसे उनके इस राष्ट्रव्यापी आन्दोलन के समक्ष सिर झुकाना ही पड़ेगा और इस प्रकार अंग्रेजों को भारत को स्वतंत्र करने पर बड़ी आसानी से विवश किया जा सकेगा। जब यही बात गांधी जी के सामने उठाई गई तो उन्होंने अंग्रेजों की मजबूरी से फायदा उठाने से इन्कार कर दिया। हालांकि उस दौरान अंग्रेजों के खिलाफ गांधी जी ने आन्दोलन तो जरूर चलाया लेकिन उनका वह आन्दोलन सामूहिक न होकर व्यक्तिगत स्तर पर किया गया आन्दोलन ही था।

- योगेश कुमार गोयल
(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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